संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
[ ९ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| १९१. चातुर्मास्यमें इष्ट वस्तुके परित्याग तथा नियम-पालनका महत्त्व .................................................... | ६४९ |
| १९२. चातुर्मास्यमें विशेष-विशेष तप और भगवान्की षोडशोपचार पूजाका क्रम ................................. | ६५१ |
| १९३. ब्रह्माजीके द्वारा मानसी और शारीरिक सृष्टिका प्रादुर्भाव, चारों वर्णोंके धर्म तथा शूद्र जातियोंके भेदोंका वर्णन .................................................... | ६५४ |
| १९४. पैजवन शूद्र और महर्षि गालवका संवाद तथा शालग्राम-शिलाके पूजनका महत्त्व .................... | ६५६ |
| १९५. सतीका देहत्याग, पार्वतीविवाह, भगवान् शिवका हरिहररूपमें प्राकट्य और शालग्राम-शिलाका महत्त्व .................................................... | ६५८ |
| १९६. शालग्राम-पूजन, द्वादशाक्षर मन्त्र एवं राम-नामकी महिमा .................................................... | ६६१ |
| १९७. भगवान् शिवका नर्मदेश्वर शिवलिंगरूप होना तथा गालव-शूद्र-संवादका उपसंहार .................... | ६६३ |
| १९८. महादेवजीके द्वारा पार्वतीके प्रति ध्यानयोग एवं ज्ञानयोगका निरूपण ............................................ | ६६५ |
| १९९. ज्ञानयोग और उसके साधन, स्कन्दस्वामीका सेनापतित्व और कौमारव्रत ................................. | ६६६ |
| ( ब्रह्मोत्तरखण्ड ) | |
| २००. शिवके षडक्षर एवं पंचाक्षर मन्त्रका माहात्म्य, राजा दाशार्ह तथा रानी कलावतीकी कथा .... | ६६९ |
| २०१. शिवरात्रिको शिवपूजनका महत्त्व, राजा मित्रसहका वसिष्ठके शापसे राक्षस होकर ब्राह्मणकी हत्या करना और गौतमजीका उन्हें गोकर्णक्षेत्रकी महिमा सुनाना .................................................... | ६७१ |
| २०२. गोकर्णक्षेत्रमें शिवरात्रिके शिव-पूजनके माहात्म्यसे एक चाण्डालीका परमधामगमन .......................... | ६७४ |
| २०३. शिव-पूजाकी महिमाके विषयमें परम शिवभक्त राजा चन्द्रसेन और भक्त श्रीकर गोपकी अद्भुत कथा .................................................... | ६७७ |
| २०४. प्रदोषमें शिवपूजनकी अवहेलनासे दोषकी प्राप्तिके प्रसंगमें विदर्भराज और उसके पुत्रकी कथा | ६८० |
| २०५. प्रदोषव्रतकी विधि, इसके पालनसे द्विजकुमार और राजकुमारकी दरिद्रताका निवारण तथा राज्यकी प्राप्ति .................................................... | ६८३ |
| २०६. सोमवार-व्रतके प्रभावसे सीमन्तिनीको पुनः परम सौभाग्यकी प्राप्ति ................................................. | ६८८ |
| २०७. त्यागी हुई रानी और राजकुमारकी वैश्य एवं शिवयोगीद्वारा रक्षा तथा शिवयोगीका राजपुत्रको धर्मका उपदेश करना ........................................ | ६९३ |
| २०८. शिवयोगीसे शिव-कवचका उपदेश और दिव्य खड्ग एवं शंख पाकर भद्रायुका शत्रुओंको जीतना तथा निषधराजकी पुत्रीसे उसका विवाह ...... | ६९८ |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| २०९. भद्रायु तथा कीर्तिमालिनीके भक्तिभावकी परीक्षा लेकर भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ..... | ७०३ |
| २१०. भस्मकी महिमासे ब्रह्मराक्षसका उद्धार ......... | ७०६ |
| २११. भस्मकी महिमा, शबरकी चिताभस्मद्वारा की हुई पूजासे शिवजीकी प्रसन्नता और उसकी जली हुई पत्नीका पुनः जीवित होना ......... | ७०७ |
| २१२. उमामहेश्वरव्रतकी महिमा, इसके पालनसे शारदाको शिवलोककी प्राप्ति तथा सत्कथाश्रवणका माहात्म्य और ब्राह्मखण्डकी समाप्ति ........... | ७१० |
| ( ४ ) काशीखण्ड ( पूर्वार्ध ) | |
| २१३. मेरुगिरिसे स्पर्धा करके विन्ध्याचलका सूर्यके मार्गको रोकना और ब्रह्माजीके आदेशसे देवताओंका काशीमें अगस्त्य मुनिके समीप जाना ......... | ७१७ |
| २१४. बृहस्पतिजीके मुखसे लोपामुद्राके पातिव्रत-धर्मका वर्णन .................................................... | ७२१ |
| २१५. अगस्त्यजीका काशीपुरीसे प्रस्थान, विन्ध्यपर्वतको लघुरूपमें रहनेका आदेश और महालक्ष्मीकी स्तुति ................................................................. | ७२२ |
| २१६. मुक्तिदायक तीर्थोंका वर्णन तथा मानसतीर्थ एवं काशीकी श्रेष्ठता ................................................ | ७२५ |
| २१७. शिवशर्माका सात पुरियोंकी यात्रा करना और हरद्वारमें उसका परमधाम-गमन .................... | ७२८ |
| २१८. शिवशर्मा और विष्णुपार्षदोंका संवाद तथा विभिन्न लोकोंका वर्णन ................................................. | ७३१ |
| २१९. शिवशर्माका सूर्यलोकमें पहुँचकर सूर्यदेवकी महिमा श्रवण करना ......................................... | ७३३ |
| २२०. इन्द्रलोक तथा अग्निलोकका वर्णन, विश्वानर मुनिके द्वारा की हुई आराधनासे प्रसन्न होकर शिवजीका उन्हें वरदान देना .......................... | ७३६ |
| २२१. विश्वानरके पुत्र गृहपतिका भगवान् शिवकी आराधनासे अग्नि एवं दिक्पालका पद प्राप्त करना ...................................................... | ७३९ |
| २२२. नैर्ऋत्यलोक तथा वरुणलोकका वर्णन ........... | ७४२ |
| २२३. वायु, कुबेर, ईशान और चन्द्रमाके लोकोंकी स्थितिका वर्णन ................................................ | ७४४ |
| २२४. बुधलोक और शुक्रलोककी स्थिति, बुध और शुक्रके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति और वरदान-प्राप्ति .................................................. | ७४६ |
| २२५. मंगल, बृहस्पति और शनिके लोकोंकी स्थिति | ७४९ |
| २२६. सप्तर्षिलोक और ध्रुवलोककी स्थिति, ध्रुवकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति .......................... | ७५१ |
| २२७. महर्लोक, जनलोक और तपोलोककी स्थिति, ब्रह्माजीके द्वारा सत्यलोकका महत्त्व-कथन और भारतवर्ष एवं वहाँके तीर्थोंकी महत्ता बताते हुए प्रयाग और काशीकी महिमाका प्रतिपादन .... | ७६० |
[१०]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| २२८. वैकुण्ठ और कैलासकी स्थिति तथा शिव और विष्णुकी अभिन्नता एवं महत्ताका निरूपण | ७६३ | २५२. गणेशजीका काशीमें जाना और लोकप्रिय होना, गणेशजीका स्तवन | ८४५ |
| २२९. अगस्त्यजीका श्रीशैलपर कार्तिकेयजीकी सेवामें जाना और उनके मुखसे काशीकी महिमा श्रवण करना | ७६४ | २५३. भगवान् विष्णुका काशी-गमन, केशव एवं पादोदकतीर्थकी महिमा, धर्मक्षेत्रमें पुण्यकीर्तिका उपदेश तथा राजा दिवोदासकी निर्वाण-प्राप्ति | ८४६ |
| २३०. काशीकी उत्पत्ति-कथा, काशी और मणिकर्णिकाका माहात्म्य | ७६६ | २५४. धर्मनदतीर्थके पंचनद नाम पड़नेका कारण, अग्नि-विन्दुके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति, भगवान्के मुखसे पंचनद एवं विन्दुमाधवतीर्थकी महिमाका निरूपण | ८५० |
| २३१. श्रीगंगाजीकी महिमा | ७६८ | ||
| २३२. श्रीगंगाजीकी महिमा | ७७२ | २५५. भगवान् विष्णुद्वारा अपने आदिकेशव प्रभृति स्वरूपोंका वर्णन तथा अग्नि-विन्दुको मुक्ति | ८५३ |
| २३३. गंगासहस्रनामस्तोत्र | ७७३ | ||
| २३४. शिवकी कृपाके बिना काशीवासकी दुर्लभता तथा काशीकी महिमा | ७९४ | २५६. भगवान् शिवका स्वागत या वृषभध्वजतीर्थकी महिमा तथा शिवका काशीपुरीमें प्रवेश | ८५४ |
| २३५. काशीपुरीकी श्रेष्ठता, हरिकेश यक्षको शिवाराधनाके द्वारा दण्डपाणिपदकी प्राप्ति और दण्ड-पाण्यष्टक-स्तोत्र | ७९७ | २५७. जैगीषव्यपर भगवान् शिवकी कृपा और उनके द्वारा शिवकी स्तुति | ८५७ |
| २३६. ईशानके द्वारा ज्ञानोद (ज्ञानवापी) तीर्थका प्राकट्य, ज्ञानवापीकी महिमाके प्रसंगमें सुशीला (कलावती)-की कथा, काशीके विविध तीर्थोंका वर्णन | ८०१ | २५८. काशीके ब्राह्मणोंको भगवान् शिवका वरदान तथा काशीक्षेत्रकी महिमा | ८५९ |
| २३७. ज्ञानवापीकी महिमा और उसके सेवनसे माल्यकेतु और कलावतीको तारक ब्रह्मकी प्राप्ति | ८०४ | २५९. परापरेश्वर और व्याघ्रेश्वर लिङ्गकी महिमा, भगवान् शिवद्वारा व्याघ्ररूपधारी दैत्यका वध | ८६२ |
| २३८. संक्षेपसे सदाचार और उसके महत्त्वका वर्णन | ८०६ | २६०. हिमवान्के द्वारा काशीमें शैलेश्वर लिंगकी प्रतिष्ठा | ८६३ |
| २३९. संस्कारोंका संक्षिप्त परिचय, ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म | ८०८ | २६१. रत्नेश्वर लिंगकी महिमा | ८६५ |
| २४०. गृहस्थ-आश्रमके धर्म, पंचयज्ञकी महिमा, काशीवासकी महत्ता तथा राजा दिवोदासको पृथ्वीके राज्यकी प्राप्ति | ८११ | २६२. कृत्तिवासेश्वर लिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा | ८६६ |
| २४१. गृहस्थोचित शिष्टाचार और धर्म | ८१३ | २६३. विभिन्न तीर्थोंके देवविग्रहोंका काशीमें आगमन और उनका स्थान | ८६७ |
| २४२. वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्मका वर्णन, योगमार्गका निरूपण | ८१८ | २६४. दैत्योंसहित दुर्गमासुरका देवी और उनकी शक्तियोंके साथ युद्ध | ८७० |
| २४३. मृत्युसूचक चिह्नोंका वर्णन | ८२५ | २६५. दुर्गदैत्यका वध, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति और दुर्गानामकी प्रसिद्धि | ८७२ |
| २४४. महाराज दिवोदासके धर्मपूर्ण राज्यका वर्णन | ८२६ | २६६. काशीके अट्ठाईस प्रमुख लिंगोंका संक्षिप्त वर्णन तथा ॐकारेश्वरके प्राकट्यकी कथा, ब्रह्माजीके द्वारा ॐकारेश्वरका स्तवन और उनकी महिमा | ८७४ |
| २४५. भगवान् शिवके आदेशसे सूर्यका काशीमें गमन और निवास तथा लोलार्कतीर्थका माहात्म्य | ८२८ | ||
| २४६. उत्तरार्क सूर्यकी महिमा, सुलक्षणकी तपस्या और उसपर शिव-पार्वतीकी कृपा | ८३० | २६७. त्रिलोचन लिंगकी महिमा | ८७८ |
| २४७. साम्बादित्य, द्रौपदादित्य और मयूखादित्यकी माहात्म्य-कथा | ८३२ | २६८. केदारेश्वर लिंगकी माहात्म्य-कथा | ८८२ |
| २४८. गरुडेश्वरलिंग तथा खखोल्कादित्यकी प्रादुर्भाव-कथा, काशीमें गरुड़ और विनताकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति | ८३६ | २६९. श्रीधर्मेश्वर लिंगका माहात्म्य, धर्मपीठका गौरव तथा मनोरथतृतीयाव्रतकी विधि और महिमा | ८८३ |
| काशीखण्ड (उत्तरार्ध) | २७०. वीरेश्वर लिंगकी महिमाके प्रसंगमें राजा अमित्रजित और मलयगन्धिनीका चरित्र | ८८८ | |
| २४९. अरुणादित्य, वृद्धादित्य, केशवादित्य, विमलादित्य, गंगादित्य तथा यमादित्यकी महिमाका वर्णन | ८३८ | २७१. वीरेश्वरका जन्म, तपस्या, वीरेश्वर लिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा | ८९१ |
| २५०. ब्रह्माजीका दिवोदासकी सहायतासे काशीमें यज्ञ करना और दशाश्वमेधतीर्थकी महिमा | ८४१ | २७२. दुर्वासेश्वर (कामेश्वर) लिङ्गकी महिमा | ८९३ |
| २५१. पिशाचमोचनतीर्थकी महिमा | ८४३ | २७३. श्रीविश्वकर्मेश्वर लिंगकी महिमा | ८९४ |
| २७४. दक्षेश्वर तथा पार्वतीश्वर लिंगका माहात्म्य | ८९७ | ||
| २७५. नर्मदेश्वर तथा सतीश्वर लिंगका माहात्म्य | ८९८ |
[ ११ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| २७६. अमृतेश्वर लिंगकी महिमा तथा व्यासोक्त व्रत एवं धर्मोंका निरूपण ............................ | ९०० | २९५. उज्जयिनीपुरीके कनकभृंगा आदि नाम पड़नेका कारण .................................................... | ९३८ |
| २७७. काशीके तीर्थोंका संक्षिप्त वर्णन ...................... | ९०२ | २९६. काष्ठा, कला आदि कालमान, युग और कल्पभेद तथा प्रतिकल्प पुरीका माहात्म्य ................... | ९४३ |
| २७८. भगवान् शिवके मुखसे विश्वेश्वर लिंगकी महिमाका वर्णन....................................... | ९०३ | २९७. शिप्राका माहात्म्य, उसके 'ज्वरघ्नी' और 'अमृतोद्भवा' आदि नाम पड़नेका कारण ...... | ९४४ |
| २७९. पंचतीर्थी, चतुर्दश आयतन, अष्ट आयतन, शैलेशादि और एकादश आयतनोंकी यात्रा, गौरीयात्रा, गणेश-यात्रा, अन्तर्गृहयात्रा तथा विश्वनाथयात्राका वर्णन | ९०६ | २९८. जय-विजयको सनकादिका शाप, भगवान्का वाराहावतार, वाराहके हृदयसे शिप्राकी उत्पत्ति तथा उसका माहात्म्य ................................. | ९४६ |
| ( ५ ) आवन्त्यखण्ड<br>( अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य ) | २९९. खातासंगम तथा उसके निकटवर्ती तीर्थोंकी महिमा, राजा युगादिदेवके धर्ममय राज्यकी प्रशंसा.... | ९४८ | |
| २८०. सनत्कुमारजीके द्वारा महाकालतीर्थकी श्रेष्ठताका निरूपण................................................... | ९०९ | ३००. गयातीर्थकी महिमा, पुरुषोत्तममास और पुरुषोत्तम-तीर्थकी महत्ता तथा गोमतीकुण्डका माहात्म्य | ९४९ |
| २८१. महाकालवनमें भगवान् शिवका प्रवेश, कपालमोचन, देवताओंद्वारा स्तवन तथा महापाशुपतव्रतकी महिमा................................................... | ९१० | ३०१. गंगेश्वर और विश्वेश्वरतीर्थका माहात्म्य, बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, ब्रह्माजीका देवताओंको विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका उपदेश देना ............ | ९५१ |
| २८२. रुद्रभक्तिका निरूपण तथा महाकालक्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंके नियम......................... | ९१३ | ३०२. भगवान्का वामनरूपसे प्रकट हो बलिसे तीन पग भूमि माँगना और वामन-कुण्डकी महिमा | ९६१ |
| २८३. हालाहल दैत्यका वध, रुद्रसरोवरकी महिमा तथा कुशस्थलीमें चार समुद्रोंका आगमन और उसका माहात्म्य ................................... | ९१५ | ३०३. भैरवतीर्थ और नागतीर्थकी महिमा ............. | ९६२ |
| २८४. शंकरवापी, शंकरादित्य, गन्धवती नदी, हर-सिद्धिदेवी, वटयक्षिणी, पिशाचतीर्थ, शिप्रागुप्तेश्वर आदि तथा हनुमत्केश्वरकी महिमा............ | ९१६ | ३०४. नृसिंहतीर्थकी महिमा................................. | ९६३ |
| २८५. महाकालकी परिक्रमा, यात्रा और विभिन्न देवताओंके दर्शनका माहात्म्य ................... | ९१९ | ३०५. कुटुम्बेश्वर, देवप्रयाग तथा कर्करोजतीर्थकी महिमा .................................................... | ९६४ |
| २८६. वाल्मीकिकी तपस्या और वाल्मीकेश्वरकी महिमा .... | ९२० | ३०६. अवन्तीक्षेत्रके महत्त्वपूर्ण तीर्थ, देवता, वहाँकी यात्राके क्रम एवं माहात्म्यका वर्णन ............ | ९६६ |
| २८७. शुक्रेश्वर आदिके पूजनकी महिमा, पंचेशानी यात्राका माहात्म्य तथा पद्मावती आदिके दर्शनका फल .. | ९२२ | ( रेवाखण्ड ) | |
| २८८. अंकपादतीर्थकी महिमा, श्रीकृष्णके द्वारा मरे हुए गुरुपुत्रके लाये जानेकी कथा .............. | ९२३ | ३०७. राजा युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा पुरूरवाकी तपस्यासे नर्मदाजीके मर्त्यलोकमें आगमनका वर्णन ..................................... | ९७० |
| २८९. लड्डुकप्रिय गणेश, कुसुमेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, ब्रह्माणीदेवी, ब्रह्मेश्वर, यज्ञवापी, रूपकुण्ड, अनङ्गेश्वर तथा सोमेश्वरका माहात्म्य ........ | ९२६ | ३०८. राजा हिरण्यतेजाके तपसे नर्मदाका अवतरण ..... | ९७२ |
| २९०. नरकोंका संक्षिप्त वर्णन; केदारेश्वर, जटेश्वर, इन्द्रेश्वर, कुण्डेश्वर, गोपेश्वर, आनन्देश्वर तथा रामेश्वरके दर्शन-पूजनका माहात्म्य............. | ९२८ | ३०९. नर्मदाका मर्त्यलोकमें आकर पुरुकुत्सको अपना पति बनाना तथा नर्मदास्नानकी महिमा ........ | ९७३ |
| २९१. सौभाग्य आदि तीर्थोंकी महिमा, अर्जुनको इन्द्रसे सूर्यप्रतिमाकी प्राप्ति तथा अवन्तीमें उसकी स्थापना और उनके दर्शनका माहात्म्य ........ | ९२९ | ३१०. नर्मदा तटवर्ती अनन्तपुर एवं व्यासतीर्थकी महिमा..................................................... | ९७५ |
| २९२. भगवान् सूर्यकी अष्टोत्तरशत नामोंद्वारा स्तुति तथा अन्यान्य तीर्थोंकी महिमा.................... | ९३३ | ३११. वरांगना-नर्मदासंगम तथा कपिलातीर्थका माहात्म्य, महाराज मनुकी त्रिपुरीयात्रा और नर्मदासे वरदान पाना.............................................. | ९७६ |
| २९३. स्वर्णक्षुर आदिकी महिमा, अन्धकासुरका युद्ध, नरदीप एवं शंखोद्धार आदिका माहात्म्य ...... | ९३४ | ३१२. भृगुतीर्थ और भास्करतीर्थका माहात्म्य.......... | ९७९ |
| २९४. ॐकारेश्वर आदिका महत्त्व तथा अन्धकासुरको शिवगणोंमें श्रेष्ठ स्थानकी प्राप्ति.................. | ९३६ | ३१३. सोमतीर्थ, ब्रह्मकुण्ड, ब्रह्मोश्वर लिंग, सिद्धेश्वर लिंग तथा संगमतीर्थकी महिमा................. | ९८१ |
| ३१४. ध्रुवेश्वर, वाराह, चान्द्रायण, द्वादशादित्य तथा गांजालतीर्थकी महिमा, राजा हरिकेशकी शुद्धि | ९८२ | ||
| ३१५. नर्मदा और मत्स्याके संगमका माहात्म्य, महर्षि आपस्तम्बके द्वारा गौओंकी महत्ताका प्रतिपादन तथा तीर्थके प्रभावसे निषादोंका मछलियों-सहित उद्धार .......................................... | ९८४ |
[ १२ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ३१६. कलहंसेश्वरतीर्थका प्रादुर्भाव और उसका माहात्म्य | ९८७ | ३३७. अमरावतीके दक्षिण विष्णुमन्दिरकी महिमा, मेघ-वनका महत्त्व तथा विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम .............................. | १०२५ |
| ३१७. नर्मदापुरका माहात्म्य, जमदग्निको कामधेनुकी प्राप्ति, कार्तवीर्यद्वारा मुनिका वध और धेनुका अपहरण तथा परशुरामद्वारा कार्तवीर्यका वध | ९८९ | ३३८. अशोकवनिकातीर्थमें महाराज रविश्चन्द्रके द्वारा यज्ञ, दान तथा मुनियोंका उद्धार ............. | १०२७ |
| ३१८. शिवनेत्रकुण्ड तथा जनकतीर्थका माहात्म्य .. | ९९० | ३३९. वागीश्वरतीर्थमें राजा ब्रह्मदत्तके यज्ञमें प्रेतोंका उद्धार तथा सहस्रावर्त आदि तीर्थोंकी महिमा | १०२९ |
| ३१९. सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, शाण्डिल्या और नर्मदाके संगमकी महिमा तथा नर्मदा-कुब्जाके संगमपर रन्तिदेवका यज्ञ ...................... | ९९२ | ३४०. देवपथतीर्थ, शुक्लतीर्थ, दीप्तिकेश्वरकी महिमा, देवासुरोंके द्वारा महादेवजीकी स्तुति तथा वैष्णव-तीर्थकी महिमा...................................... | १०३० |
| ३२०. कुब्जा और नर्मदाके संगमकी महिमा, हरिकेश ब्राह्मणका परिवारसहित ब्रह्म-राक्षसयोनिसे उद्धार.............................. | ९९४ | ३४१. नर्मदाजीकी तथा भगवान् विष्णुकी स्तुति.. | १०३३ |
| ३२१. माहेश्वरतीर्थकी महिमा, राजा सालंकायनका यज्ञ ... | ९९५ | ३४२. मेघनादतीर्थका प्राकट्य और उसकी महिमा | १०३७ |
| ३२२. श्वेतकिंशुक आदि तीर्थोंकी महिमा ......... | ९९७ | ३४३. करंजेश्वर तथा कुण्डलेश्वरतीर्थका प्रादुर्भाव और माहात्म्य....................................... | १०३८ |
| ३२३. मान्धाताका चरित्र .............................. | ९९९ | ३४४. पिप्पलेश्वर, विमलेश्वर, विश्वरूपा-नर्मदासंगम तथा एक दिनमें मेघनादेश्वर आदि पाँच लिंगोंकी यात्राका माहात्म्य, राजा धर्मसेनकी कथा... | १०३९ |
| ३२४. बाणासुरके तीन पुरोंका भगवान् शङ्करके द्वारा संहार, जालेश्वरनामक बाणलिंगकी उत्पत्ति और बाणासुरको शिवलोक प्राप्ति ............. | १००१ | ३४५. मुकण्ड-आश्रममें दो गन्धर्वोंका उद्धार तथा चन्द्रमती-नर्मदा-संगम आदि अन्य तीर्थोंकी महिमा .............................................. | १०४० |
| ३२५. अमरकण्टक और यज्ञपर्वतके श्रेष्ठ तीर्थ एवं लिंग, राजा इन्द्रद्युम्नका यज्ञ और उन्हें देवोंका वरदान .............................................. | १००२ | ३४६. भानुमतीका तीर्थसेवन, शूलभेदतीर्थमें शबर-दम्पतिका उद्धार और सती भानुमतीको कैलास-धामकी प्राप्ति .................................... | १०४१ |
| ३२६. पुराणलक्षण, कलिकालका प्रभाव तथा राजर्षि वसुदानके यज्ञमें प्रकट हुई कपिला और नर्मदाके संगमका माहात्म्य .............................. | १००७ | ३४७. आदित्येश्वरतीर्थकी महिमा, मुनियोंद्वारा नर्मदाका स्तवन और उस तीर्थमें गोदानकी महिमा | १०४५ |
| ३२७. अमरावतीमें भगवान्का दैत्यसूदनरूपसे निवास तथा वहाँके अन्यान्य तीर्थों और शिव-लिंगोंका माहात्म्य .............................. | १००८ | ३४८. धनदतीर्थका माहात्म्य, पूज्य और अपूज्य ब्राह्मण, वृषोत्सर्गकी महत्ता तथा गौतमेश्वर-तीर्थकी महिमा .................................... | १०४७ |
| ३२८. अमरकण्टकपर सूत्रयागका माहात्म्य, कावेरी-संगम और पयोष्णी-संगमकी महिमा तथा वहाँके अन्य तीर्थोंके सेवनकी महत्ता ....... | १०१० | ३४९. पराशराश्रमकी महिमा, पराशरमुनिकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति, भीमेश्वरमें गायत्री-जपका महत्त्व और नारदेश्वरतीर्थका माहात्म्य................ | १०४८ |
| ३२९. भद्ररुद्रेश्वरकी महिमा, दुर्वासाजीके द्वारा अमरकण्टकका गयातीर्थके तुल्य होना तथा राजा भरतका यज्ञ ................................ | १०१२ | ३५०. नर्मदा-नागेशके संगममें कण्ठकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति और सद्गति .............................. | १०४९ |
| ३३०. ब्रह्माजीके द्वारा सौम्या दृष्टिसे दानवोंका निवारण तथा रुद्रके एक सौ एक नामोंद्वारा शिवजीका स्तवन . | १०१३ | ३५१. पूतकेश्वर तथा जलशायी (चक्र) तीर्थका माहात्म्य, श्रीविष्णुके द्वारा नलमेघ दानवके वधकी कथा ......................................... | १०५० |
| ३३१. कपिला-नर्मदा-संगम और ईशान आदि तीर्थोंकी महिमा, यमलोकके मार्गके कष्टों तथा अट्ठाईस नरककोटियोंका वर्णन.............................. | १०१५ | ३५२. प्रभासेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, संकर्षण, मन्मथेश्वर तथा एरण्डीसंगममें पुत्रप्राप्तिपदतीर्थकी महिमा, अनसूयाजीके पुत्ररूपसे ब्रह्मा, शिव और विष्णुका अवतार .................................. | १०५१ |
| ३३२. पापियोंकी नरक-यातनाका वर्णन............. | १०१९ | ३५३. सौवर्णतीर्थ, करण्डेश्वरतीर्थ, भाण्डारतीर्थ, रोहिणीतीर्थ, चक्रतीर्थ तथा धूमपाततीर्थका माहात्म्य और माहात्म्य-श्रवणका फल .................. | १०५४ |
| ३३३. दान, पुण्य, शिवध्यान और नर्मदासेवनसे नरकसे उद्धार होनेका तथा संसारसे वैराग्यका उपदेश | १०२० | ३५४. श्रीसत्यनारायण-व्रतकी विधि, ब्राह्मण और लकड़हारेकी कथा .............................. | १०५६ |
| ३३४. मातंग, मृगवन और वाराहीतार्थकी महिमा | १०२२ | ३५५. सत्यनारायण-व्रतकी महिमा, राजा उल्कामुख, साधु वणिक् और राजा वंशध्वजकी कथा | १०५८ |
| ३३५. संसारसे मुक्त होनेके लिये पाप और पाखण्डी जनोंके त्याग तथा शिव एवं नर्मदाके आश्रय लेनेका उपदेश....................................... | १०२३ | ||
| ३३६. शिवलोककी उत्कृष्टता, गोसेवाका महत्त्व, दानकी महिमा तथा नर्मदा तटपर दान एवं शिव-ध्यानका माहात्म्य .......................... | १०२४ |
[ १३ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ( ६ ) नागरखण्ड ( पूर्वार्ध ) | ३८१. परशुरामद्वारा लोहयष्टिकी स्थापना और उसकी महिमा तथा देवीकुण्डका माहात्म्य .......... | १११८ | |
| ३५६. राजा त्रिशंकुका वसिष्ठ-पुत्रोंके शापसे चाण्डाल होना .................................................... | १०६३ | ३८२. राजवापीके प्रसंगमें राजा दशरथका प्रभाव, शनैश्चरग्रहकी पराजय ........................... | ११२२ |
| ३५७. विश्वामित्रजीके द्वारा त्रिशंकुका यज्ञ पूरा करके नूतन सृष्टि-रचनाका उद्योग आदि .......... | १०६५ | ३८३. श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणका त्याग और लक्ष्मणका परमधाम-गमन ................................... | ११२३ |
| ३५८. नागबिलका महत्त्व, इन्द्रकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति | १०६७ | ३८४. चित्रशर्मा तथा अन्यान्य ब्राह्मणोंके द्वारा भगवान् शंकरको सन्तुष्ट करना.......................... | ११२७ |
| ३५९. शंखतीर्थकी उत्पत्ति, उसमें स्नानसे राजा चमत्कारके कुष्ठरोगकी निवृत्ति ................ | १०६९ | ३८५. अड़सठ क्षेत्रों और उनमें भी प्रधान आठ क्षेत्रोंके नाम तथा उनके कीर्तनका महत्त्व | ११२८ |
| ३६०. राजा चमत्कारकी तपस्यासे सन्तुष्ट हुए शिवका अचलेश्वररूपसे निवास ........................ | १०७१ | ३८६. भगवान् शिवके दिये हुए मन्त्रद्वारा ब्राह्मणोंपर आये हुए सर्पोंके उपद्रवका निवारण ...... | ११२९ |
| ३६१. चमत्कारपुरमें गयाशीर्षतीर्थकी महिमा ........ | १०७२ | ३८७. चमत्कारपुरमें पुनर्वासी ब्राह्मणोंकी संख्या ... | ११३१ |
| ३६२. मार्कण्डेयमुनिको अमरत्वकी प्राप्ति, ब्रह्माजीकी स्थापना, बालसख्यतीर्थकी महिमा .......... | १०७७ | ३८८. रैवत और क्षेमंकरी द्वारा रैवतेश्वर तथा कात्यायनी-की स्थापना ........................................ | ११३२ |
| ३६३. मृगपदतीर्थ और विष्णुपदतीर्थका प्रादुर्भाव तथा माहात्म्य, विष्णुपदीमें स्नान आदिका महत्त्व . | १०७९ | ३८९. दुर्वासाके शापसे चित्रसम दैत्यका महिष होना तथा कात्यायनीके द्वारा महिषका वध........ | ११३३ |
| ३६४. विष्णुपदीकी अद्भुत महिमा, चण्डशर्माकी शुद्धि .... | १०८० | ३९०. केदारक्षेत्रका प्रादुर्भाव तथा वहाँ भगवान् शिवकी आराधनाका माहात्म्य ........................... | ११३७ |
| ३६५. हाटकेश्वरक्षेत्रकी दक्षिणोत्तर सीमाके गोकर्णोंका परिचय, गोकर्ण और यमका संवाद .......... | १०८२ | ३९१. शुक्लतीर्थकी महिमा ............................... | ११३९ |
| ३६६. सिद्धेश्वर लिङ्गकी महिमा तथा षडक्षर-मन्त्रका माहात्म्य एवं अहिंसाकी महत्ताका वर्णन .. | १०८४ | ३९२. कर्णोत्पलातीर्थकी उत्पत्ति, राजा सत्यसन्ध और कर्णोत्पलाकी अद्भुत कथा ................... | ११४१ |
| ३६७. सप्तर्षि आश्रमकी महिमा तथा सप्तर्षियोंका हाटकेश्वरक्षेत्रमें आगमन .......................... | १०८९ | ३९३. शाण्डिलीके उपदेशसे कात्यायनीके द्वारा पञ्चपिण्डा गौरीकी उपासना ............................... | ११४३ |
| ३६८. अगस्त्य-आश्रममें शिव-पूजा आदिका माहात्म्य.... | १०९१ | ३९४. वास्तुपदतीर्थ तथा अजागृहा देवीकी महिमा. | ११४४ |
| ३६९. दुर्वासा-लोमहर्षण-संवाद, मन्त्र-सिद्धिकी विधि .... | १०९२ | ३९५. पतिव्रताकी शक्तिसे उसके मरे हुए पतिको पुनः नवजीवनकी प्राप्ति ....................... | ११४६ |
| ३७०. धुन्धुमारे श्वरकी स्थापना और महिमा ........ | १०९३ | ३९६. शूलीतीर्थ और दीर्घिकातीर्थका प्राकट्य, माण्डव्य मुनिका धर्मराजको शाप ...................... | ११४८ |
| ३७१. विश्वामित्रका मेनकासे वार्तालाप, सती स्त्रियोंके पालन करनेयोग्य धर्मका वर्णन ............... | १०९५ | ३९७. अन्न और जलके दानकी महत्ता ............. | ११५० |
| ३७२. सरस्वत्तीर्थकी महिमा, राजा अम्बुवीचिकी मूकताका निवारण .............................. | १०९७ | ३९८. अदितिदेवीद्वारा आराधित अमरेश्वर लिंगकी महिमा ..................................... | ११५१ |
| ३७३. महाकालके समीप जागरणकी महिमा, राजा रुद्रसेनका पूर्ववृत्तान्त ............................ | १०९९ | ३९९. शुकदेवजीका जन्म, वैराग्य, व्यासजीके साथ उनका संवाद और वनगमन................... | ११५३ |
| ३७४. कलशेश्वरका माहात्म्य, नन्दीके द्वारा व्याघ्रयोनिको प्राप्त राजा कलशका शापसे उद्धार ......... | ११०१ | ४००. राजा सुरथके द्वारा भैरवजीकी स्थापना और आराधना .......................................... | ११५५ |
| ३७५. अगस्त्यकुण्ड, कपिला नदी, वैष्णवीशिला और सिद्धक्षेत्र आदिकी महिमा ....................... | ११०५ | ४०१. गौरी, जया और विजयाकुण्डका माहात्म्य. | ११५६ |
| ३७६. गालवको सूर्यदेवकी आराधनासे पुत्रकी प्राप्ति | ११०७ | नागरखण्ड ( उत्तरार्ध ) | |
| ३७७. चमत्कारीदेवीकी महिमा, कार्तिकेयजीके द्वारा शक्तिकी स्थापना ................................. | १११० | ४०२. सब पापोंकी शुद्धिके लिये पुरश्चरणसप्तमी व्रतकी विधि एवं महिमा ........................ | ११५७ |
| ३७८. स्कन्दस्वामी और देवयजनकी महिमा तथा तीनों सूर्य-विग्रहोंके दर्शनका माहात्म्य ...... | १११३ | ४०३. चण्डशर्माके द्वारा सत्ताईस शिवलिंगोंका पूजन | ११५९ |
| ३७९. चन्द्रदेवके मंदिरके निर्माणका महत्त्व, अम्बावृद्धाके दर्शनकी महत्ता ................................... | १११४ | ४०४. विश्वामित्रकी उत्पत्ति, राज्यप्राप्ति तथा राज्य त्यागकर तप करनेका निश्चय ................. | ११६२ |
| ३८०. ब्रह्मकुण्ड, गोमुखतीर्थकी उत्पत्तिकथा एवं महिमा ........................................ | १११७ | ४०५. विश्वामित्रकी तपस्या, ब्राह्मण पदकी प्राप्ति .. | ११६४ |
$ \begin{array}{c} \mathbf{[ १४ ]} \end{array} $
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ४०६. पंचपिण्डिका गौरी-पूजासे अमाकी सौभाग्यवृद्धि .. | ११६५ | ४३७. प्रभासमें भगवान् शिवका स्वरूप, पार्वतीद्वारा उनकी स्तुति .................................... | १२२३ |
| ४०७. पूर्वजन्ममें अमारूपा लक्ष्मीदेवीके द्वारा पंचपिण्डिका गौरीकी उत्पत्ति .............. | ११६७ | ४३८. प्रभासमें सूर्यदेव, सिद्धेश्वरलिंग तथा सिद्धलिंगकी महिमा ........................................ | १२२५ |
| ४०८. हाटकेश्वरक्षेत्रमें तीनों पुष्कर तीर्थोंके आगमनका वृत्तान्त ..................................... | ११७० | ४३९. अर्कस्थलका माहात्म्य, आदित्यकी महिमा, दन्तधावनकी विधि ........................... | १२२६ |
| ४०९. अतिथि-सत्कारका माहात्म्य ..................... | ११७१ | ४४०. चन्द्रमाकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा ओषधि आदिका पोषण ............................... | १२२९ |
| ४१०. हाटकेश्वरक्षेत्रमें पुष्करके प्राकट्यका वार्षिक समय | ११७२ | ४४१. सृष्टि-कथा—दक्षकन्याओं तथा धर्म एवं कश्यपजीकी संततिका संक्षिप्त वर्णन....... | १२३० |
| ४११. ब्राह्मणकन्या और राजकन्याका अनुपम प्रेम | ११७३ | ४४२. चन्द्रमाके द्वारा प्रभासक्षेत्रमें शिवकी आराधना | १२३१ |
| ४१२. परावसुके द्वारा मद्यपानका प्रायश्चित्त ......... | ११७४ | ४४३. सोमवारव्रतकी विधि और महिमा, गन्धर्व-सेनाकी रोगनिवृत्ति ............................ | १२३५ |
| ४१३. ब्राह्मणकन्या और शूद्रराजकन्याकी तपस्या, भगवान् शिवका वरदान........................... | ११७७ | ४४४. सोमनाथकी यात्रा-विधि ......................... | १२३७ |
| ४१४. त्रिविध क्षेत्र, अरण्य और पुरी आदिका वर्णन | ११७९ | ४४५. समुद्रमें स्नानकी विधि और महिमा......... | १२४१ |
| ४१५. अहल्याका शापोद्धार तथा हाटकेश्वरक्षेत्रमें अहल्या, शतानन्द और गौतमजीकी तपस्या | ११८१ | ४४६. सोमनाथके दर्शन-पूजनकी महिमा ........... | १२४२ |
| ४१६. शंखतीर्थकी महिमा, राजा दम्भका चरित्र तथा ताम्बूलके दोष............................... | ११८२ | ४४७. सरस्वती नदीकी महिमा तथा वहाँ स्नान, दान और श्राद्धका माहात्म्य .................. | १२४४ |
| ४१७. विश्वामित्रतीर्थ एवं रत्नादित्यकी महिमा .... | ११८४ | ४४८. 'कपर्दी'की अग्रपूजाका हेतु और महिमा .. | १२४५ |
| ४१८. श्राद्धकल्प ....................................... | ११८७ | ४४९. केदारलिंगकी महिमा, राजा शशिविन्दुके पूर्व-जन्मका वृत्तान्त ............................. | १२४६ |
| ४१९. श्राद्धकी आवश्यकता तथा समय ............ | ११८८ | ४५०. श्वेतकेत्वीश्वर आदि विभिन्न शिवलिंगोंका माहात्म्य | १२४८ |
| ४२०. श्राद्धकी विधि, विहित और निषिद्ध ब्राह्मण तथा मन्वादिका वर्णन........................... | ११९० | ४५१. प्रभासक्षेत्रकी त्रिविध शक्तियों तथा दूती शक्तियोंके दर्शन-पूजनका माहात्म्य .................. | १२५० |
| ४२१. श्राद्धकर्ता और श्राद्धभोक्ताके लिये नियम ..... | ११९२ | ४५२. भैरवेश्वर आदि विविध लिंगोंका माहात्म्य | १२५२ |
| ४२२. सपिण्डनकी आवश्यकता, तीन गति ........ | ११९४ | ४५३. कलकलेश्वर, उतंकलेश्वर, वैश्वानरेश्वर तथा गौतमेश्वरकी महिमा........................... | १२५४ |
| ४२३. नरकों और पापोंसे मुक्त होनेका उपाय तथा भगवान् जलशायीकी महिमा ............... | ११९७ | ४५४. वैष्णवक्षेत्रमें भगवान् दैत्यसूदनकी महिमा ..... | १२५५ |
| ४२४. चातुर्मास्य व्रतके पालनीय नियम और उनकी महिमा ........................................ | ११९८ | ४५५. योगेश्वरीदेवीकी महिमा ........................... | १२५७ |
| ४२५. शिवरात्रिकी महिमा ............................... | १२०० | ४५६. आदिनारायणका माहात्म्य ..................... | १२५८ |
| ४२६. सिद्धेश्वरकी महिमा और तुलादानका महत्त्व . | १२०२ | ४५७. पाण्डवेश्वरलिंग तथा ग्यारह रुद्रोंका माहात्म्य | १२५९ |
| ४२७. पृथ्वीदानकी महिमा ............................... | १२०३ | ४५८. चन्द्रेश्वर, चक्रपाणि, दण्डपाणि तथा साम्बा-दित्यकी महिमा ............................... | १२६२ |
| ४२८. चार प्रकारके कालमानका वर्णन ............. | १२०४ | ४५९. बालरूपधारी ब्रह्माकी महिमा, ब्रह्माजीकी आयुका मान .................................. | १२६३ |
| ४२९. निम्बेश्वरकी स्थापना तथा ग्यारह रुद्रोंका प्राकट्य | १२०८ | ४६०. ब्राह्मणोंकी महिमा, क्षेत्रवासी ब्राह्मणोंके भेद | १२६५ |
| ४३०. नागरखण्डका उपसंहार .......................... | १२१० | ४६१. ब्रह्माजीके प्रति भक्तिके भेद तथा उनके एक सौ आठ नाम ...................................... | १२६७ |
| (७) प्रभासखण्ड | ४६२. प्रत्यूषेश्वर, अनिलेश्वर, प्रभासेश्वर, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर आदिका माहात्म्य ............. | १२६९ | |
| ४३१. सूतजीके द्वारा प्रभास-खण्डका उपक्रम ..... | १२११ | ४६३. गोप्यादित्यकी स्थापना और महिमा तथा नीलसे हानि ................................... | १२७२ |
| ४३२. शिव-पार्वती-संवाद, तीर्थोंका संक्षिप्त वर्णन | १२१५ | ||
| ४३३. प्रभासतीर्थकी सीमा, क्षेत्र-विभाग, महिमा तथा रक्षकगणोंका वर्णन ....................... | १२१७ | ||
| ४३४. सोमनाथके दिव्य स्वरूपका दिग्दर्शन ........ | १२१९ | ||
| ४३५. सोमनाथके आठ नाम और पार्वतीके अठारह नामोंका वर्णन ............................... | १२२० | ||
| ४३६. सोमनाथकी महिमा ................................. | १२२२ |
$[ १५ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ४६४. रामेश्वर, चित्रांगदेश्वर तथा रावणेश्वरकी महिमा ... | १२७३ | ४८८. पृथुके गोष्पदतीर्थमें श्राद्ध-यज्ञ करनेसे वेनको स्वर्गप्राप्ति.................................. | १३१९ |
| ४६५. पौलोमीश्वर, शाण्डिल्येश्वर, क्षेमेश्वर तथा सागरादित्यका माहात्म्य ..................... | १२७३ | ४८९. नारायणगृह तथा जालेश्वर-लिंगकी महिमा | १३२० |
| ४६६. अक्षमालेश्वर, पाशुपतेश्वर, ध्रुवेश्वर तथा सिद्धि-लक्ष्मीकी महिमा .................................... | १२७५ | ४९०. चन्द्रेश्वर, कपिलेश्वर तथा नलेश्वरकी महिमा | १३२३ |
| ४६७. महाकाली देवी, पुष्करावर्तका नदी एवं कंकाल-भैरवकी महिमा........................... | १२७६ | ४९१. राजा गज और भद्रमुनिका संवाद ............ | १३२४ |
| ४६८. लोमशेश्वर, चित्रपथा नदी, रूपकुण्ड, रत्नेश्वर तथा वैनतेयेश्वरका माहात्म्य..................... | १२७८ | ४९२. तीर्थमें पूजन, श्राद्ध और दानकी महिमा... | १३२७ |
| ४६९. रैवन्त और अनन्तेश्वरकी महिमा, सावित्रीकी कथा, सावित्रीव्रतकी महिमा ................. | १२७९ | ४९३. राजा बलिके राज्यकी प्रशंसा ................. | १३२९ |
| ४७०. शालकंटकटा देवी, दशरथेश्वर, भरतेश्वर आदिका महत्त्व .................................... | १२८३ | ४९४. देवर्षि नारदका वामनजीको मत्स्य आदि अवतारोंका वृत्तान्त सुनाना................... | १३३१ |
| ४७१. देवमाता, शेषस्थान, प्रभासपंचक तथा संगममें स्नानका महत्त्व ..................................... | १२८४ | ४९५. वामनजीका बलिसे तीन पग भूमि ग्रहण करना ........................................ | १३३५ |
| ४७२. श्राद्धके विषयमें कुछ ज्ञातव्य बातें........... | १२८५ | ( श्रीद्वारका-माहात्म्य ) | |
| ४७३. श्राद्ध-विधि, सप्तशुद्धिका विचार, श्राद्धमें ग्राह्य एवं त्याज्यका निर्णय .............................. | १२८८ | ४९६. भगवान्के परमधाम पधारनेपर महर्षियोंका ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रह्लादजीके समीप जाना | १३३९ |
| ४७४. परायी वस्तुके अपहरण और प्रतिग्रहके दोष | १२९२ | ४९७. द्वारकाकी महिमा, वहाँकी यात्रा और उसमें योग देनेका माहात्म्य ........................... | १३४१ |
| ४७५. उत्तम-अधम जन्म, व्यर्थ और सफल दान, सुपात्रके लक्षण ................................... | १२९४ | ४९८. गोमतीमें स्नान और भगवत्पूजनकी महिमा | १३४४ |
| ४७६. मार्कण्डेयेश्वर आदि विविध लिंगोंकी महिमा | १२९५ | ४९९. चक्रतीर्थ तथा रुक्मिणीह्रदका माहात्म्य...... | १३४५ |
| ४७७. गौतम और प्रेतका संवाद, प्रेतोंका उद्धार तथा प्रेततीर्थकी उत्पत्ति ................................ | १२९६ | ५००. विष्णुपदोद्भवतीर्थकी महिमा, उद्धवजीका व्रजमें आगमन................................... | १३४६ |
| ४७८. नरकेश्वरका माहात्म्य ............................ | १२९९ | ५०१. गोपी-सरोवरका निर्माण और उसकी महिमाका वर्णन ................................................. | १३५० |
| ४७९. संवर्तेश्वर, बलभद्रेश्वर, दशाश्वमेधिक तीर्थ तथा दुर्वासादित्यका माहात्म्य ................. | १३०० | ५०२. ब्रह्मकुण्ड, चन्द्रसरोवर तथा पंचनदतीर्थका माहात्म्य .......................................... | १३५१ |
| ४८०. नागरादित्य, पिंगा नदी, संगमेश्वर तथा गंगेश्वरकी महिमा ................................... | १३०१ | ५०३. सिद्धेश्वर लिंग, ऋषितीर्थ और देवी-देवताओंके सेवनकी महिमा .................................... | १३५२ |
| ४८१. नन्दादित्य, पर्णादित्य, गंगेश्वर तथा मूल स्थानगत सूर्यकी महिमा ..................................... | १३०२ | ५०४. श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणीदेवीके दर्शन और पूजनकी महिमा.................................... | १३५४ |
| ४८२. भगवान् सूर्यके अष्टोत्तरशतनामोंकी महिमा | १३०६ | ५०५. द्वारकापुरी तथा वहाँ श्रीकृष्णके दर्शन-पूजनका माहात्म्य ............................................. | १३५५ |
| ४८३. महर्षि च्यवनकी कथा और च्यवनेश्वरकी महिमा .............................................. | १३०७ | ५०६. शंखोद्धारतीर्थकी महिमा ........................ | १३५७ |
| ४८४. सुकन्या-सरोवर, गोष्पदतीर्थ तथा कुबेरेश्वरकी महिमा ............................................... | १३०९ | ५०७. द्वारकापुरी, गोपीचन्दन तथा गोमतीका माहात्म्य | १३५८ |
| ४८५. भद्रकाली, कुबेर तथा गुप्तप्रयागका माहात्म्य | १३११ | ५०८. एकादशीकी रात्रिमें श्रीहरिके समीप जागरणका माहात्म्य ............................................. | १३६० |
| ४८६. माधव, शृगालेश्वर और देवविग्रहोंके सेवनकी महिमा ................................... | १३१३ | ५०९. द्वारका-यात्राकी विधि एवं महिमा ........... | १३६२ |
| ४८७. तलस्वामी, शंखावर्ततीर्थ और गोष्पद-तीर्थकी महिमा...................................... | १३१५ | ५१०. ऋषियों और देवताओंकी द्वारका-यात्रा तथा भगवद्दर्शन एवं पूजन ............................ | १३६४ |
| ५११. दिलीप-वसिष्ठ-संवाद ........................... | १३६५ | ||
| ५१२. द्वारकापुरी तथा श्रीकृष्ण-दर्शनका माहात्म्य | १३६६ | ||
| ५१३. द्वारकामें श्रीकृष्णदर्शनकी महिमा.............. | १३६८ | ||
| ५१४. द्वारका-माहात्म्यके पाठकी महिमा........... | १३७१ |
\sim\sim\circ\sim\sim$
[ १६ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|
चित्र-सूची
इकरंगे
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १. दक्षके द्वारा सतीका तिरस्कार ........................ | ६ | २९. रानी सुमित्राके द्वारा अपने पति और पुत्रकी दशाका वर्णन .................................................. | ५४२ |
| २. वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञ-विध्वंस ........................ | ९ | ३०. हनुमान्जीके द्वारा भगवान् श्रीराम और सीताका स्तवन .................................................. | ५८३ |
| ३. गरुड़पर मन्दराचल .................................... | २१ | ३१. ब्राह्मणके द्वारा राजकन्याका हाथ पकड़ा जाना | ५९० |
| ४. समुद्र-मन्थन ........................................ | २१ | ३२. राजाके द्वारा ब्राह्मणको बन्दी बनाया जाना ... | ५९० |
| ५. समुद्र-मन्थनसे श्रीमहालक्ष्मीका प्रादुर्भाव........ | २३ | ३३. राजाको स्वप्नमें भगवान्के दर्शन ............ | ५९२ |
| ६. श्रीलक्ष्मीका भगवान्को माला-अर्पण .......... | २३ | ३४. राजाके द्वारा लक्ष्मीनारायणका स्तवन ........... | ५९२ |
| ७. ब्राह्मणोंसे घिरे हुए देवर्षि नारदजीके साथ अर्जुनका संवाद ............................................ | ८७ | ३५. गणेशजीका मस्तक-छेदन ........................ | ६२४ |
| ३६. गणेशजीको गजमस्तक-दान ........................ | ६२४ | ||
| ८. त्रिदेवोंकी श्रेष्ठता .................................... | १५७ | ३७. भगवान् रामचन्द्रका दान ........................ | ६४२ |
| ९. अर्चार्विग्रहसे प्रकट होकर भगवान् विष्णु ऐतरेयको दर्शन दे रहे हैं ............................................ | १७६ | ३८. ब्रह्माजीका प्राकट्य ................................ | ६५५ |
| ३९. ध्रुवकी सफल साधना ................................ | ७५७ | ||
| १०. मुर-कन्याको न मारनेके लिये श्रीकृष्णसे कामाख्याका अनुरोध.................................... | २२१ | ### इकरंगे (लाइन) | |
| ११. बर्बरीकका बल-प्रदर्शन ............................ | २३५ | १. लोमशजीद्वारा नैमिषारण्यमें मुनियोंको शिवजीका माहात्म्य-कथन .......................................... | १ |
| १२. राजा वज्रांगदपर भगवान् अरुणाचलेश्वरकी कृपा .................................................... | २६० | २. दक्षद्वारा भगवान् शंकरका स्तवन ............ | ११ |
| १३. पद्मालय और भगवान्का परस्पर माला पहनाना................................................ | २७५ | ३. भगवान् विष्णुके द्वारा देवताओंको आश्वासन | १५ |
| ४. मोहिनीद्वारा देवताओंको अमृतरसपान............ | २६ | ||
| १४. भूदेवी तथा श्रीदेवीसहित सपरिकर भगवान् विष्णु............................................ | २७९ | ५. त्वष्टाका ब्रह्माजीसे पुत्र-प्राप्तिके लिये वर माँगना | ३३ |
| १५. भक्त भीम कुम्हारका पत्नीसहित विमानारोहण............................................ | २८३ | ६. इन्द्रका बृहस्पतिजीसे प्रदोषव्रतकी उद्यापन-विधि पूछना ............................................ | ३९ |
| १६. ब्रह्मा और यमराजके द्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन .................................................... | ३२१ | ७. जुआरीका स्वर्गमें ऋषि-मुनियोंको अंधाधुंध दान देना .................................................. | ४६ |
| १७. राजा इन्द्रद्युम्नको ध्यानमें भगवान्के दर्शन .... | ३५५ | ८. विरोचनद्वारा ब्राह्मणरूपधारी इन्द्रको अपना मस्तक उतारकर देना.................................... | ४७ |
| १८. भगवान् विष्णुको लक्ष्मीदेवी भोजन परोस रही हैं .................................................... | ३७८ | ९. भगवान् विष्णुका बलि और उसकी पत्नीको वरदान देना ............................................ | ५० |
| १९. राजा श्वेतको भगवान् लक्ष्मीनृसिंहके दिव्य दर्शन ............................................ | ३७९ | १०. पार्वतीजीके तपसे जगत् सन्तप्त होनेपर देवताओंद्वारा ब्रह्माजीकी शरण लेना............ | ५६ |
| २०. रत्नहिंडोलेपर भगवान् लक्ष्मीनारायण .......... | ३८५ | ११. तपस्यामें लगी हुई पार्वतीजीको भगवान् शंकरका दर्शन तथा परस्पर वार्तालाप ........................ | ६० |
| २१. कदम्बमूलमें भगवान् गोविन्द झूला झूल रहे हैं | ३८६ | १२. पार्वतीजीका कुमार षडाननको गोदमें लेनेके लिये उनकी ओर बढ़ना ................................ | ७० |
| २२. वटवृक्षसे देवताओंका निकलना................ | ४२० | ||
| २३. भक्त विष्णुदासके द्वारा चाण्डालकी सेवा ..... | ४३४ | १३. कार्तिकेयजीके शक्ति-प्रहारसे तारककी मृत्यु.. | ७४ |
| २४. चाण्डालके स्थानपर विष्णुदासको भगवान्का दर्शन .................................................... | ४३४ | १४. कैलाशमें शिवजीका राज्य ........................ | ८२ |
| २५. हेमकान्तके द्वारा त्रितमुनिको छत्र-जल-दान.. | ४७९ | १५. अर्जुनके द्वारा पंचाप्सरस्तीर्थमें ग्राह बनी अप्सराओंका उद्धार.................................... | ८६ |
| २६. छत्र और जलदानसे हेमकान्तपर भगवत्कृपा.. | ४७९ | १६. धर्मवर्माका छद्मरूपमें पधारे हुए नारदजीसे परिचय पूछना ........................................ | ९८ |
| २७. सर्वस्व दानी रघु और ब्राह्मण कौत्स.......... | ५१६ | ||
| २८. सुदर्शनचक्रके द्वारा गालवमुनिकी रक्षा.......... | ५३८ |
[ १७ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १७. नारदजीका ब्राह्मणोंके सामने अपना स्वरूप प्रकट करना | १०७ | ४५. पार्वतीजीको अरुणाचलपर अपूर्व ज्योतिका दर्शन | २५३ |
| १८. मेधातिथिका चिरकारीको छातीसे लगाना | ११० | ४६. दुर्वासाजीका कान्तिशाली और कलाधरको शाप देना | २५६ |
| १९. ब्रह्माजीका इन्द्रद्युम्नको पृथ्वीपर लौटनेका आदेश | ११२ | ४७. पृथ्वीदेवीद्वारा भगवान् वराहका पूजन | २६२ |
| २०. लोमशजीका इन्द्रद्युम्नको अपनी चिरायु बताना | ११४ | ४८. भगवान् वराहके स्वरूपका ध्यान | २६६ |
| २१. इन्द्रद्युम्न आदिके सामने भगवान् शंकरका प्राकट्य | १२२ | ४९. भगवान् श्रीकृष्णका पद्मावतीका स्मरण करना | २६९ |
| २२. महीसागरसंगमतीर्थमें कुमारद्वारा पार्वतीजी एवं गणेशजीकी स्थापना | १२८ | ५०. भगवान् विष्णुका वसुको अपने पुत्रका वध करनेसे रोकना | २७७ |
| २३. कुमारीका दर्पणमें अपना मुँह देखना | १४२ | ५१. अस्थिसरोवरके प्रभावसे जीवित हुई ब्राह्मणीकी अपने पतिदेवसे भेंट | २८२ |
| २४. कुमारीका पार्वतीजीकी सखी चित्रलेखाके स्वरूपको प्राप्त होना | १४४ | ५२. तक्षकके काटनेसे वृक्षका भस्म होना | २८५ |
| २५. कालभीतिका प्रकट हुए शिवलिंगकी स्तुति करना | १४९ | ५३. धर्मज्ञ रीछका सिंहको उपदेश | २८९ |
| २६. भगवान् वासुदेवका नारदजीके समक्ष प्रकट होना | १६७ | ५४. श्रीरामकृष्णके समक्ष भगवान् विष्णुका प्राकट्य | २९० |
| २७. ऐतरेयका माताको उपदेश देना | १७० | ५५. रामानुजद्वारा भगवान् श्रीविष्णुका स्तवन | २९६ |
| २८. भगवान् सूर्यदेवका नारदजीके सामने प्राकट्य | १७९ | ५६. चक्रद्वारा राक्षसका शिरश्छेदन | २९९ |
| २९. सत्यव्रतका नन्दभद्रके सामने अपने नास्तिकतापूर्ण विचार रखना | १८४ | ५७. अगस्त्यजीका गंगाजीको अपना अभीष्ट मार्ग दिखाना | ३०९ |
| ३०. बालकका नन्दभद्रको उपदेश देना | १८८ | ५८. राजा शंखका अगस्त्यजीके साथ भगवान् विष्णुका कीर्तन करना | ३१६ |
| ३१. व्यासजीका कीटको उद्बोधन करना | १९१ | ५९. अंजनाको वायुदेवके द्वारा वरदान | ३१९ |
| ३२. हारीतका अपने पुत्र कमठसे परम भोजनका स्वरूप पूछना | १९६ | ६०. विश्वासु शबरद्वारा ब्राह्मणका आतिथ्य-सत्कार | ३३५ |
| ३३. ब्राह्मणोंद्वारा सूर्य भगवान्का स्तवन | २०५ | ६१. विद्यापतिका इन्द्रद्युम्नको नीलाचलवासी भगवान् विष्णुका वृत्तान्त सुनाना | ३३९ |
| ३४. भगवान् श्रीकृष्णद्वारा उग्रसेनजीको नारदजीके गुणोंका कथन | २०८ | ६२. इन्द्रद्युम्नका नारदजीके साथ भगवान्का प्रसाद ग्रहण करना | ३४५ |
| ३५. धर्मका महीसागरसंगमतीर्थका सावधान करना | २१८ | ६३. इन्द्रद्युम्नद्वारा भगवान्का स्तवन | ३५४ |
| ३६. बर्बरीकका भगवान् श्रीकृष्णसे श्रेयको पूछना | २२५ | ६४. श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा | ३७५ |
| ३७. बर्बरीकका नागगणसे वरदान माँगना | २२८ | ६५. दक्ष प्रजापतिको श्रीजगन्नाथजीका वरदान देना | ३८८ |
| ३८. बर्बरीकका नागकन्याओंके विवाह-प्रस्तावको ठुकराना | २२९ | ६६. भगवान् शिवके द्वारा बदरीक्षेत्रकी महिमाका कथन | ३९४ |
| ३९. भगवान् शंकरका बर्बरीकको भीमसेनको छोड़ देनेके लिये आदेश | २३१ | ६७. देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुसे वरयाचना | ४०६ |
| ४०. भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बर्बरीकका मस्तकछेदन | २३४ | ६८. तुलसीवृक्षके नीचे भगवान् श्रीकृष्णकी मूर्तिका पूजन | ४११ |
| ४१. भगवान् शंकरका भगवान् विष्णु एवं ब्रह्माजीके सामने प्रकट होना | २३९ | ६९. सत्यभामाका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने पूर्वजन्मोंका वृत्तान्त पूछना | ४२७ |
| ४२. मार्कण्डेयजीका नन्दिकेश्वरसे अरुणाचलक्षेत्रकी महिमा पूछना | २४४ | ७०. रोटी चुराकर दौड़ते हुए चाण्डालके पीछे विष्णुदासका घी लेकर जाना | ४३३ |
| ४३. गौतमाश्रममें हिंसक प्राणियोंका परस्पर प्रेम | २५० | ७१. ब्रह्माजीका भगवान्से मार्गशीर्षमासका माहात्म्य पूछना | ४४४ |
| ४४. दुर्गादेवीका महिषासुरके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थान | २५१ | ७२. राजा वीरबाहुका भरद्वाजजीसे अपने सौभाग्यका कारण पूछना | ४५१ |
| ७३. कुसुमसरोवरपर संकीर्तनमें उद्धवजीका प्राकट्य | ४६७ |
$[ १८ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ७४. कुतियाका दिव्य देहको प्राप्त होना ............. | ५०६ | ९८. लोपामुद्राके चरण-चिह्नोंको देखकर देवताओंका नमस्कार करना ....................................... | ७२० |
| ७५. शेषनागजीका लक्ष्मणजीके सामने प्रकट होना | ५११ | ९९. लक्ष्मीजीका लोपामुद्राको हृदयसे लगाना ...... | ७२५ |
| ७६. भगवान् रामद्वारा सीताकुण्डका माहात्म्य-कथन . | ५१७ | १००. शिवशर्माका सूर्यलोकमें पहुँचना .................. | ७३३ |
| ७७. भगवान् सूर्यका राजा घोषके सामने प्रकट होना.. | ५२५ | १०१. शिवजीका बालक गृहपतिकी इन्द्रके वज्रसे रक्षा करना ............................................. | ७४२ |
| ७८. वानरोंका समुद्रपर पुल बाँधना ..................... | ५३५ | १०२. शुक्राचार्यद्वारा भगवान् शंकरका स्तवन ......... | ७४७ |
| ७९. व्यासजीका शुकदेवजीको जटातीर्थमें स्नान करनेके लिये भेजना ................................. | ५४८ | १०३. ध्रुवका माता सुनीतिके सामने फूट-फूटकर रोना ..................................................... | ७५२ |
| ८०. सुचरित मुनिके सामने भगवान् शंकरका अर्ध-नारीश्वररूपमें प्रकट होना ........................ | ५५८ | १०४. भगवान् नारायणका ध्रुवको वरदान देना ....... | ७६० |
| ८१. वेताल-बाधासे मुक्त ब्राह्मणका दत्तात्रेयजीसे संवाद .................................................... | ५६८ | १०५. भगवान् विष्णुका अपने चक्रसे पुष्करिणी खोदना .................................................... | ७६७ |
| ८२. राजा पुण्यनिधिके सामने लक्ष्मीनारायणका प्राकट्य ................................................ | ५९३ | १०६. पार्वतीजीकी महादेवजीसे हरिकेशको वर देनेके लिये प्रार्थना ..................................... | ७९९ |
| ८३. धर्मकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये वर्द्धिनी अप्सराका उपस्थित होना ........................... | ६०४ | १०७. काशी-गमनके लिये कलावतीका अपने पतिसे प्रार्थना करना ............................................. | ८०५ |
| ८४. अतिथि-सत्कार .......................................... | ६१३ | १०८. रिपुंजयको ब्रह्माजीका दर्शन देना .................... | ८१३ |
| ८५. वैश्योंकी उत्पत्ति ....................................... | ६२२ | १०९. सुलक्षणाकी बकरीपर अनुग्रह करनेके लिये शिवजीसे प्रार्थना ..................................... | ८३१ |
| ८६. वसिष्ठजीके द्वारा भगवान् रामके प्रति भिन्न-भिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन .................. | ६३६ | ११०. सूर्यदेवके सामने भगवान् शंकरका प्राकट्य ... | ८३३ |
| ८७. भगवान् रामका अबलाको दुःखी देखकर द्रवित होना ............................................... | ६३९ | १११. विमलादित्यको भगवान् सूर्यके दर्शन ........... | ८४० |
| ८८. नारदजीका ब्रह्माजीसे चातुर्मास्य-व्रतका माहात्म्य पूछना ........................................ | ६४६ | ११२. कपर्दीका शिव-नाम-संकीर्तन करना ........... | ८४३ |
| ८९. गालवमुनिद्वारा शालग्रामपूजनका माहात्म्य-कथन ........................................ | ६५७ | ११३. धर्मक्षेत्रतीर्थमें पुण्यकीर्तिरूपधारी भगवान्का उपदेश देना ............................................ | ८४७ |
| ९०. भगवान् विष्णुकी पार्वतीजीसे क्षमा-याचना .... | ६६० | ११४. रिपुंजयके सामने शिव-पार्षदोंसे घिरे हुए दिव्य विमानका अवतरण ................................... | ८४९ |
| ९१. कार्तिकेयजीकी क्रौंचपर्वतपर भीषण तपस्या ... | ६६८ | ११५. अग्निविन्दुके सामने लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका प्राकट्य ......................................... | ८५२ |
| ९२. शिवदूतोंका चाण्डालिनीको दिव्यतेजसे सम्पन्न करना ........................................ | ६७६ | ११६. लीलाकमलका स्पर्श पाते ही जैगीषव्यका उल्लसित हो उठना .................................. | ८५७ |
| ९३. विदर्भराजकी पत्नीका ग्राहद्वारा पकड़ा जाना .. | ६८१ | ११७. भगवान् शिवका व्याघ्ररूपधारी दैत्यका वध करना ............................................... | ८६२ |
| ९४. अपनी कन्या सीमन्तिनीका भविष्य सुनकर चित्रवर्माका चिन्तामें डूब जाना ................... | ६८८ | ११८. पार्वतीजीका भगवान् शंकरसे रत्नेश्वर लिंगका स्वरूप एवं प्रभाव पूछना ............................ | ८६५ |
| ९५. भद्रायु और रानीका शिवयोगीकी पूजा करना. | ६९६ | ११९. नन्दीकी भगवान् शंकरसे सेवाके लिये प्रार्थना ................................................... | ८६९ |
| ९६. भद्रायुका व्याघ्रपर तीखे बाणोंकी वर्षा करना. | ७०३ | ||
| ९७. नैध्रुवका शारदाके प्रति उमा-महेश्वरव्रतकी महिमा-कथन ........................................ | ७१२ |
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१. माहेश्वरखण्ड (केदारखण्ड)
ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः
संक्षिप्त श्रीस्कन्द-महापुराण
~~ ० ~~
माहेश्वर-खण्ड
~~ ० ~~
[ केदार-खण्ड ]
~~ ० ~~
भगवान् शिवकी महिमा, दक्षका शिवजीसे द्वेष तथा दक्ष-यज्ञमें सतीका गमन
यस्याज्ञया जगत्स्रष्टा विरञ्चिः पालको हरिः।
संहर्ता कालरुद्राख्यो नमस्तस्मै पिनाकिने॥
जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजी इस जगत्की सृष्टि तथा विष्णुभगवान् पालन करते हैं और जो स्वयं ही कालरुद्र नाम धारण करके इस विश्वका संहार करते हैं, उन पिनाकधारी भगवान् शंकरको नमस्कार है।
नैमिषारण्य तीर्थ सब तीर्थोंसे उत्तम और समस्त क्षेत्रोंमें श्रेष्ठ है। प्राचीन कालमें वहाँ शौनक आदि तपस्वी मुनि एक ऐसे यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे, जो दीर्घकालतक चालू रहनेवाला था। उस यज्ञमें दीक्षित सभी महर्षियोंका सबके प्रति समान भाव था। एक दिन उन सभी महात्माओंके दर्शनकी उत्कण्ठासे प्रेरित होकर महातपस्वी व्यासशिष्य लोमश मुनि वहाँ पधारे। उस दीर्घकालिक यज्ञका अनुष्ठान करनेवाले मुनियोंने लोमशजीको आया देख एक साथ ही उठकर उनका स्वागत किया। सबके मनमें उल्लास छा गया। सभी उनके दर्शनके लिये उत्सुक थे। वे पापरहित महाभाग महर्षिगण लोमशजीको अर्घ्य और पाद्य निवेदन करके उनके सत्कारमें लग गये। आतिथ्यके पश्चात् उन्होंने विस्तारपूर्वक शिवधर्म सुनानेके लिये लोमशजीसे प्रार्थना की। इसपर उन्होंने शिवजीके उत्तम माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया।
२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लोमशजी बोले—अठारह पुराणोंमें परम पुरुष भगवान् शिवकी महिमाका गान किया गया है; अतः शिवजीके माहात्म्यका पूर्णतया वर्णन कोई भी नहीं कर सकता। जो लोग 'शिव' इस दो अक्षरके नामका उच्चारण करेंगे, उन्हें स्वर्ग और मोक्ष दोनों प्राप्त होंगे—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।* महादेवजी देवताओंके पालक और सबका शासन करनेवाले हैं, वे बड़े उदार (औढरदानी) हैं, उन्होंने अपना सब कुछ दूसरोंको दे डाला है, इसीलिये वे 'सर्व' (या शर्व) कहे गये हैं। जो सदा कल्याण करनेवाले भगवान् शिवका भजन करते हैं, वे धन्य हैं! जिन्होंने (दूसरोंकी रक्षाके लिये) विष-भक्षण किया, दक्ष-यज्ञका विनाश किया, कालको दग्ध कर डाला और राजा श्वेतको संकटसे छुड़ाया, उन महादेवजीकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है।
मुनियोंने पूछा—मुने! भगवान् शिवने कैसे विष-भक्षण किया तथा कैसे दक्ष-यज्ञका विनाश किया, वे सब बातें हमें बताइये। हमारे मनमें वह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है।
लोमशजी बोले—विप्रगण! पूर्वकालकी बात है, प्रजापति दक्षने परमेष्ठी ब्रह्माजीके कहनेसे अपनी पुत्री सतीका विवाह महात्मा शंकरजीके साथ कर दिया था। एक दिन वे ही दक्ष स्वेच्छानुसार घूमते हुए नैमिषारण्यमें आये। वहाँके ऋषि-मुनियोंने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंने भी स्तुति और नमस्कारके द्वारा दक्षका सम्मान किया; किंतु भगवान् शंकरने उनको प्रणाम नहीं किया। दक्षने जब इस बातकी ओर लक्ष्य किया, तब उनके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। वे प्रजापति ठहरे, यह अपमान कैसे सहते; उन्होंने तुरंत भगवान् शिवके प्रति कटु वचनोंकी बौछार आरम्भ कर दी—'अहो! ये सम्पूर्ण देवता और असुर भी मेरे चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं, श्रेष्ठ ब्राह्मण भी अत्यन्त उत्सुक होकर मुझे प्रणाम करते हैं; परन्तु वह शंकर दुष्ट पुरुषोंकी भाँति मेरे सामने शीश क्यों नहीं झुकाता? वह भूत-प्रेतोंका स्वामी है और सदा प्रेत-पिशाचोंसे घिरा रहता है; फिर भी अपनेको महान् समझता है! इसलिये आज मैं उसे शाप देनेको उद्यत हुआ हूँ। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मेरी बात सुनो और इसका पालन करो, आजसे इस रुद्रको मैंने यज्ञोंसे बहिष्कृत कर दिया।'
दक्षका यह कठोर वचन सुनकर नन्दीको बड़ा क्रोध हुआ। वे बोले—'अहो! मेरे स्वामी महेश्वर यज्ञभागसे वंचित किये गये। यज्ञ, दान, तप तथा नाना प्रकारके तीर्थ जिनके नामसे ही पवित्र हुए हैं, उन्हीं भगवान् शिवको शाप क्यों दिया गया? खोटी बुद्धिवाले दक्ष! वह यज्ञ, जिसमें शंकरजीका भाग न हो, व्यर्थ ही होगा; दुर्बुद्धे! तू उस यज्ञकी रक्षा कर। अरे! जिन महात्मा शिवने इस सम्पूर्ण विश्वका पालन किया है, उन्हींको तूने शाप दे डाला!'
तब महादेवजीने नन्दीसे कहा—महामते! तुम्हें ब्राह्मणोंके प्रति कभी क्रोध नहीं करना चाहिये। मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही यज्ञ करनेवाला यजमान और आचार्य हूँ, सम्पूर्ण यज्ञांग भी मैं ही हूँ; इसलिये मैं सदा यज्ञमें रत हूँ। (मुझे कोई शाप देकर यज्ञ-बहिष्कृत नहीं कर सकता।) इसी प्रकार सर्वव्यापी होनेके कारण मैं किसीके भीतर नहीं हूँ—किसी भी सीमासे आबद्ध नहीं हूँ; इस दृष्टिसे देखनेपर मैं सदा ही सब यज्ञोंसे बाह्य हूँ।
भगवान् शंकरके इस प्रकार समझानेपर महातपस्वी नन्दीने विवेकका आश्रय लिया। शिवजीका सत्संग पाकर वे परमानन्दमें निमग्न हो गये। उधर मुनियोंसे घिरे हुए दक्ष भी अत्यन्त रोषमें भरकर अपने स्थानको चले गये। वे प्रणाम
* शिवेति द्वयक्षरं नाम व्याहरिष्यन्ति ये जनाः। तेषां स्वर्गश्च मोक्षश्च भविष्यति न चान्यथा॥
(स्क० पु०, मा० के० १।१६)
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३
न करनेवाले रुद्रको भूल न सके। बारंबार उनका स्मरण करके क्रोधसे जलने लगे। भगवान् शिवकी ओरसे उन्होंने श्रद्धा हटा ली और वे शिवके उपासकोंकी निन्दामें संलग्न रहने लगे।
एक समय दक्षने स्वयं ही एक महान् यज्ञका आयोजन किया। उसमें उन्होंने बड़े-बड़े तपस्वी ऋषि-मुनियोंको बुलाया। वसिष्ठ आदि अनेक महर्षि उस महायज्ञमें पधारे। अगस्त्य, कश्यप, अत्रि, वामदेव, भृगु, दधीचि, भगवान् व्यास, भरद्वाज और गौतम—ये तथा और भी बहुत-से महर्षि वहाँ आये। सभी देवगण, समस्त लोकपाल, विद्याधर, गन्धर्व तथा किन्नरोंका भी आगमन हुआ। उस यज्ञमें सत्यलोकसे लोकपितामह ब्रह्माजी तथा वैकुण्ठ-धामसे भगवान् विष्णु भी बुलाये गये थे। इन्द्राणीके साथ देवराज इन्द्र, रोहिणीके साथ चन्द्रमा तथा अपनी प्रियाके साथ वरुणदेव भी आये थे। कुबेर पुष्पक विमानपर, वायुदेव मृगपर तथा अग्निदेव बकरेकी सवारीपर चढ़कर पधारे थे। नैर्ऋत्य कोणके अधिपति निर्ऋति प्रेतके कंधेपर बैठकर आये थे। इस प्रकार सब लोग दक्षकी यज्ञशालामें उपस्थित हुए। दक्षने सबका सत्कार किया। उनके यहाँ विश्वकर्माके बनाये हुए अनेक दिव्य भवन थे। वे सभी बहुमूल्य उपकरणोंसे सजे हुए तथा अत्यन्त प्रकाशमान थे। उन्हीं भवनोंमें दक्षने अपने समागत अतिथियोंको यथायोग्य स्थान देकर ठहराया।
दक्षका वह महायज्ञ कनखल तीर्थमें आरम्भ हुआ। उसमें उन्होंने भृगु आदि तपोधनोंको ऋत्विज् बनाया। अनेक प्रकारके कौतुक और मंगलाचार सम्पन्न करके दक्षने उस यज्ञकी दीक्षा ली। साथमें उनकी धर्मपत्नी भी बैठीं। ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया। उस समय अपने सुहृदोंसे घिरे हुए दक्ष अपना महत्त्व बढ़ जानेके कारण अधिक सुशोभित हो रहे थे। इसी समय महर्षि दधीचिने वहाँ दक्षसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—'प्रजापते! ये देवेश्वरगण, ये बड़े-बड़े महर्षि तथा लोकपाल भी तुम्हारे यज्ञ-मण्डपमें पधारे हैं, तो भी पिनाकपाणि महात्मा शंकरके बिना यह यज्ञ अधिक शोभा नहीं पा रहा है। जिनके बिना मंगल भी अमंगल रूपमें ही परिणत हो जाते हैं तथा जिन त्रिनेत्रधारी भगवान्के अधिकारमें आनेपर अमङ्गल भी तत्काल मंगलके रूपमें बदल जाते हैं, वे अबतक यहाँ क्यों नहीं दर्शन दे रहे हैं? दक्ष! अब तुम्हें ही भगवान् विष्णु और इन्द्रके साथ जाकर परमेष्ठी भगवान् महेश्वरको बुला ले आना चाहिये। उन योगी शंकरकी उपस्थितिसे यहाँ सब कुछ पवित्र हो जायगा, जिनके स्मरण तथा नामोच्चारणसे सब पुण्यमय हो जाता है।'
दधीचिका यह वचन सुनकर दक्ष क्रोधमें भर गये और बड़ी उतावलीके साथ उत्तर देने लगे। उनका भीतरी भाव तो दूषित था, किंतु ऊपरसे वे हँसते हुए-से बोल रहे थे। उन्होंने कहा—'सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं— भगवान् विष्णु। जिनमें सनातन-धर्मकी स्थिति है, जिनमें सम्पूर्ण वेद, यज्ञ और नाना प्रकारके सत्कर्म भी प्रतिष्ठित हैं, वे भगवान् विष्णु तो यहाँ पधारे हुए हैं ही। सत्यलोकसे लोकपितामह ब्रह्माजी भी आ गये हैं। उनके साथ समस्त वेद, उपनिषद् और नाना प्रकारके आगम भी हैं। इसी प्रकार आप-जैसे निष्पाप महर्षिगण भी आ ही गये हैं। जो-जो यज्ञ-कर्मके योग्य हैं, शान्तचित्त और सुपात्र हैं, वे सब महात्मा यहाँ पदार्पण कर चुके हैं। आप सब महर्षिगण वेदके वाक्य तथा उसके अर्थके भी तत्त्वज्ञ हैं। दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं। आपके होते हुए अब हमें रुद्रसे क्या प्रयोजन है? ब्रह्मन्! आप सब लोग मिलकर मेरे इस महान् यज्ञको सफल बनावें।'
दक्षकी बात सुनकर दधीचिने कहा—पवित्र अन्तःकरणवाले समस्त श्रेष्ठ महर्षियों और देवताओंके समुदायमें यह बड़ा भारी अन्याय हुआ है कि भगवान् शिवको आमन्त्रित नहीं किया गया। महात्मा शंकरके बिना इस यज्ञमें शीघ्र ही महान् विघ्न होनेवाला है।
| ४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
यों कहकर महर्षि दधीचि अकेले ही दक्षकी यज्ञशालासे निकल पड़े और तुरंत अपने आश्रमको चले गये। उनके चले जानेपर दक्षने हँसते हुए कहा—'ब्राह्मणो! दधीचि शंकरके प्रेमी हैं। वे चले गये। आप सब लोग वैदिक सिद्धान्तमें रत रहनेवाले हैं; भगवान् विष्णु आप सबके अग्रणी हैं। अब शीघ्र ही आपलोग मेरे यज्ञको सफल बनावें।' तब उन सभी महर्षियोंने वहाँ देवयज्ञ प्रारम्भ किया।
इसी समय महादेवी दक्षकुमारी सतीने, जो गन्धमादनपर्वतपर अपनी सखियोंके साथ विराजमान थीं, रोहिणीके साथ चन्द्रमाको कहीं जाते हुए देखा। वे यज्ञमें ही जा रहे थे। सतीने अपनी सखी विजयासे कहा—'विजये! तू शीघ्र जाकर पूछ तो सही, ये चन्द्रमा कहाँ जायँगे?' उनके आदेशसे विजया चन्द्रमाके समीप गयी और यथोचित विनयके साथ उनकी यात्राका उद्देश्य पूछा। चन्द्रमाने दक्षके यज्ञमें जानेका सब वृत्तान्त बता दिया। यह सुनकर विजयाको बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ। उसने तुरंत लौटकर सतीसे चन्द्रमाकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं। सुनकर सती देवीने विचार किया, 'क्या कारण है, जो पिताजी मुझे नहीं बुला रहे हैं? क्या मेरी यशस्विनी माता भी मुझे भूल गयीं? आज मैं भगवान् शंकरसे इसका कारण पूछती हूँ।' यह निश्चय करके सती देवीने सखियोंको वहीं ठहरा दिया और स्वयं भगवान् शंकरके पास गयीं। उन्होंने देखा, त्रिनेत्रधारी महेश्वर सभा-मण्डपमें विराजमान हैं। चण्ड-मुण्ड आदि सभी पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरकर बैठे हैं। बाण, भृंगी, नन्दी, महाकाल, महारौद्र, महामुण्ड, महाशिरा, धूम्राक्ष, धूम्रकेतु, धूम्रपाद तथा अन्य बहुत-से गण भगवान् रुद्रका अनुवर्तन करनेवाले हैं। वे सभी जितेन्द्रिय तथा वीतराग हैं। लोक-कल्याणकारी भगवान् शंकर इन सबसे घिरे हुए हैं और परम अद्भुत आसनपर विराजमान हैं। सतीका मन भगवान् शिवका दर्शन करते ही उनकी ओर आकृष्ट हो गया। वे सहसा उनके समीप चली गयीं। भगवान् शिवने बड़े आदरके साथ प्रीतियुक्त वचनोंसे सतीको आनन्दित किया और कहा—'प्रिये! इस समय यहाँ तुम्हारे आगमनका क्या कारण है?'
सती बोलीं—देवदेवेश्वर! मेरे पिताके घर महान् यज्ञ हो रहा है। उसमें चलनेके लिये आपकी रुचि क्यों नहीं होती? सदाशिव! यद्यपि आप उस यज्ञमें बुलाये नहीं गये हैं, तथापि आज मेरे कहनेसे मेरे पिताकी यज्ञशालामें आप स्वयं सब प्रकारसे प्रयत्न करके पधारें।
सतीका यह वचन सुनकर महादेवजीने मधुर वाणीमें कहा—कल्याणी! तुम्हारे पिताकी दृष्टिमें जो देवता, असुर तथा किन्नर आदि सम्माननीय हैं, वे सब निःसन्देह उनके यज्ञमें पहुँच गये हैं। सुन्दरी! जो लोग दूसरोंके घर बिना बुलाये जाते हैं, वे वहाँ मृत्युसे भी अधिक कष्टदायक अपमानको प्राप्त होते हैं।* शुभे! दूसरोंके घर जानेपर इन्द्र भी लघुताको प्राप्त होते हैं; इसलिये तुम्हें भी दक्षके यज्ञमें नहीं जाना चाहिये।
महात्मा भगवान् शंकरके इस प्रकार कहनेपर सतीने अपने पिताके प्रति रोष प्रकट करनेवाले वचनोंमें कहा—'नाथ! जिनसे सम्पूर्ण यज्ञ सफल होते हैं, वे देवदेवेश्वर तो आप ही हैं; फिर आपको भी मेरे दुराचारी पिताने आमन्त्रित नहीं किया! उस दुरात्माके मनमें आपके प्रति सद्भाव है या दुर्भाव, यह सब मैं जानना चाहती हूँ। इसलिये अभी पिताके यज्ञमण्डपमें जाती हूँ। देवदेव! जगत्पते! मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा दीजिये।'
सती देवीके यों कहनेपर भगवान् महेश्वर
* अनाहूताश्च ये सुभ्रु गच्छन्ति परमन्दिरम्। तेऽपमानं प्राप्नुवन्ति मरणादधिकं ततः॥
(स्क० पु०, मा० के० २।५९)
* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५
बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवी! यदि ऐसी बात है तो इस नन्दीपर सवार हो नाना प्रकारके प्रमथगणोंको साथ लेकर तुम शीघ्र वहाँकी यात्रा करो; मैं आज्ञा देता हूँ।
भगवान् शिवके आदेशसे साठ हजार रुद्रगण सती देवीके साथ चले। उन गणोंसे घिरी हुई देवीने अपने पिताके घरकी ओर प्रस्थान किया। सती देवी जब पिताके घर चली गयीं, उस समय सब बातोंपर विचार करके भगवान् महेश्वरने अपने मुखसे यह वचन निकाला—'अपने पिताद्वारा अपमानित होकर दक्षकुमारी सती अब फिर यहाँ लौटकर नहीं आयेंगी।'
~~ ० ~~
सतीका अग्नि-प्रवेश, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस तथा दक्षपर पुनः भगवान् शिवकी कृपा
दाक्षायणी सती उस स्थानपर गयीं, जहाँ वह महान् प्रकाशशाली यज्ञ हो रहा था। नाना प्रकारके आश्चर्यमय कौतूहलसे परिपूर्ण पिताके उस भवनको देखकर सती देवी द्वारपर ही ठहर गयीं और परम सौभाग्यवान् नन्दीकी पीठसे उतरकर इधर-उधर दृष्टि डालने लगीं। उन्होंने माता, पिता, सुहृद्, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धवोंको देखा। माता-पिताको मस्तक झुकाकर वे बड़ी प्रसन्न हुईं। फिर अपने अभिमत प्रस्तावके अनुरूप वचन बोलीं—'पिताजी! जिनसे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् पवित्र होता है, उन परम कल्याणमय भगवान् शंकरको आपने क्यों नहीं बुलाया?' (फिर ऋषियोंको सम्बोधित करके कहा—) 'भृगुजी! क्या आप भगवान् शिवको नहीं जानते? महामते कश्यप! क्या आप भी महादेवजीसे अपरिचित हैं? अत्रि, वसिष्ठ तथा कण्वजी! क्या आप भी महेश्वरकी महिमा नहीं जानते? इन्द्र! इस समय तुम्हारा क्या कर्तव्य है? भगवान् विष्णु! आप तो परमेश्वर महादेवजीको अच्छी तरह जानते हैं। ब्रह्माजी! क्या आपको महादेवजीके पराक्रमका ज्ञान नहीं है?'
सतीकी बात सुनकर दक्षने कुपित होकर कहा—भद्रे! तुम्हारे बहुत बातें बनानेसे क्या होगा? इस समय यहाँ तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है। ठहरो या चली जाओ। तुम यहाँ आयी ही क्यों? तुम्हारा पति, जो शिव कहलाता है, अमंगलका मूर्तिमान् स्वरूप है। कुलीन भी नहीं है। वेदसे बहिष्कृत है। वह भूत, प्रेत और पिशाचोंका राजा है। इसीलिये इस यज्ञके निमित्त उसको आमन्त्रित नहीं किया गया है।
विश्ववन्दिता सती अपने पिताको शिवकी निन्दामें संलग्न देख अत्यन्त क्रोधमें भर गयीं और सोचने लगीं—'जो महादेवजीकी निन्दा करता है तथा जो उनकी निन्दा होती देख चुपचाप सुनता है, वे दोनों नरकमें जाते हैं, और जबतक सूर्य-चन्द्रमाकी स्थिति है तबतक उस नरकमें ही पड़े रहते हैं।* अतः अब मैं इस देहको त्याग दूँगी, अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगी।' इस प्रकार विचार करती हुई सती शिव, रुद्र आदि नामोंका उच्चारण करने लगीं और अग्निमें प्रवेश कर गयीं। यह देख उनके साथ आये हुए समस्त शिवगण हाहाकार करने लगे। ऋषि, इन्द्र आदि देवता, मरुद्गण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा सम्पूर्ण लोकपाल अवाक् हो गये। दक्ष-यज्ञमें सम्मिलित हुए सभी ऋषि-मुनि इस घटनासे भयभीत हो उठे।
इसी बीचमें महात्मा नारदजीने महादेवजीके पास जाकर दक्षकी सारी करतूतें कह सुनायीं। सुनकर भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले परम क्रोधवान् जगदीश्वर भगवान् रुद्र बहुत ही कुपित
* यो निन्दति महादेवं निन्द्यमानं शृणोति च। तावुभौ नरकं यातो यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
(स्क० पु०, मा० के० ३।२२)
दक्षके द्वारा सतीका तिरस्कार
* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ७
हुए। लोकसंहारकारी रुद्रने अपनी जटा उखाड़कर उसे पर्वतके शिखरपर क्रोधपूर्वक दे मारा। जटा उखाड़नेसे महायशस्वी वीरभद्र प्रकट हुए। साथ ही करोड़ों भूतोंसे घिरी हुई कालीका भी प्राकट्य हुआ। महात्मा रुद्रके क्रोध और निःश्वाससे सैकड़ों प्रकारके ज्वर तथा तेरह प्रकारके सन्निपात रोग उत्पन्न हुए। वीरभद्रने भयंकर पराक्रमी रुद्रसे निवेदन किया—'प्रभो! शीघ्र आज्ञा कीजिये, इस सेवकसे क्या काम लेना है?' भगवान् रुद्रने आज्ञा दी—'महाबाहु वीर! शीघ्र जाओ और दक्ष-यज्ञका विनाश करो।'
देवाधिदेव शूलपाणि महादेवजीकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके महातेजस्वी वीरभद्र समस्त भूतोंसे घिरे हुए दक्ष-यज्ञकी ओर चल दिये। उनके साथ कालिका देवी भी थीं। उसी समय दक्षके यहाँ सहसा अपशकुन प्रकट होने लगे। धूल और कंकड़ोंसे भरी हुई रूक्ष वायु चलने लगी। मेघ रक्तकी वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया। पृथ्वीपर सहस्त्रशः उल्कापात होने लगे। इस प्रकारके अनिष्टसूचक उत्पात वहाँ देवता आदिको दिखायी दिये। दक्षको भी बड़ा भय हुआ। वे भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और विनयपूर्वक कहने लगे—'महाविष्णो! आप हमारे परम गुरु हैं; रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। सुरश्रेष्ठ! आप ही यज्ञ हैं, इस महान् भयसे मुझे मुक्त कीजिये।'
दक्षके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् मधुसूदनने कहा—ब्रह्मन्! इसमें सन्देह नहीं कि मुझे तुम्हारी रक्षा करनी चाहिये; किंतु तुमने धर्मको जानते हुए भी महेश्वरकी अवहेलना की है। महेश्वरकी अवज्ञासे तुम्हारा सब कुछ निष्फल हो जायगा। जहाँ अपूज्य व्यक्तियोंका पूजन होता तथा पूजनीय महात्माका पूजन नहीं किया जाता, वहाँ तीन संकट अवश्य प्राप्त होंगे—दुर्भिक्ष, मृत्यु तथा भय।* इसलिये सब प्रकारसे यत्न करके भगवान् शंकरको मनाना चाहिये। तुम्हारे यज्ञमें महेश्वरका सम्मान नहीं किया गया है, इसी कारण यह महान् भय उपस्थित हुआ है। इस समय तो हम सब लोग मिलकर भी इस भयका निवारण करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह सब कुछ तुम्हारी दुर्नीतिके कारण हो रहा है।
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दक्ष चिन्तित हो उठे। उनका मुँह सूख गया। इतनेमें ही अपनी सेनासे घिरे हुए महातेजस्वी वीरभद्र भी आ पहुँचे। उनके साथ काली, कात्यायनी, ईशानी, चामुण्डा, मर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता तथा वैष्णवी—ये नव दुर्गाएँ तथा भूतोंका महान् समुदाय भी था। शाकिनी, डाकिनी, भूत, प्रमथ, गुह्यक, कूष्माण्ड, कर्पट, वटुक, ब्रह्मराक्षस, भैरव, क्षेत्रपाल, राक्षस, यक्ष, विनायक तथा चौंसठ योगिनियोंका मण्डल—ये सब उस महान् प्रकाशमय यज्ञ-मण्डपमें सहसा प्रकट हो गये। भगवान् शंकरके उन पार्षदोंनें देवताओंके साथ युद्ध आरम्भ किया। लोकपालोंसहित देवताओंने भी शिवगणोंपर अस्त्र-शस्त्रोंसे प्रहार किया। यद्यपि वे लाखोंकी संख्यामें थे, तथापि इन्द्र आदि लोकपालोंने उन्हें रणसे विमुख कर दिया। उस समय देवताओंकी विजय और यजमानके सन्तोषके लिये महर्षि भृगुने शिवगणोंके प्रति उच्चाटनका प्रयोग किया था। इसीसे उस समय देवता विजयी हुए।
अपने सैनिकोंकी पराजय देखकर वीरभद्रको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने भूतों, प्रेतों और पिशाचोंको पीछे करके वृषभास्यको आगे किया और स्वयं भी आगे आ गये। महाबली वीरभद्रने एक तीक्ष्ण त्रिशूल हाथमें लेकर देवताओं, यक्षों, (दक्षपक्षीय) पिशाचों, गुह्यकों तथा राक्षसोंको भी उस युद्धमें मार गिराया। समस्त शिवगणोंने शूलके आघातसे
* अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते। त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दुर्भिक्षो मरणं भयम्॥
(स्क० पु०, मा० के० ३।४८-४९)
८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
देवताओंको गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो सम्पूर्ण देवता पराजित होकर भागने लगे। सबने एक-दूसरेको छोड़कर स्वर्गकी राह ली। केवल इन्द्र आदि लोकपाल ही विजयके लिये उत्सुक होकर वहाँ खड़े रहे। वे बारंबार बृहस्पतिजीसे पूछते थे—'गुरुदेव! हमारी विजय कैसे होगी?' तब बृहस्पतिजीने कहा—'भगवान् विष्णुने जो बात बहुत पहले कह दी थी, वह आज सत्य हुई। यदि फलरूपमें परिणत हुए कर्मका नियामक कोई ईश्वर है तो वह भी कर्ताका ही आश्रय लेता है। जो कर्ता नहीं है, उसपर वह अपना प्रभुत्व नहीं प्रकट करता—कर्म करनेवालेको ही ईश्वर उसका फल देता है, न करनेवालेको नहीं। वह ईश्वर केवल अनन्य भक्तिसे जानने योग्य है। परम शान्ति और सन्तोषसे ही भगवान् सदाशिवके स्वरूपको जाना जा सकता है। उन्हींसे यह सम्पूर्ण सुख-दुःखात्मक जगत् जन्म और जीवन धारण करता है। (इस समय तुम्हारी विजयका कोई उपाय नहीं दिखायी देता।) इन्द्र! तुम मूर्खता और लोलुपताके वश इन लोकपालोंके साथ यहाँ आ गये हो। बताओ तो इस समय क्या करोगे? ये परम शोभायमान गण भगवान् शिवके किंकर हैं; वे ही इनके सहायक हैं। ये महाभाग कुपित होनेपर जब संहार आरम्भ करते हैं तब किसीको शेष नहीं छोड़ते।'
बृहस्पतिजीका यह कथन सुनकर वे सम्पूर्ण देवता, लोकपाल तथा इन्द्र भी चिन्तामें डूब गये। तदनन्तर शिवगणोंसे घिरे हुए वीरभद्रने कहा—'तुम सब देवता मूर्खताके कारण यहाँ भेंट लेनेके लिये आ गये हो। मेरे निकट तो आओ। मैं तुम्हें भेंट देता हूँ। सखे इन्द्र! मित्रवर सूर्य! चन्द्रमा! धनाध्यक्ष कुबेर! पाशधारी वरुण! मृत्यो! यमुनाके बड़े भैया यमराज! मैं आपलोगोंकी तृप्तिके लिये शीघ्र ही भेंट अर्पित करूँगा।' यों कहकर क्रोधमें भरे वीरभद्रने सब देवताओंपर बाणोंकी बौछार आरम्भ की। उन बाणोंके आघातसे पीड़ित होकर वे सब-के-सब दसों दिशाओंमें भाग गये। लोकपालोंके और देवताओंके पलायन कर जानेपर भगवान् विष्णु भी चले गये। फिर वीरभद्र अपने गणोंके साथ यज्ञशालामें आये। उस समय देवता, ऋषि तथा अन्य जो यज्ञोपजीवी लोग थे, उन सबको भगवान् शिवके गणोंने परास्त कर दिया। महर्षि भृगुको धरतीपर पटककर उनकी दाढ़ी और मूँछ नोंच ली। पूषाने दाँत दिखाकर हँसी उड़ायी थी, अतः शिवगणोंने उनके सारे दाँत उखाड़ लिये। अग्निपत्नी स्वधा और स्वाहाको भी अपमानित किया तथा क्रोधमें भरकर उन्होंने और भी ऐसे-ऐसे बर्ताव किये, जो वाणीद्वारा कहने योग्य नहीं हैं। दक्ष महान् भयके मारे अन्तर्वेदीमें छिपे हुए थे। इस बातका पता लगनेपर रोषमें भरे हुए वीरभद्र उन्हें पकड़ लाये और उनका जबड़ा पकड़कर सिरके ऊपर तलवारसे चोट की। फिर दक्षके कटे हुए सिरको उन्होंने तुरंत ही यज्ञकुण्डमें डालकर जला दिया। उस यज्ञशालामें दूसरे-दूसरे जो देवता, पितर, ऋषि, यक्ष और राक्षस रह गये थे, वे सब शिवगणोंके उपद्रवसे भयभीत होकर भाग चले। चन्द्रमा, आदित्यगण, ग्रहमण्डल, नक्षत्र और तारे—इन सबको शिवगणोंने भगा दिया। ब्रह्माजी अपने पुत्र दक्षके शोकसे पीड़ित होकर सत्यलोकको चले गये और वहाँ स्वस्थचित्तसे विचार करने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? इस अपमानके कारण ब्रह्माजीको शान्ति नहीं मिलती थी। 'यह सब कुछ उस दक्षके ही पापका फल है' यह जानकर पितामहने कैलास पर्वतपर जानेका निश्चय किया। महातेजस्वी ब्रह्माजी हंसपर आरूढ़ हो सब देवताओंके साथ पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर गये। वहाँ उन्होंने नन्दीके साथ एकान्तमें बैठे हुए भगवान् सदाशिवका दर्शन किया। उनके मस्तकपर जटा-जूट शोभा पा रहा था। भगवान् शिवको देखकर ब्रह्माजी दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़ गये और अपना अपराध क्षमा करानेके
वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञ-विध्वंस
| १० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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लिये उद्यत हो अपने चारों मुकुटोंसे भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका स्पर्श करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।
ब्रह्माजी बोले— शान्तस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, परब्रह्मरूप परमात्मा भगवान् रुद्रको नमस्कार है; मस्तकपर जटा-जूट धारण करनेवाले महान् ज्योतिर्मय महेश्वरको नमस्कार है। भगवन्! आप जगत्की सृष्टि करनेवाले प्रजापतियोंके भी स्रष्टा हैं। आप ही सबका धारण-पोषण करते हैं। आप सबके प्रपितामह हैं। आप ही रुद्र, महान्, नीलकण्ठ और वेधा हैं; आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपका स्वरूप है। आप ही इसके बीज (आदिकारण) हैं। इस जगत्को आनन्दकी प्राप्ति करानेवाले भी आप ही हैं, आपको नमस्कार है। आप ही ओंकार, वषट्कार तथा सम्पूर्ण आयोजनोंके प्रवर्त्तक हैं। यज्ञ, यजमान और यज्ञ-प्रवर्त्तक भी आप ही हैं। प्रभो! देवेश्वर! यज्ञ-प्रवर्त्तक होकर भी आपने इस यज्ञका विनाश कैसे किया? महादेव! आप ब्राह्मणोंके हितैषी हैं, तो भी आपके द्वारा दक्षका वध कैसे हुआ? रुद्र! आप तो गौओं और ब्राह्मणोंके प्रतिपालक हैं। समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं। रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।
श्रीमहादेवजीने कहा— पितामह! सावधान होकर मेरी बात सुनिये, दक्ष अपने ही कर्मसे मारा गया। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इसलिये किसीको भी कदापि ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये जो दूसरोंको क्लेश पहुँचानेवाला हो। ब्रह्मन्! जो दूसरोंको कष्ट देनेवाला कर्म किया जाता है, वह एक दिन अपने ही ऊपर आ पड़ता है।
यों कहकर भगवान् शंकर उस समय ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ कनखल तीर्थमें, जहाँ प्रजापति दक्षका यज्ञमण्डप था, गये। वहाँ जाकर उन्होंने वीरभद्रके द्वारा जो कुछ किया गया था, सब देखा। स्वाहा, स्वधा, पूषा, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भृगु, अन्यान्य ऋषि, समस्त पितर, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—जो भी वहाँ जिस अवस्थामें पड़े थे, सबको भगवान् शिवने देखा। किसीके अंग-भंग हो गये थे, किसीकी दाढ़ी और मूँछें नोंच ली गयी थीं तथा कुछ लोग रणभूमिमें मरे पड़े थे। भगवान् शंकरको आया देख वीरभद्रने समस्त गणोंके साथ उनके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम किया और वे सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। महाबली वीरभद्रको अपने आगे खड़ा देख महादेवजीने हँसते हुए कहा—‘वीरवर! यह तुमने क्या किया? दक्षको शीघ्र यहाँ ले आओ, जिसने ऐसा यज्ञ किया और उसका वैसा ही विलक्षण फल भी प्राप्त किया।’
शंकरजीके यों कहनेपर वीरभद्रने बड़ी उतावलीके साथ दक्षका धड़ लाकर उनके सामने डाल दिया। तब शंकरजीने कहा—‘वीर! इस दुरात्मा दक्षका मस्तक कौन ले गया? यदि मिल जाय तो कुटिल होनेपर भी इसे मैं जीवित कर दूँगा।’ यह सुनकर वीरभद्र फिर बोले—‘भगवन्! मैंने उसी समय इसके मस्तकको अग्निमें होम दिया था, अब तो केवल पशुका सिर बचा है। किंतु उसका मुख बहुत विकृत हो गया है।’ ये सब बातें जानकर भगवान् शिवने पशुके भयंकर मुखको, जिसमें दाढ़ी भी लगी थी, दक्षके धड़से जोड़ दिया। इस प्रकार भगवान् शंकरकी कृपासे दक्षको नया जीवन प्राप्त हुआ। दक्ष अपने सामने भगवान् रुद्रको उपस्थित देख लज्जासे गड़ गये, उन्होंने लोक-कल्याणकारी भगवान् शंकरके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उनका स्तवन किया।
दक्ष बोले— सबको वर देनेवाले सर्वश्रेष्ठ देव भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। सनातन देवता शिवको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। देवताओंके पालक और ईश्वर, पापहारी हरको मैं प्रणाम करता हूँ। जगत्के एकमात्र बन्धु शम्भुको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके स्वामी, विश्वरूप, सनातन ब्रह्म और स्वात्मरूप हैं, उन