भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करता है, वह परलोकमें वैशस नामक नरकमें गिराया जाता है। जो लुटेरोंके मार्गका आश्रय लेकर दूसरोंको जहर देता, गाँवोंको जला डालता और बनियोंके धनका अपहरण करता है, वह परलोकमें वज्रदंष्ट्र नामक भयानक नरकमें दीर्घकालतकके लिये डाल दिया जाता है। ये तथा और भी जितने नरक हैं, उन सबमें वह मनुष्य कभी नहीं पड़ता, जो स्वामिपुष्करिणी तीर्थमें गोता लगाता है। स्वामिपुष्करिणीमें एक बार स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। उसे आत्मज्ञान तथा चार प्रकारकी साक्षात् मुक्तिकी भी प्राप्ति होती है। जो महापातकों अथवा सम्पूर्ण पातकोंसे युक्त है, वह भी स्वामितीर्थमें गोता लगानेसे तत्काल पवित्र हो जाता है। स्वामितीर्थके सेवनसे मनुष्योंकी बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, सम्पत्ति, ज्ञान, धर्म और वैराग्यकी वृद्धि तथा मनकी शुद्धि होती है।

इस प्रकार अद्वैतज्ञान, भोग और मोक्ष तथा मनोवांछित कामना प्रदान करनेवाले अज्ञाननाशक स्वामितीर्थके प्रभावका वर्णन किया गया, जो मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।

नैमिषारण्यनिवासी महर्षियो! मैं तुमलोगोंसे स्वामितीर्थकी महिमाका अभी और वर्णन करूँगा। चन्द्रवंशमें नन्द नामसे प्रसिद्ध एक महाराजा थे, जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम धर्मगुप्त था। नन्दने राज्यकी रक्षाका भार अपने पुत्रपर रख दिया और स्वयं इन्द्रियोंको वशमें करके आहारपर विजय पाकर तपस्याके लिये तपोवनमें चले गये। पिताके तपोवन चले जानेपर राजा धर्मगुप्तने सारी पृथ्वीका पालन किया। वे धर्मोंके ज्ञाता और नीतिपरायण थे। उन्होंने अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा इन्द्र आदि देवताओंका पूजन किया और ब्राह्मणोंको धन एवं बहुत-से क्षेत्र प्रदान किये। उनके शासनकालमें समस्त प्रजा अपने-अपने धर्मका पालन करती थी। उनके राज्यमें कभी चोर आदिसे किसीको कष्ट नहीं प्राप्त हुआ। एक दिन धर्मगुप्त उत्तम घोड़ेपर सवार हो वनमें गये। वहीं रात हो गयी। विनयशील राजाने वहीं सायं-सन्ध्याकी उपासना करके वेदमाता गायत्रीका जप किया। तत्पश्चात् सिंह, व्याघ्र आदिके भयसे वे एक वृक्षपर जा बैठे। उस वृक्षके पास एक रीछ आया, जो सिंहके भयसे पीड़ित था। वनमें विचरनेवाला एक सिंह उस रीछका पीछा कर रहा था। रीछ वृक्षपर चढ़ गया। वहाँ उसने महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न राजा धर्मगुप्तको बैठे देखा। उन्हें देखकर रीछ बोला—‘महाराज! भय न करो। हम दोनों रातभर यहीं रहेंगे, क्योंकि वृक्षके नीचे बड़ा भयंकर सिंह आया हुआ है। महामते! तुम आधी राततक निर्भय होकर नींद लो, मैं सजग होकर तुम्हारी रक्षा करता रहूँगा। उसके बाद जब मैं सो जाऊँ, तब शेष आधी राततक तुम मेरी रक्षा करना।'

रीछकी यह बात सुनकर धर्मगुप्त सो गये। उस समय सिंहने रीछसे कहा—‘यह राजा तो सो गया है, अब तुम इसे मेरे लिये नीचे गिरा दो।' तब धर्मज्ञ रीछने सिंहको उत्तर दिया—‘वनचारी मृगराज! तुम धर्मको नहीं जानते। अहो! विश्वासघात करनेवाले प्राणियोंको संसारमें बड़ा कष्ट भोगना पड़ता है। मित्रद्रोहियोंका पाप दस हजार यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी नष्ट नहीं होता। ब्रह्महत्या आदि पापोंका तो किसी प्रकार निवारण हो सकता है, परंतु विश्वासघातियोंका पाप कोटिजन्मोंमें भी नष्ट नहीं हो सकता है।*


* ब्रह्महत्यादिपापानां कथञ्चिन्निष्कृतिर्भवेत्। विश्वासघातिनां पापं न नश्येज्जन्मकोटिभिः॥ (स्क० पु०, वै० वे० १३।२२)