भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 318
  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २८९

सिंह! मैं मेरुपर्वतको इस पृथ्वीका बड़ा भारी भार नहीं मानता, संसारमें जो विश्वासघाती है, उसीको मैं भूतलका महान् भार समझता हूँ।'

रीछके ऐसा कहनेपर सिंह चुप हो गया। तत्पश्चात् धर्मगुप्त जागे और रीछ वृक्षपर सो गया। तब सिंहने राजासे कहा—'इस रीछको नीचे छोड़ दो।' तब राजाने अपने अंकमें सिर रखकर सोये हुए रीछको पृथ्वीपर ढकेल दिया। राजाके गिरानेपर रीछ वृक्षकी डाली पकड़ता लटक गया। वह पुण्यवश वृक्षसे नीचे नहीं गिरा। अब वह राजाके पास आकर क्रोधपूर्वक बोला— 'राजन्! मैं इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला ध्यानकाष्ठ नामक मुनि हूँ। मेरा जन्म भृगुवंशमें हुआ है। मैंने स्वेच्छासे रीछका रूप धारण किया है। मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया था। फिर सोते समय तुमने मुझे क्यों ढकेला ? जाओ, मेरे शापसे बहुत शीघ्र पागल होकर पृथ्वीपर विचरो।' राजाको इस प्रकार शाप देकर मुनिने सिंहसे कहा—'तुम सिंह नहीं, महायक्ष हो। पहले कुबेरके मन्त्री थे। एक दिन अपनी स्त्रीके साथ हिमालयके शिखरपर आकर अनजानमें गौतम मुनिके समीप ही तुम विहार करने लगे थे। दैवकी प्रेरणासे महर्षि गौतम समिधा लानेके लिये कुटीसे बाहर निकले। उन्होंने तुम्हें नंगा देख इस प्रकार शाप दिया—'अरे! तू मेरे आश्रममें आकर नंगा खड़ा है। अतः अभी तू सिंह हो जायगा।' इस प्रकार तुम्हें सिंहयोनि प्राप्त हुई है। मृगराज! ये सारी बातें मैं ध्यानसे जानता हूँ।' ध्यानकाष्ठ मुनिके ऐसा कहनेपर उसने सिंहका रूप त्याग दिया और कुबेर-सचिवके रूपमें दिव्य यक्षका शरीर धारण कर लिया। उसके बाद उसने हाथ जोड़कर कहा— 'महामुने! आज मुझे अपने समस्त पूर्ववृत्तान्तका ज्ञान हो गया। गौतमजीने शाप देते समय उसके उद्धारका समय भी इस प्रकार बताया था— 'जब रीछरूपधारी ध्यानकाष्ठके साथ तुम्हारा वार्तालाप होगा, तब तुम सिंह-देह त्याग करके यक्षरूप धारण कर लोगे।'

यों कहकर वह यक्षराज मुनिवर ध्यानकाष्ठको प्रणाम करके उत्तम विमानपर बैठा और अलकापुरीको चला गया। नृपश्रेष्ठ धर्मगुप्तको पागलके रूपमें देखकर मन्त्रीलोग उन्हें नर्मदाके तटपर उनके पिता नन्दके पास ले गये और यह बताया कि आपके पुत्रकी बुद्धि विकृत हो गयी है। पुत्रका वृत्तान्त जानकर राजा नन्द उसे साथ ले सहसा जैमिनि मुनिके समीप गये और उनसे इस प्रकार बोले—'भगवन्! मेरा पुत्र इस समय उन्मादग्रस्त हो गया है। महामुने! इस रोगके निवारणका कोई उपाय बतलाइये।' उनके ऐसा पूछनेपर मुनिवर जैमिनिने दीर्घकालतक ध्यान करके कहा, 'राजन्! तुम्हारा पुत्र ध्यानकाष्ठ मुनिके शापसे उन्मत्त हुआ है। इस शापसे छुटकारा पानेके लिये मैं तुम्हें उपाय बतलाता हूँ। सुवर्णमुखरी नदीके तटपर एक वेंकट नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जो सब पापोंको हरनेवाला तथा परमपवित्र है। उसके शिखरपर स्वामिपुष्करिणी नामक एक बड़ा भारी तीर्थ है। महामते! वहीं