भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ले जाकर अपने पुत्रको उसमें नहलाओ। ऐसा करनेसे इसका उन्माद तत्काल नष्ट हो जायगा।' यह सुनकर राजा नन्दने मुनिश्रेष्ठ जैमिनिको प्रणाम किया और पुत्रको लेकर वे स्वामिपुष्करिणी तीर्थको गये। वहाँ नियमपूर्वक पुत्रको नहलाया। स्नान करते ही उसी क्षण उसका उन्माद नष्ट हो गया। राजा नन्दने स्वयं भी स्वामिपुष्करिणीके जलमें स्नान किया। फिर पुत्रके साथ एक दिन उस तीर्थमें निवास किया और वेंकटगिरिके स्वामी दयानिधान भगवान् श्रीनिवासकी सेवा करके पुनः तपस्याके लिये वनको प्रस्थान किया। पिताके चले जानेपर राजा धर्मगुप्तने भगवान् वेंकटेश्वरमें भक्ति रखते हुए ब्राह्मणोंको बहुत धन-धान्य और क्षेत्र प्रदान किये। तत्पश्चात् मन्त्रियोंके साथ वे अपनी नगरीको चले गये। ब्राह्मणो! इस प्रकार तुमसे मैंने राजा धर्मगुप्तकी कल्याणमयी कथा सुनायी। इसके श्रवणमात्रसे ब्रह्महत्याका नाश हो जाता है।


कृष्णतीर्थ और भगवान् वेंकटेश्वरका माहात्म्य

**सूतजी कहते हैं—**मुनिवरो! सब पापोंका नाश करनेवाले महान् पुण्यप्रद वेंकटाचलपर जो कृष्णतीर्थ है, उसका माहात्म्य श्रवण करो। पूर्वकालमें विप्रवर रामकृष्ण नामक एक बहुत बड़े मुनि थे। वे सत्यवादी, शीलवान्, उत्तम भक्त, सब प्राणियोंपर दया करनेवाले, शत्रु और मित्रके प्रति समभाव रखनेवाले, जितात्मा, तपस्वी और जितेन्द्रिय थे। परब्रह्ममें निष्णात तथा एकमात्र ब्रह्मतत्त्वके आश्रित थे। ऐसे प्रभाववाले मुनिवर रामकृष्णने उस तीर्थमें बड़ी कठोर तपस्या की। वे अपने सब अंगोंको स्थिर करके खड़े रहते। वहाँ खड़े होकर तपस्या करते हुए उनको कई सौ वर्ष बीत गये। उनके सब अंगोंपर वल्मीककी मिट्टी जम गयी और उसने उन्हें आच्छादित कर लिया। तो भी महामुनि रामकृष्ण तपस्यामें संलग्न रहे। उन्होंने वल्मीककी कोई परवा नहीं की। इन्द्रने तपस्या करते हुए उस मुनिश्रेष्ठपर मेघोंको भेजकर बड़े वेगसे वृष्टि करवायी। सात दिनोंतक लगातार वर्षा होती रही। मूसलाधार पानी पड़नेपर भी मुनिने अपने नेत्र बंद करके वर्षाको सहन किया। तब बड़ी भारी गड़गड़ाहटके साथ कानोंको बधिर बनाती हुई बिजली वल्मीकके ऊपर गिरी। वल्मीक ढह गया। उसी समय शंख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णु प्रकट हो गये। वे विनतानन्दन गरुड़पर आरूढ़ थे। गलेमें पड़ी हुई वनमाला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। श्रीरामकृष्णकी तपस्यासे सन्तुष्ट हो भगवान् इस प्रकार बोले—'रामकृष्ण! तुम वेद-शास्त्रके पारंगत विद्वान् हो और तपस्याकी निधि हो। मेरे प्रादुर्भावके दिन जो मनुष्य यहाँ स्नान करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन शेषनाग भी नहीं कर सकते। सूर्य मकर-राशिपर स्थित हों और महातिथि पूर्णिमा पुष्य-नक्षत्रसे युक्त हो तो वह इस तीर्थमें स्नान करनेका सर्वोत्तम समय बताया गया