भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 804

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७७५

है, ऐसी, ७८ इहामुत्र शुभप्रदा—इहलोक और परलोकमें कल्याण प्रदान करनेवाली, ७९ इज्याशीलसमिज्येष्ठा—यज्ञ आदि करनेवाले कर्मनिष्ठ तथा समस्वरूप ब्रह्मका विचार करनेवाले ज्ञानी, दोनोंमें श्रेष्ठ अथवा इन दोनोंके लिये श्रेष्ठ मानकर पूजनीय, ८० इन्द्रादिपरिवन्दिता—इन्द्र आदि देवताओंद्वारा वन्दित।^१

८१ इलालङ्कारमाला—पृथ्वीको विभूषित करनेवाली पुष्पमालाके सदृश, ८२ इद्धा—दीप्तिमती अथवा प्रकाशस्वरूपा, ८३ इन्दिरा—लक्ष्मीस्वरूपा, ८४ रम्यमन्दिरा—भगवच्चरणारविन्द, ब्रह्मकमण्डलु तथा भगवान् शंकरका मस्तक—ये सब रमणीय आश्रय हैं जिसके, ऐसी, ८५ इन्दिरादिसंसेव्या—निरन्तर लक्ष्मी आदि देवियोंके सेवन करने योग्य, ८६ ईश्वरी—ऐश्वर्यसम्पन्न, ८७ ईश्वरवल्लभा—शंकरप्रिया।^२

८८ ईतिभीतिहरा—अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी पड़ना, चूहे लगना, तोते आदि पक्षियोंकी अधिकता और दूसरे राजाकी चढ़ाई—इन छः प्रकारके उपद्रवोंका भय दूर करनेवाली, ८९ ईड्या—स्तवन करने योग्य, ९० ईडनीयचरित्रभृत्—स्तुत्य चरित्र धारण करनेवाली, ९१ उत्कृष्टशक्तिः—उत्तम शक्तिसे युक्त, ९२ उत्कृष्टा—श्रेष्ठ, ९३ उडुपमण्डलचारिणी—चन्द्रमण्डलमें विचरनेवाली।^३

९४ उदिताम्बरमार्गा—जिसके द्वारा आकाशमें मार्गका उदय होता है अथवा जो ऊर्ध्वलोकमें जानेके लिये प्रकाशित मार्गके समान है, ऐसी, ९५ उस्रा—उज्ज्वल किरणके समान प्रकाशमान, ९६ उरगलोकविहारिणी—पाताललोकमें प्रवाहित होनेवाली, ९७ उक्षा—भूतलको सींचनेवाली, ९८ उर्वरा—भूमिको उर्वरा (उपजाऊ) बनानेमें हेतु, ९९ उत्पला—कमलस्वरूपा, १०० उत्कुम्भा—जिसमें भरे जानेवाले कलश उत्कृष्ट हो जाते हैं, वह, १०१ उपेन्द्रचरणद्रवा—भगवान् वामनके चरण पखारनेसे प्रकट चरणोदकस्वरूपा।^४

१०२ उदन्वत्पूर्तिहेतुः—समुद्रको पूर्ण करनेमें कारणभूत, १०३ उदारा—उत्तम गति प्रदान करनेमें उदार, १०४ उत्साहप्रवर्द्धिनी—अपने आश्रितोंका उत्साह बढ़ानेवाली, १०५ उद्वेगघ्नी—घबराहट अथवा भयको मिटानेवाली, १०६ उष्णशमनी—गर्मीको शान्त करनेवाली, १०७ उष्णारश्मिसुताप्रिया—सूर्यकन्या यमुनाकी प्रिय सखी।^५

१०८ उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणी—ब्रह्मशक्ति, विष्णुशक्ति तथा रुद्रशक्तिके रूपमें उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली, १०९ उपरिचारिणी—पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकके ऊपर विचरनेवाली, ११० ऊर्जवहन्ती—बलवर्द्धक जलको प्रवाहित करनेवाली, १११ ऊर्जधरा—बल अथवा प्राणशक्तिको धारण करनेवाली, ११२ ऊर्जावती—बल अथवा प्राणशक्तिका आश्रय, ११३ ऊर्मिमालिनी—तरंग-मालाओंसे युक्त।^६

११४ ऊर्ध्वरेतःप्रिया—ऊर्ध्वरेता महात्माओंको प्रिय लगनेवाली, ११५ ऊर्ध्वाध्वा—जिसका मार्ग ऊपर विष्णुलोककी ओर गया है, ऐसी, ११६ ऊर्मिला—लहरोंको धारण करनेवाली अथवा भक्तोंके शोक, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा, पिपासा—इन छः ऊर्मियोंको ग्रहण करनेवाली, ११७ ऊर्ध्वगतिप्रदा—अपने सम्पर्कमें आये हुए मुमूर्षुओंको ऊर्ध्वगति (स्वर्ग एवं मोक्ष) प्रदान करनेवाली, ११८ ऋषिवृन्दस्तुता—महर्षियोंके समुदायसे प्रशंसित, ११९ ऋद्धिः—समृद्धिस्वरूपा, १२० ऋणत्रयविनाशिनी—देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋणका नाश करनेवाली।^७

१२१ ऋतम्भरा—ऋत अर्थात् सत्य एवं ब्रह्मका


१. इतिहासश्रुतीड्यार्था त्विहामुत्रशुभप्रदा । इज्याशीलसमिज्येष्ठा त्विन्द्रादिपरिवन्दिता ॥
२. इलालङ्कारमालेद्धा त्विन्दिरा रम्यमन्दिरा । इन्दिरादिसंसेव्या त्वीश्वरीश्वरवल्लभा ॥
३. ईतिभीतिहरेड्या च त्वीडनीयचरित्रभृत् । उत्कृष्टशक्तिरुत्कृष्टोडुपमण्डलचारिणी ॥
४. उदिताम्बरमार्गोंस्रोरगलोकविहारिणी । उक्षोर्वरोत्पलोत्कुम्भा उपेन्द्रचरणद्रवा ॥
५. उदन्वत्पूर्तिहेतुश्चोदारोत्साहप्रवर्द्धिनी । उद्वेगघ्न्युष्णशमनी ह्युष्णारश्मिसुताप्रिया ॥
६. उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिण्युपरिचारिणी । ऊर्जवहन्त्यूर्जधरोजांवती चोर्मिमालिनी ॥
७. ऊर्ध्वरेतःप्रियोर्ध्वाध्वा ह्यूर्मिलोर्ध्वगतिप्रदा । ऋषिवृन्दस्तुतर्द्धिश्च ऋणत्रयविनाशिनी ॥

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