संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७७९
| २६० गानवत्सला—संगीतप्रिया, २६१ घर्महन्त्री—घामका कष्ट निवारण करनेवाली, २६२ घृतवती—घीके समान गुणकारक जलवाली, २६३ घृततुष्टिप्रदायिनी—अपने जलसे ही घीके समान सन्तोष देनेवाली।^१ | चन्द्रकान्तमणिके समान निर्मल जलवाली, २८४ चञ्चदापा—चंचल जलवाली, २८५ चलद्युतिः—विद्युत्स्वरूपा, २८६ चिन्मयी—ज्ञानस्वरूपा, २८७ चितिरूपा—चैतन्यस्वभावा, २८८ चन्द्रायुतशतानना—दस सहस्र चन्द्रमाओंके समान मनोरम मुखवाली।^५ |
| २६४ घण्टारवप्रिया—घण्टानादसे प्रसन्न होनेवाली, २६५ घोराघौघविध्वंसकारिणी—भयंकर पापराशिका विनाश करनेवाली, २६६ घ्राणतुष्टिकरी—घ्राणेन्द्रियको सन्तुष्ट करनेवाली, २६७ घोषा—अपने प्रवाह और तरंगोंसे कल-कल शब्द करनेवाली, २६८ घनानन्दा—घनीभूत आनन्दकी राशि अथवा आकाशगंगामें स्थित जलसे मेघोंको आनन्द देनेवाली, २६९ घनप्रिया—आकाशगंगारूपसे मेघोंको प्रिय लगनेवाली।^२ | २८९ चाम्पेयलोचना—चम्पाके फूलोंके समान सुन्दर नेत्रोंवाली, २९० चारुः—मनोहारिणी, २९१ चार्वङ्गी—परम सुन्दर अंगोंवाली, २९२ चारुगामिनी—मनोहर चालसे चलनेवाली, २९३ चार्या—शरण लेनेयोग्य, २९४ चारित्रनिलया—सदाचारका आश्रय, २९५ चित्रकृत्—अद्भुत कार्य करनेवाली, २९६ चित्ररूपिणी—विचित्र रूपवाली।^६ |
| २७० घातुका—पाप एवं अज्ञानका नाश करनेवाली, २७१ घूर्णितजला—भँवरयुक्त जलवाली, २७२ घृष्टपातक सन्ततिः—पातक-परम्पराको नष्ट कर देनेवाली, २७३ घटकोटिप्रपीतापा—जिसके करोड़ों घड़े जल नित्य पीये जाते हैं, वह, २७४ घटिताशेषमङ्गला—पूर्ण मंगलकारिणी।^३ | २९७ चम्पूः—गद्य-पद्यमय काव्यस्वरूपा अथवा चम्पापुष्पके समान रंगवाली, २९८ चन्दनशुच्यम्बुः—चन्दनके समान पवित्र एवं सुगन्धित जलवाली, २९९ चर्चनीया—पूजन अथवा कीर्तन करने योग्य, ३०० चिरस्थिरा—चिरन्तन कालतक स्थिर रहनेवाली, ३०१ चारुचम्पकमालाढ्या—मनोहर चम्पा पुष्पोंकी मालासे सुशोभित, ३०२ चमिताशेषदुष्कृता—समस्त पापोंको पी जानेवाली।^७ |
| २७५ घृणावती—दयालु, २७६ घृणनिधिः—दयासागर, २७७ घस्मरा—सब कुछ भक्षण करनेवाली, २७८ घूकनादिनी—तटपर उलूक और वक आदि पक्षियोंके शब्दसे युक्त, २७९ घुसृणापिज्जरतनुः—कुंकुम, केशर आदिसे चर्चित होनेके कारण किंचित् पीले अंगोंवाली, २८० घर्घरा—घाघरानदीस्वरूपा, २८१ घर्घरस्वना—घर्घर ध्वनिसे युक्त।^४ | ३०३ चिदाकाशवहा—चिदाकाशरूप ब्रह्मको प्राप्त होनेवाली, ३०४ चिन्त्या—चिन्तन करने योग्य, ३०५ चञ्चत्—देदीप्यमान, ३०६ चामरवीजिता—डुलाये जाते हुए चँवरसे सेवित, ३०७ चोरिताशेषवृजिना—समस्त पापोंको हर लेनेवाली चरिताशेषमण्डला—ब्रह्मलोक आदि सब मण्डलों (स्थानों)-में विचरनेवाली।^८ |
| २८२ चन्द्रिका—चन्द्रप्रभास्वरूपा, २८३ चन्द्रकान्ताम्बुः—चन्द्रमाके समान श्वेत जलवाली अथवा |
१. ग्रहपीडाहरा गुन्द्रा गरघ्नी गानवत्सला। घर्महन्त्री घृतवती घृततुष्टिप्रदायिनी ॥
२. घण्टारवप्रिया घोराघौघविध्वंसकारिणी। घ्राणतुष्टिकरी घोषा घनानन्दा घनप्रिया ॥
३. घातुका घूर्णितजला घृष्टपातकसन्ततिः। घटकोटिप्रपीतापा घटिताशेषमङ्गला ॥
४. घृणावती घृणनिधिर्घस्मरा घूकनादिनी। घुसृणापिज्जरतनुर्घर्घरा घर्घरस्वना ॥
५. चन्द्रिका चन्द्रकान्ताम्बुश्चञ्चदापा चलद्युतिः। चिन्मयी चितिरूपा च चन्द्रायुतशतानना ॥
६. चाम्पेयलोचना चारुश्चार्वङ्गी चारुगामिनी। चार्या चारित्रनिलया चित्रकृच्चित्ररूपिणी ॥
७. चम्पूश्चन्दनशुच्यम्बुश्चर्चनीया चिरस्थिरा। चारुचम्पकमालाढ्या चमिताशेषदुष्कृता ॥
८. चिदाकाशवहा चिन्त्या चञ्चच्चामरवीजिता। चोरिताशेषवृजिना चरिताशेषमण्डला ॥