भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


३०९ छेदिताखिलपापौघा—समस्त पापराशिका उच्छेद करनेवाली, ३१० छद्मघ्नी—कपट, अज्ञान अथवा छद्म नामक विशेष रोगका नाश करनेवाली, ३११ छलहारिणी—छलको हर लेनेवाली, ३१२ छन्नत्रिविष्टपतला—स्वर्गलोकको व्याप्त करनेवाली, ३१३ छोटिताशेषबन्धना—समस्त बन्धनोंको दूर करनेवाली।^१

३१४ छुरितामृतधारौघा—अमृतमय जलकी धारा बहानेवाली, ३१५ छिन्नैनाः—पापोंका उच्छेद करनेवाली, ३१६ छन्दगामिनी—स्वच्छन्द चलनेवाली, ३१७ छत्रीकृतमरालौघा—हंसोंके समूहको श्वेतछत्रके समान धारण करनेवाली, ३१८ छटीकृतनिजामृता—अपने स्वरूपभूत जलको विशेष शोभाके रूपमें धारण करनेवाली।^२

३१९ जाह्नवी—जह्नुकी पुत्री, ३२० ज्या—पापरूपी मृगको भयभीत करनेके लिये धनुषकी प्रत्यंचाके समान, ३२१ जगन्माता—विश्वजननी, ३२२ जप्य—जप करने योग्य नामवाली, ३२३ जङ्गालवीचिका—उत्ताल तरंगोंवाली, ३२४ जया—विजयिनी अथवा पार्वतीकी सखी जया, ३२५ जनार्दनप्रीता—भगवान् विष्णुसे प्रीति करनेवाली, ३२६ जुष्णीया—देवता, ऋषि और मनुष्योंके द्वारा सेवन करनेयोग्य, ३२७ जगद्धिता—जगत्का कल्याण करनेवाली।^३

३२८ जीवनम्—जीवनहेतु, ३२९ जीवनप्राणा—जीवनरूप जलसे जगत्‌को प्राणशक्तिसे युक्त करनेवाली अथवा जीवनप्राणस्वरूपा, ३३० जगत्—विश्वरूपा अथवा सर्वत्र व्यापक, ३३१ ज्येष्ठा—आद्याशक्ति, ३३२ जगन्मयी—जगत्स्वरूपा, ३३३ जीवजीवातुलतिका—प्राणियोंके लिये संजीवन औषधरूपा, ३३४ जन्मजन्मनिबर्हिणी—जन्मधारी प्राणियोंके जन्म-मरणका क्लेश दूर करनेवाली।^४

३३५ जाड्यविध्वंसनकरी—जड़ता—अज्ञानका विनाश करनेवाली, ३३६ जगद्योनिः—जगत्‌की कारणभूता प्रकृतिस्वरूपा, ३३७ जलाविला—वर्षाके जलसे कुछ मलिन-सी, ३३८ जगदानन्दजननी—जगत्‌के लिये आनन्ददायिनी। ३३९ जलजा—कमलका उत्पत्ति-स्थान, ३४० जलजेक्षणा—कमलसदृश अथवा कमलस्वरूप नेत्रोंवाली।^५

३४१ जनलोचनपीयूषा—जीवमात्रके नेत्रोंमें अमृतके समान सुखद प्रतीत होनेवाली, ३४२ जटातटविहारिणी—भगवान् शंकरके जटा-प्रदेशमें विहार करनेवाली, ३४३ जयन्ती—विजयशीला, ३४४ जञ्जपूकघ्नी—पापोंका नाश करनेवाली, ३४५ जनितज्ञानविग्रहा—जिसने अपने ज्ञानमय शरीरको प्रकट किया है, वह।^६

३४६ झल्लरीवाद्यकुशला—अपने जलप्रवाहके द्वारा झल्लरीनामक वाद्यविशेषकी ध्वनि प्रकट करनेमें कुशल अथवा झल्लरी बजानेमें निपुण, ३४७ झलञ्झालजलावृता—झल-झल ध्वनि करनेवाले जलसे आच्छादित, ३४८ झिण्टीशवन्द्या—भगवान् शिवके द्वारा वन्दनीया, ३४९ झाङ्कारकारिणी—झंकार शब्द करनेवाली, ३५० झर्झरावती—झर-झर शब्दसे युक्त।^७

३५१ टीकिताशेषपाताला—भोगावती गंगाके रूपमें समस्त पाताललोकमें प्रवाहित होनेवाली, ३५२ टङ्किकैनोऽद्रिपाटने—पापरूपी पर्वतको विदीर्ण करनेमें टंक (शस्त्रविशेष)-के समान, ३५३ टङ्कारनृत्यत्कल्लोला—जिसकी चंचल लहरें टंकार शब्दके


१. छेदिताखिलपापौघा छद्मघ्नी छलहारिणी। छन्नत्रिविष्टपतला छोटिताशेषबन्धना ॥
२. छुरितामृतधारौघा छिन्नैनाश्छन्दगामिनी। छत्रीकृतमरालौघा छटीकृतनिजामृता ॥
३. जाह्नवी ज्या जगन्माता जप्य जङ्गालवीचिका। जया जनार्दनप्रीता जुष्णीया जगद्धिता ॥
४. जीवनं जीवनप्राणा जगज्ज्येष्ठा जगन्मयी। जीवजीवातुलतिका जन्मजन्मनिबर्हिणी ॥
५. जाड्यविध्वंसनकरी जगद्योनिर्जलाविला। जगदानन्दजननी जलजा जलजेक्षणा ॥
६. जनलोचनपीयूषा जटातटविहारिणी। जयन्ती जञ्जपूकघ्नी जनितज्ञानविग्रहा ॥
७. झल्लरीवाद्यकुशला झलञ्झालजलावृता। झिण्टीशवन्द्या झाङ्कारकारिणी झर्झरावती ॥