भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *७८१

साथ नृत्य-सी करती हैं, वह, ३५४ टीकनीयमहातटा—जिसका विशाल तटप्रान्त सबके सेवन करने योग्य है, वह।^१

३५५ डम्बरप्रवहा—बड़े वेगसे बहनेवाली, ३५६ डीनराजहंसकुलाकुला—उड़ते हुए राजहंसोंके समुदायसे व्याप्त, ३५७ डमड्डमरुहस्ता—हाथमें डिमडिम शब्द करनेवाला डमरू लिये रहनेवाली, ३५८ डामरोक्तमहाण्डका—डामरकल्पमें प्रतिपादित विराट् स्वरूपवाली।^२

३५९ ढौकिताशेषनिर्वाणा—अपने भक्तोंको सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि तथा सायुज्यरूप सभी प्रकारके मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली, ३६० ढक्कानादचलज्जला—डंकेकी आवाजके समान ध्वनि-सी करनेवाले प्रवाहशील चंचल जलवाली, ३६१ ढुण्ढिविघ्नेशजननी—ढुण्ढिराज गणेशकी माता, ३६२ ढणड्ढुणितपातका—ढन्-ढन् शब्दके साथ पातकोंको धक्के देकर ढकेलनेवाली।^३

३६३ तर्पणी—सबको तृप्त करनेवाली अथवा जिसके जलसे सभी तर्पण करते हैं, वह, ३६४ तीर्थतीर्था—तीर्थोंके लिये भी तीर्थरूपा, ३६५ त्रिपथा—स्वर्ग, भूतल और पाताल—तीन मार्गोंसे बहनेवाली, ३६६ त्रिदशेश्वरी—देवताओंकी स्वामिनी, ३६७ त्रिलोकगोप्त्री—तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली, ३६८ तोयेशी—जल अथवा उसकी अधिष्ठात्री देवियोंकी भी स्वामिनी, ३६९ त्रैलोक्यपरिवन्दिता—त्रिभुवनविशेषवन्दिता।^४

३७० तापत्रितयसंहर्त्री—आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंका संहार करनेवाली, ३७१ तेजोबलविवर्धिनी—तेज और बल बढ़ानेवाली, ३७२ त्रिलक्ष्या—जिसका स्वरूप तीनों लोकोंमें लक्षित होता है, वह, ३७३ तारणी—सबको तारनेवाली, ३७४ तारा—तारनेवाली, प्रणवरूपा अथवा नक्षत्ररूपा, ३७५ तारापतिकरार्चिता—चन्द्रमाकी किरणोंद्वारा पूजित अथवा चन्द्रमाद्वारा अपने हाथों पूजित।^५

३७६ त्रैलोक्यपावनी पुण्या—तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली नदियोंमें सबसे अधिक पुण्यमयी, ३७७ तुष्टिदा—सुख एवं सन्तोष देनेवाली, ३७८ तुष्टिरूपिणी—सन्तोषवृत्तिरूपा, ३७९ तृष्णाच्छेत्री—तृष्णाका उच्छेद करनेवाली, ३८० तीर्थमाता—तीर्थोंकी माता, ३८१ त्रिविक्रमपदोद्गवा—भगवान् वामनके चरण पखारनेसे प्रकट हुई।^६

३८२ तपोमयी—इन्द्रिय और मनकी एकाग्रतारूपा, ३८३ तपोरूपा—कृच्छ्र-चान्द्रायणादि व्रत एवं तपस्यास्वरूपा, ३८४ तपःस्तोमफलप्रदा—तपःसमुदायका फल देनेवाली, ३८५ त्रैलोक्यव्यापिनी—तीनों लोकोंमें व्यापक, ३८६ तृप्तिः—तृप्तिस्वरूपा, ३८७ तृप्तिकृत्—सन्तुष्ट करनेवाली, ३८८ तत्त्वरूपिणी—चौबीस तत्त्वरूपा अथवा परमार्थरूपिणी।^७

३८९ त्रैलोक्यसुन्दरी—तीनों लोकोंमें सर्वाधिक सौन्दर्यवाली, ३९० तुर्या—जाग्रत् आदि तीन अवस्थाओंसे परे, ३९१ तुर्यातीतफलप्रदा—तुरीयातीत ब्रह्मपदको देनेवाली, ३९२ त्रैलोक्यलक्ष्मीः—त्रिभुवनकी सम्पत्ति, ३९३ त्रिपदी—तीनों लोकोंमें जिसका स्थान है, वह, ३९४ तथ्या—तीनों कालोंसे अबाधित, परमार्थरूपा, ३९५ तिमिरचन्द्रिका—अज्ञानरूपी अन्धकारको चाँदनीकी भाँति दूर करनेवाली।^८


१. टीकिताशेषपाताला टङ्कितैकनोऽङ्घ्रिपाटने। टङ्कारनृत्यत्कल्लोला टीकनीयमहातटा॥
२. डम्बरप्रवहा डीनराजहंसकुलाकुला। डमड्डमरुहस्ता च डामरोक्तमहाण्डका॥
३. ढौकिताशेषनिर्वाणा ढक्कानादचलज्जला। ढुण्ढिविघ्नेशजननी ढणड्ढुणितपातका॥
४. तर्पणी तीर्थतीर्था च त्रिपथा त्रिदशेश्वरी। त्रिलोकगोप्त्री तोयेशी त्रैलोक्यपरिवन्दिता॥
५. तापत्रितयसंहर्त्री तेजोबलविवर्धिनी। त्रिलक्ष्या तारणी तारा तारापतिकरार्चिता॥
६. त्रैलोक्यपावनी पुण्या तुष्टिदा तुष्टिरूपिणी। तृष्णाच्छेत्री तीर्थमाता त्रिविक्रमपदोद्गवा॥
७. तपोमयी तपोरूपा तपःस्तोमफलप्रदा। त्रैलोक्यव्यापिनी तृप्तिस्तृप्तिकृत्तत्त्वरूपिणी॥
८. त्रैलोक्यसुन्दरी तुर्या तुर्यातीतफलप्रदा। त्रैलोक्यलक्ष्मीस्त्रिपदी तथ्या तिमिरचन्द्रिका॥