संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३९६ तेजोगर्भा—भगवान् शंकरका तेजोमय वीर्य जिसके गर्भमें स्थित था, वह, ३९७ तपःसारा—तपस्याकी सारभूता, ३९८ त्रिपुरारिशिरोगृहा—भगवान् शंकरके मस्तकरूपी गृहमें निवास करनेवाली, ३९९ त्रयीस्वरूपिणी—तीनों वेद जिसके स्वरूप हैं, वह, ४०० तन्वी—प्रपंचका विस्तार करनेवाली अथवा सुन्दरी, कृशांगी, ४०१ तपनाङ्गजभीतिनुत्—सूर्यपुत्र यमका भय दूर करनेवाली। १
४०२ तरिः—संसार-सागरसे पार होनेके लिये नौका, ४०३ तरणिजामित्रम्—सूर्यपुत्र यमके अधिकारमें बाधा डालनेके कारण उनके लिये अमित्ररूपा अथवा सूर्यकन्या यमुनाकी सखी, ४०४ तर्पिताशेषपूर्वजा—राजा भगीरथके अथवा समस्त जनसमुदायके सम्पूर्ण पूर्वजोंको तृप्त करनेवाली, ४०५ तुलाविरहिता—तुलनारहित, ४०६ तीव्रपापतूलतूनपात्—भयंकर पापरूपी रूईके ढेरको जलानेके लिये अग्निके समान। २
४०७ दारिद्र्यदमनी—दुर्गति एवं दरिद्रताका दमन करनेवाली, ४०८ दक्षा—जगत्का उद्धार करनेमें कुशल, ४०९ दुष्प्रेक्षा—भक्तिभावके बिना जिसका दर्शन पाना अत्यन्त कठिन है, वह ४१० दिव्यमण्डना—अलौकिक आभूषणोंसे विभूषित, ४११ दीक्षावती—लोकहित एवं जीवोंके उद्धारकी दीक्षासे युक्त, ४१२ दुरावाप्या—दुर्लभा, ४१३ द्राक्षामधुरवारिभृत्—मुनक्काके समान मधुर जल धारण करनेवाली। ३
४१४ दर्शितानेककुतुका—अपने जल-कल्लोलोंके द्वारा अनेक प्रकारके कौतुक दिखानेवाली, ४१५ दुष्टदुर्जयदुःखहृत्—दोषयुक्त दुर्जय दुःखोंको हर लेनेवाली, ४१६ दैन्यहृत्—दीनताको दूर करनेवाली, ४१७ दुरितघ्नी—पापोंका नाश करनेवाली, ४१८ दानवारिपदाब्जजा—श्रीविष्णुके चरणारविन्दोंसे प्रकट हुई। ४
४१९ दन्दशूकविषघ्नी—सर्पोंके विषका नाश करनेवाली, ४२० दारिताघौघसन्ततिः—पापराशिकी परम्पराको विदीर्ण करनेवाली, ४२१ द्रुता—वेगसे बहनेवाली, ४२२ देवद्रुमच्छन्ना—सन्तान, कल्पवृक्ष, मन्दार, पारिजात तथा हरिचन्दन—इन पाँच देववृक्षोंसे आच्छादित, ४२३ दुर्वाराघविघातिनी—जिन्हें दूर करना कठिन है, ऐसे पातकोंका भी नाश करनेवाली। ५
४२४ दमग्राह्या—मन और इन्द्रियोंके संयमसे प्राप्त होनेवाली, ४२५ देवमाता—अदितिस्वरूपा, ४२६ देवलोकप्रदर्शिनी—अपने उपासकोंको ब्रह्मलोक आदि दिव्यलोकोंकी प्राप्ति करानेवाली, ४२७ देवदेवप्रिया—देवाधिदेव शिवकी प्रिया, ४२८ देवी—द्युतिमती, प्रकाशस्वरूपा, ४२९ दिक्पालपददायिनी—इन्द्र आदि दिक्पालोंके पदकी प्राप्ति करानेवाली। ६
४३० दीर्घायुःकारिणी—आयु बड़ी करनेवाली, ४३१ दीर्घा—विशाल, अनन्त, ४३२ दोग्ध्री—धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाली, ४३३ दूषणवर्जिता—दोषरहित, ४३४ दुग्धाम्बुवाहिनी—दूधके समान स्वच्छ, स्वादिष्ट एवं गुणकारी जल बहानेवाली, ४३५ दोग्धा—इच्छानुसार दोहन करनेयोग्य—कामधेनुरूपा, ४३६ दिव्या—अलौकिक स्वरूपवाली, ४३७ दिव्यगतिप्रदा—दिव्य गति प्रदान करनेवाली। ७
४३८ द्युनदी—स्वर्गलोककी गंगा, ४३९ दीन-
१. तेजोगर्भा तपःसारा त्रिपुरारिशिरोगृहा। त्रयीस्वरूपिणी तन्वी तपनाङ्गजभीतिनुत्॥
२. तरिस्तरणिजामित्रं तर्पिताशेषपूर्वजा। तुलाविरहिता तीव्रपापतूलतूनपात्॥
३. दारिद्र्यदमनी दक्षा दुष्प्रेक्षा दिव्यमण्डना। दीक्षावती दुरावाप्या द्राक्षामधुरवारिभृत्॥
४. दर्शितानेककुतुका दुष्टदुर्जयदुःखहृत्। दैन्यहृद् दुरितघ्नी च दानवारिपदाब्जजा॥
५. दन्दशूकविषघ्नी च दारिताघौघसन्ततिः। द्रुता देवद्रुमच्छन्ना दुर्वाराघविघातिनी॥
६. दमग्राह्या देवमाता देवलोकप्रदर्शिनी। देवदेवप्रिया देवी दिक्पालपददायिनी॥
७. दीर्घायुःकारिणी दीर्घा दोग्ध्री दूषणवर्जिता। दुग्धाम्बुवाहिनी दोग्धा दिव्या दिव्यगतिप्रदा॥