संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७८३
शरणम्—दीनों-महापातकियोंको भी शरण देकर उनका उद्धार करनेवाली, ४४० देहिदेहनिवारिणी—देहधारियोंके देहका निवारण करनेवाली (उन्हें मुक्ति देकर जन्म-मृत्युसे रहित करनेवाली), ४४१ द्राघीयसी—अतिशय विशाल, ४४२ दाघहन्त्री—दाहकी शान्ति करनेवाली, ४४३ दितपातकसन्ततिः—पाप-परम्पराका खण्डन करनेवाली। १
४४४ दूरदेशान्तरचरी—दूर देशमें विचरनेवाली, ४४५ दुर्गमा—दुर्लभा, ४४६ देववल्लभा—देवताओंकी इष्टदेवी अथवा देव अर्थात् विष्णु एवं शिवकी प्रिया, ४४७ दुर्वृत्तघ्नी—दुष्टों अथवा पापोंका नाश करनेवाली, ४४८ दुर्विगाह्या—जिसमें स्नान करनेका अवसर बहुत दुर्लभ है, ऐसी, ४४९ दयाधारा—करुणाकी भण्डार, ४५० दयावती—दयालु-स्वभावा। २
४५१ दुरासदा—दुर्लभ अथवा दुर्बोध, ४५२ दानशीला—स्वभावतः चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली, ४५३ द्राविणी—बड़े वेगसे प्रवाहित होनेवाली अथवा पाप-पुंजको भगानेवाली, ४५४ द्रुहिणस्तुता—ब्रह्माजीके द्वारा प्रशंसित, ४५५ दैत्यदानवसंशुद्धिकर्त्री—दैत्यों और दानवोंको भी भलीभाँति शुद्ध करनेवाली, ४५६ दुर्बुद्धिहारिणी—खोटी बुद्धिका निवारण करनेवाली। ३
४५७ दानसारा—दान जिसका सार तत्त्व है, वह, ४५८ दयासारा—जिसमें स्वभावतः दया भरी है, वह, ४५९ द्यावाभूमिविगाहिनी—आकाश और भूमिमें समान रूपसे विचरण करनेवाली, ४६० दृष्टादृष्टफलप्राप्तिः—लौकिक और पारलौकिक फलकी प्राप्तिमें हेतु, ४६१ देवतावृन्दवन्दिता—देवसमुदायके द्वारा नमस्कृत। ४
४६२ दीर्घव्रता—लोकोपकारका महान् व्रत धारण करनेवाली, ४६३ दीर्घदृष्टिः—जिसकी दृष्टि अर्थात् बुद्धि दीर्घ—दूरतककी बात सोच लेनेवाली हो, वह अथवा अपरिच्छिन्न ज्ञानस्वरूपा, ४६४ दीप्ततोया—प्रकाशमान जलवाली, ४६५ दुरालभा—दुर्लभा, ४६६ दण्डयित्री—पापोंको दण्ड देनेवाली, ४६७ दण्डनीतिः—दण्डनीति नामवाली विद्यास्वरूपा, ४६८ दुष्टदण्डधरार्चिता—दुष्टोंको दण्ड देनेवाले यमराजके द्वारा पूजित। ५
४६९ दुरोदरघ्नी—जूआ आदि बुरे आचरणोंको नाश करनेवाली, ४७० दावार्चिः—पापरूपी वनके लिये दावानलकी ज्वालाके समान, ४७१ द्रवत्—सर्वव्यापक तत्त्व, ४७२ द्रव्यैकशेवधिः—सम्पूर्ण द्रव्योंकी एकमात्र निधि, ४७३ दीनसन्तापशमनी—दीनों-संसारदुःखसे दुःखी जीवोंके आध्यात्मिक आदि तापोंका निवारण करनेवाली, ४७४ दात्री—चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली, ४७५ दवथुवैरिणी—संसार-भयसे होनेवाले सन्तापको दूर करनेवाली। ६
४७६ दरीविदारणपरा—पर्वतोंकी गुफाओंको विदीर्ण करनेवाली, ४७७ दान्ता—इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाली, ४७८ दान्तजनप्रिया—जितेन्द्रिय पुरुष जिसे प्रिय हों, ऐसी, ४७९ दारिताद्रितटा—पर्वतोंके पार्श्वभागको विदीर्ण करके बहनेवाली, ४८० दुर्गा—दुर्ग दैत्यका वध करनेवाली देवी, ४८१ दुर्गारण्यप्रचारिणी—दुर्गम वनमें विचरनेवाली। ७
४८२ धर्मद्रवा—धर्मस्वरूप है द्रव (जल)
१. द्युन्दी दीनशरणं देहिदेहनिवारिणी। द्राघीयसी दाघहन्त्री दितपातकसन्ततिः॥ २. दूरदेशान्तरचरी दुर्गमा देववल्लभा। दुर्वृत्तघ्नी दुर्विगाह्या दयाधारा दयावती॥ ३. दुरासदा दानशीला द्राविणी द्रुहिणस्तुता। दैत्यदानवसंशुद्धिकर्त्री दुर्बुद्धिहारिणी॥ ४. दानसारा दयासारा द्यावाभूमिविगाहिनी। दृष्टादृष्टफलप्राप्तिर्देवतावृन्दवन्दिता ॥ ५. दीर्घव्रता दीर्घदृष्टिर्दीप्ततोया दुरालभा। दण्डयित्री दण्डनीतिर्दुष्टदण्डधरार्चिता॥ ६. दुरोदरघ्नी दावार्चिर्द्रवद्द्रव्यैकशेवधिः। दीनसन्तापशमनी दात्री दवथुवैरिणी॥ ७. दरीविदारणपरा दान्ता दान्तजनप्रिया। दारिताद्रितटा दुर्गा दुर्गारण्यप्रचारिणी॥