संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७८३
शरणम्—दीनों-महापातकियोंको भी शरण देकर उनका उद्धार करनेवाली, ४४० देहिदेहनिवारिणी—देहधारियोंके देहका निवारण करनेवाली (उन्हें मुक्ति देकर जन्म-मृत्युसे रहित करनेवाली), ४४१ द्राघीयसी—अतिशय विशाल, ४४२ दाघहन्त्री—दाहकी शान्ति करनेवाली, ४४३ दितपातकसन्ततिः—पाप-परम्पराका खण्डन करनेवाली। १
४४४ दूरदेशान्तरचरी—दूर देशमें विचरनेवाली, ४४५ दुर्गमा—दुर्लभा, ४४६ देववल्लभा—देवताओंकी इष्टदेवी अथवा देव अर्थात् विष्णु एवं शिवकी प्रिया, ४४७ दुर्वृत्तघ्नी—दुष्टों अथवा पापोंका नाश करनेवाली, ४४८ दुर्विगाह्या—जिसमें स्नान करनेका अवसर बहुत दुर्लभ है, ऐसी, ४४९ दयाधारा—करुणाकी भण्डार, ४५० दयावती—दयालु-स्वभावा। २
४५१ दुरासदा—दुर्लभ अथवा दुर्बोध, ४५२ दानशीला—स्वभावतः चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली, ४५३ द्राविणी—बड़े वेगसे प्रवाहित होनेवाली अथवा पाप-पुंजको भगानेवाली, ४५४ द्रुहिणस्तुता—ब्रह्माजीके द्वारा प्रशंसित, ४५५ दैत्यदानवसंशुद्धिकर्त्री—दैत्यों और दानवोंको भी भलीभाँति शुद्ध करनेवाली, ४५६ दुर्बुद्धिहारिणी—खोटी बुद्धिका निवारण करनेवाली। ३
४५७ दानसारा—दान जिसका सार तत्त्व है, वह, ४५८ दयासारा—जिसमें स्वभावतः दया भरी है, वह, ४५९ द्यावाभूमिविगाहिनी—आकाश और भूमिमें समान रूपसे विचरण करनेवाली, ४६० दृष्टादृष्टफलप्राप्तिः—लौकिक और पारलौकिक फलकी प्राप्तिमें हेतु, ४६१ देवतावृन्दवन्दिता—देवसमुदायके द्वारा नमस्कृत। ४
४६२ दीर्घव्रता—लोकोपकारका महान् व्रत धारण करनेवाली, ४६३ दीर्घदृष्टिः—जिसकी दृष्टि अर्थात् बुद्धि दीर्घ—दूरतककी बात सोच लेनेवाली हो, वह अथवा अपरिच्छिन्न ज्ञानस्वरूपा, ४६४ दीप्ततोया—प्रकाशमान जलवाली, ४६५ दुरालभा—दुर्लभा, ४६६ दण्डयित्री—पापोंको दण्ड देनेवाली, ४६७ दण्डनीतिः—दण्डनीति नामवाली विद्यास्वरूपा, ४६८ दुष्टदण्डधरार्चिता—दुष्टोंको दण्ड देनेवाले यमराजके द्वारा पूजित। ५
४६९ दुरोदरघ्नी—जूआ आदि बुरे आचरणोंको नाश करनेवाली, ४७० दावार्चिः—पापरूपी वनके लिये दावानलकी ज्वालाके समान, ४७१ द्रवत्—सर्वव्यापक तत्त्व, ४७२ द्रव्यैकशेवधिः—सम्पूर्ण द्रव्योंकी एकमात्र निधि, ४७३ दीनसन्तापशमनी—दीनों-संसारदुःखसे दुःखी जीवोंके आध्यात्मिक आदि तापोंका निवारण करनेवाली, ४७४ दात्री—चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली, ४७५ दवथुवैरिणी—संसार-भयसे होनेवाले सन्तापको दूर करनेवाली। ६
४७६ दरीविदारणपरा—पर्वतोंकी गुफाओंको विदीर्ण करनेवाली, ४७७ दान्ता—इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाली, ४७८ दान्तजनप्रिया—जितेन्द्रिय पुरुष जिसे प्रिय हों, ऐसी, ४७९ दारिताद्रितटा—पर्वतोंके पार्श्वभागको विदीर्ण करके बहनेवाली, ४८० दुर्गा—दुर्ग दैत्यका वध करनेवाली देवी, ४८१ दुर्गारण्यप्रचारिणी—दुर्गम वनमें विचरनेवाली। ७
४८२ धर्मद्रवा—धर्मस्वरूप है द्रव (जल)
१. द्युन्दी दीनशरणं देहिदेहनिवारिणी। द्राघीयसी दाघहन्त्री दितपातकसन्ततिः॥ २. दूरदेशान्तरचरी दुर्गमा देववल्लभा। दुर्वृत्तघ्नी दुर्विगाह्या दयाधारा दयावती॥ ३. दुरासदा दानशीला द्राविणी द्रुहिणस्तुता। दैत्यदानवसंशुद्धिकर्त्री दुर्बुद्धिहारिणी॥ ४. दानसारा दयासारा द्यावाभूमिविगाहिनी। दृष्टादृष्टफलप्राप्तिर्देवतावृन्दवन्दिता ॥ ५. दीर्घव्रता दीर्घदृष्टिर्दीप्ततोया दुरालभा। दण्डयित्री दण्डनीतिर्दुष्टदण्डधरार्चिता॥ ६. दुरोदरघ्नी दावार्चिर्द्रवद्द्रव्यैकशेवधिः। दीनसन्तापशमनी दात्री दवथुवैरिणी॥ ७. दरीविदारणपरा दान्ता दान्तजनप्रिया। दारिताद्रितटा दुर्गा दुर्गारण्यप्रचारिणी॥
| ७८४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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जिसका, ऐसी, ४८३ धर्मधुरा—धर्मका आधार अथवा उत्कृष्ट धर्मस्वरूपा, ४८४ धेनुः—कामधेनुस्वरूपा, ४८५ धीरा—धैर्यशालिनी अथवा विदुषी, ४८६ धृतिः—धारणाशक्ति, ४८७ ध्रुवा—नित्या, ४८८ धेनुदानफलस्पर्शा—जिसके जलका स्पर्श गोदानका फल देनेवाला है, वह, ४८९ धर्म-कामार्थ मोक्षदा—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली।^१
४९० धर्मोर्मिवाहिनी—धर्मरूपी लहरोंको धारण करनेवाली, ४९१ धुर्या—श्रेष्ठा, ४९२ धात्री—धारण-पोषण करनेवाली अथवा माता, ४९३ धात्री-विभूषणम्—पृथ्वीका अलंकार, ४९४ धर्मिणी—पुण्यवती, ४९५ धर्मशीला—स्वभावतः धर्मका आचरण करनेवाली, ४९६ धन्विकोटिकृतावना—कोटि-कोटि धनुर्धर वीरोंने जिसका रक्षण किया है, वह।^२
४९७ ध्यातृपापहरा—ध्यान करनेवाले पुरुषके सब पापोंको हर लेनेवाली, ४९८ ध्येया—ध्यान करनेयोग्य, ४९९ धावनी—धोनेवाली, पवित्र करनेवाली, ५०० धूतकल्मषा—पापोंको धो डालनेवाली, ५०१ धर्मधारा—धर्मको धारण करनेवाली, ५०२ धर्मसारा—सब धर्मोंकी सारभूता, ५०३ धनदा—धन देनेवाली, ५०४ धनवर्द्धिनी—धन बढ़ानेवाली।^३
५०५ धर्माधर्मगुणच्छेत्री—धर्माधर्मके बन्धनको काटनेवाली ब्रह्मविद्यास्वरूपा, ५०६ धत्तूरकुसुम-प्रिया—धतूरके फूलमें रुचि रखनेवाली, ५०७ धर्मेशी—धर्मकी स्वामिनी, ५०८ धर्म-शास्त्रज्ञा—धर्मशास्त्रको जाननेवाली, ५०९ धन-धान्यसमृद्धिकृत्—धन और धान्यको बढ़ानेवाली।^४
५१० धर्मलभ्या—धर्मसे प्राप्त होने योग्य, ५११ धर्मजला—धर्मस्वरूप जलवाली, ५१२ धर्म-प्रसवधर्मिणी—धर्मकी जननी तथा धर्मनिष्ठ, ५१३ ध्यानगम्यस्वरूपा—जिसका स्वरूप ध्यानके द्वारा चिन्तन करने योग्य है, वह, ५१४ धरणी—धारण करनेवाली, पृथ्वीरूपा, ५१५ धातृपूजिता—ब्रह्माजीके द्वारा पूजित।^५
५१६ धूः—पापोंको कम्पित करनेवाली, ५१७ धूर्जटिजटासंस्था—भगवान् शंकरकी जटामें वास करनेवाली, ५१८ धन्या—कृतार्थस्वरूपा, ५१९ धीः—बुद्धिस्वरूपा, ५२० धारणावती—धारणाशक्तिसे सम्पन्न, मेधास्वरूपा, ५२१ नन्दा—नन्दा नामवाली गंगा अथवा जगत्को आनन्द देनेवाली, ५२२ निर्वाणजननी—परम शान्ति अथवा मोक्ष देनेवाली, २३ नन्दिनी—दूसरोंको प्रसन्न करनेवाली अथवा वसिष्ठकी धेनु, ५२४ नुन्नपातका—पातकोंको दूर करनेवाली।^६
५२५ निषिद्धविघ्ननिचया—विघ्नसमुदायका निवारण करनेवाली, ५२६ निजानन्दप्रकाशिनी—अपने स्वरूपभूत आनन्दको प्रकाशित करनेवाली, ५२७ नभोऽङ्गणचरी—आकाशके आँगनमें विचरने-वाली, ५२८ नूतिः—स्तुतिस्वरूपा, ५२९ नम्या—वन्दनीया, ५३० नारायणी—नारायणशक्तिस्वरूपा अथवा नारायणी (गण्डकी) नदीस्वरूपा, ५३१ नुता—ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा अभिनन्दिता।^७
५३२ निर्मला—संसाररूपी मलसे रहित, ५३३ निर्मलाख्याना—जिसकी माहात्म्यकथा अत्यन्त निर्मल है, ऐसी, ५३४ नाशिनी ताप-सम्पदाम्—सन्तापकी परम्पराका नाश करनेवाली,
१. धर्मद्रवा धर्मधुरा धेनुर्धीरा धृतिर्ध्रुवा । धेनुदानफलस्पर्शा धर्मकामार्थमोक्षदा ॥
२. धर्मोर्मिवाहिनी धुर्या धात्री धात्रीविभूषणम् । धर्मिणी धर्मशीला च धन्विकोटिकृतावना ॥
३. ध्यातृपापहरा ध्येया धावनी धूतकल्मषा । धर्मधारा धर्मसारा धनदा धनवर्द्धिनी ॥
४. धर्माधर्मगुणच्छेत्री धत्तूरकुसुमप्रिया । धर्मेशी धर्मशास्त्रज्ञा धनधान्यसमृद्धिकृत् ॥
५. धर्मलभ्या धर्मजला धर्मप्रसवधर्मिणी । ध्यानगम्यस्वरूपा च धरणी धातृपूजिता ॥
६. धूर्धूर्जटिजटासंस्था धन्या धीर्धारणावती । नन्दा निर्वाणजननी नन्दिनी नुन्नपातका ॥
७. निषिद्धविघ्ननिचया निजानन्दप्रकाशिनी । नभोऽङ्गणचरी नूतिर्नम्या नारायणी नुता ॥
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७८५ ---|---
५३५ नियता—नियमपूर्वक रहनेवाली अथवा एकरूपा, ५३६ नित्यसुखदा—सदा सुख देनेवाली, ५३७ नानाश्चर्यमहानिधिः—अनेक प्रकारके आश्चर्योंका भण्डार। १
५३८ नदी—अव्यक्त शब्द करनेवाली सरिता, ५३९ नदसरोमाता—नदों और सरोवरोंकी जननी, ५४० नायिका—जीवोंको संसार-समुद्रसे पार ले जानेवाली अथवा सब नदियोंकी स्वामिनी, ५४१ नाकदीर्घिका—स्वर्गलोककी बावली, ५४२ नष्टोद्धरणधीरा—संसार-सागरमें गिरकर नष्ट होनेवाले जीवोंका उद्धार करनेमें दक्ष, ५४३ नन्दना—समृद्धि देनेवाली, ५४४ नन्ददायिनी—आनन्द देनेवाली। २
५४५ निर्णिन्क्ताशेषभुवना—समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली, ५४६ निःसङ्गा—आसक्तिरहित, ५४७ निरुपद्रवा—विघ्नरहित, ५४८ निरालम्बा—आधाररहित, अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित, ५४९ निष्प्रपञ्चा—प्रपंचसे परे स्थित, ५५० निर्णाशितमहामला—अज्ञानरूपी महामलका पूर्णतया नाश करनेवाली। ३
५५१ निर्मलज्ञानजननी—विशुद्ध ज्ञानको प्रकट करनेवाली, ५५२ निःशेषप्राणितापहृत्—समस्त प्राणियोंका सन्ताप हर लेनेवाली, ५५३ नित्योत्सवा—नित्य उत्सवयुक्त, ५५४ नित्यतृप्ता—अपने स्वरूपभूत आनन्दसे सदा सन्तुष्ट, ५५५ नमस्कार्या—नमस्कार करनेयोग्य, ५५६ निरञ्जना—अज्ञानरहित। ४
५५७ निष्ठावती—श्रद्धा एवं नियम-निष्ठासे युक्त, ५५८ निरातङ्का—भयरहित, ५५९ निर्लेपा—पाप आदिसे अलिप्त, शुद्धस्वरूपा, ५६० निश्चलात्मिका—स्थिर बुद्धिवाली, ५६१ निरवद्या—निर्दोष, ५६२ निरीहा—चेष्टारहित, ५६३ नीललोहित-मूर्द्धगा—भगवान् शिवके मस्तकपर विराजमान। ५
५६४ नन्दिभृङ्गिगणस्तुत्या—नन्दी, भृंगी आदि शिवगणोंसे स्तुति की जाने योग्य, ५६५ नागा—नागस्वरूपा, ५६६ नन्दा—समृद्धिदायिनी, ५६७ नगात्मजा—गिरिराज हिमवान्की पुत्री, ५६८ निष्प्रत्यूहा—विघ्न-बाधाओंसे रहित, ५६९ नाकनदी—स्वर्गलोककी नदी, ५७० निर्याणव-दीर्घनौः—नरक-समुद्रसे पार होनेके लिये विशाल नौकास्वरूप। ६
५७१ पुण्यप्रदा—पुण्य देनेवाली, ५७२ पुण्य-गर्भा—अपने भीतर पुण्य धारण करनेवाली, ५७३ पुण्या—पुण्यस्वरूपा, ५७४ पुण्यतरङ्गिणी—पवित्र लहरोंवाली, ५७५ पृथुः—विशाल एवं परिपूर्ण, ५७६ पृथुफला—महान् फलवाली, ५७७ पूर्णा—सर्वत्र व्यापक, अविच्छिन्न धारासे युक्त, ५७८ प्रणतार्तिप्रभञ्जनी—शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करनेवाली। ७
५७९ प्राणदा—प्राणदान करनेवाली, ५८० प्राणि-जननी—जीवोंको जन्म देनेवाली, ५८१ प्राणेशी—प्राणोंकी अधीश्वरी, ५८२ प्राणरूपिणी—प्राणस्वरूपा, ५८३ पद्मालया—कमलोंमें वास करनेवाली लक्ष्मीस्वरूपा, ५८४ पराशक्तिः—सर्वोत्कृष्ट शक्ति, ५८५ पुरजित्परमप्रिया—त्रिपुरारि शिवकी अतिशय वल्लभा। ८
५८६ परा—सर्वश्रेष्ठ, ५८७ परफलप्राप्तिः—
१. निर्मला निर्मलाख्याना नाशिनी तापसम्पदाम् । नियता नित्यसुखदा नानाश्चर्यमहानिधिः ॥
२. नदी नदसरोमाता नायिका नाकदीर्घिका । नष्टोद्धरणधीरा च नन्दना नन्ददायिनी ॥
३. निर्णिंक्ताशेषभुवना निःसङ्गा निरुपद्रवा । निरालम्बा निष्प्रपञ्चा निर्णाशितमहामला ॥
४. निर्मलज्ञानजननी निःशेषप्राणितापहृत् । नित्योत्सवा नित्यतृप्ता नमस्कार्या निरञ्जना ॥
५. निष्ठावती निरातङ्का निर्लेपा निश्चलात्मिका । निरवद्या निरीहा च नीललोहितमूर्द्धगा ॥
६. नन्दिभृङ्गिगणस्तुत्या नागा नन्दा नगात्मजा । निष्प्रत्यूहा नाकनदी निर्याणवदीर्घनौः ॥
७. पुण्यप्रदा पुण्यगर्भा पुण्या पुण्यतरङ्गिणी । पृथुः पृथुफला पूर्णा प्रणतार्तिप्रभञ्जनी ॥
८. प्राणदा प्राणिजननी प्राणेशी प्राणरूपिणी । पद्मालया पराशक्तिः पुरजित्परमप्रिया ॥
७८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सर्वोत्तम फल—मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली, ५८८ पावनी—सबको पवित्र करनेवाली, ५८९ पयस्विनी—उत्तम जलवाली, ५९० परानन्दा—परमानन्दस्वरूपा, ५९१ प्रकृष्टार्था—श्रेष्ठ पुरुषार्थ-स्वरूपा, ५९२ प्रतिष्ठा—सबकी आधारभूता, ५९३ पालिनी—पालन करनेवाली, ५९४ परा—परमात्मस्वरूपा। १
५९५ पुराणपठिता—पुराणोंमें जिसकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है, वह, ५९६ प्रीता—सबको प्रिय लगनेवाली, ५९७ प्रणवाक्षररूपिणी—ॐकारस्वरूपा, ५९८ पार्वती—पर्वतराजकन्या, ५९९ प्रेमसम्पन्ना—प्रेमसे परिपूर्ण, ६०० पशुपशविमोचनी—जीवोंके अज्ञानमय बन्धनको दूर करनेवाली। २
६०१ परमात्मस्वरूपा—परब्रह्मरूपिणी, ६०२ परब्रह्मप्रकाशिनी—परब्रह्मको प्रकाशित करनेवाली, ६०३ परमानन्दनिष्यन्दा—अपने स्वरूपभूत परमानन्दमें निमग्न होनेके कारण निश्चल, ६०४ प्रायश्चित्तस्वरूपिणी—समस्त पापोंके लिये एकमात्र प्रायश्चित्तस्वरूपा। ३
६०५ पानीयरूपनिर्वाणा—जिसमें जलरूपसे मोक्षका ही निवास है, वह, ६०६ परित्राणपरायणा—शरणागतोंकी रक्षामें तत्पर, ६०७ पापेन्धनदवज्वाला—पापरूपी ईन्धनको जलानेके लिये दावाग्निकी लपट, ६०८ पापारि:—पापोंकी शत्रु, ६०९ पापनामनुत्—पापोंका नामतक मिटा देनेवाली। ४
६१० परमैश्वर्यजननी—अणिमा आदि महान् ऐश्वर्योंको जन्म देनेवाली, ६११ प्रज्ञा—उत्तम ज्ञानस्वरूपा, ६१२ प्राज्ञा—विदुषी, ६१३ परापरा—कारणकार्यस्वरूपा, ६१४ प्रत्यक्षलक्ष्मी:—साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा, ६१५ पद्माक्षी—कमलके समान अथवा कमलस्वरूप नेत्रोंवाली, ६१६ परव्योमामृतस्रवा—परब्रह्मस्वरूप अमृतमय जलको बहानेवाली। ५
६१७ प्रसन्नरूपा—आनन्दमय स्वरूपवाली, ६१८ प्रणिधि:—सर्वाधार, ६१९ पूता—परम पवित्र, ६२० प्रत्यक्षदेवता—सबके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हुई सच्चिदानन्दमयी देवी, ६२१ पिनाकिपरमप्रीता—पिनाकधारी भगवान् शिवकी परम प्रियतमा, ६२२ परमेष्ठिकमण्डलु:—ब्रह्माजीके कमण्डलुमें वास करनेवाली। ६
६२३ पद्मनाभपदार्घ्येण प्रसूता—भगवान् विष्णुके चरण पखारनेसे प्रकट हुई, ६२४ पद्ममालिनी—कमल पुष्पोंकी माला धारण करनेवाली, ६२५ परर्द्धिदा—उत्तम समृद्धि देनेवाली, ६२६ पुष्टिकरी—पोषण करनेवाली, ६२७ पथ्या—संसाररूपी रोगकी निवृत्तिके लिये हितकर आहारस्वरूपा, ६२८ पूर्ति:—पूर्णता, ६२९ प्रभावती—प्रकाशवती। ७
६३० पुनाना—पवित्र करनेवाली, ६३१ पीतगर्भिणी—पीतगर्भ अर्थात् राक्षसोंका नाश करनेवाली, ६३२ पापपर्वतनाशिनी—पापरूपी पर्वतका नाश करनेवाली, ६३३ फलिनी—देने योग्य फलसे युक्त, ६३४ फलहस्ता—भक्तोंको देनेके लिये सब प्रकारके फल हाथमें धारण करनेवाली, ६३५ फुल्लाम्बुजविलोचना—विकसित कमलके समान नेत्रोंवाली। ८
१. परा परफलप्राप्तिः पावनी च पयस्विनी। परानन्दा प्रकृष्टार्था प्रतिष्ठा पालिनी परा॥
२. पुराणपठिता प्रीता प्रणवाक्षररूपिणी। पार्वती प्रेमसम्पन्ना पशुपशविमोचनी॥
३. परमात्मस्वरूपा च परब्रह्मप्रकाशिनी। परमानन्दनिष्यन्दा प्रायश्चित्तस्वरूपिणी॥
४. पानीयरूपनिर्वाणा परित्राणपरायणा। पापेन्धनदवज्वाला पापारिः पापनामनुत्॥
५. परमैश्वर्यजननी प्रज्ञा प्राज्ञा परापरा। प्रत्यक्षलक्ष्मीः पद्माक्षी परव्योमामृतस्रवा॥
६. प्रसन्नरूपा प्रणिधिः पूता प्रत्यक्षदेवता। पिनाकिपरमप्रीता परमेष्ठिकमण्डलुः॥
७. पद्मनाभपदार्घ्येण प्रसूता पद्ममालिनी। परर्द्धिदा पुष्टिकरी पथ्या पूर्तिः प्रभावती॥
८. पुनाना पीतगर्भिणी पापपर्वतनाशिनी। फलिनी फलहस्ता च फुल्लाम्बुजविलोचना॥
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६३६ फालितैनोमहाक्षेत्रा—पापोंके महाक्षेत्रको नष्ट करनेवाली, ६३७ फणिलोकविभूषणम्—भोगवती गंगाके रूपमें नागलोकको विभूषित करनेवाली, ६३८ फेनच्छलप्रणुन्नैनाः—फेन छाँटनेके व्याजसे पापराशिको नाश करनेवाली, ६३९ फुल्लकैरवगन्धिनी—खिले हुए कुमुदपुष्पोंकी गन्धसे युक्त।^१
६४० फेनिलाच्छाम्बुधाराभा—फेनयुक्त स्वच्छ जलकी धारासे उद्भासित होनेवाली, ६४१ फुडुच्चाटितपातका—'फुद्' इस शब्दके साथ पातकोंको उखाड़ फेंकनेवाली, ६४२ फाणितस्वादुसलिला—सीराके समान स्वादिष्ट जलवाली, ६४३ फाण्टपथ्यजलाविला—मट्ठाके समान पथ्य (हितकर) जलसे भरी हुई।^२
६४४ विश्वमाता—समस्त संसारकी माता, ६४५ विश्वेशी—जगदीश्वरी, ६४६ विश्वा—सर्वस्वरूपा, ६४७ विश्वेश्वरप्रिया—विश्वनाथवल्लभा, ६४८ ब्रह्मण्या—ब्राह्मणहितकारिणी, ६४९ ब्रह्मकृत्—ब्रह्मा आदि देवताओंको उत्पन्न करनेवाली जगदीश्वरी, ६५० ब्राह्मी—ब्रह्मशक्ति, ६५१ ब्रह्मिष्ठा—ब्रह्मनिष्ठ, ६५२ विमलोदका—निर्मल जलवाली।^३
६५३ विभावरी—रात्रिस্বরূপा, ६५४ विरजा—रजोगुणरहिता, ६५५ विक्रान्तानेकविष्टपा—अनेक भुवनोंमें व्याप्त, ६५६ विश्वमित्रम्—सम्पूर्ण जगत्की सुहृद्, ६५७ विष्णुपदी—भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई, ६५८ वैष्णवी—विष्णुशक्ति, ६५९ वैष्णवप्रिया—विष्णुभक्तोंको प्रिय।^४
६६० विरूपाक्षप्रियकरी—भगवान् शंकरका प्रियकार्य करनेवाली, ६६१ विभूतिः—अणिमा आदि अष्टविध ऐश्वर्यरूपा, ६६२ विश्वतोमुखी—सब ओर मुखवाली, ६६३ विपाशा—बन्धनरहित, अथवा विपाशा (व्यास) नामक नदी, ६६४ वैबुधी—देवाधिदेव विष्णुकी शक्ति अथवा देवलोकमें प्रकट, ६६५ वेद्या—जानने योग्य, ६६६ वेदाक्षररसस्रवा—वेदके अक्षरोंसे प्रतिपादित ब्रह्मानन्दरसका स्रोत बहानेवाली, ब्रह्मद्रवरूपा।^५
६६७ विद्या—ब्रह्मविद्यास्वरूपा, ६६८ वेगवती—बड़े वेगसे बहनेवाली, ६६९ वन्द्या—वन्दनीया, ६७० बृंहणी—बृहत्स्वरूपा अथवा विस्तार करनेवाली, ६७१ ब्रह्मवादिनी—ब्रह्मका उपदेश करनेवाली, ६७२ वरदा—वर देनेवाली, ६७३ विप्रकृष्टा—सर्वोत्तम, ६७४ वरिष्ठा—श्रेष्ठा, ६७५ विशोधनी—विशेषरूपसे शुद्ध (पवित्र) करनेवाली।^६
६७६ विद्याधरी—सम्पूर्ण विद्याओंको धारण करनेवाली, ६७७ विशोका—शोकरहित, ६७८ वयोवृन्दनिषेविता—पक्षियोंके समुदायसे निषेवित, ६७९ बहुदका—बहुत जलवाली, ६८० बलवती—बलसे युक्त, ६८१ व्योमस्था—स्वर्गंगारूपसे आकाशमें स्थित, ६८२ विबुधप्रिया—देवताओंकी प्रियनदी।^७
६८३ वाणी—सरस्वतीस्वरूपा, ६८४ वेदवती—वैदिक ज्ञानसे सम्पन्न अथवा वेदवती नामवाली सती साध्वी स्वरूपा, ६८५ वित्ता—ज्ञानस्वरूपा, ६८६ ब्रह्मविद्यातरङ्गिणी—ब्रह्मविद्यारूपी तरंगोंसे युक्त, ६८७ ब्रह्माण्डकोटिव्याप्ताम्बुः—करोड़ों ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त जलवाली, ६८८ ब्रह्महत्यापहारिणी—ब्रह्महत्याका अपहरण करनेवाली।^८
१. फालितैनोमहाक्षेत्रा फणिलोकविभूषणम्। फेनच्छलप्रणुन्नैनाः फुल्लकैरवगन्धिनी ॥
२. फेनिलाच्छाम्बुधाराभा फुडुच्चाटितपातका। फाणितस्वादुसलिला फाण्टपथ्यजलाविला ॥
३. विश्वमाता च विश्वेशी विश्वा विश्वेश्वरप्रिया। ब्रह्मण्या ब्रह्मकृद्ब्राह्मी ब्रह्मिष्ठा विमलोदका ॥
४. विभावरी च विरजा विक्रान्तानेकविष्टपा। विश्वमित्रं विष्णुपदी वैष्णवी वैष्णवप्रिया ॥
५. विरूपाक्षप्रियकरी विभूतिर्विश्वतोमुखी। विपाशा वैबुधी वेद्या वेदाक्षररसस्रवा ॥
६. विद्या वेगवती वन्द्या बृंहणी ब्रह्मवादिनी। वरदा विप्रकृष्टा च वरिष्ठा च विशोधनी ॥
७. विद्याधरी विशोका च वयोवृन्दनिषेविता। बहुदका बलवती व्योमस्था विबुधप्रिया ॥
८. वाणी वेदवती वित्ता ब्रह्मविद्यातरङ्गिणी। ब्रह्माण्डकोटिव्याप्ताम्बुर्ब्रह्महत्यापहारिणी ॥
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६८९ ब्रह्मोशविष्णुरूपा—ब्रह्मा, शिव और विष्णुस्वरूपा, ६९० बुद्धिः—बुद्धिस्वरूपा, ६९१ विभववर्द्धिनी—धन बढ़ानेवाली, ६९२ विलासिसुखदा—विलासियोंको सुख देनेवाली, ६९३ वश्या—भगवदिच्छाके अधीन रहनेवाली, ६९४ व्यापिनी—सर्वत्र व्यापक, ६९५ वृषारणिः—धर्मोत्पत्तिकी कारणरूपा।^१
६९६ वृषाङ्कमौलिनिलया—भगवान् शंकरके मस्तकपर निवास करनेवाली, ६९७ विपन्नार्त्ति-प्रभञ्जनी—विपत्तिमें पड़े हुए भक्तजनोंकी पीड़ा अथवा अपने जलमें मृत्युको प्राप्त हुए पुरुषोंकी दुर्गति एवं कष्टका निवारण करनेवाली, ६९८ विनीता—विनयशीला, ६९९ विनता—विशेषतः नम्र, ७०० ब्रध्नतनया—सूर्यपुत्री यमुना-स्वरूपा, ७०१ विनयान्विता—विनययुक्त।^२
७०२ विपञ्ची—वीणास्वरूपा अथवा वीणाकी-सी मधुर ध्वनि करनेवाली, ७०३ वाद्यकुशला—सभी प्रकारके वाद्योंको बजानेमें चतुर, ७०४ वेणुश्रुतिविचक्षणा—वेणुगीत सुनने और समझनेमें कुशल, ७०५ वर्चस्करी—तेज उत्पन्न करनेवाली, ७०६ बलकरी—सामर्थ्य प्रदान करनेवाली, ७०७ बलोन्मूलितकल्मषा—बलपूर्वक पापोंका उच्छेद करनेवाली।^३
७०८ विपाप्मा—पापरहित, ७०९ विग-तातङ्का—भयरहित, ७१० विकल्पपरिवर्जिता—भेददृष्टिसे रहित, ७११ वृष्टिकर्त्री—सूर्यरूपसे वर्षा करनेवाली, ७१२ वृष्टिर्जला—वर्षाके कारणभूत जलवाली, ७१३ विधिः—ब्रह्मारूपसे सृष्टि करनेवाली, ७१४ विच्छिन्नबन्धना—अपने आश्रितोंके संसार-बन्धनका नाश करनेवाली।^४
७१५ व्रतरूपा—कृच्छ्र-चान्द्रायणादि व्रत-स्वरूपा अथवा भक्तोंके व्रत (संकल्प)-के अनुसार स्वरूप धारण करनेवाली, ७१६ वित्तरूपा—वैभवरूपिणी, ७१७ बहुविघ्नविनाशकृत्—बहुतसे विघ्नोंका विनाश करनेवाली, ७१८ वसुधारा—वसु (धन) धारण करनेवाली, आठ वसुओंको मातारूपसे गर्भमें धारण करनेवाली अथवा 'वसुधारा' स्वरूपा, ७१९ वसुमती—रत्नगर्भा वसुधारूपा, ७२० विचित्राङ्गी—अद्भुत शरीरवाली, ७२१ विभावसुः—अग्नि अथवा सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाली।^५
७२२ विजया—विजयशालिनी, ७२३ विश्व-बीजम्—जगत्की कारणस्वरूपा, ७२४ वामदेवी—वामदेव शिवकी शक्ति, मनोहारिणी देवी, ७२५ वरप्रदा—वर देनेवाली, ७२६ वृषाश्रिता—धर्मके आश्रित, ७२७ विषघ्नी—विषका प्रभाव नष्ट करनेवाली, ७२८ विज्ञानोर्म्यंशुमालिनी—विज्ञानमयी तरंगों और किरणोंसे युक्त।^६
७२९ भव्या—कल्याणमयी, ७३० भोगवती—भोगवती नामसे प्रसिद्ध पातालगंगा, ७३१ भद्रा—मंगलमयी, ७३२ भवानी—शिवपत्नी, ७३३ भूत-भाविनी—समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाली, ७३४ भूतधात्री—चार प्रकारके जीवोंका धारण-पोषण करनेवाली, ७३५ भयहरा—संसार-भयका निवारण करनेवाली, ७३६ भक्तदारिद्र्य-घातिनी—भक्तोंकी दरिद्रताका नाश करनेवाली।^७
७३७ भुक्तिमुक्तिप्रदा—भोग और मोक्ष देनेवाली, ७३८ भेशी—नक्षत्रोंकी अधीश्वरी, ७३९ भक्त-स्वर्गापवर्गदा—भक्तोंको स्वर्ग और मोक्ष देनेवाली, ७४० भागीरथी—राजा भगीरथके द्वारा लायी
१. ब्रह्मोशविष्णुरूपा च बुद्धिर्विभववर्द्धिनी। विलासिसुखदा वश्या व्यापिनी च वृषारणिः॥
२. वृषाङ्कमौलिनिलया विपन्नार्त्तिप्रभञ्जनी। विनीता विनता ब्रध्नतनया विनयान्विता॥
३. विपञ्ची वाद्यकुशला वेणुश्रुतिविचक्षणा। वर्चस्करी बलकरी बलोन्मूलितकल्मषा॥
४. विपाप्मा विगतातङ्का विकल्पपरिवर्जिता। वृष्टिकर्त्री वृष्टिर्जला विधिर्विच्छिन्नबन्धना॥
५. व्रतरूपा वित्तरूपा बहुविघ्नविनाशकृत्। वसुधारा वसुमती विचित्राङ्गी विभावसुः॥
६. विजया विश्वबीजं च वामदेवी वरप्रदा। वृषाश्रिता विषघ्नी च विज्ञानोर्म्यंशुमालिनी॥
७. भव्या भोगवती भद्रा भवानी भूतभाविनी। भूतधात्री भयहरा भक्तदारिद्र्यघातिनी॥
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७८९ ---|---
हुई, ७४१ भानुमती—प्रकाशवती, ७४२ भाग्यम्—नियतिरूपा, ७४३ भोगवती—विविध प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न, ७४४ भृतिः—भरण-पोषणका साधन।^१
७४५ भवप्रिया—भगवान् शंकरकी प्रिया, ७४६ भवद्वेष्ट्री—संसार-बन्धनका नाश करनेवाली, ७४७ भूतिदा—ऐश्वर्य देनेवाली, ७४८ भूति-भूषणा—विभूतिसे विभूषित, ७४९ भाललोचन-भावज्ञा—भगवान् शिवके भावको जाननेवाली, ७५० भूतभव्यभवत्प्रभुः—भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालकी स्वामिनी।^२
७५१ भ्रान्तिज्ञानप्रशमनी—भ्रमात्मक ज्ञानका निवारण करनेवाली, ७५२ भिन्नब्रह्माण्डमण्डपा—ब्रह्माण्डरूपी मण्डपका भेदन करनेवाली, ७५३ भूरिदा—बहुत देनेवाली, ७५४ भक्तसुलभा—भक्तोंको सुगमतापूर्वक प्राप्त होनेवाली, ७५५ भाग्य-वद्दृष्टिगोचरी—भाग्यवानोंको प्रत्यक्ष दर्शन देनेवाली।^३
७५६ भज्जितोपप्लवकुला—भक्तजनोंके उपद्रवोंका नाश करनेवाली, ७५७ भक्ष्यभोज्य-सुखप्रदा—भक्ष्य-भोज्यका सुख देनेवाली, ७५८ भिक्षणीया—अभ्युदय और निःश्रेयसकी इच्छावाले पुरुषोंद्वारा याचना करने योग्य, ७५९ भिक्षुमाता—भिक्षुओं—परमहंसजनोंको माताके समान सुख देनेवाली, ७६० भावी—सबको उत्पन्न करनेवाली, ७६१ भावस्वरूपिणी—पदार्थरूपा।^४
७६२ मन्दाकिनी—स्वर्गा, ७६३ महानन्दा—परमानन्दस्वरूपा, ७६४ माता—सम्पूर्ण विश्वके पापरूपी मलको पुत्रवत्सला माताकी भाँति दूर करनेवाली, ७६५ मुक्तितरङ्गिणी—मोक्षरूप तरंगोंसे सुशोभित, ७६६ महोदया—महान् अभ्युदयरूप, ७६७ मधुमती—अमृतमय जलसे युक्त, ७६८ महापुण्या—महापुण्यस्वरूपा, ७६९ मुदा-करी—हर्षोल्लासकी निधि।^५
७७० मुनिस्तुता—मुनियोंके द्वारा प्रशंसित एवं पूजित, ७७१ मोहहन्त्री—अज्ञानका नाश करनेवाली, ७७२ महातीर्था—महान् तीर्थस्वरूपा, ७७३ मधुस्रवा—मीठे जलका स्रोत बहानेवाली, ७७४ माधवी—विष्णुप्रिया, ७७५ मानिनी—सबके द्वारा सम्मान प्राप्त करनेवाली, ७७६ मान्या—माननीया, पूजनीया, ७७७ मनोरथपथातिगा—मनकी पहुँचसे परे विराजमान।^६
७७८ मोक्षदा—मोक्ष देनेवाली, ७७९ मतिदा—उत्तम बुद्धि देनेवाली, ७८० मुख्या—श्रेष्ठ, ७८१ महाभाग्यजनाश्रिता—बड़भागी मनुष्योंद्वारा सेवित, ७८२ महावेगवती—बड़े वेगसे बहनेवाली, ७८३ मेध्या—पवित्रा, ७८४ महा—उत्सवरूपा, ७८५ महिमभूषणा—अपनी महिमासे विभूषित।^७
७८६ महाप्रभावा—महान् प्रभावसे युक्त, ७८७ महती—विशाल, ७८८ मीनचञ्चल-लोचना—मीनके समान अथवा मीनस्वरूप चंचल नेत्रोंवाली, ७८९ महाकारुण्यसम्पूर्णा—अत्यन्त कृपासे भरी हुई, ७९० महर्द्धिः—बड़ी भारी समृद्धि देनेवाली अथवा महती समृद्धिरूपा, ७९१ महोत्पला—बड़े-बड़े कमलोंको उत्पन्न करनेवाली।^८
७९२ मूर्तिमत्—मूर्तिमान् तेज, ७९३ मुक्ति-
१. भुक्तिमुक्तिप्रदा भेशी भक्तस्वर्गापवर्गदा। भागीरथी भानुमती भाग्यं भोगवती भृतिः॥
२. भवप्रिया भवद्वेष्ट्री भूतिदा भूतिभूषणा। भाललोचनभावज्ञा भूतभव्यभवत्प्रभुः॥
३. भ्रान्तिज्ञानप्रशमनी भिन्नब्रह्माण्डमण्डपा। भूरिदा भक्तसुलभा भाग्यवद्दृष्टिगोचरी॥
४. भज्जितोपप्लवकुला भक्ष्यभोज्यसुखप्रदा। भिक्षणीया भिक्षुमाता भावी भावस्वरूपिणी॥
५. मन्दाकिनी महानन्दा माता मुक्तितरङ्गिणी। महोदया मधुमती महापुण्या मुदाकरी॥
६. मुनिस्तुता मोहहन्त्री महातीर्था मधुस्रवा। माधवी मानिनी मान्या मनोरथपथातिगा॥
७. मोक्षदा मतिदा मुख्या महाभाग्यजनाश्रिता। महावेगवती मेध्या महा महिमभूषणा॥
८. महाप्रभावा महती मीनचञ्चललोचना। महाकारुण्यसम्पूर्णा महर्द्धिश्च महोत्पला॥
| ७९० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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रमणी—मुक्तिरूपा, रमण करने योग्य, ७९४ मणिमाणिक्यभूषणा—मणि-माणिक्यमय आभूषणोंवाली ७९५ मुक्ताकलापनेपथ्या—मोतियोंकी मालासे श्रृंगार करनेवाली, ७९६ मनोनयननन्दिनी—मन और नेत्रोंको आनन्द देनेवाली।^१
७९७ महापातकराशिघ्नी—महापातकोंकी राशिका नाश करनेवाली, ७९८ महादेवार्धहारिणी—महादेवजीके आधे शरीरपर अधिकार करनेवाली गौरीस्वरूपा, ७९९ महोर्मिमालिनी—ऊँची तरंग-मालाओंसे युक्त, ८०० मुक्ता—मुक्तस्वरूपा, ८०१ महादेवी—महादेवी, ८०२ मनोन्मनी—मनको उन्मन (उत्तम ज्ञानसे युक्त) करनेवाली।^२
८०३ महापुण्योदयप्राप्या—महान् पुण्यका उदय होनेपर प्राप्त होनेवाली, ८०४ मायातिमिरचन्द्रिका—मायामय अन्धकारका नाश करनेके लिये चन्द्रप्रभारूप, ८०५ महाविद्या—ब्रह्मविद्यास्वरूपा, ८०६ महामाया—महामाया, ८०७ महामेधा—महान् बुद्धिमती, ८०८ महौषधम्—उत्तम ओषधिरूपा।^३
८०९ मालाधरी—माला धारण करनेवाली, ८१० महोपाया—मुक्तिकी प्राप्तिका महासाधन, ८११ महोरगविभूषणा—महान् सर्प जिसके आभूषण हैं, वह, ८१२ महामोहप्रशमनी—महान् मोहको शान्त करनेवाली, ८१३ महामङ्गलमङ्गलम्—महान् मंगलोंके लिये भी मंगलरूप।^४
८१४ मार्तण्डमण्डलचरी—आकाशगंगारूपसे सूर्यलोकमें विचरनेवाली, ८१५ महालक्ष्मीः—महालक्ष्मीस्वरूपा, ८१६ मदोज्झिता—मदसे रहित, ८१७ यशस्विनी—उत्तम यशसे युक्त, ८१८ यशोदा—सुयश देनेवाली, ८१९ योग्या—सब प्रकारसे सुयोग्य, ८२० युक्तात्मसेविता—जितात्मा पुरुषोंद्वारा सेवित।^५
८२१ योगसिद्धिप्रदा—योगसिद्धि देनेवाली, ८२२ याच्या—प्रार्थनीया, ८२३ यज्ञेशपरिपूरिता—यज्ञेश्वर विष्णुसे व्याप्त, ८२४ यज्ञेशी—यज्ञकी अधिष्ठात्री देवी, ८२५ यज्ञफलदा—स्मरण करनेपर यज्ञोंका फल देनेवाली, ८२६ यजनीया—पूजनीया, ८२७ यशस्करी—यश देनेवाली।^६
८२८ यमिसेव्या—संयमी पुरुषोंद्वारा सेवन करनेयोग्य, ८२९ योगयोनिः—योगकी उत्पत्तिका स्थान, ८३० योगिनी—योगको जाननेवाली, ८३१ युक्तबुद्धिदा—योगयुक्त बुद्धि देनेवाली, ८३२ योगज्ञानप्रदा—योग और ज्ञान देनेवाली, ८३३ युक्ता—मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाली, ८३४ यमाद्यष्टाङ्गयोगयुक्—यम, नियम आदि आठ अंगोंवाले योगसे युक्त।^७
८३५ यन्त्रिताघौघसंचारा—पापराशियोंके संचारको नियन्त्रित करनेवाली, ८३६ यमलोक-निवारिणी—यमलोकका निवारण करनेवाली, ८३७ यातायातप्रशमनी—आवागमन अथवा जन्म-मृत्युका कष्ट दूर करनेवाली, ८३८ यातनानाम-कृन्तनी—यातनाका नाम-निशान मिटानेवाली।^८
८३९ यामिनीशहिमाच्छोदा—चन्द्रमा और बर्फके समान स्वच्छ एवं शीतल जलवाली, ८४० युगधर्मविवर्जिता—कलियुगधर्म—हिंसा और असत्य आदिसे सर्वथा रहित, ८४१ रेवती—रेवती नामक नक्षत्रस्वरूपा, ८४२ रतिकृत्—भगवान्के
१. मूर्तिमन्मुक्तिरमणी मणिमाणिक्यभूषणा। मुक्ताकलापनेपथ्या मनोनयननन्दिनी॥
२. महापातकराशिघ्नी महादेवार्धहारिणी। महोर्मिमालिनी मुक्ता महादेवी मनोन्मनी॥
३. महापुण्योदयप्राप्या मायातिमिरचन्द्रिका। महाविद्या महामाया महामेधा महौषधम्॥
४. मालाधरी महोपाया महोरगविभूषणा। महामोहप्रशमनी महामङ्गलमङ्गलम्॥
५. मार्तण्डमण्डलचरी महालक्ष्मीर्मदोज्झिता। यशस्विनी यशोदा च योग्या युक्तात्मसेविता॥
६. योगसिद्धिप्रदा याच्या यज्ञेशपरिपूरिता। यज्ञेशी यज्ञफलदा यजनीया यशस्करी॥
७. यमिसेव्या योगयोनिर्योगिनी युक्तबुद्धिदा। योगज्ञानप्रदा युक्ता यमाद्यष्टाङ्गयोगयुक्॥
८. यन्त्रिताघौघसंचारा यमलोकनिवारिणी। यातायातप्रशमनी यातनानामकृन्तनी॥
| * काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७९१ |
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प्रति अनुराग रखनेवाली, ८४३ रम्या—रमणीया, ८४४ रत्नगर्भा—अपने भीतर रत्न धारण करनेवाली ८४५ रमा—लक्ष्मीरूपा, ८४६ रतिः—अनुरागरूपा।^१
८४७ रत्नाकरप्रेमपात्रम्—रत्नाकर—समुद्रकी प्रीतिपात्र, ८४८ रसज्ञा—रसको जाननेवाली, ८४९ रसरूपिणी—रसरस्वरूपा, ८५० रत्नप्रासादगर्भा—जिसके भीतर रत्नमय देवालय शोभा पा रहे हैं, ऐसी, ८५१ रमणीयतरङ्गिणी—रमणीय लहरोंसे युक्त।^२
८५२ रत्नार्चिः—रत्नोंके समान कान्तिमती, ८५३ रुद्ररमणी—भगवान् रुद्रकी जटामें रमण करनेवाली, ८५४ रागद्वेषविनाशिनी—राग और द्वेषका नाश करनेवाली, ८५५ रमा—नेत्र और मनको रमानेवाली, ८५६ रामा—मनोहर स्त्री अथवा योगियोंके मनको रमानेवाली, ८५७ रम्यरूपी—रमणीय रूपवाली, ८५८ रोगिजीवानुरूपिणी—संसार-रोगसे ग्रस्त पुरुषोंके लिये संजीवन ओषधिरूपा।^३
८५९ रुचिकृत्—प्रकाश करनेवाली, ८६० रोचनी—अपने दर्शनकी रुचि उत्पन्न करनेवाली, ८६१ रम्या—रमाकी हितकारिणी, ८६२ रुचिरा—मनोहर रूपवाली, ८६३ रोगहारिणी—संसाररूपी रोगका नाश करनेवाली, ८६४ राजहंसा—शोभायमान हंसोंसे युक्त, ८६५ रत्नवती—अनेक प्रकारके रत्नोंसे संयुक्त, ८६६ राजत्कल्लोलराजिका—शोभाशाली तरंग-मालाओंसे युक्त।^४
८६७ रामणीयकरेखा—जिसकी जलधारा रमणीयताकी रेखा है, वह, ८६८ रुजारिः—रोगोंकी शत्रुभूता, ८६९ रोगरोषिणी—रोगोंपर रोष प्रकट करनेवाली, ८७० राका—पूर्णमासीस्वरूपा, ८७१ रङ्कार्तिशमनी—दीन-दुःखियोंकी दैन्य वेदना शान्त करनेवाली, ८७२ रम्या—रमणीया, ८७३ रोलम्बराविणी—भ्रमरोंके गुंजारके समान जलकी कलकल ध्वनि करनेवाली।^५
८७४ रागिणी—भगवान्के प्रति अनुराग रखनेवाली, ८७५ रञ्जितशिवा—अपनी सन्निधिसे भगवान् शिवको प्रसन्न करनेवाली, ८७६ रूपलावण्यशेवधिः—सौन्दर्य और कान्तिकी निधि, ८७७ लोकप्रसूः—लोकमाता, ८७८ लोकवन्द्या—सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीया, ८७९ लोलत्कल्लोलमालिनी—चंचल लहरोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित।^६
८८० लीलावती—सृष्टिकी उत्पत्ति, पालन और संहारकी लीला करनेवाली, ८८१ लोकभूमिः—सम्पूर्ण भुवनोंकी आधार, ८८२ लोकलोचनचन्द्रिका—लोगोंके नेत्रोंमें चाँदनीकी भाँति आह्लाद उत्पन्न करनेवाली, ८८३ लेखस्रवन्ती—देवनदी, ८८४ लटभा—भगवत्प्रेमके लिये लोलुप-सी प्रतीत होनेवाली, ८८५ लघुवेगा—शीतकालमें लघुवेगवाली, ८८६ लघुत्वहृत्—भक्तोंकी लघुता दूर करनेवाली।^७
८८७ लास्यतरङ्गहस्ता—नृत्य-सा करती हुई चंचल लहरें जिसके लिये मानो हाथ हैं, वह, ८८८ ललिता—मनोहर रूपवाली, ८८९ लयभङ्गिमा—लय—नृत्य, गति और वाद्यकी समताकी भंगी (अंदाज)-से चलनेवाली, ८९० लोकबन्धुः—सम्पूर्ण जगत्का बन्धुकी भाँति हित चाहनेवाली, ८९१ लोकधात्री—माताकी भाँति विश्वका पालन-पोषण करनेवाली, ८९२ लोकोत्तरगुणोर्जिता—अलौकिक गुणोंसे बढ़ी-चढ़ी।^८
१. यामिनीशहिमाच्छोदा युगधर्मविवर्जिता। रेवती रतिकृद् रम्या रत्नगर्भा रमा रतिः॥
२. रत्नाकरप्रेमपात्रं रसज्ञा रसरूपिणी। रत्नप्रासादगर्भा च रमणीयतरङ्गिणी॥
३. रत्नार्ची रुद्ररमणी रागद्वेषविनाशिनी। रमा रामा रम्यरूपी रोगिजीवानुरूपिणी॥
४. रुचिकृद् रोचनी रम्या रुचिरा रोगहारिणी। राजहंसा रत्नवती राजत्कल्लोलराजिका॥
५. रामणीयकरेखा च रुजारि रोगरोषिणी। राका रङ्कार्तिशमनी रम्या रोलम्बराविणी॥
६. रागिणी रञ्जितशिवा रूपलावण्यशेवधिः। लोकप्रसूर्लोकवन्द्या लोलत्कल्लोलमालिनी॥
७. लीलावती लोकभूमिर्लोकलोचनचन्द्रिका। लेखस्रवन्ती लटभा लघुवेगा लघुत्वहृत्॥
८. लास्यतरङ्गहस्ता च ललिता लयभङ्गिमा। लोकबन्धुर्लोकधात्री लोकोत्तरगुणोर्जिता॥
| ७९२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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८९३ लोकत्रयहिता—तीनों लोकोंका हित करनेवाली, ८९४ लोका—लोकस्वरूपा, ८९५ लक्ष्मी:—लक्ष्मीस्वरूपा, ८९६ लक्षणलक्षिता—शुभ लक्षणोंसे उपलक्षिता, ८९७ लीला—भगवत्क्रीडास्वरूपा, ८९८ लक्षितनिर्वाणा—मोक्षका साक्षात्कार करानेवाली, ८९९ लावण्यामृतवर्षिणी—लावण्यमय अमृतकी वर्षा करनेवाली।^१
९०० वैश्वानरी—वैश्वानर-अग्निस्वरूपा, ९०१ वासवेड्या—इन्द्रके द्वारा स्तवन करनेयोग्य, ९०२ वन्ध्यत्वपरिहारिणी—वन्ध्यापनका निवारण करनेवाली, ९०३ वासुदेवाङ्घ्रिरेणुघ्नी—भगवान् विष्णुके चरणोंकी धूलिको धो लेनेवाली, ९०४ वज्रिवज्रनिवारिणी—इन्द्रके वज्रका निवारण करनेवाली।^२
९०५ शुभावती—मंगलमयी, ९०६ शुभफला—शुभ फल देनेवाली, ९०७ शान्ति:—शान्तिस्वरूपा, ९०८ शान्तनुवल्लभा—राजा शान्तनुकी प्रिय पत्नी, ९०९ शूलिनी—त्रिशूल धारण करनेवाली, ९१० शैशववया—बाल्यावस्थासे युक्त, ९११ शीतलामृतवाहिनी—शीतल जलकी धारा बहानेवाली।^३
९१२ शोभावती—शोभायमान, ९१३ शीलवती—सुशीला, ९१४ शोषिताशेषकिल्बिषा—सम्पूर्ण पापोंका शोषण (नाश) करनेवाली, ९१५ शरण्या—शरण लेने योग्य, ९१६ शिवदा—कल्याणदायिनी, ९१७ शिष्टा—श्रेष्ठा, ९१८ शरजन्मप्रसू:—कार्तिकेयकी जननी, ९१९ शिवा—कल्याणस्वरूपा।^४
९२० शक्ति:—आह्लादिनी शक्तिस्वरूपा, ९२१ शशाङ्कविमला—चन्द्रमाके समान उज्ज्वल वर्णवाली, ९२२ शमनस्वसृसम्मता—यमराजकी बहिन यमुनाकी प्रिय सखी, ९२३ शमा—अज्ञानका नाश करनेवाली अथवा शमस्वरूपा, ९२४ शमनमार्गघ्नी—यमलोकके मार्गका निवारण करनेवाली, ९२५ शितिकण्ठमहाप्रिया—नीलकण्ठ महादेवजीकी अत्यन्त वल्लभा।^५
९२६ शुचि:—पवित्रा, ९२७ शुचिकरी—पवित्र करनेवाली, ९२८ शेषा—प्रलयके समय भी शेष रहनेवाली—सच्चिदानन्द ब्रह्मरूपा, ९२९ शेषशायिपदोद्भवा—शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंसे प्रकट हुई, ९३० श्रीनिवासश्रुति:—भगवान् विष्णुसे जिनका प्रादुर्भाव सुना जाता है, वह, ९३१ श्रद्धा—आस्तिक्य बुद्धिरूपा, ९३२ श्रीमती—शोभायुक्त, ९३३ श्री:—लक्ष्मीस्वरूपा, ९३४ शुभव्रता—शुभव्रतवाली।^६
९३५ शुद्धविद्या—ब्रह्मविद्यास्वरूपा, ९३६ शुभावर्ता—उत्तम भँवरवाली, ९३७ श्रुतानन्दा—श्रवणमात्रसे आनन्द देनेवाली, ९३८ श्रुतिस्तुति:—श्रुतियों (वैदिक मन्त्रों) द्वारा जिसकी स्तुति की जाती है, वह, ९३९ शिवेतरघ्नी—अमंगलकारी पापोंका नाश करनेवाली, ९४० शबरी—किरातरूपधारी भगवान् महेश्वरकी प्रिया, ९४१ शाम्बरीरूपधारणी—मायामय रूप धारण करनेवाली।^७
९४२ श्मशानशोधनी—काशीकी महाश्मशानभूमिको शुद्ध करनेवाली, ९४३ शान्ता—शान्तस्वरूपा, ९४४ शाश्वत्—सनातनी, ९४५ शतधृतिस्तुता—ब्रह्माजीके द्वारा अभिवन्दित, ९४६ शालिनी—शोभायमान, ९४७ शालिशोभाढ्या—धानके हरे-भरे पौधोंकी शोभासे सम्पन्न, ९४८ शिखिवाहन-
१. लोकत्रयहिता लोका लक्ष्मीर्लक्षणलक्षिता। लीला लक्षितनिर्वाणा लावण्यामृतवर्षिणी॥
२. वैश्वानरी वासवेड्या वन्ध्यत्वपरिहारिणी। वासुदेवाङ्घ्रिरेणुघ्नी वज्रिवज्रनिवारिणी॥
३. शुभावती शुभफला शान्तिः शान्तनुवल्लभा। शूलिनी शैशववया शीतलामृतवाहिनी॥
४. शोभावती शीलवती शोषिताशेषकिल्बिषा। शरण्या शिवदा शिष्टा शरजन्मप्रसूः शिवा॥
५. शक्तिः शशाङ्कविमला शमनस्वसृसम्मता। शमा शमनमार्गघ्नी शितिकण्ठमहाप्रिया॥
६. शुचिः शुचिकरी शेषा शेषशायिपदोद्भवा। श्रीनिवासश्रुतिः श्रद्धा श्रीमती श्रीः शुभव्रता॥
७. शुद्धविद्या शुभावर्ता श्रुतानन्दा श्रुतिस्तुतिः। शिवेतरघ्नी शबरी शाम्बरीरूपधारिणी॥
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७९३ ---|---
गर्भभृत्—कार्तिकेयको गर्भमें धारण करनेवाली। १
९४९ शंसनीयचरित्रा—स्तवन करनेयोग्य दिव्य चरित्रोंवाली, ९५० शातिताशेषपातका—समस्त पातकोंका नाश करनेवाली, ९५१ षड्गुणैश्वर्य-सम्पन्ना—ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान तथा वैराग्य—इन छः प्रकारके ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, ९५२ षडङ्गश्रुतिरूपिणी—शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष तथा कल्प—ये वेदके छः अंग तथा वेद जिसके स्वरूप हैं, वह। २
९५३ षण्ढताहारिसलिला—नपुंसकता एवं निर्वीर्यता आदि दोष दूर करनेमें समर्थ जलवाली, ९५४ स्त्यायन्नदनदीशता—जिसमें सैकड़ों नद और नदियाँ कल-कल नादके साथ आकर मिलती हैं, वह, ९५५ सरिद्वरा—नदियोंमें श्रेष्ठ, ९५६ सुरसा—उत्तम रससे युक्त, ९५७ सुप्रभा—सुन्दर प्रभाववाली, ९५८ सुरदीर्घिका—देवताओंकी बावली। ३
९५९ स्वःसिन्धुः—स्वर्गलोककी नदी, ९६० सर्वदुःखघ्नी—सबके दुःखोंका नाश करनेवाली, ९६१ सर्वव्याधिमहौषधम्—समस्त रोगोंकी एकमात्र महौषधि, ९६२ सेव्या—सेवन करने योग्य, ९६३ सिद्धिः—अणिमा आदि अष्टसिद्धिस्वरूपा, ९६४ सती—पतिव्रता, ९६५ सूक्तिः—शुभ उक्तिरूप अथवा वैदिक-सूक्तस्वरूपा, ९६६ स्कन्दसूः—कार्तिकेयजननी, ९६७ सरस्वती—वाणीकी अधिष्ठात्री देवी। ४
९६८ सम्पत्तरङ्गिणी—सम्पत्तिरूप लहरोंवाली, ९६९ स्तुत्या—स्तवन करने योग्य, ९७० स्थाणु-मौलिकुतालया—भगवान् शंकरके मस्तकको अपना निवासस्थान बनानेवाली, ९७१ स्थैर्यदा—स्थिरता प्रदान करनेवाली, ९७२ सुभगा—उत्तम ऐश्वर्यसे युक्त, ९७३ सौख्या—सुख देनेवाली, ९७४ स्त्रीषु सौभाग्यदायिनी—स्त्रियोंको सौभाग्य प्रदान करनेवाली। ५
९७५ स्वर्गनिःश्रेणिका—स्वर्गलोकमें जानेके लिये सीढ़ी, ९७६ सूक्ष्मा—इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे स्थित, सूक्ष्मस्वरूपा, ९७७ स्वधा—पितृतृप्तिस्वरूपा, ९७८ स्वाहा—हव्यस्वरूपा, ९७९ सुधाजला—अमृतके समान मधुर जलवाली, ९८० समुद्ररूपिणी—समुद्ररूपा, ९८१ स्वर्ग्या—स्वर्गलोककी प्राप्तिमें सहायक, ९८२ सर्वपातक-वैरिणी—समस्त पापोंकी शत्रु। ६
९८३ स्मृताघहारिणी—स्मरण करनेपर समस्त पापोंका संहार करनेवाली, ९८४ सीता—सीता नामवाली गंगा, जनकनन्दिनीस्वरूपा, ९८५ संसाराब्धि-तरण्डिका—संसारसागरसे पार उतारनेके लिये नौकारूप, ९८६ सौभाग्यसुन्दरी—अतिशय सौभाग्यसे परम सुन्दर प्रतीत होनेवाली, ९८७ सन्ध्या—सन्ध्याकालमें उपास्य गायत्रीरूपा, ९८८ सर्वसार-समन्विता—समस्त शक्तियोंसे संयुक्त। ७
९८९ हरप्रिया—भगवान् शिवकी वल्लभा, ९९० हृषीकेशी—इन्द्रियोंकी स्वामिनी अथवा हृषीकेश भगवान् विष्णुकी पत्नी, ९९१ हंसरूपा—शुद्धस्वरूपा, हंसरूपधारिणी, ९९२ हिरण्मयी—स्वर्णमयी, ज्ञानस्वरूपा, ९९३ हताघसंघा—पापराशियोंका विनाश करनेवाली, ९९४ हितकृत्—हित-साधन करनेवाली, ९९५ हेला—एक प्रकारकी शृंगारजनित चेष्टा, ९९६ हेलाघगर्वहृत्—लीलापूर्वक पापका घमण्ड चूर करनेवाली। ८
१. श्मशानशोधनी शान्ता शश्वच्छतधृतिस्तुता । शालिनी शालिशोभाढ्या शिखिवाहनगर्भभृत् ॥
२. शंसनीयचरित्रा च शातिताशेषपातका । षड्गुणैश्वर्यसम्पन्ना षडङ्गश्रुतिरूपिणी ॥
३. षण्ढताहारिसलिला स्त्यायन्नदनदीशता । सरिद्वरा च सुरसा सुप्रभा सुरदीर्घिका ॥
४. स्वःसिन्धुः सर्वदुःखघ्नी सर्वव्याधिमहौषधम् । सेव्या सिद्धिः सती सूक्तिः स्कन्दसूश्च सरस्वती ॥
५. सम्पत्तरङ्गिणी स्तुत्या स्थाणुमौलिकुतालया । स्थैर्यदा सुभगा सौख्या स्त्रीषु सौभाग्यदायिनी ॥
६. स्वर्गनिःश्रेणिका सूक्ष्मा स्वधा स्वाहा सुधाजला । समुद्ररूपिणी स्वर्ग्या सर्वपातकवैरिणी ॥
७. स्मृताघहारिणी सीता संसाराब्धितरण्डिका । सौभाग्यसुन्दरी सन्ध्या सर्वसारसमन्विता ॥
८. हरप्रिया हृषीकेशी हंसरूपा हिरण्मयी । हताघसंघा हितकृद्धेला हेलाघगर्वहृत् ॥
| ७९४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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९९७ क्षेमदा—कल्याणदायिनी, ९९८ क्षालिताधौघा—पापराशिको धो डालनेवाली, ९९९ क्षुद्रविद्राविणी—दुष्टोंको मार भगानेवाली, १००० क्षमा—सहनशीला, पृथ्वीस्वरूपा। अगस्त्यजी ! इस प्रकार गंगाजीके सहस्र नामोंका कीर्तन करके मनुष्य गंगास्नानका उत्तम फल पा लेता है।*
यह गंगासहस्रनाम सब पापोंका नाश और सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाला है। समस्त स्तोत्रोंके जपसे इसका जप श्रेष्ठ है। यह सबको पवित्र करनेवाली वस्तुओंको भी पवित्र करनेवाला है। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करनेपर यह मनोवांछित फल देनेवाला है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाला है। मुने ! इसका एक बार पाठ करनेसे भी एक यज्ञका फल प्राप्त होता है। गंगासहस्रनाम आयु तथा आरोग्य देनेवाला और सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश करनेवाला है। यह मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। जो इस स्तुतिका पाठ करता है, उसे सदाचारी जानना चाहिये। वह सदा पवित्र है तथा उसने सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर ली है। उसके तृप्त होनेसे साक्षात् गंगाजी तृप्त हो जाती हैं। अतः सर्वथा प्रयत्न करके गंगाजीके भक्तका पूजन करे। जो गंगाजीके इस स्तोत्रराजका श्रवण और पाठ करता है या दम्भ और लोभसे रहित होकर उनके भक्तोंको सुनाता है, वह मानसिक, वाचिक और शारीरिक तीनों प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा पितरोंका प्रिय होता है। जिसके घरमें गंगाजीका यह स्तोत्र लिखकर इसकी पूजा की जाती है, वहाँ पापका कोई भय नहीं है। वह घर सदा पवित्र है।
शिवकी कृपाके बिना काशीवासकी दुर्लभता तथा काशीकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—महाभाग अगस्त्यजी ! सुनिये। सुप्रसिद्ध राजा भगीरथ श्रीमहादेवजीकी आराधना करके गंगाजीको बड़ी तपस्यासे भूमिपर ले आये। फिर वहाँसे तीनों लोकोंके हितके लिये गंगाको उस स्थानपर लाये जहाँ मणिकर्णिका तीर्थ है, भगवान् शंकरका आनन्दवन है और श्रीहरिका चक्रपुष्करिणी नामक तीर्थ है। वह परब्रह्म परमात्माका सर्वोत्तम क्षेत्र है, जो लीलासे ही समस्त जीवोंको मोक्ष अर्पण करता है। दिलीपनन्दन भगीरथ स्वयं आगे-आगे चलते हुए गंगाजीको उस पुरीमें ले आये, जो मोक्षको प्रकाशित करनेसे 'काशीपुरी' के नामसे विख्यात है। उस महाक्षेत्रको भगवान् शंकरने कभी नहीं छोड़ा है, इसलिये वह 'अविमुक्त' कहलाता है। मुने ! काशीका महत्त्व पहलेसे ही अधिक था, फिर गंगाजीके जलके समागमसे जो उसकी महिमा बढ़ी, उसके विषयमें क्या कहना है। वहाँका चक्र-पुष्करिणी तीर्थ पहलेसे ही कल्याणका निकेतन था, फिर भगवान् शंकरके मणिमय कर्णभूषणके गिरनेसे वह और भी श्रेष्ठ हो गया। भगवान् शिवके निवासस्थान अविमुक्तक्षेत्र अथवा आनन्द-काननमें पहलेसे ही मुक्ति सिद्ध है, फिर गंगाजीका सम्पर्क होनेसे उस तीर्थकी महिमामें और उत्कर्ष आ गया। जबसे मणिकर्णिकामें गंगाजी आकर मिल गयीं, तबसे वह क्षेत्र देवताओंके लिये भी दुर्लभ हो गया। काशीमें निवास करनेवाला तथा वहीं मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है। वेदान्तद्वारा जाननेयोग्य परब्रह्म परमात्माके निदिध्यासन, सांख्य और योगके बिना ही काशीमें मरा हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है। कालसे काशीमें शरीरका परित्याग करके मरा हुआ पुरुष तारकमन्त्रका उपदेश पाकर अमर हो जाता है। काशीमें शरीरका त्याग करना ही दान है, वही तपस्या है और वही मोक्षका सुख देनेवाला योग है। देवताओंने वहाँ पापियोंकी खोटी बुद्धिका खण्डन करनेवाली महान्
* क्षेमदा क्षालिताधौघा क्षुद्रविद्राविणी क्षमा। इति नाम सहस्रं हि गंगायाः कलशोद्भव ॥
कीर्तयित्वा नरः सम्यग्गंगास्नानफलं लभेत्।
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७९५ ---|---
असि (खड्ग)-रूपा 'असी', दुष्टोंके प्रवेशका अवधूनन (नाश) करनेवाली 'धुनी' (नदी) तथा विघ्ननिवारण करनेवाली 'वरणा' (नदी)-का निर्माण किया है। काशीके दक्षिण भागमें 'असी' और उत्तरभागमें 'वरणा' को उस क्षेत्रके मोक्षरूपी गड़े हुए धनकी रक्षाके लिये स्थापित करके देवतालोग बहुत सन्तुष्ट हुए। तत्पश्चात् स्वयं भगवान् शंकरने काशीके पश्चिम क्षेत्रकी रक्षाके लिये 'देहली-विनायक' को नियुक्त किया।
इस विषयमें मैं एक प्राचीन इतिहास बतलाता हूँ। दक्षिण समुद्रके तटपर सेतुबन्धतीर्थके समीप कोई धनंजय नामवाला वैश्य रहता था। वह अपनी माताका बड़ा भक्त था। पुण्यके मार्गसे ही वह धन पैदा करता और उससे याचकोंको सन्तुष्ट करता था। धनंजय यशोदानन्दन श्रीकृष्णका उपासक था। वह समस्त सद्गुणोंका भण्डार था, तो भी गुणियोंकी मण्डलीमें अपने गुणी स्वरूपको छिपाये रखनेकी चेष्टा करता था। यद्यपि व्यापारसे ही उसकी जीविका चलती थी, तो भी वह सत्यप्रिय था। ब्राह्मण आदि उच्च वर्णोंके लोग उसके गुणोंका बखान करते थे। इस प्रकार उत्तम वृत्ति और बर्तावसे रहते हुए उस वैश्यकी माता, जो वृद्धावस्थासे अत्यन्त आतुर तथा रोगग्रस्त हो रही थी, मृत्युको प्राप्त हो गयी।
पूर्वकालमें जब वह जवान थी तो उसने अपने पतिको धोखा देकर परपुरुषसमागम किया था। जो स्त्री चार दिनोंकी जवानी पाकर मोहवश अपने स्वामीको धोखा देती है, वह अक्षय नरकमें पड़ती है। स्त्रियोंके सतीत्वका नाश होनेसे उसका धर्मपरायण पति भी बड़े दुःखसे प्राप्त किये हुए स्वर्गलोकसे गिर जाता है। इसलिये स्त्रीको शीलकी रक्षा करनी चाहिये। खोटी बुद्धिवाली व्यभिचारिणी स्त्री एक कल्पतक नरकके विष्ठाकुण्डमें पड़ी रहती है। इसके बाद गाँवमें सूकरी होती है। इसलिये स्त्रीको उचित है कि वह पुण्यके एकमात्र साधन अपने शरीरको विशेष यत्न करके सुखतुल्य प्रतीत होनेवाले परपुरुषके दुःखद स्पर्शसे बचावे। सती नारीने अपने स्वामीके अधीन किये हुए इसी शरीरके द्वारा आदेश देकर क्या उगते हुए सूर्यको नहीं रोक दिया था? अत्रिमुनिकी पत्नी पतिव्रता अनसूयाने पतिभक्तिके ही प्रभावसे क्या ब्रह्मा, विष्णु और शिवको अपने गर्भमें नहीं धारण किया था? नारी अपने पातिव्रत्यके प्रभावसे इस लोकमें महान् सुयश, वैकुण्ठधाममें अक्षय निवास तथा भगवती लक्ष्मीजीकी सखीका पद प्राप्त कर लेती है।
धनंजयकी माता अपने पति और सनातन धर्मका परित्याग करके दुराचारका आश्रय ले स्वेच्छाचारिणी हो गयी थी। इसलिये मृत्युके बाद वह नरकमें गयी। उसका पुत्र धनंजय पूर्वजन्मकी तपस्याका उदय होनेसे किसी शिवयोगीका साथ पाकर धर्माचरणमें तत्पर हुआ। वह माताका भक्त तो था ही, उसकी हड्डियाँ लेकर उन्हें पंचगव्य और पंचामृतसे स्नान कराया और यक्षकर्दमका लेप करके फूलोंसे उनका पूजन किया। तत्पश्चात् उन्हें नैनसुख वस्त्रसे लपेट कर ऊपरसे रेशमी वस्त्र लपेटा। फिर चिकने सूती वस्त्रसे आवृत्त करके मजीठ (गेरुवा)-के रंगमें रँगे हुए गेरुवे वस्त्रद्वारा उस पोटलीको आच्छादित किया। तदनन्तर नेपाली कम्बलसे ढककर उसपर शुद्ध मिट्टीका लेप कर दिया। तत्पश्चात् उसे ताँबेके सम्पुटमें रखकर वह गंगाजीके मार्गपर प्रस्थित हुआ। धनंजय नीच जातिका स्पर्श न करके पवित्रतापूर्वक रहता और वेदी या पवित्र भूमिपर सोता था। इस प्रकार उस गठरीको लाता हुआ वह रास्तेमें ज्वरसे ग्रस्त हो गया। तब उसने उचित मजदूरी देकर कोई कहार निश्चित किया और किसी तरह काशीपुरीमें आ पहुँचा। वहाँ वह कहारको रक्षाके लिये बिठाकर कुछ खाने-पीनेकी वस्तु लेनेको बाजारमें गया। कहार अवसर पाकर उस भारमेंसे ताँबेका सम्पुट लेकर अपने घरकी ओर चल दिया। धनंजयने विश्रामस्थानपर लौटकर देखा तो सब सामग्रियोंमें
७९६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
वह ताँबेका सम्पुट नहीं दिखायी दिया। तब वह 'हाय-हाय' करता हुआ उसे ढूँढ़नेको चला और धीरे-धीरे उस कहारके घर जा पहुँचा। इधर वह कहार भी किसी वनमें पहुँचकर जब ताँबेके सम्पुटमें देखता है, तब उसे हड्डियाँ दिखायी देती हैं। यह देख उन्हें वहीं छोड़कर वह उदासभावसे घरको लौट गया। इसके बाद धनंजय उस कहारके घर पहुँचा और उसकी स्त्रीसे पूछने लगा— 'सच बताओ, तुम्हारा पति कहाँ गया है? उसने मेरी माताकी हड्डियाँ ले ली हैं, उन्हें दिला दो। हड्डियोंको शीघ्र दिखाओ, मैं तुम्हें अधिक धन दूँगा।' तब उसकी स्त्रीने पतिसे सब बातें कहीं। कहार लज्जासे मस्तक झुकाये सब वृत्तान्त बताकर धनंजयको अपने साथ वनमें ले गया। परंतु दैवयोगसे वह उस स्थानको भूल गया और दिशा भूल जानेके कारण वनमें इधर-उधर भटकने लगा। एक वनसे दूसरे वनमें घूमते-घूमते वह थक गया और धनंजयको वहीं छोड़कर अपने घर लौट गया। दो-तीन दिन वहाँ घूम-घामकर धनंजय भी काशीपुरीमें लौट आया। उसका मुख बहुत उदास हो गया था। धनंजय गया और प्रयागतीर्थका सेवन करके पुनः अपने देशको लौट गया। अगस्त्यजी ! भगवान् विश्वनाथकी आज्ञाके बिना उस स्त्रीकी हड्डियाँ काशीमें प्रवेश पाकर भी तत्काल बाहर हो गयीं। इसी प्रकार किसी पुण्यसे काशीमें पहुँचकर भी पापी मनुष्य उस क्षेत्रका फल नहीं पाता। वह तत्काल वहाँसे बाहर हो जाता है। अतः भगवान् विश्वनाथकी आज्ञा ही काशीमें रहनेका कारण होती है। महामुने ! असी और वरणा— ये दो नदियाँ उस क्षेत्रकी रक्षाके लिये नियुक्त की गयी हैं। इसीलिये वह पुरी 'वाराणसी' के नामसे प्रसिद्ध हुई। काशीपुरी कहती है 'अरे जीव ! तू बहुतेरे श्रेष्ठ तीर्थोंमें गोता लगा चुका, किंतु अबतक तुझे कभी शान्ति नहीं मिली। अब यहाँ मृत्युको प्राप्त होकर तू मेरे बलसे अमरत्व धारण करके शिवरूप हो जा।' अहा हा ! क्या जीवको गर्भवासका कष्ट भूल गया? यमराजके दूतोंके हाथसे बाँधा जाना और पीड़ित होना क्या याद नहीं रहा? क्या कारण है कि भगवान् शंकरकी कृपासे मिलने योग्य काशीपुरीको पाकर भी मूर्ख मनुष्य हाथमें आयी हुई मुक्तिको त्यागकर अन्यत्र जाता है।
अगस्त्यजी ! अविमुक्त क्षेत्रको भगवान् रुद्रका निवासस्थान बताया गया है। यहाँके सभी जीव रुद्रस्वरूप हैं। इसलिये काशीमें रहनेवाले चारों वर्णों तथा वर्णेतर मनुष्योंका भी ईश्वरबुद्धिसे श्रद्धापूर्वक सत्कार करके मनुष्य भगवान् शिवकी पूजाके फलका भागी होता है। प्रलयकालमें पृथ्वी जलमें विलीन हो जाती है, जल अग्निके मुखरूपी भयानक कन्दरामें समा जाता है। अग्नि वायुमें और वायु आकाशमें लीन हो जाती है। आकाश अहंकारमें लयको प्राप्त होता है। षोडश विकारोंके साथ अहंकार भी समष्टि बुद्धि नामक महत्तत्त्वमें लीन होता है। फिर महत्तत्त्व भी प्रकृतिके भीतर विलीन हो जाता है। वह त्रिगुणमयी प्रकृति उस निर्गुण पुरुषका आलिंगन करके स्थित होती है। वह परम पुरुष ही देह और गेहका स्वामी तथा सबको जीवन देनेवाला है। यह प्राकृत प्रलय कहलाता है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव बने रहते हैं। कालस्वरूप परमात्मा उस प्रकृतिस्थ पुरुषको लीलापूर्वक अपनेसे अभिन्न कर लेते हैं। वे परम पुरुष परमेश्वर ही महाविष्णु कहलाते हैं। उन्हींको महादेव कहते हैं। वे ही आदि, मध्य और अन्तसे रहित शिव हैं। वे ही लक्ष्मीपति तथा वे ही पार्वतीपति हैं। प्रलयकालमें भगवान् शंकर काशीपुरीको अपने त्रिशूलके अग्रभागपर रखकर स्वयं इसकी रक्षा करते हैं। अतः काशी कलि और कालसे वर्जित है। इसीको वाराणसी, रुद्रावास, महाश्मशान तथा आनन्दवन कहा गया है। अगस्त्यजी ! देवाधिदेव भगवान् शंकरने माता पार्वतीदेवीके आगे जो कुछ कहा था उसे ज्यों-का-त्यों मैंने सुना और वह सब तुमसे कहा। जो महापातकोंका नाश करनेवाले इस पुण्यमय प्रसंगको पढ़ता और सुनता है। वह शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
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काशीपुरीकी श्रेष्ठता, हरिकेश यक्षको शिवाराधनाके द्वारा दण्ड-पाणि-पदकी प्राप्ति और दण्डपाण्यष्टकस्तोत्र
स्कन्दजी कहते हैं—काशीमें भिक्षुकोंको आँवलेके फलके बराबर भी दी हुई भिक्षा सुमेरु पर्वतके समान भारी पुण्य देनेवाली होती है। जो काशीमें भूखे कुटुम्बीको वर्षभर खानेके लिये अन्न देता है और इस प्रकार वह जितने वर्षोंके लिये देता है, उतने ही युगोंतक स्वर्गमें पूजित होता है। जो काशीमें जीविकाके साधनसे रहित ब्राह्मणको एक वर्षतक भोजन देता है वह श्रेष्ठ पुरुष कभी भूख-प्यासका कष्ट नहीं भोगता। काशीमें निवास करनेवाले पुरुषोंको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वही पूरा-का-पूरा फल काशीवास करानेवालेको भी प्राप्त होता है। जिसका नाम लेनेसे भी ब्रह्महत्या आदि पाप मनुष्यको त्याग देते हैं, उस काशीपुरीकी यहाँ किससे उपमा दी जा सकती है। इस पुरीकी पूजा और प्रदक्षिणा करनी चाहिये। जो दूर देशमें होनेपर भी अविमुक्त नामक महाक्षेत्र (काशी)-का स्मरण करते हुए प्राणत्याग करता है उसका भी संसारमें पुनर्जन्म नहीं होता। जैसे योगी अपने योगबलसे मुक्त होते हैं, उसी प्रकार जीव यहाँ मृत्यु होनेमात्रसे मुक्त हो जाते हैं। यह काशीपुरी परम पद है, यह परम आनन्द है और यही परम ज्ञान है। अतः मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको इसका सेवन करना चाहिये। यहाँ भगवान् भैरव कपालमोचनतीर्थको आगे करके भक्तजनोंकी पाप-परम्पराका भक्षण करते हुए वहीं निवास करते हैं। भैरवजी काशीवासियोंके कलि और कालको अपना ग्रास बना लेते हैं। इसीलिये उनकी 'कालभैरव' संज्ञा हुई है।
अगस्त्यजीने कहा—कार्तिकेयजी! अब आप मुझे हरिकेशकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनाइये।
कार्तिकेयजी बोले—मुने! प्राचीन कालमें गन्धमादनपर्वतपर 'रत्नभद्र' नामसे विख्यात एक परम धर्मात्मा यक्ष रहता था, जो लाखों पुण्यकर्मोंसे सुशोभित था। उसके 'पूर्णभद्र' नामक एक पुत्र हुआ। तदनन्तर अन्तिम अवस्थामें शरीर त्याग करके रत्नभद्र परम शान्त भगवान् शिवके धाममें जा पहुँचा। पिताकी मृत्यु हो जानेके बाद पूर्णभद्रने वैभव तथा भोगसामग्रीका अधिकारी होकर समस्त लौकिक मनोरथोंको प्राप्त किया। केवल एक ही वस्तु उसे नहीं मिली, जिसको 'पुत्र' कहते हैं, जो गृहस्थाश्रमका श्रृंगार, पितरोंका महान् हितकारी और सांसारिक तापसे सन्तप्त अंगोंको अमृतके फुहारोंकी तरह शीतल एवं सुखद प्रतीत होनेवाला है। पूर्णभद्र अपने सुन्दर गृहको सन्तान-सुखसे शून्य देखकर बहुत दुःखी हुआ। अगस्त्यजी! एक दिन उस यक्षने अपनी धर्मपत्नी श्रेष्ठ यक्षिणी कनककुण्डलाको समीप बुलाकर कहा—'प्रिये! यह महल पुत्रके बिना सूना दिखायी देता है। अतः सुखद नहीं जान पड़ता। क्या करूँ, किस उपायसे पुत्रका मुँह देखूँ? यदि इसका कोई उपाय हो तो बताओ।' अपने प्रियतम पतिको इस प्रकार विलाप करते देख पतिव्रता कनककुण्डला मन-ही-मन लंबी साँस खींचकर बोली—'प्राणनाथ! आप तो ज्ञानी हैं, आप इतना खेद क्यों करते हैं। उद्योगी पुरुषोंको इस चराचर जगत्में कौन-सी वस्तु दुर्लभ है। जो अत्यन्त कायर हैं, वे ही लोग प्रारब्ध (भाग्य)-को कारण बताया करते हैं। पूर्वजन्ममें अपना किया हुआ कर्म ही तो प्रारब्ध है। अतः वह पुरुषार्थसे भिन्न नहीं है। इसलिये पुरुषार्थका सहारा लेकर प्रतिकूल प्रारब्धको शान्त करनेके लिये समस्त कारणोंके भी कारणरूप भगवान् महेश्वरकी शरणमें जाना चाहिये। उन्होंने ही ब्रह्माजीको सृष्टि-रचनाका अधिकार दिया है। उन्हींकी कृपासे इन्द्र आदि देवता लोकपालके
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पदपर प्रतिष्ठित हुए हैं। महर्षि शिलाद भी सन्तानहीन थे; किंतु भगवान् शिवकी कृपासे उन्होंने मृत्युपर विजय पानेवाला पुत्र प्राप्त कर लिया। श्वेतकेतु कालपाशसे मुक्त हुए तथा अन्धकासुर भी शिवकी कृपासे उनके गणोंका अधिनायक होकर भृंगी नामसे विख्यात हुआ। जिस वस्तुको हम मनसे सोच भी नहीं सकते, जिसका वाणीके द्वारा वर्णन भी नहीं हो सकता, उस मोक्षपदको भी सेवासे प्रत्यक्ष किये हुए भगवान् शिव क्षणभरमें दे सकते हैं। आर्यपुत्र! यदि आप सबका हित चाहनेवाले प्रिय पुत्रको प्राप्त करना चाहते हैं तो भगवान् शिवकी शरणमें जाइये।'
धर्मपत्नीका यह वचन सुनकर पूर्णभद्रने महादेवजीकी आराधना की। वह संगीत-कलाका ज्ञाता था। उसने अपनी संगीत-विद्यासे कुछ ही दिनोंमें भगवान् शंकरको रिझा लिया और उनकी कृपासे उसका मनोरथ पूर्ण हो गया। पूर्णभद्रने अपनी पत्नीके गर्भसे एक श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त किया और उसका नाम हरिकेश रखा। बालकका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था। वह शुक्ल पक्षके शशीकी भाँति प्रतिक्षण वृद्धिको प्राप्त होने लगा। बालक हरिकेश जब आठ वर्षका हुआ तभीसे प्रतिदिन एकमात्र भगवान् शिवमें उसकी मान्यता बढ़ने लगी। वह धूलसे खेलनेमें संलग्न होकर भी धूलकी ही शिवमूर्ति बनाता और कोमल घाससे कौतूहलपूर्वक उनकी पूजा करता था। हरिकेश अपने सभी मित्रोंको भगवान् शिवके नामसे ही पुकारता था। चन्द्रशेखर, मृत्युंजय, त्रिलोचन, शम्भो, पिनाकिन्, शंकर, श्रीकण्ठ, नीलकण्ठ, ईश, पार्वतीपते, भाललोचन, शूलपाणे, महेश्वर, गंगाजीके जलसे भीगे जटाजूटवाले शिव आदि नामोंकी मालाका जप किया करता था और अपनी आयुके मित्र बालकोंको बड़े लाड़-प्यारसे इन्हीं नामोंद्वारा सम्बोधित करता था। उसके दोनों कान भगवान् शिवके नामोंके अतिरिक्त और कोई नाम सुनते ही नहीं थे। भगवान् भूतनाथके मन्दिरके आँगनके अतिरिक्त दूसरे किसी स्थानमें उसके पैर जाते ही नहीं थे। शिवके श्रीविग्रहके अतिरिक्त दूसरे किसी रूपका दर्शन करनेमें उसके नेत्र तत्पर नहीं होते थे। उसकी रसना सदा भगवान् शिवके नामाक्षरमय अमृतका पान करती रहती थी। उसकी नासिका महादेवजीके चरणारविन्दोंकी सुगन्धके अतिरिक्त दूसरी कोई गन्ध नहीं ग्रहण करना चाहती थी। उसके हाथ केवल शिवजीकी सेवा करनेको ही उत्सुक रहते थे और वह मनसे उनके सिवा दूसरी किसी वस्तुका चिन्तन नहीं करता था। पीने योग्य पदार्थोंको हरिकेश शुद्धभावसे भगवान् शंकरको निवेदन करके ही पीता था। भोजन भी वही करता था, जो भगवान् शिवको निवेदित होकर प्रसाद बन जाता था। सर्वत्र सब अवस्थाओंमें उसे भगवान् शिवके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं दिखायी देती थी। चलते, गाते, सोते, खड़े होते, लेटते, खाते और पीते हुए भी वह सब ओर भगवान् शंकरको ही देखता था। दूसरे किसी भावका चिन्तन नहीं करता था। रातमें सो जानेपर भी वह स्वप्नमें बार-बार यही कहता था कि 'हे भगवान् महेश्वर! आप कहाँ चले जा रहे हैं? क्षणभर और ठहरिये।' इतना कहते-कहते वह सोतेसे जाग उठता था। हरिकेशकी ऐसी दशा देखकर उसके पिता पूर्णभद्र उसे शिक्षा देते थे—'वत्स ! अब तुम घरके काम-काजमें लगो। यह सब धन-दौलत तुम्हारी ही है। पहले सब प्रकारकी विद्याओंका अभ्यास करो, फिर उत्तम-उत्तम भोग भोगो। तत्पश्चात् वृद्धावस्थामें पहुँचकर भक्तियोगका अनुष्ठान करना।' जब पिता बार-बार ऐसी शिक्षा देने लगे तब हरिकेश उसे स्वीकार न करके एक दिन चुपचाप घरसे बाहर निकल गया। बाहर जानेपर उसे दिग्भ्रम हो गया। तब वह भगवान् शंकरको पुकारते
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७९९
हुए मन-ही-मन कहने लगा—'शम्भो! अब मैं कहाँ जाऊँ? कहाँ रहनेसे मेरा कल्याण होगा। मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है, मैंने पहलेसे सुन रखा है कि जिनकी कहीं भी गति नहीं है उनकी गति काशीपुरी ही है।'
ऐसा विचार करके हरिकेश काशीपुरीको चला गया। उस आनन्दवनमें पहुँचकर उसने तपस्याकी शरण ली। एक दिन उस वनमें विचरते हुए भगवान् शंकर पार्वतीदेवीसे इस प्रकार बोले—'देवि! जैसे तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, उसी प्रकार यह आनन्दवन भी मुझे अत्यन्त प्रिय लगता है। यहाँ मेरे अनुग्रहसे मृत्युको प्राप्त हुए जीव अमृतरूपको प्राप्त हो गये हैं। संसारमें उनका पुनर्जन्म नहीं होता। जो संसारी जीव काशीमें प्राणत्याग करते हैं उनके कर्मोंके संस्कार मेरी आज्ञासे चिताकी आगमें ही भस्म हो जाते हैं। जीव ब्रह्मज्ञानसे मुक्त होते हैं अथवा ब्रह्मज्ञानमय क्षेत्र प्रयागमें शरीर त्याग करनेसे मुक्त होते हैं। उसी ब्रह्मज्ञानका तारकमन्त्रके रूपमें मैं काशीमें मरनेवाले प्राणियोंके लिये उपदेश करता हूँ, जिससे वे तत्काल मुक्त हो जाते हैं। कलियुगमें जिनका अन्तःकरण मलिन हो गया है तथा जिनकी इन्द्रियाँ स्वभावसे ही चंचल हैं, उन्हें ब्रह्मज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है? अतः उनके लिये मैं काशीपुरीमें तारक ब्रह्मका उपदेश देता हूँ। कलियुगमें मुझ विश्वनाथ देवका, काशीपुरीका, भागीरथी गंगाका और दानका विशेष महत्त्व है। काशीमें उत्तरवाहिनी गंगा और मेरा विश्वेश्वर नामक लिंग—ये दोनों मनुष्योंको मुक्ति देनेवाले हैं। कलिमें दानजनित पुण्यके बलसे इनकी प्राप्ति हो सकती है। योगियोंके हृदयाकाशमें, कैलासमें तथा मन्दराचल पर्वतपर भी निवास करनेकी मेरी वैसी रुचि नहीं है जैसी कि काशीपुरीमें निवास करनेकी मेरी रुचि रहती है।'
इस प्रकार बातचीत करते हुए महादेवजीने हरिकेशको देखा जो आनन्दवनके मध्यभागमें अशोक वृक्षके नीचे उसकी जड़के समीप बैठकर तपस्या कर रहा था। उसका शरीर तनिक भी हिलता-डुलता नहीं था। वह ऐसा जान पड़ता था मानो सूखी नस-नाड़ियोंसे बँधा हुआ कोई हड्डियोंका ढेर हो। उसे इस रूपमें देखकर पार्वतीदेवीने महादेवजीसे निवेदन किया—'नाथ! यह आपका तपस्वी भक्त है, इसे वरदान देकर प्रसन्न कीजिये।
इसका चित्त एकमात्र आपमें ही लगा हुआ है, इसका जीवन भी आपके ही अधीन है। यह आपकी ही प्रसन्नताके लिये सब कर्म करता और आपकीही शरणमें रहता है। कठोर तपस्यासे इसका सारा अंग सूख गया है। अतः इस यक्षको वरदान देकर आप इसपर अनुग्रह करें। तब भगवान् शिवने दयार्द्रचित्त होकर समाधिमें आँख बंद करके बैठे हुए हरिकेशका अपने हाथसे स्पर्श किया। स्पर्श पाकर यक्षने आँखें खोल दीं और भगवान् त्रिलोचनको सामने देखकर हर्षगद्गद वाणीमें कहा—ईश! आपकी जय हो। शम्भो! गिरिजापते! शंकर! त्रिशूलपाणे! चन्द्रार्धशेखर! कृपालो! आपके कर-कमलोंका स्पर्श पाकर मेरा यह शरीर अमृतस्वरूप हो गया।' भगवान् महेश्वरने उस भक्तकी कही हुई यह कोमल वाणी सुनकर
८०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्रसन्नतापूर्वक उसे अनेकानेक वरदान दिये और इस प्रकार कहा—'यक्ष! अब तुम मेरे इस प्रिय क्षेत्र काशीधामके दण्डनायक होओ। इस समय तुम्हारा नाम दण्डपाणि होगा। तुम मेरी आज्ञासे मेरे समस्त उत्कट गणोंका शासन करो। ये दो सम्भ्रम और उद्भ्रम नामवाले गण सदा तुम्हारे अनुगामी होकर रहेंगे। तुम काशीनिवासी प्राणियोंके एकमात्र अन्नदाता, प्राणदाता, ज्ञानदाता और मेरे मुखसे निकले हुए तारकमन्त्रके उपदेशसे मोक्षदाता होकर यहाँ अविचल निवास प्राप्त करोगे। पापी मनुष्योंको नाना प्रकारके विघ्नसमूहोंसे पीड़ा देकर उनके मनमें उद्वेग पैदा करके उन्हें काशीपुरीसे बाहर निकाल दोगे और भक्तजनोंको दूरसे भी क्षणभरमें यहाँ ले आकर उन्हें उत्तम मोक्ष दिलानेवाले होओगे। यक्षराज! यह उत्तम क्षेत्र आजसे तुम्हारे अधीन कर दिया गया। अब यहाँ तुम्हारी आराधना किये बिना कौन पुरुष मोक्षका भागी हो सकता है। मेरा भक्त यहाँ आकर पहले तुम्हारी पूजा करेगा, तब मेरी करेगा। जो ज्ञानोद तीर्थमें स्नान, तर्पण आदि करके तुझ दण्डपाणि गणेशका पूजन करेगा, वही यहाँ पुण्यवान् होकर लोकमें मेरी असीम दयासे कृतार्थताका अनुभव करेगा। दण्डपाणे! तुम यहाँ दक्षिण दिशामें मेरे नेत्रोंके समक्ष निवास करो और पापी मनुष्योंको दण्ड तथा अपने भक्तोंको अभय दान देते रहो।'
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार दण्डपाणिको वरदान देकर भगवान् शिव वृषभराज नन्दीपर आरूढ़ हो आनन्दवनके भीतर अपने निवासस्थानको चले गये। तभीसे यक्षराज हरिकेश दण्डनायकके पदपर अभिषिक्त हो काशीपुरीका भलीभाँति शासन करते हैं। मैं भी उनके प्रति दोषदृष्टि रखनेके कारण ही यहाँ (काशीसे बाहर) रहनेको विवश हुआ हूँ, क्योंकि मैंने काशीमें रहकर भी कभी उनका आदर नहीं किया। मुने! ऐसे जितेन्द्रिय होकर भी तुमने जो उस क्षेत्रका त्याग किया है, इसमें भी दण्डपाणिकी ही अप्रसन्नता कारण है, ऐसा मुझे सन्देह होता है। यक्ष हरिकेश! कल्याणमय मोक्षकी प्राप्तिके लिये मुझे निर्विघ्न काशीवास प्रदान करो। महामते दण्डपाणे! यक्ष पूर्णभद्र धन्य है, माता कनककुण्डला भी धन्य है, जिनके उदरसे तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। यक्षपते! तुम्हारी जय हो। पीले नेत्रोंवाले धीरशिरोमणे! तुम्हारी जय हो, पीले रंगकी जटा धारण करनेवाले देव! तुम्हारी जय हो। दण्डरूप महान् आयुध धारण करनेवाले वीर! तुम्हारी जय हो। अविमुक्त नामक महाक्षेत्रके सूत्रधार तीव्र तपस्वी दण्डनायक भयंकरमुख! विश्वनाथप्रिय! तुम्हारी जय हो। सौम्य स्वभाववाले संतोंके लिये तुम सौम्य मुख हो और दूसरोंको भय पहुँचानेवाले पापियोंके लिये भयंकर हो। काशी क्षेत्रमें पापपूर्ण विचार रखनेवाले मनुष्योंके लिये काल हो। भगवान् महाकालके परम प्रिय सबके प्राणदाता यक्षराज! तुम्हारी जय हो। तुम्हीं काशीवास, काशीनिवासियोंको आनन्द तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हो, तुम्हारी जय हो। तुम्हारा शरीर बड़े-बड़े रत्नोंकी जगमगाती हुई ज्योतिसे प्रकाशमान है। तुम अभक्तोंको महान् सम्भ्रम और उद्भ्रम देनेवाले हो और भक्तोंके सम्भ्रम तथा उद्भ्रमका निवारण करनेवाले हो। प्राणियोंके अन्तकालीन श्रृंगार करनेमें परम चतुर तथा ज्ञानकी निधि प्रदान करनेवाले दण्डपाणे! तुम्हारी जय हो। गौरीचरणारविन्दोंके भ्रमर तथा मोक्षका साक्षात्कार करानेमें कुशल यक्षराज! तुम्हारी जय हो।' मुने! इस परम पुण्यमय यक्षराजाष्टक नामक स्तोत्रका मैं प्रतिदिन तीनों समय जप करता हूँ। यह काशीकी प्राप्ति करानेवाला है। जो बुद्धिमान् श्रद्धापूर्वक दण्डपाण्यष्टकका पाठ करता है वह कभी विघ्नोंसे तिरस्कृत नहीं होता और काशीनिवासका फल पाता है।
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ईशानके द्वारा ज्ञानोद (ज्ञानवापी) तीर्थका प्राकट्य, ज्ञानवापीकी महिमाके प्रसंगमें सुशीला (कलावती)-की कथा, काशीके विविध तीर्थोंका वर्णन
अगस्त्यजी बोले—स्कन्द! अब आप ज्ञानोद तीर्थका माहात्म्य बतलाइये, क्योंकि स्वर्गवासी भी इस ज्ञानवापीकी प्रशंसा करते हैं।
कार्तिकेयजीने कहा—अगस्त्य! यह काशी तीर्थ महानिद्रामें सोये (मृत्युको प्राप्त) हुए जीवोंको ज्ञान एवं मोक्ष देनेवाला है, संसारसागरके भँवरमें गिरे हुए प्राणियोंके लिये नौकास्वरूप है, आवागमनसे खिन्न जीवोंके लिये विश्रामस्थान है तथा अनेक जन्मोंके बँटे हुए कर्मसूत्रको काटनेवाला छुरा है। इतना ही नहीं, यह क्षेत्र सच्चिदानन्दमय परमेश्वरका धाम और परब्रह्म रसकी प्राप्ति करानेवाला है। यह सुखका विस्तार करनेवाला तथा मोक्षके साधनमें सिद्धि देनेवाला है। एक समय इस तीर्थमें ईशानकोणके अधिपति ईशान नामक रुद्र स्वेच्छासे विचरते हुए आये। यहाँ आकर उन्होंने भगवान् शिवके विशाल ज्योतिर्मय लिंगका दर्शन किया, जो सब ओरसे प्रकाशपुंजद्वारा व्याप्त था। देवता, ऋषि, सिद्ध और योगियोंके समुदाय निरन्तर उसकी आराधनामें संलग्न रहते थे। उसे देखकर ईशानके मनमें यह इच्छा हुई कि ‘मैं शीतल जलसे भरे हुए कलशोंद्वारा इस महालिंगको स्नान कराऊँ।’ तब उन्होंने विश्वेश्वर लिंगसे दक्षिण थोड़ी ही दूरपर त्रिशूलसे वेगपूर्वक एक कुण्ड खोदा। उस समय उस कुण्डसे पृथ्वीका आवरणरूप जल जो पृथ्वीमें ढका हुआ था, प्रकट हो गया। ईशानने उस जलसे उस ज्योतिर्मय लिंगको स्नान कराया। वह जल अत्यन्त शीतल, ज्ञानस्वरूप एवं पापपुंजका नाश करनेवाला था, संत-महात्माओंके हृदयकी भाँति स्वच्छ, भगवान् शिवके नामकी भाँति पवित्र, अमृतके समान स्वादिष्ट, पापहीन और अगाध था। ईशानने अज्ञानतापसे सन्तप्त प्राणियोंके प्राणोंकी एकमात्र रक्षा करनेवाले उस जलसे सहस्र धारवाले कलशोंद्वारा सहस्र बार विश्वनाथजीको स्नान कराया। तदनन्तर विश्वात्मा भगवान् शिव प्रसन्न होकर इस प्रकार बोले—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ईशान! मैं तुम्हारे इस महान् कर्मसे बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम कोई वर माँगो।’
ईशान बोले—देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ, तो यह अनुपम तीर्थ आपके नामसे प्रसिद्ध हो।
विश्वनाथजी बोले—त्रिलोकीमें जितने तीर्थ हैं, उन सबसे यह शिवतीर्थ परम श्रेष्ठ होगा। शिव ज्ञानको कहते हैं, वही ज्ञान मेरी महिमाके उदयसे इस कुण्डमें द्रवीभूत होकर प्रकट हुआ है। अतः यह तीर्थ तीनों लोकोंमें ज्ञानोद (ज्ञानवापी)-के नामसे प्रसिद्ध होगा। इसके जलके स्पर्शमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। ज्ञानोद तीर्थके स्पर्शसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। इसके जलके स्पर्श और आचमनसे राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंका फल मिलता है। फल्गुतीर्थ (गया)-में स्नान और पितरोंका तर्पण करके मनुष्य जिस फलको पाता है उसे यहाँ ज्ञानवापीके समीप श्राद्ध करनेसे प्राप्त कर लेता है। जिस दिन गुरुवार, पुष्य नक्षत्र, कृष्णपक्षकी अष्टमी और व्यतीपातका योग हो, उस समय यहाँ श्राद्ध करनेसे गयाकी अपेक्षा कोटिगुना अधिक फल होता है। पुष्करतीर्थमें पितरोंका तर्पण करके मनुष्य जिस फलको पाता है, ज्ञानवापीतीर्थमें तिल और जलके द्वारा तर्पण करनेसे उससे कोटिगुना अधिक फल मिलता है। विशेषतः सोमवारको ईशानतीर्थमें स्नान करके जो देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण कर अपनी शक्तिके अनुसार दान देता है; फिर विशेष पूजन-सामग्री जुटाकर मेरे श्रीलिंगकी विस्तारपूर्वक पूजा करके वहाँ भी यथाशक्ति दान
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करता है वह मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। ज्ञानवापी तीर्थके समीप सन्ध्योपासना करके द्विज काल-लोकजनित पापका क्षणभरमें नाश कर देता है और ज्ञानवान् हो जाता है। यही शिवतीर्थ कहा गया है और इसीको मंगलमय ज्ञानतीर्थ, तारकतीर्थ और मोक्षतीर्थ भी कहते हैं। ज्ञानोदतीर्थके स्मरण करनेमात्रसे भी पापराशिका निश्चय ही नाश हो जाता है और उसके दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपानसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति होती है। जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष ज्ञानवापीके जलसे मेरे श्रीलिंगको स्नान कराता है, उसे सब तीर्थोंके जलसे स्नान करानेका फल प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।
इस प्रकार वरदान देकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये और उन त्रिशूलधारी ईशानने अपनेको कृतार्थ माना। अगस्त्यजी ! प्राचीन कालकी बात है। काशीमें हरिस्वामीके नामसे विख्यात एक ब्राह्मण रहते थे। उनके एक कन्या थी, जो इस पृथ्वीपर अनुपम सुन्दरी थी। शील और सदाचारमें भी वह इस भूतलपर सबसे श्रेष्ठ थी। सम्पूर्ण कलाओंमें उस कन्याने निपुणता प्राप्त कर ली थी। ज्ञानोदतीर्थकी सेवासे वह सुशीला कुमारी सम्पूर्ण जगत्को बाहर और भीतरसे शिवमय देखती थी। एक दिन जब वह अपने घरके आँगनमें सोयी हुई थी, उसके रूप-वैभवसे मोहित होकर किसी विद्याधरने उसे हर लिया। वह रातमें आकाशमार्गसे उस कन्याको लेकर मलय पर्वतपर जाना चाहता था। इतनेमें ही भयानक आकारवाला विद्युन्माली राक्षस वहाँ आ गया और इस प्रकार बोला—'विद्याधरकुमार ! अब तू मेरी दृष्टिके समक्ष आ गया। आज इस मानवकन्याके साथ तुझे यमलोक भेजे देता हूँ।' ऐसा कहकर राक्षसने विद्याधरको त्रिशूलसे मारा। विद्याधरकुमार भी बड़ा बलवान् था। उसने वज्रपातके समान मुक्केसे उस राक्षसको मारा। उसके मुष्टिकाघातसे चूर-चूर होकर वह राक्षस पृथ्वीपर गिर पड़ा। इधर त्रिशूलसे घायल हुआ विद्याधर भी उस संग्राममें प्राण त्यागकर वीरगतिको प्राप्त हुआ। सुशीलाने उस विद्याधरको ही पति मानकर शोकाग्निसे सन्तप्त हो अपने शरीरको भस्म कर दिया। विद्याधरकुमारने मृत्युकालमें अपनी प्रियतमाका स्मरण करते हुए ही प्राणोंका त्याग किया था, अतः राजा मलयकेतुके यहाँ उसने नूतन जन्म ग्रहण किया। उधर सुशीला भी विद्याधरकुमारका स्मरण करती हुई प्राण त्यागकर 'कर्नाटक' में उत्पन्न हुई। उसके पिताने अपनी उस कन्या कलावतीको समयानुसार मलयकेतुके पुत्रके साथ ब्याह दिया। पूर्वजन्मकी वासनासे वह सती इस जन्ममें भी शिवमूर्तिकी पूजामें तत्पर हुई। मलयकेतुके पुत्रका नाम माल्यकेतु था। उसे पतिरूपमें पाकर पतिव्रता कलावती दिव्य भोग एवं वैभवकी अधिकारिणी हुई। उसने तीन सन्तानोंको जन्म दिया। एक दिन कोई उत्तरभारतका चित्रकार राजा माल्यकेतुके यहाँ गया। उसने राजाको एक विचित्र चित्रपट दिखाया। वह चित्रपट लेकर राजाने उसे कलावतीको दे दिया। उस चित्रपटको देखते ही कलावतीके शरीरमें रोमांच हो आया। वह एकान्त स्थानमें बैठकर अपने प्राणाराध्य देवता भगवान् विश्वनाथको बार-बार देखती हुई अपनी सुध-बुध भूल गयी। थोड़ी देरमें सावधान होकर उसने देखा कि इस चित्रपटमें लोलार्ककुण्डके समीप उससे और आगे परम सुन्दर असी और गंगाका संगम है और उत्तरमें भगवान् केशवके चरणोंके समीप यह 'वरणा' नामवाली श्रेष्ठ नदी बहती है। इधर ये उत्तरवाहिनी गंगा हैं, जिनमें स्नान करनेके लिये स्वर्गवासी देवता भी सदा लालायित रहते हैं। यह परम शोभायमान मणिकर्णिका तीर्थ है जो साधुपुरुषोंके मोक्षका साधन है। जहाँ मृत्यु होना मंगल माना गया है, जहाँ जीना सफल होता है और जहाँ स्वर्ग तिनकेके समान समझा जाता है, वही यह श्रीमणिकर्णिका तीर्थ है। यही वह कुलस्तम्भ है जहाँ भगवान् श्रीकालभैरव इस तीर्थमें पाप करनेवाले प्राणियोंको तीव्र यातनाका अनुभव कराते हुए दण्ड देते हैं। यह पवित्र कपालमोचन तीर्थ है जहाँ भैरवके हाथसे कपाल गिरा था। यह