संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 820, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| * काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७९१ |
|---|
प्रति अनुराग रखनेवाली, ८४३ रम्या—रमणीया, ८४४ रत्नगर्भा—अपने भीतर रत्न धारण करनेवाली ८४५ रमा—लक्ष्मीरूपा, ८४६ रतिः—अनुरागरूपा।^१
८४७ रत्नाकरप्रेमपात्रम्—रत्नाकर—समुद्रकी प्रीतिपात्र, ८४८ रसज्ञा—रसको जाननेवाली, ८४९ रसरूपिणी—रसरस्वरूपा, ८५० रत्नप्रासादगर्भा—जिसके भीतर रत्नमय देवालय शोभा पा रहे हैं, ऐसी, ८५१ रमणीयतरङ्गिणी—रमणीय लहरोंसे युक्त।^२
८५२ रत्नार्चिः—रत्नोंके समान कान्तिमती, ८५३ रुद्ररमणी—भगवान् रुद्रकी जटामें रमण करनेवाली, ८५४ रागद्वेषविनाशिनी—राग और द्वेषका नाश करनेवाली, ८५५ रमा—नेत्र और मनको रमानेवाली, ८५६ रामा—मनोहर स्त्री अथवा योगियोंके मनको रमानेवाली, ८५७ रम्यरूपी—रमणीय रूपवाली, ८५८ रोगिजीवानुरूपिणी—संसार-रोगसे ग्रस्त पुरुषोंके लिये संजीवन ओषधिरूपा।^३
८५९ रुचिकृत्—प्रकाश करनेवाली, ८६० रोचनी—अपने दर्शनकी रुचि उत्पन्न करनेवाली, ८६१ रम्या—रमाकी हितकारिणी, ८६२ रुचिरा—मनोहर रूपवाली, ८६३ रोगहारिणी—संसाररूपी रोगका नाश करनेवाली, ८६४ राजहंसा—शोभायमान हंसोंसे युक्त, ८६५ रत्नवती—अनेक प्रकारके रत्नोंसे संयुक्त, ८६६ राजत्कल्लोलराजिका—शोभाशाली तरंग-मालाओंसे युक्त।^४
८६७ रामणीयकरेखा—जिसकी जलधारा रमणीयताकी रेखा है, वह, ८६८ रुजारिः—रोगोंकी शत्रुभूता, ८६९ रोगरोषिणी—रोगोंपर रोष प्रकट करनेवाली, ८७० राका—पूर्णमासीस्वरूपा, ८७१ रङ्कार्तिशमनी—दीन-दुःखियोंकी दैन्य वेदना शान्त करनेवाली, ८७२ रम्या—रमणीया, ८७३ रोलम्बराविणी—भ्रमरोंके गुंजारके समान जलकी कलकल ध्वनि करनेवाली।^५
८७४ रागिणी—भगवान्के प्रति अनुराग रखनेवाली, ८७५ रञ्जितशिवा—अपनी सन्निधिसे भगवान् शिवको प्रसन्न करनेवाली, ८७६ रूपलावण्यशेवधिः—सौन्दर्य और कान्तिकी निधि, ८७७ लोकप्रसूः—लोकमाता, ८७८ लोकवन्द्या—सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीया, ८७९ लोलत्कल्लोलमालिनी—चंचल लहरोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित।^६
८८० लीलावती—सृष्टिकी उत्पत्ति, पालन और संहारकी लीला करनेवाली, ८८१ लोकभूमिः—सम्पूर्ण भुवनोंकी आधार, ८८२ लोकलोचनचन्द्रिका—लोगोंके नेत्रोंमें चाँदनीकी भाँति आह्लाद उत्पन्न करनेवाली, ८८३ लेखस्रवन्ती—देवनदी, ८८४ लटभा—भगवत्प्रेमके लिये लोलुप-सी प्रतीत होनेवाली, ८८५ लघुवेगा—शीतकालमें लघुवेगवाली, ८८६ लघुत्वहृत्—भक्तोंकी लघुता दूर करनेवाली।^७
८८७ लास्यतरङ्गहस्ता—नृत्य-सा करती हुई चंचल लहरें जिसके लिये मानो हाथ हैं, वह, ८८८ ललिता—मनोहर रूपवाली, ८८९ लयभङ्गिमा—लय—नृत्य, गति और वाद्यकी समताकी भंगी (अंदाज)-से चलनेवाली, ८९० लोकबन्धुः—सम्पूर्ण जगत्का बन्धुकी भाँति हित चाहनेवाली, ८९१ लोकधात्री—माताकी भाँति विश्वका पालन-पोषण करनेवाली, ८९२ लोकोत्तरगुणोर्जिता—अलौकिक गुणोंसे बढ़ी-चढ़ी।^८
१. यामिनीशहिमाच्छोदा युगधर्मविवर्जिता। रेवती रतिकृद् रम्या रत्नगर्भा रमा रतिः॥
२. रत्नाकरप्रेमपात्रं रसज्ञा रसरूपिणी। रत्नप्रासादगर्भा च रमणीयतरङ्गिणी॥
३. रत्नार्ची रुद्ररमणी रागद्वेषविनाशिनी। रमा रामा रम्यरूपी रोगिजीवानुरूपिणी॥
४. रुचिकृद् रोचनी रम्या रुचिरा रोगहारिणी। राजहंसा रत्नवती राजत्कल्लोलराजिका॥
५. रामणीयकरेखा च रुजारि रोगरोषिणी। राका रङ्कार्तिशमनी रम्या रोलम्बराविणी॥
६. रागिणी रञ्जितशिवा रूपलावण्यशेवधिः। लोकप्रसूर्लोकवन्द्या लोलत्कल्लोलमालिनी॥
७. लीलावती लोकभूमिर्लोकलोचनचन्द्रिका। लेखस्रवन्ती लटभा लघुवेगा लघुत्वहृत्॥
८. लास्यतरङ्गहस्ता च ललिता लयभङ्गिमा। लोकबन्धुर्लोकधात्री लोकोत्तरगुणोर्जिता॥