संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ७२. वेंकटाचलपर राजा शंख और महर्षि अगस्त्य आदिको भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन तथा वरप्राप्ति .. | ३१५ | ८९. समुद्रमें स्नानकी विधि और भगवद्विग्रहोंका वर्णन.. | ३६८ |
| ७३. आकाशगंगातीर्थमें अंजनाकी तपस्या और उसे वायुदेवद्वारा वरदानकी प्राप्ति ..................... | ३१८ | ९०. इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नान, नृसिंहजीका दर्शन-पूजन तथा भगवद्विग्रहोंके ज्येष्ठ-स्नानका वर्णन ..... | ३७१ |
| ( उत्कलखण्ड या पुरुषोत्तमक्षेत्र-माहात्म्य ) | ९१. श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा, गुण्डिचा-महोत्सव तथा पुनः मन्दिरप्रवेश सम्बन्धी यात्रा एवं उत्सवकी महिमा ........................................ | ३७३ | |
| ७४. भगवान् विष्णुका ब्रह्माजीको पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जानेका आदेश.................................................... | ३२० | ९२. पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चातुर्मास्यकी महिमा, राजा श्वेतपर भगवत्कृपा तथा भगवत्प्रसादका माहात्म्य ..... | ३७६ |
| ७५. यमराज तथा मार्कण्डेयजीके द्वारा भगवान्की स्तुति और पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा ............. | ३२२ | ९३. भगवान् पुरुषोत्तमके पार्श्व-परिवर्तन, उत्थापन और प्रावरण आदि उत्सवोंका महत्त्व ................... | ३८१ |
| ७६. पुरुषोत्तमक्षेत्रके विभिन्न तीर्थों और देवताओंका परिचय, तीर्थ और भगवान्की महिमा तथा पापपरायण पुण्डरीक और अम्बरीषका उस क्षेत्रमें आना ... | ३२६ | ९४. पुष्यस्नानोत्सव, उत्तरायणोत्सव तथा दोलारोहण-उत्सवका वर्णन .......................................... | ३८३ |
| ७७. पुण्डरीक और अम्बरीषद्वारा भगवान्की स्तुति तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रमें रहकर भजन करनेसे उनकी मुक्तिका वर्णन .......................................... | ३२८ | ९५. भगवान्की द्वादशादित्य मूर्तियोंकी उपासना, दक्षके द्वारा भगवान्की आराधना और वर-प्राप्ति तथा विभिन्न विभूतियोंके रूपमें भगवान्की उपासनाका फल ........................................ | ३८७ |
| ७८. उत्कलदेशके भव्य रूपका परिचय, राजा इन्द्रद्युम्नका एक तीर्थयात्रीसे पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा सुनकर पुरोहितके भाईको वहाँ भेजना और उनका नीलाचलके समीप शबरसे वार्तालाप ......................... | ३३१ | ९६. राजा इन्द्रद्युम्नका ब्रह्मलोकगमन, पुराण-श्रवणकी विधि और ग्रन्थका उपसंहार ...................... | ३८९ |
| ७९. विद्यापतिका शबरके साथ नीलमाधवका दर्शन करके तीर्थकी परिक्रमा करना और अवन्तीमें जाकर राजा इन्द्रद्युम्नको सब समाचार सुनाना ..... | ३३५ | ( बदरिकाश्रम-माहात्म्य ) | |
| ८०. भगवान् जगन्नाथके नीलमणिमय विग्रहका वर्णन, इन्द्रद्युम्नके पास नारदजीका आगमन और भक्ति एवं भक्तके स्वरूपका विवेचन .................... | ३३९ | ९७. सब तीर्थोंका संक्षिप्त माहात्म्य तथा बदरीक्षेत्रकी विस्तृत महिमाका उपक्रम .......................... | ३९२ |
| ८१. राजा इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रको प्रस्थान और महानदीके तटपर विश्राम............................ | ३४४ | ९८. बदरीक्षेत्रकी महिमा—अग्निदेवके सर्वभक्षणरूप दोषका निवारण ....................................... | ३९३ |
| ८२. राजाका एकाग्रक्षेत्र (भुवनेश्वर)-में जाकर भगवान् शिवका पूजन करना और भगवान् शिवका नारदजीसे उनके कर्तव्यकार्योंका संकेत करना .............. | ३४७ | ९९. बदरीक्षेत्रकी पाँच शिलाओंमेंसे नारदशिला और मार्कण्डेयशिलाका माहात्म्य ................. | ३९५ |
| ८३. राजा इन्द्रद्युम्नका नारदजीके साथ नृसिंहजी, कल्पवट तथा नीलमाधवके स्थानका दर्शन करना और आकाशवाणी सुनना .................................... | ३४९ | १००. गरुड़शिला, वाराहीशिला और नारसिंही-शिलाकी उत्पत्ति और महिमा ....................... | ३९७ |
| ८४. देवर्षि नारदजीके द्वारा भगवान् नृसिंहकी स्थापना और राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा उनका स्तवन ....... | ३५१ | १०१. बदरीक्षेत्र और वहाँ भगवान्के प्रसाद-ग्रहणकी विशेष महिमा .......................................... | ४०० |
| ८५. इन्द्रद्युम्नके द्वारा सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान और ध्यानमें भगवान्का दर्शन ...................... | ३५३ | १०२. कपालतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ और वसुधारातीर्थकी महिमा... | ४०१ |
| ८६. अश्वमेधकी पूर्ति, आकाशवाणी, भगवान्की काष्ठमयी प्रतिमाका निर्माण, संस्कार तथा स्तवन ........ | ३५६ | १०३. पंचतीर्थ, सोमतीर्थ, द्वादशादित्यतीर्थ, चतुःस्रोततीर्थ, सत्यपदतीर्थ तथा नर-नारायणाश्रमकी महिमा | ४०४ |
| ८७. देवताओं तथा ब्रह्माजीके द्वारा भगवद्विग्रहोंका स्तवन और उनकी स्थापना ....................... | ३५९ | १०४. मेरुतीर्थ, लोकपालतीर्थ, दण्डपुष्करिणी, गंगासंगम तथा धर्मक्षेत्र आदिका माहात्म्य और ग्रन्थका उपसंहार ................................................. | ४०५ |
| ८८. ब्रह्माजीके द्वारा भगवत्स्वरूपकी एकताका प्रतिपादन तथा भगवान्का राजा इन्द्रद्युम्नको अपनी सेवाका आदेश देना ............................................. | ३६६ | ( कार्तिकमास-माहात्म्य ) | |
| १०५. कार्तिकमासकी श्रेष्ठता तथा उसमें करनेयोग्य स्नान, दान, भगवत्पूजन आदि धर्मोंका महत्त्व .. | ४०८ | ||
| १०६. विभिन्न देवताओंके सन्तोषके लिये कार्तिकस्नानकी विधि तथा स्नानके लिये श्रेष्ठ तीर्थोंका वर्णन ... | ४१० | ||
| १०७. कार्तिकव्रत करनेवाले मनुष्यके लिये पालनीय नियम .................................................... | ४१३ | ||
| १०८. कार्तिकव्रतसे एक पतित ब्राह्मणीका उद्धार तथा दीपदान एवं आकाशदीपकी महिमा ............. | ४१६ |