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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

७४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गर्भमें चलने-फिरनेसे पहले ही सम्पन्न किया गया। तदनन्तर आठवें मासमें सीमन्तोन्नयन संस्कार किया, जो गर्भस्थ बालकके अवयवोंको पुष्ट करनेवाला है। उसके बाद सुखपूर्वक पुत्रका जन्म हो जाय, इसके लिये भी विद्वान् ब्राह्मणने सोष्यन्ती नामक वैदिक कर्म सम्पन्न किया। यह सब होनेके पश्चात् शुभ ग्रह एवं नक्षत्रोंके योगमें शुचिष्मतीके गर्भसे एक चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाला पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब प्रकारके अरिष्टोंका नाश करनेवाला था। वह अपने अंगोंकी प्रभासे सूतिकागृहको प्रकाशित कर रहा था। स्वयं ब्रह्माजीने आकर उस बालकका जातकर्म-संस्कार किया और यह बताया कि इस बालकका नाम गृहपति होगा। विष्णु और महादेवजीके साथ बालकके लिये उचित रक्षा-विधान करके सबके प्रपितामह ब्रह्माजी हंसपर आरूढ़ हो चले गये। चौथे महीनेमें बालकका घरसे बाहर निष्क्रमण हुआ। छठे महीनेमें उसका अन्नप्राशन-संस्कार किया गया और वर्ष पूरा होनेपर चूड़ाकरण। तदनन्तर श्रवण नक्षत्रमें कर्णवेध संस्कार करके ब्रह्मतेजकी वृद्धिके लिये पाँचवें वर्षमें उपनयन-संस्कारपूर्वक उसे यज्ञोपवीत दे दिया गया। उसके बाद श्रावणीमें उपाकर्म करके विद्वान् विश्वानरने उसे वेद पढ़ाना प्रारम्भ किया। तीन ही वर्षमें उस बालकने अंग, पद और क्रमके साथ विधिपूर्वक सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर लिया। विनय आदि सद्गुणोंको प्रकट करनेवाले उस शक्तिमान् विप्रकुमारने गुरुमुखको साक्षीमात्र बनाकर समस्त विद्याएँ ग्रहण कर लीं।

तदनन्तर नवें वर्षमें विश्वानरकुमार गृहपति जब माता-पिताकी सेवामें संलग्न था, उस समय इच्छानुसार विचरनेवाले देवर्षि नारदजी विश्वानरकी पर्णशालामें आये और उस बालकको देखकर अर्घ्य और आसन ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने वहाँका कुशल-समाचार पूछा—'महाभाग विश्वानर और उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवी शुचिष्मती! यह बालक गृहपति तुम दोनोंकी आज्ञाका पालन तो करता है न? क्योंकि पुत्रके लिये पिता-माताके आज्ञापालनको छोड़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है, दूसरा कोई तीर्थ नहीं है तथा दूसरा कोई देवता, गुरु और सत्कर्म नहीं है। त्रिलोकीमें पुत्रके लिये माता-पितासे बढ़कर कोई वस्तु नहीं है। गर्भमें धारण और बाल्यावस्थामें पोषण करनेके कारण माताका गौरव पितासे भी बढ़कर है। समस्त कर्मोंका संन्यास (त्याग) करनेवाले संन्यासीके द्वारा भी पिता वन्दनीय है। उस सर्ववन्द्य संन्यासीको भी प्रयत्नपूर्वक अपनी माताके चरणोंकी वन्दना करनी चाहिये। यही अत्यन्त उग्र तपस्या है, यही सबसे श्रेष्ठ व्रत है और यही सर्वोत्तम धर्म है कि पिता-माताको सन्तुष्ट किया जाय *। विश्वानरकुमार! मेरे पास आओ मेरी गोदमें बैठो और अपना दाहिना हाथ दिखाओ। तुम्हारे लक्षण कैसे हैं, यह मैं देखूँगा।'

देवर्षि नारदके ऐसा कहनेपर बालक गृहपति पिता-माताकी आज्ञा ले नारदजीको प्रणाम करके भक्तिसे विनीत हो उनके समीप आ बैठा। उसे अच्छी तरह देखनेके बाद नारदजीने कहा—'विप्रवर! तुम्हारा यह पुत्र समूची पृथ्वीका पालन करनेवाला होगा और दिक्पाल पदवी धारण करेगा। इसके पास महान् ऐश्वर्य होगा। इसमें राजा होनेके लक्षण हैं। यह अत्यन्त सुलक्षण बालक है; किंतु सर्वगुणसम्पन्न, समस्त शुभ लक्षणोंसे लक्षित तथा सम्पूर्ण निर्मल कलाओंसे युक्त होनेपर भी इसे दुर्दैव चन्द्रमाकी भाँति नीचे गिरा सकता है। अतः पूर्ण प्रयत्न करके तुम्हें अपने इस शिशुकी रक्षा करनी चाहिये। बारहवें वर्षकी अवस्थामें इसको बिजलीकी अग्निसे भय है।' ऐसा कहकर बुद्धिमान् नारदजी जैसे आये थे, वैसे


* संन्यस्ताखिलकर्मापि पितुर्वन्द्यो हि मस्करी। सर्ववन्द्येन यतिना प्रसूर्वन्द्या प्रयत्नतः॥
इदमेव तपोऽत्युग्रमिदमेव परं व्रतम्। अयमेव परो धर्मो यत्पित्रोः परितोषणम्॥
(स्क० पु०, का० पू० ११। ५०-५१)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७४१

ही लौट गये। नारदजीके चले जानेपर माता-पिताको शोकसे घिरा हुआ देख गृहपतिने मुसकराते हुए कहा—'माता और पिताजी! आपलोगोंको इतना भय क्यों हो रहा है? आप दोनोंके चरणोंकी धूलिसे मेरे शरीरकी रक्षा हो रही है। मुझे काल भी अपना ग्रास नहीं बना सकता, फिर बेचारी बिजली तो बहुत छोटी वस्तु है। आप दोनों मेरी प्रतिज्ञा सुनें। यदि मैं आप दोनोंका पुत्र हूँ तो ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे बिजली स्वयं मुझसे भयभीत होगी। जो साधु-महात्माओंको सब कुछ देनेवाले और सर्वज्ञ हैं, कालके भी काल, कालकूट विषका भक्षण करनेवाले महाकाल हैं, उन भगवान् मृत्युंजयकी आराधना करके मैं निर्भय हो जाऊँगा।' पुत्रकी यह बात सुनकर बूढ़े ब्राह्मण-दम्पति इस प्रकार बोले—'बेटा! तुम भगवान् शिवकी शरणमें जाओ। इससे बढ़कर हितकी दूसरी कोई बात नहीं हो सकती। भगवान् शिव आशातीत फलको देनेवाले और कालका भी संहार करनेवाले हैं। जिसने तीनों लोकोंकी सम्पत्तिका अपहरण कर लिया था, उस महाभिमानी जालन्धरको जिन्होंने अपने चरणोंके अंगुष्ठकी रेखासे प्रकट हुए चक्रके द्वारा मार डाला था, जो ब्रह्मा आदि देवताओंके एकमात्र उत्पादक हैं और अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते, उन सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाके लिये चिन्तामणिस্বরূপ भगवान् शिवकी शरणमें जाओ।'

माता-पिताकी ऐसी आज्ञा पाकर बालक गृहपति उनके चरणोंमें प्रणाम करके काशीमें गया। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उसने तीनों लोकोंके प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले भगवान् विश्वनाथका दर्शन एवं उन्हें प्रणाम किया। विश्वनाथजीका दर्शन करके गृहपतिके हृदयमें बड़ा सन्तोष हुआ। उसने मन-ही-मन कहा—'यह दिव्य शिवस्वरूप वास्तवमें परमानन्दकन्द है। इस मोक्षदायक मूर्तिमें सम्पूर्ण विश्वका और विश्वके बीजभूत कर्मोंका लय होता है, इसलिये यह 'विश्वनाथ' है। मेरे भाग्यका उदय हुआ था, इसीलिये महर्षि नारदने उस दिन आकर वैसी बात कही थी। इसीसे आज मैं विश्वनाथजीका दर्शन करके कृतकृत्य हो रहा हूँ।' इस प्रकार आनन्द-सुधारससे पारण-सा करके गृहपतिने अत्यन्त कठोर नियम ग्रहण किये। वह प्रतिदिन गंगाके अमृतमय जलसे भरे हुए एक सौ आठ कलशोंके वस्त्रद्वारा छाने हुए जलसे भगवान् शिवको स्नान कराता और उन्हें नीलकमलकी माला समर्पित करता था। वह माला एक हजार आठ पुष्पोंकी बनी हुई होती थी। गृहपति पंद्रह-पंद्रह दिनपर कन्द-मूल-फल भोजन करता था। इस तरह उसने छः मास व्यतीत किये। फिर छः महीनोंतक उसने एक-एक पक्षपर सूखे पत्ते चबाये। छः महीनोंतक उसने जलकी एक-एक बूँदका ही आहार किया और छः महीनोंतक केवल वायुभक्षण किया। इस प्रकार तपस्या करते हुए उस बालकके दो वर्ष व्यतीत हो गये। जन्मसे बारहवें वर्षमें वज्रधारी इन्द्र उसके समीप आये और बोले—'तुम कोई मनोवांछित वर माँगो, मैं उसे दूँगा।'

बालक बोला— इन्द्र! मैं आपको जानता हूँ, किंतु आपसे वर नहीं माँगूँगा। मुझे वर देनेवाले तो भगवान् शंकर हैं।

इन्द्रने कहा— बालक! मैं देवताओंका भी देवता हूँ। मुझसे भिन्न दूसरा कोई कल्याणकारी शंकर नहीं है। तुम मूर्खता छोड़कर मुझसे वर माँगो।

ब्राह्मणबालक बोला— पाकशासन! मैं भगवान् शिवके अतिरिक्त दूसरे किसी देवतासे याचना नहीं कर सकता।

उसकी यह बात सुनकर इन्द्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने भयानक वज्र उठाकर उस बालकको भयभीत किया। विद्युत्की सैकड़ों ज्वालाओंसे व्याप्त वज्रको देखकर ब्राह्मणबालकको देवर्षि नारदके वचनका स्मरण हो आया और वह भयसे व्याकुल होकर मूर्च्छित हो गया। इसी समय अज्ञानान्धकारको दूर करनेवाले गौरीपति भगवान् शंकर वहाँ प्रकट हो गये और अपने स्पर्शसे उस बालकमें नवजीवनका संचार-सा करते हुए बोले—'वत्स! तुम्हारा कल्याण हो, उठो, उठो।' उसने रातमें सोये हुएकी भाँति बंद नेत्रकमलोंको

७४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

खोलकर और उठकर देखा, आगे भगवान् शिव विराजमान हैं। उनका तेज सैकड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रकाशमान है, मस्तकपर जटाजूट उनकी शोभा बढ़ा रहा है, त्रिशूल और आजगव धनुष (पिनाक) ये दोनों आयुध उनके हाथोंमें सुशोभित हैं। कर्पूरके समान गौर अंग उद्भासित हो रहा है। गुरुजनों और शास्त्रके वचनसे उक्त लक्षणोंद्वारा महादेवजीको पहचानकर गृहपतिके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। वह एक क्षणतक ठगा हुआ-सा खड़ा रहा। स्तुति, नमस्कार अथवा कुछ निवेदन करनेमें भी समर्थ न हुआ। तब भगवान् शंकर मुसकराते हुए बोले—'वत्स गृहपते! तुम भयभीत न होओ। इन्द्रवज्र अथवा काल भी मेरे भक्तका अनिष्ट करनेमें समर्थ नहीं है। मैंने ही इन्द्रका रूप धरकर तुम्हें डराया था। भद्र! मैं तुम्हें वर देता हूँ, तुम अग्निपदवीके भागी बनो। तुम सम्पूर्ण देवताओंके मुख होओगे। अग्ने! तुम समस्त प्राणियोंके भीतर विचरण करो। इन्द्र (पूर्व) और धर्मराज (दक्षिण)-के मध्यमें तुम दिक्पाल बनकर रहो और अपना राज्य ग्रहण करो। तुमने जो यह शिवजीकी मूर्ति स्थापित की है, तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। अग्नीश्वर नामसे विख्यात यह सब तेजोंको बढ़ानेवाली होगी। सब समृद्धियोंको देनेवाले अग्नीश्वरकी पूजा करके दैववश काशीसे अन्यत्र मरनेवाला पुरुष भी अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होगा।' ऐसा कहकर गृहपति अग्निको दिक्पाल पदपर अभिषिक्त करके भगवान् शंकर उसी शिवमूर्तिमें समा गये।


नैर्ऋत्यलोक तथा वरुणलोकका वर्णन

शिवशर्मा बोले— नारायणस्वरूप भगवत्पार्षदो! अब आपलोग नैर्ऋत्य आदि लोकोंका क्रमशः वर्णन करें।

दोनों भगवत्पार्षदोंने कहा— महाभाग! संयमनीपुरीसे आगे जो निर्ऋति नामक दिक्पालकी पुण्यमयी पुरी है, उसका वर्णन सुनो। उसमें पुण्यजन निवास करते हैं। यद्यपि इसमें राक्षसोंका ही वास है, तथापि वे राक्षस कभी भी दूसरोंसे द्रोह नहीं रखते। वे जातिमात्रसे राक्षस हैं, आचार-व्यवहारसे तो ये पुण्यजन हैं—पुण्यात्मा पुरुष हैं। ये सदा तीर्थ-स्नानपरायण हो प्रतिदिन देवपूजामें तत्पर रहते हैं। अपने नाम-गोत्रका उच्चारण करके ब्राह्मणोंको प्रणाम करते हैं। दम (मनोनिग्रह), दान, दया, क्षमा, शौच, इन्द्रियनिग्रह, अस्तेय (चोरी न करना), सत्य और अहिंसा—ये सभी प्राणियोंके लिये धर्ममें सहायक हैं। जो मनुष्य जहाँ कहीं भी जन्म लेकर सदा आवश्यक कार्योंके लिये उद्यमशील बने रहते हैं, वे सब प्रकारकी भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न हो इस नैर्ऋत्यलोकमें निवास करते हैं। काशी छोड़कर अन्य उत्तम तीर्थोंमें मरे हुए म्लेच्छकोटिके लोग यदि आत्मघाती न हों तो वे इस लोकमें भोगसम्पन्न होकर निवास करते हैं। जो कोई अन्त्यज भी दयाधर्मका अनुसरण करनेवाले और परोपकारपरायण

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७४३

होते हैं, वे इस लोकमें श्रेष्ठतम होकर निवास करते हैं।

पूर्वकालमें विन्ध्याचलके जंगलोंमें पिंगाक्ष नामसे प्रसिद्ध एक भील रहता था, जो भीलोंका सरदार था। निर्विन्ध्या नदीके तटपर उसका घर था। वह शूरवीर होनेके साथ ही क्रूरकर्मोंसे विमुख था। पथिकोंपर डाका डालनेवाले लुटेरोंको वह दूर रहकर भी मरवा डालता था और व्याघ्र आदि दुष्ट एवं हिंसक जीवोंको प्रयत्नपूर्वक मारता था। यद्यपि व्याधोंके आचार-व्यवहारसे ही उसकी जीविका चलती थी तथापि उस दशामें भी वह जीवोंके प्रति बड़ा दयालु था। वह थके-माँदे बटोहियोंको विश्राम देता, भूखोंको भोजन देकर उनकी भूख मिटाता और नंगे पाँववाले मनुष्योंको जूता देता था। जिनके पास वस्त्र नहीं होता, उन्हें कोमल मृगचर्म देता और दुर्गम मार्ग एवं निर्जन प्रान्तरमें वह पथिकोंके पीछे-पीछे जाकर उन्हें अभीष्ट स्थानपर पहुँचा आता था। उनके देनेपर भी उनसे कभी धन नहीं लेना चाहता और सबको अभयदान करता था। पिंगाक्षके रहनेसे विन्ध्याचलका वह भयानक वन नगर-सा हो गया था। उसके डरसे कोई भी राह चलनेवालोंकी रोक-टोक नहीं करता था।

पिंगाक्षके घरके समीप ही एक-दूसरे गाँवमें उसका चाचा निवास करता था। एक दिन उसने गेरुए वस्त्र धारण करनेवाले तीर्थयात्रियोंके समूहका बड़ा भारी कोलाहल सुना। उन यात्रियोंके पास बहुत धन था। वह नीच व्याध उस धनके लोभसे उन्हें मार डालनेको उद्यत हो गया और आगे जाकर बहुत छिपे हुए उसने उस मार्गको घेर लिया। उस समय पिंगाक्ष भी शिकार खेलनेके लिये उस जंगलमें गया था और रातमें उसी मार्गके समीप टिका हुआ था। यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् विश्वनाथसे सुरक्षित होकर कुशलपूर्वक रहता है। अतः विद्वान् पुरुष कभी किसी भी जीवका अनिष्टचिन्तन न करे। होगा वही जो विधाताने रच रखा है। बुरा चाहनेवालोंको केवल पाप ही हाथ लगेगा। इसलिये आत्मसुखकी इच्छा रखनेवाला पुरुष किसीका बुरा न सोचे। यदि कुछ सोचना ही हो तो मोक्षके उपायका चिन्तन करे और किसी बात का नहीं *।

तदनन्तर जब रात बीतने लगी और प्रातःकाल निकट आ गया, उस समय बड़ा भारी कोलाहल मचा। एक ओरसे आवाज आयी—‘योद्धाओ! सबको मार डालो, नीचे गिरा दो और नंगे करके तलाशी लो।’ दूसरी ओरसे करुणाभरी पुकार सुनायी पड़ी—‘सिपाहियो! मत मारो, रक्षा करो, हम तीर्थयात्री हैं। हमारे पास जो कुछ है, उसे बिना परिश्रमके लूट लो और ले जाओ। हम अनाथ बटोही हैं, भगवान् विश्वनाथके उपासक हैं और उन्हींसे सनाथ हैं। पिंगाक्षके विश्वाससे हम सदा इस मार्गपर निर्भय होकर आया-जाया करते हैं, किंतु आज वह भी यहाँसे बहुत दूर है।’

तीर्थयात्रियोंकी यह बात सुनकर पिंगाक्ष दूरसे ही ‘मत डरो, मत डरो’ की रट लगाता हुआ सहसा वहाँ आ पहुँचा और बोला—‘यह कौन दुराचारी है, जो मुझ पिंगाक्षके जीते-जी मेरे प्राणोंके समान प्यारे पथिकोंको लूटना चाहता है।’ उसका यह वचन सुनकर उसके पापी पितृव्य ताराक्षने क्रोधपूर्वक अपने सेवकोंको आज्ञा दी—‘पहले इसीको मार डालो, उसके बाद इन साधु यात्रियोंको लूटना।’ यह सुनकर वे सभी दुराचारी भील मिलकर अकेले पिंगाक्षके साथ युद्ध करने लगे। किसी-किसी तरह उन सबका सामना करता हुआ पिंगाक्ष यात्रियोंको अपने घरके समीपतक ले गया। इसी बीचमें विरोधियोंके बाणोंसे उसके धनुष-बाण और कवच सभी कट गये। वे यात्री भी निर्भय होकर उसकी बस्तीमें पहुँच गये और उसने दूसरोंकी रक्षाके लिये लड़ते-लड़ते प्राण त्याग दिये। मरते समय उसके मनमें यह अभिलाषा थी कि यदि


* तस्मादात्मसुखं प्रेप्सुरनिष्टं न चिन्तयेत्। चिन्तयेच्चेतदा चिन्त्यो मोक्षोपायो न चेतरः॥ (स्क० पु०, का० पू० १२।३१)

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मैं समर्थ होता तो इन सबको मार गिराता। अन्तकालमें जैसी मति होती है, उसके अनुरूप ही गति होती है। अतः वह नैर्ऋत्यलोकमें राक्षसोंका राजा एवं दिक्पाल हुआ। इस प्रकार हम दोनोंने तुम्हें निर्ऋतिके स्वरूपका परिचय दिया है।

नैर्ऋत्यपुरीसे उत्तर दिशामें वह वरुणदेवका अद्भुत लोक है। जो लोग न्यायोपार्जित धनसे कुआँ-बावली और तालाब बनवाते हैं, वे वरुणलोकमें वरुणके ही समान कान्तिमान् होकर सम्मानपूर्वक निवास करते हैं। जो निर्जल प्रदेशमें जल देते, दूसरोंके सन्ताप दूर करते और याचकोंको विचित्र छाता एवं कमण्डलु देते हैं, जो नाना प्रकारकी खान-पानकी सामग्रियोंसे युक्त पौंसला बनवाते, सुगन्धित जलसे भरे हुए धर्मघट दान करते, जो पीपलके वृक्षको सींचते और मार्गमें वृक्ष लगाते हैं, यात्रियोंके ठहरनेके लिये धर्मशालाएँ बनवाते, थके-माँदे पथिकोंका कष्ट दूर करते, गरमीमें मोरपंख आदिके बने हुए पंखे बाँटते और यात्रियोंका पसीना दूर करते हैं तथा जो पुण्यात्मा मानव दुराचारी मनुष्योंद्वारा गलेमें फाँसी लगाये हुए जीवोंको बन्धनसे मुक्त करते हैं, वे निर्भय होकर वरुण देवताके इस लोकमें निवास करते हैं। ये वरुणदेव ही सम्पूर्ण जलाशयों तथा जलजन्तुओंके एकमात्र स्वामी और सब कर्मोंके साक्षी हैं। इस प्रकार यह वरुणलोकका स्वरूप बताया गया है। इस प्रसंगको सुनकर मनुष्य कहीं भी दुर्मृत्युके कष्टसे पीड़ित नहीं होता है।

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वायु, कुबेर, ईशान और चन्द्रमाके लोकोंकी स्थितिका वर्णन

भगवान्‌के दोनों पार्षद कहते हैं—ब्रह्मन्! वरुणकी पुरीसे उत्तर भागमें इस पुण्यमयी पुरीको देखो। यह वायुदेवकी गन्धवती नामवाली नगरी है। इसमें सम्पूर्ण जगत्‌के प्राणस्वरूप प्रभंजन (वायु) नामक दिक्पाल निवास करते हैं। इन्होंने महादेवजीकी आराधना करके दिक्पालका पद प्राप्त किया है। पहलेकी बात है। कश्यपजीके पुत्र पूतात्माने महादेवजीकी राजधानी काशीपुरीमें दस लाख वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उन्होंने वहाँ पवनेश्वर नामक परम पवित्र महान् शिवजीके स्वरूपकी स्थापना की, जिसके दर्शनमात्रसे मनुष्यका अन्तःकरण परम पवित्र हो जाता है और वह पापकी केंचुल त्यागकर वायुदेवके पवित्र नगरमें निवास करता है। तदनन्तर पूतात्माकी घोर तपस्यासे प्रसन्न हो तपका फल देनेवाले ज्योतिस्वरूप भगवान् महेश्वर उस मूर्तिसे प्रकट हुए और बोले—'सुव्रत! उठो, उठो। मनोवांछित वर माँगो।'

पूतात्मा बोला—देवाधिदेव महादेव! आप देवताओंको अभयदान देनेवाले हैं। प्रभो! वेद भी नेति-नेति कहते हुए आपके सम्बन्धमें यह नहीं जानते कि आपका स्वरूप कैसा है? फिर मेरे-जैसा मनुष्य आपकी स्तुति करनेमें कैसे समर्थ हो सकता है? योगी भी आपके तत्त्वको वास्तवमें नहीं उपलब्ध कर पाते। आप एक होकर भी शिव और शक्तिके भेदसे दो स्वरूपोंमें अभिव्यक्त हुए हैं। आप ज्ञानस्वरूप भगवान् हैं और आपकी इच्छा ही शक्तिस्वरूपा है। शिव और शक्तिरूप आप दोनोंके द्वारा लीलापूर्वक क्रियाशक्ति उत्पन्न की गयी है, जिसके द्वारा इस सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि की गयी है। आप ज्ञानशक्ति महेश्वर हैं और उमादेवी इच्छाशक्ति मानी गयी हैं। यह सम्पूर्ण जगत् क्रियाशक्तिमय है और आप इसके कारण हैं। नाथ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।

पूतात्माके ऐसा कहनेपर सर्वशक्तिमान् देवेश्वर शिवने उन्हें अपना स्वरूप प्रदान किया और दिक्पालके पदपर प्रतिष्ठित किया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा—'तुम सब तत्त्वोंके ज्ञाता और सबकी आयुरूप होओगे। जो मनुष्य तुम्हारे द्वारा स्थापित की हुई मेरी इस दिव्य मूर्तिकी यहाँ दर्शन करेंगे, वे तुम्हारे लोकमें सब भोगोंसे सम्पन्न हो सुखके भागी

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होंगे।' इस प्रकार वरदान देकर महादेवजी उस मूर्तिमें विलीन हो गये।

ब्रह्मन्! गन्धवतीपुरीके स्वरूपका निरूपण किया गया। उसके पूर्वभागमें शोभामयी कुबेरकी अलकापुरी है। इसके स्वामी कुबेर अपने भक्तिभावके प्रभावसे भगवान् शिवके सखा हो गये हैं। शिवकी पूजाके बलसे वे पद्म आदि नवनिधियोंके दाता और भोक्ता हैं।

अलकापुरीके पूर्वभागमें भगवान् शंकरकी ईशानपुरी है, जो महान् अभ्युदयसे सदा सुशोभित है। उसके भीतर भगवान् शंकरके तपस्वी भक्त निवास करते हैं। जो भगवान् शिवके चिन्तनमें संलग्न रहते, शिवसम्बन्धी व्रतोंका पालन करते, अपने समस्त कर्म भगवान् शिवको अर्पित कर देते और सदा शिवकी पूजामें तत्पर रहते तथा जो स्वर्गभोगकी अभिलाषा लेकर भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तप करते हैं, वे सब मानव रुद्ररूप धारण करके इस परम रमणीय रुद्रपुरीमें निवास करते हैं। इस पुरीमें अजैकपात् और अहिर्बुध्न्य आदि ग्यारह रुद्र अधिपत्तिरूपसे हाथमें त्रिशूल लिये विराजमान रहते हैं। ये देवद्रोहियोंसे आठ पुरियोंकी रक्षा करते और शिवभक्तोंको सदैव वर देते हैं। इन्होंने भी काशीपुरीमें जाकर शुभदायक ईशानेश्वरकी स्थापना करके बड़ी भारी तपस्या की है और भगवान् ईशानेश्वरके प्रसादसे ईशानकोणमें ये दिक्पाल हुए हैं। ये ग्यारहों रुद्र जटाके मुकुटसे मण्डित हो एक साथ चलते हैं।

इस प्रकार स्वर्गमार्गमें विष्णुसार्षदोंकी कही हुई कथा सुनते हुए शिवशर्माने आगे जाकर दिनमें भी चन्द्रमाकी चटकीली चाँदनी देखी, जो सब इन्द्रियोंके साथ-साथ मनको परम आह्लाद प्रदान करती थी। उसे देखकर शिवशर्माने पूछा— 'भगवत्पार्षदो! वह कौन-सा लोक है?'

दोनों पार्षदोंने कहा— महाभाग! यह चन्द्रमाका लोक है, जिसकी अमृतकी वर्षा करनेवाली किरणोंसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपुष्ट होता है। चन्द्रमाके पिता महर्षि अत्रि हैं, जो पूर्वकालमें प्रजासर्गकी इच्छा रखनेवाले ब्रह्माजीके मनसे प्रकट हुए थे। हमने सुना है, मुनिवर अत्रिने प्राचीन कालमें तीन हजार दिव्य वर्षोंतक लोकोत्तर तपस्या की है। उन्हींके पुत्र चन्द्रमा हैं। स्वयं ब्रह्माजीने उनका पालन-पोषण किया है। तेज प्राप्त करके भगवान् चन्द्रमाने बहुत वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। परम पावन अविमुक्त क्षेत्र (काशीधाम)-में जाकर अपने नामसे उन्होंने चन्द्रेश्वर नामक मूर्तिकी स्थापना की। इससे वे पिनाकधारी देवाधिदेव श्रीविश्वनाथजीकी कृपासे बीज, ओषधि, जल और ब्राह्मणोंके राजा हुए। वहाँ उन्होंने अमृतोद नामसे प्रसिद्ध कूपका निर्माण कराया, जिसके जलको पीने और जिसमें स्नान करनेसे मनुष्य अज्ञानसे मुक्त हो जाता है। देवदेव महादेवने प्रसन्न होकर जगत्को जीवन प्रदान करनेवाली चन्द्रमाकी एक उत्तम कलाको लेकर अपने मस्तकपर धारण किया। तत्पश्चात् दक्षके शापसे मासकी समाप्तिपर अमावास्या तिथिको क्षीण होनेपर भी केवल उसी कलाके द्वारा पुनः वे वृद्धि एवं पुष्टिको प्राप्त होते हैं।

जब सोमवारको अमावास्या तिथि हो, तब सज्जन पुरुषोंको आदरपूर्वक चतुर्दशी तिथिमें उपवास करना चाहिये। नित्यकर्म करके त्रयोदशी तिथिमें शनिप्रदोषयोगमें चन्द्रेश्वरलिंगका पूजन करके त्रयोदशीमें नक्त व्रत करे और उसीमें नियम ग्रहण करके चतुर्दशीको उपवास एवं रात्रि-जागरण करे। प्रातःकाल सोमवती अमावास्याके योगमें चन्द्रोदतीर्थके जलसे स्नान करे। तत्पश्चात् विधिपूर्वक सन्ध्योपासना करके तर्पण आदि कर्म करे। फिर चन्द्रोदतीर्थके समीप ही शास्त्रोक्त विधिके अनुसार श्राद्ध करे। आवाहन और अर्घ्यदान कर्मके बिना ही यत्नपूर्वक पिण्डदान दे। वसु, रुद्र और आदित्यस्वरूप पिता, पितामह और प्रपितामहको क्रमशः पिण्ड देकर मातामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामहके उद्देश्यसे पिण्ड दे। तदनन्तर अपने गोत्रमें उत्पन्न हुए अन्य लोगोंको एवं गुरु, श्वशुर और बन्धुजनोंको भी उनके नाम लेकर पिण्ड देवे। जो श्रद्धापूर्वक चन्द्रोदतीर्थमें पिण्डदान करता है, वह अपने

७४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सम्पूर्ण पितरोंका उद्धार कर देता है। जैसे गयामें पिण्ड देनेसे पितर तृप्त होते हैं, उसी प्रकार इस चन्द्रोदकुण्डके समीप श्राद्ध करनेसे भी उनकी तृप्ति होती है। काशीक्षेत्रमें निवास करनेवाले लोगोंको तारकमन्त्रके ज्ञानकी प्राप्तिके लिये चैत्रकी महापूर्णिमाको यहाँ यात्रा करनी चाहिये। यह यात्रा इस क्षेत्रके निवासमें आनेवाले विघ्नका निवारण करनेवाली है। काशीसे अन्यत्र निवास करनेवाला पुरुष भी यदि यहाँ आकर चन्द्रेश्वरकी भलीभाँति पूजा कर ले तो वह पापराशिका भेदन करके चन्द्रलोकको प्राप्त होगा। सोमवारका व्रत करनेवाले और सोमयागमें सोमरस पीनेवाले मनुष्य चन्द्रमाके समान प्रकाशमान विमानद्वारा जाकर सोमलोकमें ही निवास करते हैं।

अगस्त्यजी कहते हैं—प्रिये! भगवान्‌के दोनों दिव्य पार्षद उस दिव्य मार्गमें शिवशर्माको यह कल्याणकारिणी कथा सुनाते हुए परम उज्ज्वल नक्षत्रलोकमें जा पहुँचे।

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बुधलोक और शुक्रलोककी स्थिति, बुध और शुक्रके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति और वरदान-प्राप्ति

अगस्त्यजी कहते हैं—तदनन्तर शिवशर्माको बुधका लोक दृष्टिगोचर हुआ। तब उन्होंने पूछा—'भगवत्पार्षदो! यह अनुपम लोक किसका है?'

भगवान्‌के पार्षदोंने कहा—शिवशर्मन्! यह चन्द्रमाके पुत्र बुधका लोक है। बुध अपने पिता चन्द्रदेवकी आज्ञा लेकर काशीपुरीमें गये। वहाँ उन्होंने अपने नामसे बुधेश्वरको स्थापित किया और हृदयमें भगवान् शिवका ध्यान करते हुए दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। तब सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी विश्वभावन भगवान् विश्वनाथ बुधेश्वर नामसे प्रकट हुए। उनका स्वरूप ज्योतिर्मय था। वे प्रसन्नचित्त होकर बोले—'बुध! तुम वर माँगो।'

बुध बोले—पूतात्मा वायुरूप! आपको नमस्कार है (अथवा पवित्र अन्तःकरणवाले आप परमेश्वरको नमस्कार है)। ज्योतिःस्वरूप महेश्वर! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपका ही स्वरूप है, आपको नमस्कार है। आप रूपसे अतीत, निराकार हैं, आपको नमस्कार है। सबकी पीड़ाओंका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। शरणागतोंके लिये कल्याणरूप आपको नमस्कार है। आप सबके ज्ञाता और सर्वस्रष्टा हैं, आपको नमस्कार है। आप परम दयालु हैं, आपको नमस्कार है। भक्तिभावसे आप प्राप्त होने योग्य हैं, आपको नमस्कार है। आप तपस्याओंका फल देनेवाले और तपःस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। शम्भो! शिव! शिवाकान्त! शान्त! श्रीकण्ठ! शूलपाणे! चन्द्रशेखर! सर्वेश! शंकर! ईश्वर! धूर्जटे! पिनाकपाणे! गिरीश! शितिकण्ठ! सदाशिव! महादेव! आपको नमस्कार है। देवदेव! आपको नमस्कार है। स्तुतिप्रिय महेश्वर! मैं स्तुति करना नहीं जानता। आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी निश्चल भक्ति हो।

उनकी स्तुतिसे प्रसन्न हो भगवान् महेश्वर बोले—महाभाग! तुम्हारा स्थान नक्षत्रलोकसे ऊपर होगा और तुम समस्त ग्रहोंमें अधिक सम्मान प्राप्त करोगे। तुम्हारे द्वारा स्थापित की हुई यह मेरी मूर्ति सबको बुद्धि देनेवाली, दुर्बुद्धि हरनेवाली और तुम्हारे लोकमें निवास देनेवाली है। ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीका प्रसाद प्राप्त करके बुध पुनः स्वर्गलोकमें लौट आये।

काशीमें बुधेश्वरकी पूजासे उत्तम बुद्धि पाकर मनुष्य अगाध संसारसागरमें प्रवेश करते हुए डूब नहीं सकता और अन्तमें वह बुधलोकमें निवास करता है। चन्द्रेश्वरके पूर्वभागमें बुधेश्वरका दर्शन

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७४७

करके मनुष्य मृत्युकालमें भी कभी बुद्धिसे हीन नहीं होता।

महामते शिवशर्मन्! बुधलोकसे ऊपर यह परम अद्भुत शुक्रलोक है। यहाँ दानवों और दैत्योंके गुरु शुक्राचार्य निवास करते हैं, जिन्होंने सहस्र वर्षोंतक तपस्या करके महादेवजीसे मृत्युसंजीवनी नामवाली महाविद्या प्राप्त की थी। इस दुर्लभ विद्याको देवगुरु बृहस्पति भी नहीं जानते। भृगुवंशी शुक्रने अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज—इन चार प्रकारके प्राणियोंको मुक्ति प्रदान करनेवाली काशीपुरीमें जाकर एक शिवपूर्तिको स्थापित किया और बिल्वपत्र आदि सहस्रों प्रकारके पत्तों और पुष्पोंसे उसका भलीभाँति पूजन किया। चन्दन और यक्षकर्दमसे लेपन किया। सुगन्धित उबटन लगाया, नृत्य और गीतसे भी भगवान्‌को रिझाया तथा भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री समर्पित करके सहस्रनाम आदि स्तोत्रोंसे भगवान् शंकरका स्तवन किया। इस प्रकार पाँच हजार वर्षोंतक शुक्राचार्यने भगवान् शिवकी भलीभाँति आराधना की। तत्पश्चात् इन्द्रियोंसहित चित्तके चांचल्य (विक्षेप)-रूपी महान् मलको ध्यानरूपी जलसे धोकर अपने निर्मल किये हुए चित्तरत्नको उन्होंने पिनाकपाणि भगवान् शिवकी सेवामें समर्पित कर दिया। तब भगवान् शंकर प्रसन्न हो सहस्रों सूर्योंसे भी अधिक तेजस्वी रूप धारण कर उस मूर्तिसे प्रकट हुए और बोले—'भृगुनन्दन! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।'

भगवान् शंकरका वचन सुनकर शुक्राचार्यने दोनों हाथ जोड़ जय-जयकार करते हुए उनका इस प्रकार स्तवन किया। 'सूर्यस्वरूप जगदीश्वर! आप अपनी प्रभासे निशाचरोंको प्रिय लगनेवाले अन्धकारको तिरस्कृत करके उसे सर्वथा विलुप्त कर देते और तीनों लोकोंके हितके लिये आकाशमें देदीप्यमान होते हैं, अतः आपको नमस्कार है। हे चन्द्रस्वरूप शिव! आप अमृतमयी किरणोंसे परिपूर्ण हैं, समस्त अन्धकारको दूर भगानेवाले और परम सुन्दर हैं। आप संसारमें निरन्तर असीम एवं महान् प्रकाश फैलाकर कुमुद पुष्पोंको प्रमोद देते तथा संसारके प्राणियोंके लिये आनन्दका समुद्र उड़ेल देते हैं। इतना ही नहीं, आप समुद्रको भी आनन्दसे परिपूर्ण करते हैं, अतः आपको नमस्कार है। हे वायुरूप परमेश्वर! आप नम्रता एवं विनयसे रहित चराचर जगत्‌को भग्न करनेवाले हैं, सब जीवोंको अपनी प्राणशक्ति देकर बढ़ानेवाले हैं, वायुभक्षी सर्पोंको सन्तुष्ट करनेवाले हैं, सर्वव्यापी! आप सदा पावन पथपर चलते हुए सबके उपास्य हैं। सम्पूर्ण जगत्‌को जीवन प्रदान करनेवाले देव! आपके बिना इस संसारमें कौन जीवित रह सकता है, आपको नमस्कार है। हे अग्निस्वरूप महेश्वर! आप सम्पूर्ण जगत्‌के एकमात्र पवित्र करनेवाले और प्रणतजनोंके रक्षक हैं, अमृतब्रह्मस्वरूप हैं। सम्पूर्ण विश्वके अन्तरात्मा पावक! क्या आपकी पावनशक्तिके बिना यह आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक जगत् कभी जीवित रह सकता है? कदापि नहीं। आपको किया हुआ नमस्कार प्रतिक्षण शान्ति देनेवाला होता है। जलस्वरूप परमेश्वर! आप सम्पूर्ण जगत्‌में परम पवित्र हैं,

७४८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आपका उत्तम चरित्र परम विचित्र है। हे विश्वनाथ ! आप इस विचित्र जगत्‌को जलपान और स्नानकी सुविधा देकर निश्चय ही बाहर-भीतरसे पवित्र एवं निर्मल कर देते हैं, अतः आपको मैं नमस्कार करता हूँ। हे आकाशस्वरूप महादेव ! हे ईश्वर ! आपके द्वारा बाहर और भीतरसे अवकाश मिलनेके कारण यह सम्पूर्ण विश्व नित्य विकसित होता रहता है। सदा सबपर दया रखनेवाले प्रभो ! आपसे ही यह जगत् जीवन धारण करता है और आपमें ही स्वभावतः इसका लय होता है, अतः मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे पृथ्वीरूप परमेश्वर ! हे विभो ! हे विश्वनाथ ! हे अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले शिव ! इस सम्पूर्ण विश्वको यहाँ आपके सिवा दूसरा कौन धारण करता है? गिरिराजनन्दिनी उमा और नागराज वासुकि आपके आभूषण हैं, आप परात्पर हैं। शान्ति, क्षमा आदि गुणोंसे विभूषित देवताओंमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई स्तवन करने योग्य नहीं है। अथवा शम, दम आदि साधनोंसे सम्पन्न संत-महात्माओंके द्वारा स्तवन करने योग्य आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे आत्मस्वरूप शिव ! हे अज्ञानका अपहरण करनेवाले हर ! सबके अन्तरात्मामें निवास करनेवाले परमात्मस्वरूप ! अष्टमूर्ते ! आपकी इन रूप-परम्पराओं—सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश और आत्मा—इन आठ मूर्तियोंसे यह समस्त चराचर जगत् व्याप्त है। आप प्रत्येक रूपमें व्यापक होनेके कारण तदनुरूप प्रतीत होते हैं, अतः मैं सदा आपको नमस्कार करता हूँ। प्रभो ! प्रणतजनोंको प्राप्त होनेवाले सम्पूर्ण अर्थसमूहोंमें आप ही परमार्थस्वरूप हैं। भगवती उमा आपके चरणारविन्दोंकी वन्दना करती हैं। आप वन्दनीय पुरुषोंके द्वारा भी अतिशय वन्दनीय हैं। आप ही इस विश्वके उत्पादक हैं। आपकी मूर्ति सम्पूर्ण विश्वके प्राणियोंका हित साधन करनेवाली है। आपकी पूर्वोक्त आठ मूर्तियोंद्वारा यह विशाल जगत् व्याप्त है, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ।'

भृगुनन्दन शुक्रने अष्टमूर्त्यष्टक स्तोत्रसे इस प्रकार अपने इष्टदेव शिवकी स्तुति करके धरतीपर मस्तक टेककर उन्हें बार-बार प्रणाम किया। तब महादेवजीने उन्हें अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर उठाया और इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन्‌! मेरे द्वारा तपोबलसे प्रकट की हुई जो मेरी मृतसंजीवनी नामक निर्मल विद्या है, उस मन्त्ररूपा विद्याका ज्ञान आज मैं तुम्हें कराऊँगा। उस विद्याके लिये तुम्हारी योग्यता है। तुम जिस-जिस व्यक्तिके लिये इस विद्याका जप करोगे, वह-वह निश्चय ही जीवित हो उठेगा। आकाशमें तुम्हारा तेज सब नक्षत्रोंसे भी अधिक प्रकाशित होगा। तुम ग्रहोंमें श्रेष्ठ माने जाओगे। तुम्हारे उदय होनेपर ही विवाह आदि शुभ एवं धार्मिक कार्य सफल होंगे। तुम्हारे द्वारा स्थापित किये हुए इस शुक्रेश्वरका जो मनुष्य पूजन करेंगे, उन्हें सिद्धि प्राप्त होगी। जो एक वर्षतक प्रति शुक्रवारको केवल रात्रिमें भोजन करनेका नियम लेंगे और तुम्हारे दिनमें शुक्रकूपमें स्नान करके तर्पण आदि कर्म करनेके पश्चात् शुक्रेश्वरकी पूजा करेंगे, वे मनुष्य अधिक वीर्यवान्, पुत्रवान्, सौभाग्यशाली एवं सुखी होंगे।' यह वरदान देकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये।

जो शुक्रेश्वरके भक्त होते हैं, वे शुक्रलोकमें निवास करते हैं। शुक्रेश्वर विश्वनाथके दक्षिण भागमें है। उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य शुक्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। महामते ! इस प्रकार तुम्हें शुक्रलोककी स्थिति बतायी गयी।

अगस्त्यजी कहते हैं—प्रिये ! इस प्रकार शुक्रलोककी कथा सुनते हुए शिवशर्माने अपने समीप मंगललोकको देखा।

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  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७४९

मंगल, बृहस्पति और शनिके लोकोंकी स्थिति

शिवशर्माने पूछा- यह किसका लोक है? भगवत्पार्षदोंने कहा-शिवशर्मन्! यह मंगलग्रहका लोक है। मंगलकी उत्पत्ति पृथ्वीसे हुई है, पृथ्वीमाताने ही उनका स्नेहपूर्वक पालन-पोषण किया है। जहाँ जगत्‌का हित करनेवाली असी और वरणा नामक दो शोभायमान नदियाँ उत्तरवाहिनी गंगासे मिली हैं, जहाँ मृत्युको प्राप्त हुए देहधारी जीव भगवान् विश्वनाथका महान् अनुग्रह प्राप्त करके अमृतमय ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं, उस काशीपुरीमें जाकर मंगलने अपने नामसे अंगारकेश्वरको स्थापित किया और वहाँ वे तबतक तपस्या करते रहे जबतक कि उनके शरीरसे प्रज्वलित अंगारके समान तेज नहीं निकला। अंगारके समान तेज प्रकट होनेसे वे सब लोकोंमें अंगारक नामसे विख्यात हुए। तदनन्तर उनसे सन्तुष्ट हुए महादेवजीने उन्हें महान् ग्रहका पद प्रदान किया। जो मनुष्य अंगारकचतुर्थीको उत्तरवाहिनी गंगाके जलमें स्नान करके अंगारकेश्वरकी पूजा और उन्हें नमस्कार करेंगे, उन्हें कभी कहीं भी ग्रहजनित पीड़ा नहीं होगी।

अगस्त्यजी कहते हैं- इस प्रकार सुन्दर एवं पुण्यमयी कथा कहते हुए भगवत्पार्षदोंको देवगुरु बृहस्पतिकी पुरी दृष्टिगोचर हुई।

शिवशर्माने पूछा- यह किसकी पुरी है? भगवत्पार्षदोंने कहा-सखे! प्रजापति अंगिराके पुत्र देवपूज्य बृहस्पति हुए। वे अपनी बुद्धिसे देवताओं और विद्वानोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। शान्त और जितेन्द्रिय हैं, उन्होंने क्रोधको जीत लिया है। उनकी वाणी मधुर और अन्तःकरण निर्मल है। वे वेदों और वेदार्थोंके तत्त्वज्ञ, समस्त कलाओंमें कुशल, निर्मल, समस्त शास्त्रोंमें पारंगत तथा नीतिविद्याके विशेषज्ञ हैं। वे हितका उपदेश करनेवाले, हितकारक, रूपवान्, सुशील, गुणवान्, देश-कालको जाननेवाले, समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और गुरुजनोंके प्रति भक्ति रखनेवाले हैं। उन्होंने काशीमें तपस्वीजनोंकी वृत्तिका आश्रय लेकर और शिवजीकी मूर्तिकी स्थापना करके बड़ी भारी तपस्या की। तब भगवान् शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले- 'बृहस्पते! वर माँगो।' भगवान् शंकरको अपने सामने उपस्थित देख बृहस्पतिजी हर्षमें भर गये और इस प्रकार स्तुति करने लगे- 'चन्द्रमाके समान गौर कान्तिवाले, शान्तस्वरूप शंकर! आपकी जय हो। आप रुचिके अनुकूल मनोहर पदार्थों एवं चारों पुरुषार्थोंको देनेवाले हैं। सर्वस्वरूप, सब कुछ देनेवाले तथा नित्य शुद्ध हैं। पवित्र भक्तोंद्वारा शुद्धभावसे दी हुई महती उपहार-सामग्रीको ग्रहण करते हैं। भक्तजनोंपर आयी हुई घोर सन्ताप-परम्पराका आप नाश करनेवाले हैं। आपने सबके हृदयाकाशको व्याप्त कर रखा है। प्रणतजनोंको आप मनोवांछित वर देनेवाले हैं। शरणागत भक्तोंके पापरूपी महान् वनको जलानेके लिये दावानलस्वरूप हैं। अपने शरीरसे भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते रहते हैं। आपका श्रीअंग परम सुन्दर है। आप कामदेवके बाणोंको सुखा देनेवाले हैं। धैर्यनिधे! आपकी जय हो। आप मृत्यु आदि विकारोंसे सर्वथा रहित हैं तथा अपने चरणोंमें प्रणाम करनेवाले भक्तजनोंको भी मृत्यु आदि विकारोंसे रहित कर देते हैं। पुण्यात्मा पुरुषोंका मनोरथ पूर्ण करते और सर्पोंको आभूषणरूपमें धारण करते हैं। आपका वामांग भाग गिरिराजनन्दिनी उमासे व्याप्त है। आपने अपने सर्वव्यापी स्वरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। तीनों लोक आपके ही स्वरूप हैं, फिर भी आप इन सभी

७५०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रूपोंसे परे हैं। आपकी दृष्टि बड़ी सुन्दर है। आप अपने नेत्रोंके खोलने-मीचनेसे जगत्‌की सृष्टि और प्रलय करनेवाले हैं। आपने ही अग्निदेवको प्रकट किया है। जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले भूतनाथ! एकमात्र आप ही प्रमथगणोंके पालक और स्वामी हैं। अपनी शरणमें आये हुए पतितजनोंपर भी आप अपना वरद हस्त फैलाते रहते हैं। आप सम्पूर्ण भूतलमें फैले हुए आवरणका निवारण करनेवाले तथा प्रणवनादरूपी सुधाधौलिगृहमें निवास करनेवाले हैं। आपने चन्द्रमाको अपने ललाटमें धारण कर रखा है। गिरिराजकुमारी पार्वतीके द्वारा सर्वथा सन्तुष्ट रहनेवाले शिव! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। शिव! देव! गिरीश! महेश! विभो! आप वैभव प्रदान करनेवाले और कैलास पर्वतपर सोनेवाले हैं। पार्वतीवल्लभ! आप सबको सुख देनेवाले हैं। चन्द्रधर! आप भक्तिका विघात करनेवाले दुष्टोंको कठोर दण्ड देनेवाले हैं। तीनों लोकोंको सुखी बनाइये। सबकी पीड़ा हरनेवाले महादेव! मैं कालसे भी नहीं डरता। अमोघमते! आप शीघ्र मेरी पापराशिका विनाश कीजिये। शिवके चरणारविन्दोंमें नमस्कार करनेके सिवा दूसरी किसी विचारधाराको मैं जीवोंके लिये कल्याणकारी नहीं मानता, अतः आपके चरणोंमें ही मस्तक झुकाता हूँ। इस सम्पूर्ण विशाल जगत्‌में भगवान् शिवको सन्तुष्ट करना ही सब पापोंका नाशक तथा परम गुणकारी है। हे ईश! आप त्रिगुणमय प्रपंचसे अतीत, नागराज वासुकिका महान् कंगन धारण करनेवाले तथा प्रलयकालमें सबका विनाश करनेवाले हैं, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ।'

इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके बृहस्पतिजी मौन हो गये। इस स्तुतिसे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने कहा—'ब्रह्मन्! तुमने बृहत् तप किया है, इसलिये बृहत् अर्थात् बड़े-बड़े देवताओंके पति (पालक) बने रहो। तुम ग्रहोंमें बृहस्पति नामसे पूजित होओ। तीन वर्षोंतक तीनों समय इस स्तोत्रका पाठ करनेसे जिस पुरुषके प्रति सरस्वती उदित हों, उसकी वाणी संस्कृत होगी*। इस स्तोत्रके पाठसे किसीकी दुराचारमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। तुम्हारे द्वारा स्थापित की हुई इस मूर्तिकी पूजा करके इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला पुरुष मनोवांछित फल प्राप्त करेगा। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह मूर्ति काशीमें बृहस्पतीश्वरके नामसे विख्यात होगी। बृहस्पतिवार और पुष्य नक्षत्रके योगमें इसकी पूजा करके मनुष्य जो कार्य प्रारम्भ करेंगे, उसमें उन्हें सिद्धि प्राप्त होगी। चन्द्रेश्वरके दक्षिण और वीरेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें स्थित बृहस्पतीश्वरका पूजन करके मनुष्य बृहस्पतिलोकमें सम्मानित होगा।'

अगस्त्यजी कहते हैं—लोपामुद्रे! बृहस्पति-लोकके ऊपर जाकर शिवशर्माने शनिका लोक देखा और उसके विषयमें प्रश्न किया। तब दोनों भगवत्पार्षदोंने कहा—'ब्रह्मन्! यह सूर्यके पुत्र शनिकी पुरी है। भगवान् सूर्यसे सवर्णाके गर्भसे शनैश्चरकी उत्पत्ति हुई। शनैश्चरने देववन्दित काशीपुरीमें जाकर शिवलिंग स्थापित किया और उसके समीप बड़ी भारी तपस्या करके शिवपूजनके प्रभावसे इस शनिलोकको तथा ग्रहकी पदवीको प्राप्त किया। काशीमें परम सुन्दर शनैश्चरेश्वरका दर्शन करके शनिवारको उनकी पूजा करनेसे शनैश्चरकी बाधा नहीं होती है। विश्वनाथजीसे दक्षिण और शुक्रेश्वरसे उत्तर भागमें शनैश्चरेश्वरकी पूजा करके मनुष्य इस शनिलोकमें आनन्दका भागी होता है।'


\* अस्य स्तोत्रस्य पठनादपि वागुदियाच्च यम्। तस्य स्यात्संस्कृता वाणी त्रिभिर्वर्षैस्त्रिकालतः॥  
(स्क० पु०, का० पू० १७ । ४६)
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७५१

सप्तर्षिलोक और ध्रुवलोककी स्थिति, ध्रुवकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति

अगस्त्यजी कहते हैं—तदनन्तर शिवशर्माने सप्तर्षिमण्डलको अपने नेत्रोंसे देखा और पूछा—'यह अनुपम तेजोमय शुभ लोक किसका है?'

दोनों भगवत्पार्षदोंने कहा—ब्रह्मन्! इस लोकमें सदा निर्मल अन्तःकरणवाले सप्तर्षि निवास करते हैं। ब्रह्माजीके द्वारा सृष्टिकार्यमें नियुक्त होकर वे यहीं रहते हैं। मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा और महाभाग वसिष्ठ—ये ब्रह्माजीके मानसपुत्र हैं। पुराणोंमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। सम्भूति, अनसूया, क्षमा, प्रीति, सन्नति, स्मृति और अरुन्धती—ये क्रमशः इन सात ऋषियोंकी पत्नियाँ हैं, जो लोकमाता कही गयी हैं। इन सप्तर्षियोंने काशीक्षेत्रमें जाकर अपने-अपने नामसे एक-एक शिव-मूर्ति स्थापित की और शिवमें बड़ी भक्ति रखकर अत्यन्त कठोर तपस्या प्रारम्भ की। इनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने इन्हें प्रजापतिका पद दिया। जो लोग प्रयत्नपूर्वक काशीमें अत्रीश्वर आदि शिव-मूर्तियोंका दर्शन करते हैं, वे उज्ज्वल तेजसे सम्पन्न हो इस प्राजापत्यलोकमें निवास करते हैं। अत्रीश्वर लिंग गोकर्णेश्वरकुण्डके पश्चिम तटपर प्रतिष्ठित है। कर्कोटककुण्डके ईशानकोणमें मरीचिकुण्ड है। वहीं मरीचीश्वर-संज्ञक शिवलिंग प्रतिष्ठित है। पुलहेश्वर और पुलस्त्येश्वर लिंग स्वर्गद्वारके पश्चिम भागमें हैं। आंगिरसेश्वर लिंग हरिकेश वनमें स्थित है। वसिष्ठेश्वर लिंग वरणा नदीके रमणीय तटपर है। क्रत्वीश्वर लिंग भी वहीं है। शुभकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंद्वारा काशीतीर्थमें सेवित होनेपर ये सातों लिंग इहलोक और परलोकमें मनोवांछित फल देते हैं। इस सप्तर्षिलोकमें महापुण्यमयी पतिव्रता एवं परम सुन्दरी वसिष्ठपत्नी अरुन्धती रहती हैं, जिनके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य गंगास्नानका फल पाता है। भगवान् नारायण अरुन्धतीके पातिव्रत्यसे सन्तुष्ट होकर लक्ष्मीजीके सामने प्रसन्नतापूर्वक उनकी चर्चा किया करते हैं और कहते हैं—'कमले! पतिव्रताओंमें अरुन्धतीका अन्तःकरण जैसा शुद्ध है, वैसा कहीं किसीका भी नहीं है। वैसा रूप, वैसा शील-स्वभाव, वैसी कुलीनता, वह कला-कौशल, वह पतिसेवापरायणता, वह माधुर्य, वह गम्भीरता और वह गुरुजनोंको सन्तुष्ट रखनेका भाव जैसा अरुन्धती देवीमें है, वैसा अन्य स्त्रियोंमें कहीं नहीं है। जो वार्तालापके प्रसंगमें अरुन्धतीका नाम भी लेती हैं, वे युवतियाँ संसारमें धन्य हैं, सौभाग्यवती हैं और शुद्ध चित्तवाली हैं।

तदनन्तर शिवशर्माके समक्ष ध्रुवलोक प्राप्त हुआ। उसे देखकर उन्होंने पूछा—'भगवत्पार्षदो! यह कौन लोक है?'

भगवत्पार्षदोंने कहा—ब्रह्मन्! स्वायम्भुव मनुके एक पुत्रका नाम उत्तानपाद था। राजा उत्तानपादके दो पुत्र हुए। रानी सुरुचिके गर्भसे उत्तमका जन्म हुआ था, जो ज्येष्ठ था और सुनीतिके गर्भसे ध्रुव नामक पुत्र हुआ था, जो कनिष्ठ था। एक दिन राजा उत्तानपाद जब राजसभामें बैठे हुए थे, उस समय सुनीतिने अपने पुत्रको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके राजाकी सेवामें भेजा। विनयशील ध्रुवने धायके बालकोंके साथ वहाँ जाकर महाराज उत्तानपादके चरणोंमें प्रणाम किया और ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए पिताकी गोदमें उत्तम भैयाको बैठा देख बालोचित चपलताके कारण उसने भी पिताकी गोदमें चढ़नेकी चेष्टा की। सुरुचिने ध्रुवको पिताकी गोदमें चढ़नेके लिये उत्सुक देख फटकारते हुए कहा—'ओ अभागिनीके पुत्र! क्या तू महाराजकी गोदमें बैठना चाहता है? इस सिंहासनपर बैठनेके योग्य पुण्य तूने नहीं किया है। यदि तेरा कुछ

७५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पुण्य होता तो तू एक अभागिनी स्त्रीके पेटसे कैसे पैदा होता ? मेरे परम सुन्दर उत्तमको देख ले। वह सौभाग्यवतीकी अच्छी कोखसे पैदा हुआ है। इसीलिये वह पृथ्वीपतिके अंकमें सम्मानपूर्वक बैठा हुआ है।'

राजसभाके बीचमें सुरुचिके द्वारा इस प्रकार अपमानित होनेपर ध्रुवने गिरते हुए आँसुओंको रोक लिया और धैर्य धारण करके कुछ भी उत्तर नहीं दिया। राजाने भी उचित-अनुचित कुछ नहीं कहा। वे रानी सुरुचिके वशीभूत थे। कुमार ध्रुव राजाको प्रणाम करके बालकोंके साथ अपने घर लौट गया। सुनीतिने बालकके मुखकी कान्ति देखकर ही ताड़ लिया कि ध्रुवका अपमान हुआ है। उन्होंने बार-बार अपने पुत्रका मस्तक सूँघा और सान्त्वना देकर हृदयसे लगा लिया। एकान्तमें माता सुनीतिको देखकर बालक ध्रुव फूट-फूटकर रोने लगा। माताके नेत्रोंसे भी आँसू बहने लगे।

सुनीतिने समझा-बुझाकर आँचलसे ध्रुवका मुँह पोंछा और कहा—'बेटा! तुम्हारे रोनेका क्या कारण है, बताओ। महाराजके रहते हुए किसने तुम्हारा अपमान किया है?' माताके आग्रहपूर्वक पूछनेपर ध्रुवने कहा—'माँ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ। तुम और सुरुचि दोनों ही महाराजकी पत्नी हो, तो भी राजाको केवल सुरुचि क्यों प्यारी है और क्यों तुमपर उनका प्रेम नहीं है? मैं और उत्तम दोनों समानरूपसे राजकुमार हैं, फिर सुरुचिका पुत्र उत्तम क्यों उत्तम है और क्यों मैं अधम हूँ? राजसिंहासन क्यों उत्तमके ही योग्य है और क्यों मेरे योग्य नहीं है?'

ध्रुवका यह वचन सुनकर सुनीतिने लंबी साँस खींचकर कहा—वत्स! सुरुचिने जो कुछ कहा है, सब सत्य है। वह महाराजकी पटरानी है, इसलिये सब रानियोंमें अधिक प्रिय है। तात! उसने दूसरे जन्ममें बड़ा भारी पुण्य किया है। उसी पुण्यकी वृद्धिसे सुरुचिके प्रति राजा अच्छी रुचि रखते हैं। जो मेरी-जैसी अभागिनी स्त्रियाँ हैं, उनमें राजाकी वैसी प्रीति नहीं है। उत्तमने भी महान् पुण्यराशिका उपार्जन किया है, इसीलिये उसने उस पुण्यात्मा स्त्रीकी उत्तम कोखमें निवास किया है और यही कारण है कि वह राजसिंहासनपर बैठनेका अधिकारी माना गया है। महामते! थोड़ी तपस्या करनेके कारण मैं और तुम राजाके समीप पहुँचकर भी राजलक्ष्मीके पात्र नहीं हो सके। बेटा! अपना पूर्वजन्मका कर्म ही मान और अपमानमें कारण होता है, अतः तुम इसके लिये शोक न करो।

ध्रुव बोला—माँ! यदि मैं मनुके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, राजा उत्तानपादका पुत्र हूँ और तुम्हारी कोखसे पैदा हुआ हूँ तो मेरी बात सुनो। यदि तपस्या ही सब सम्पत्तियोंका कारण है तो आजतक जो स्थान दूसरोंके लिये दुर्लभ रहा है, उसे भी मैंने प्राप्त कर लिया, ऐसा समझो। माँ! तुम केवल मुझे तपस्याके लिये जानेकी आज्ञा दे दो और अपने आशीर्वादसे मेरा उत्साह बढ़ाओ।

तब सुनीतिने कहा—राजकुमार! तुम्हारी आयु अभी कम है, अतः मैं तुम्हें वनमें जानेकी आज्ञा देनेमें असमर्थ हूँ। तथापि इस समय आज्ञा देती हूँ। तपस्याके लिये तुम्हारे जानेपर मेरे कठोर प्राण

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *७५३

किसी तरह कण्ठमें अटके रहेंगे।

इस प्रकार माताकी आज्ञा पाकर ध्रुवने उनके चरणकमलोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और वह वहाँसे चल दिया। माताने मार्गमें पुत्रकी रक्षाके लिये शतशः आशीर्वाद दिये। वह तरुणोंके समान पराक्रमी बालक अपने महलसे निकलकर वनमें गया। उस समय अनुकूल वायु चलकर उसे मार्ग दिखा रही थी। वनमें ध्रुवने सप्तर्षियोंको देखा। भोले-भाले असहाय जीवोंका भाग्य सहायक होता है। कहाँ राजकुमार और कहाँ वह घोर जंगल; परंतु जहाँ जिसकी शुभ या अशुभ भवितव्यता होती है, वहाँ उस मनुष्यको वह अपनी रस्सीमें बाँधकर खींच लेती है। मनुष्य अपने बुद्धिविभवसे कुछ और करनेकी चेष्टा करता है, किंतु भावीकी सहायतासे विधाता कुछ और ही कर डालता है। सप्तर्षियोंका दर्शन करके ध्रुव बहुत प्रसन्न हुआ और उनके पास जा हाथ जोड़े हुए प्रणाम करके ललित वाणीमें बोला—'मुनिवरो! आप मुझे राजा उत्तानपादका पुत्र ध्रुव जानें। मैं माता सुनीतिकी कोखसे पैदा हुआ हूँ।' वे सप्तर्षिगण स्वभावसे ही मधुर आकृतिवाले, अतिशय नीतिकुशल, मृदुल, गम्भीरभाषी उस तेजस्वी बालकको देखकर इस प्रकार बोले—'बालक! तू अपने खेदका कारण बता।' उनके सहज स्नेहसे सने हुए वचन सुनकर ध्रुवने कहा—'मुनीश्वरो! मेरी माताने मुझे महाराजकी सेवामें भेजा था। जब मैं वहाँ जाकर उनकी गोदीमें बैठनेको उत्सुक हुआ तब विमाता सुरुचिने मेरा बहुत तिरस्कार किया। उसने अपने पुत्र उत्तमको तो उत्तम बताया और मुझको तथा मेरी माताको धिक्कार देकर अपनी प्रशंसा की। यही मेरे खेदका कारण है।'

बालक ध्रुवकी यह बात सुनकर सप्तर्षि आपसमें एक-दूसरेकी ओर देखकर उसके क्षत्रियस्वभावकी चर्चा करने लगे—'अहो! देखो तो सही इस छोटे-से बालकमें भी अपमान सहन करनेकी शक्ति नहीं।'

ऋषि बोले—वत्स! हमसे तुम्हारा क्या काम है? तुम्हारा कौन-सा मनोरथ है?

ध्रुवने कहा—मुनियो! मेरे सर्वोत्तम बन्धु जो उत्तम हैं, वे पिताजीके दिये श्रेष्ठ राजसिंहासनपर बैठें। मैं आपके द्वारा इतनी ही सहायता चाहता हूँ कि मैं बालक होनेके कारण प्रायः कुछ साधन-भजन नहीं जानता, अतः मेरे लिये आप उसीका उपदेश करें। मैं पिताके दिये हुए सिंहासनको नहीं चाहता, मैं तो अपनी भुजाओंके बलसे उपार्जित उस उत्तम वस्तुको पाना चाहता हूँ, जो मेरे पिताके लिये भी आशातीत हो। जो पिताकी सम्पत्ति भोगनेवाले हैं, वे प्रायः यशके धनी नहीं होते। श्रेष्ठ मनुष्य तो उन्हें जानना चाहिये, जो पितासे भी अधिक उन्नति करके दिखा दें।

इस प्रकार उसके नीतिसे युक्त वचन सुनकर मरीचि आदि मुनियोंने उससे इस प्रकार कहा—

मरीचि बोले—प्रिय वत्स! मैं झूठ नहीं कहता, तुम जिस स्थानको पानेकी बात करते हो, उसे, जिसने भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंकी आराधना नहीं की है, वह पुरुष कैसे पा सकता है?

अत्रिने कहा—जिसने भगवान् गोविन्दके चरणकमलोंकी धूलिके रसका आस्वादन नहीं किया है, वह आशातीत समृद्धिशाली पदको नहीं पा सकता।

अंगिरा बोले—जो भगवान् लक्ष्मीपतिके कान्तिमान् चरणकमलोंका भलीभाँति चिन्तन करता है, उसके लिये सम्पूर्ण सम्पदाओंका स्थान दूर नहीं है।

पुलस्त्यने कहा—ध्रुव! जिनके स्मरणमात्रसे महापातकोंकी परम्पराका सर्वथा नाश हो जाता है, वे भगवान् विष्णु ही सब कुछ देनेवाले हैं।

पुलह बोले—जिनको प्रकृति और पुरुषसे परे परब्रह्म कहते हैं तथा जिनकी मायासे सम्पूर्ण जगत्का विस्तार किया गया है, वे भगवान् विष्णु ही सब कुछ देंगे।

क्रतुने कहा—जो यज्ञपुरुष हैं, सर्वत्र व्यापक

७५४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हैं, सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य तथा समस्त जगत्के अन्तरात्मा हैं, वे भगवान् जनार्दन यदि सन्तुष्ट हो जायें तो क्या नहीं दे सकते हैं?

वसिष्ठ बोले—राजकुमार! जिनके भ्रूभंगमात्रसे अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ आज्ञाके अनुसार कार्य करनेको प्रस्तुत रहती हैं, उन भगवान् हृषीकेशकी आराधना करनेपर मोक्ष भी दूर नहीं है।

ध्रुवने कहा—मुनीश्वरो! आपने भगवान् विष्णुकी आराधनाके विषयमें जो विचार व्यक्त किया है, वह सत्य है। परंतु भगवान् विष्णुकी आराधना कैसे की जाती है, उसकी विधि क्या है, इसका उपदेश करें।

मुनि बोले—खड़े होते, चलते, सोते, जागते, लेटे अथवा बैठे हुए सब समय भगवान् नारायणके नामका जप करना चाहिये। चार भुजाधारी भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए वासुदेवस्वरूप द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) द्वारा जप करके कौन सिद्धिको नहीं प्राप्त हुआ है*? अलसीके फूलकी भाँति श्याम कान्तिवाले पीतवस्त्रधारी सर्वात्मा अच्युतका एक क्षण भी ध्यान करनेवाला कौन ऐसा पुरुष है, जो इस भूतलपर सिद्धिको नहीं पाता? भगवान् वासुदेवका जप करनेवाला मनुष्य स्त्री, पुत्र, मित्र, राज्य, स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) सब कुछ निःसन्देह प्राप्त कर लेता है। वासुदेवके मन्त्र-जपमें लगे हुए पापी मनुष्योंको भी विघ्न तथा भयंकर यमदूत नहीं छू सकते। महा समृद्धिशाली और विष्णुभक्त तुम्हारे दादा मनुने भी राज्यकी कामनासे इस महामन्त्रका जप किया था। तुम भी इसी मन्त्रसे भगवान् वासुदेवकी आराधनामें लग जाओ। इससे तुम शीघ्र ही मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लोगे।

ऐसा कहकर वे सब महात्मा मुनीश्वर वहीं अन्तर्धान हो गये। इधर ध्रुव भी भगवान् वासुदेवके चिन्तनमें मन लगाकर तपस्याके लिये चल दिये। जंगलसे निकलकर वे यमुनाके किनारे मनोहर मधुवनमें गये। वह भगवान् श्रीहरिका परम पवित्र आदिस्थान है, जहाँ पहुँचकर पापी जीव भी निष्पाप हो जाता है। वहाँ जाकर ध्रुवने वासुदेव नामक निरामय परब्रह्मका जप प्रारम्भ किया। उनके नेत्र ध्यानमें निश्चल रहते थे और वे सम्पूर्ण विश्वको वासुदेवमय देखते थे। सम्पूर्ण दिशाओंमें श्रीहरि हैं, वे ही पातालमें अनन्तरूपसे रहते हैं, आकाशमें भी वे ही अनन्तरूपसे व्याप्त हैं। यद्यपि वे एक हैं तथापि अनन्त रूपभेदके कारण अनन्तताको प्राप्त हुए हैं। जो सदा देवताओंमें वास करें अथवा देवताओंके वासस्थान हों या व्यापकशक्तिसे सर्वत्र देदीप्यमान हों, वे भगवान् वासुदेव कहलाते हैं। 'विष्ऌ व्याप्तौ' धातु है। इसका प्रयोग व्याप्ति अर्थमें होता है। (इसीसे 'विष्णु' शब्द बनता है) भगवान् विष्णुके सर्वव्यापी नाम एवं स्वरूपमें ही यह धातु पूर्णतः सार्थक होती है। जो परमेश्वर सम्पूर्ण हृषीक अर्थात् इन्द्रियोंके स्वामी होनेसे 'हृषीकेश' कहलाते हैं, वे ही सर्वत्र स्थित हैं। जिनके भक्त भी महाप्रलयमें अपने स्वरूपसे च्युत नहीं होते, वे भगवान् सम्पूर्ण लोकोंमें 'अच्युत' कहलाते हैं। जो एकमात्र अविनाशी एवं सर्वत्र व्यापक हैं, जो पालन-पोषण करने और स्वरूपकी प्राप्ति करानेके द्वारा इस समस्त चराचर विश्वका लीलापूर्वक भरण करते हैं, वे भगवान् विश्वम्भर यहाँ विराजमान हैं। ध्रुवकी आँखें भगवान् विष्णुके स्वरूपके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखती थीं। उन्होंने यह नियम बना लिया था कि केवल कमलनयन भगवान् विष्णु ही दर्शन करनेयोग्य हैं, दूसरा कोई नहीं। उनके कान गोविन्द, मुकुन्द, दामोदर, चतुर्भुज आदि शब्दोंके बिना दूसरा कोई शब्द नहीं ग्रहण करते थे। उनके दोनों हाथ गोविन्दके चरणारविन्दोंकी पूजा


* तिष्ठता गच्छता वापि स्वपता जाग्रता तथा। शयानेनोपविष्टेन जप्यो नारायणः सदा॥
द्वादशाक्षरमन्त्रेण वासुदेवात्मकेन च। ध्यायेश्चतुर्भुजं विष्णुं जप्त्वा सिद्धिं न को गतः॥
(स्क० पु०, का० पू० १९। १७-१८)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७५५

तथा उन्हें प्रिय लगनेवाले कर्मोंको छोड़कर और कोई कर्म नहीं करते थे। उनका मन अन्य सारी बातोंका मनन छोड़कर केवल भगवान्‌के द्वन्द्वरहित युगल चरणकमलोंका चिन्तन करता हुआ स्थिर हो गया था। तपस्या करते हुए ध्रुवके दोनों पैर भगवान् नारायणका आँगन छोड़कर अन्यत्र नहीं जाते थे। परम सारभूत तपस्या करते हुए राजकुमारने मौन धारण कर लिया था। केवल गोविन्दका गुणगान करनेमें वे अपनी वाणीको प्रमाणित करते थे। निरन्तर भगवान् कमलाकान्तके नामामृतरसका आस्वादन करती हुई ध्रुवकी रसना अन्य लौकिक रसोंकी स्पृहा त्याग चुकी थी। उनकी घ्राणेन्द्रिय श्रीमुकुन्दके युगल चरणारविन्दोंकी सुगन्धसे परमानन्दमें निमग्न रहती थी। इसलिये वह और किसी गन्धको नहीं सूँघती थी। राजकुमार ध्रुवके शरीरकी त्वचा-इन्द्रिय भगवान् मधुसूदनके युगल चरणोंका स्पर्श करती हुई सम्पूर्ण स्पर्शसुखको प्राप्त कर लेती थी। उनकी समस्त इन्द्रियाँ शब्दादि सभी विषयोंके आधार एवं सारभूत परात्पर भगवान् दामोदरकी सेवामें संलग्न हो कृतार्थ हो गयी थीं। ध्रुवकी तपस्यारूपी सूर्यका उदय होनेपर तीनों लोक सन्तप्त होने लगे। इन्द्र, सोम, अग्नि, वरुण, वायु, कुबेर, यम और निर्ऋति आदि समस्त दिक्पाल अपना-अपना पद खो जानेके भयसे शंकित हो उठे। ध्रुव पृथ्वीपर जहाँ-जहाँ पाँव रखते थे, वहाँ-वहाँ वह महान् भारसे दबने लगती थी। उनके अंगके स्पर्शमें आये हुए समस्त जल अपनी मलिनताका परित्याग करके सरस एवं स्वच्छ हो गये थे। राजकुमारने कौस्तुभमणिसे उद्भासित वक्षवाले पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुका ध्यान करनेके कारण सम्पूर्ण विश्वको तेजोमय ही देखा। उनकी तपस्याके भयसे इन्द्रको बड़ी भारी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—'ध्रुव चाहे तो मेरा इन्द्रपद अवश्य हर लेगा। अप्सराओंका समूह उस बालकपर अपना कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। काम और क्रोध उसे विचलित करनेमें समर्थ न होंगे। उसे डिगानेके लिये एक ही उपाय है, उसके पास भयंकर आकारवाले भूतोंकी सेना भेजें। बालक होनेके कारण वह भूतोंसे डरकर निश्चय ही अपनी तपस्या त्याग देगा।' ऐसा निश्चय करके इन्द्रने भूतोंकी सेना भेज दी। उन भूतोंमेंसे कोई यक्षिणी किसीके रोते हुए शिशुको उठा लायी और उसकी कोख फाड़कर उसका रक्त पीने लगी। फिर उसने उसकी हड्डियोंको चबा डाला और ध्रुवको सम्बोधित करके कहा—'अरे! इसी बालककी भाँति तेरी हड्डियोंको भी चबाकर मैं आज प्यास लगनेपर तेरा रक्त पीऊँगी।' किसी भूतनीने बवंडर (तूफान)-का रूप धारण करके कितने ही वृक्षों और गिरि-शिखरोंको तोड़-फोड़कर आकाशके मार्गको ढँक दिया और उस बालकको कम्पित करने लगी। परंतु उन भूत-भूतनियोंका भय त्यागकर ध्रुव केवल भगवान् नारायणके ध्यानमें तत्पर रहे। भय दिखानेवाली भूतावलियोंने देखा—ध्रुवके चारों ओर भगवान्‌का सुदर्शनचक्र प्रज्वलित हो उठा है। वह मण्डलाकार चक्र सूर्यकी परिधिके समान अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था। भगवान्‌ने भूतावलियोंसे भक्तकी रक्षाके लिये उसे प्रकट किया था। उस चक्रको देख डरी हुई भूतोंकी सेना ध्रुवको नमस्कार करके जैसे आयी थी, वैसे ही लौट गयी।

ब्रह्मन्! तदनन्तर भयभीत हुए सम्पूर्ण देवता इन्द्रके साथ ब्रह्माजीकी शरणमें गये और उनको प्रणाम करके सबने उनका स्तवन किया। तत्पश्चात् बोलनेका अवसर देख इस प्रकार कहा—'पितामह! उत्तानपादके तेजस्वी पुत्रने तपस्या करके तीनों लोकोंके सम्पूर्ण निवासियोंको सन्तप्त कर दिया है। तात! ध्रुवका मनोरथ क्या है, यह हम अच्छी तरह नहीं जानते। पता नहीं, वह महातपस्वी बालक हमलोगोंमेंसे किसके पदको चाहता है।'

**देवताओंकी यह बात सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माजी हँसकर बोले—**देवताओ! ध्रुव ध्रुवपद (अविनाशी स्थान) प्राप्त करना चाहता है। अतः

७५६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उससे तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये। तुम सब लोग निश्चिन्त होकर जाओ। वह तुम्हारा पद नहीं लेना चाहता। ध्रुव भगवान्‌का भक्त है, उससे किसीको कहीं भी भय नहीं होना चाहिये। यह निश्चित है कि भगवान् विष्णुके भक्त दूसरोंको सन्ताप देनेवाले नहीं होते। देवेश्वर श्रीविष्णुकी आराधना करके उनसे अपनी मनोवांछित वस्तु प्राप्त करके ध्रुव तुम सब देवताओंके भी स्थानोंको स्थिर करेगा।

ब्रह्माजीकी कही हुई यह बात सुनकर देवता बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चले गये। इधर भगवान् विष्णु उस अनन्यशरण बालकको स्थिरचित्त देखकर गरुड़पर आरूढ़ हो उसके पास गये और इस प्रकार बोले—'महाभाग! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।' यह अमृतके समान वचन सुनकर ध्रुवने आँखें खोल दीं और देखा—इन्द्रनीलमणिके समान श्याम तेजका पुंज सामने प्रकाशित हो रहा है। पीताम्बरधारी, मेघके समान श्याम गरुड़वाहन भगवान् विष्णुको ध्रुवने देखा। देखते ही ध्रुव दण्डकी भाँति उनके चरणोंमें पड़ गये और सब ओर लोटने लगे। फिर जैसे दुःखी बालक दीर्घकालके बाद पिताको देखकर रोता है, उसी प्रकार वे फूट-फूटकर रोने लगे। उस समय भगवान्‌के कमल-समान नेत्रोंमें करुणापूर्ण अश्रुजल भर आया और उन्होंने अपने हाथसे ध्रुवको उठाया तथा उनके धूलिधूसरित अंगोंको प्रेमपूर्वक सहलाया। देवाधिदेव श्रीहरिके स्पर्शमात्रसे ध्रुवके मुखसे संस्कृतमयी शुभ वाणी प्रकट हुई और उन्होंने इस प्रकार स्तवन किया—

ध्रुव बोले—सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करनेवाले हिरण्यगर्भस्वरूप आपको नमस्कार है। आप उत्तम ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। समस्त भूतोंका संहार करनेवाले हरस्वरूप! आपको नमस्कार है। पंचमहाभूतस्वरूप तथा समस्त भूत-प्राणियोंके स्वामी आपको नमस्कार है। सर्वशक्तिमान् अथवा जगत्‌के उत्पादक, पालनकर्ता आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। विषयोंकी तृष्णा हर लेनेवाले सच्चिदानन्द श्रीकृष्णस्वरूप आपको नमस्कार है। कूर्म और वाराह आदि अवतारोंके रूप आप समस्त विश्वका महान् भार सहन करते हैं, आपको नमस्कार है। लक्ष्मीजीके स्वामी एवं सुदर्शनचक्र धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। पृथ्वीको अपने दाढ़ोंपर उठानेवाले आप वाराहरूपधारी परमात्माको नमस्कार है। वेदान्तोंद्वारा आप ही जानने योग्य हैं, आपको नमस्कार है। आप अपने वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप सत्त्वादि गुणस्वरूप तथा सगुण एवं निर्गुण ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है। आपकी नाभिसे ब्रह्माण्डरूपी कमल प्रकट हुआ है, आपको नमस्कार है। आप पाञ्चजन्य नामक शंख धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। देवकीनन्दन! आपको नमस्कार है। दामोदर! हृषीकेश! गोविन्द! अच्युत! माधव! उपेन्द्र! मधुसूदन! और अधोक्षज! आपको नमस्कार है। आपका कहीं अन्त नहीं है, इसलिये अनन्त कहलाते हैं। आपको नमस्कार है। आप अनन्त नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। रुक्मिणीके पति! आपको नमस्कार है। मुकुन्द! परमानन्द! नन्दगोपके प्रिय! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। गोपालरूप धारण करके वंशी बजानेवाले! आपको नमस्कार है। गोपीवल्लभ! गोवर्द्धनधारी! आपको नमस्कार है। आपमें योगीजन रमण करते हैं, इसलिये आप राम हैं, रघुकुलके स्वामी होनेसे रघुनाथ हैं तथा रघुवंशमें अवतार ग्रहण करनेके कारण आप राघव कहलाते हैं। आपको बार-बार नमस्कार है। विभीषणको आश्रय देनेवाले आपको नमस्कार है। आप अजन्मा एवं जयस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। क्षण, निमेष आदि जितने कालभेद हैं, वे सब आपके ही स्वरूप हैं। आप अनेक रूप धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप शाङ्गि

ध्रुवकी सफल साधना

७५८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नामक धनुष, कौमोदकी गदा और सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप गौओं और ब्राह्मणोंके हितकारी हैं, आपको नमस्कार है। धर्मस्वरूप आपको नमस्कार है। सत्त्वगुण धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक हैं, आप परम पुरुष परमेश्वर हैं, आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों नेत्र, सहस्रों चरण, सहस्रों किरणें और सहस्रों मूर्तियाँ हैं, आपको नमस्कार है। श्रीकान्त ! यज्ञपुरुष ! आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य है और वेद आपको बहुत प्रिय हैं, आपको नमस्कार है। वेदस्वरूप, वेदोंके वक्ता और सदाचारके पथपर चलनेवाले आपको नमस्कार है। आप वैकुण्ठधामस्वरूप तथा वैकुण्ठधामके निवासी हैं, आपको नमस्कार है। विस्तृत यशवाले आप भगवान् गरुड़वाहनको नमस्कार है। विष्वक्सेन ! आपको नमस्कार है। जगन्मय जनार्दन ! आपको नमस्कार है। आप अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको माप लेनेवाले, सत्यस्वरूप तथा सत्यप्रिय हैं, आपको नमस्कार है। केशव ! आपको नमस्कार है। आप मायाशक्तिसे सम्पन्न हैं और वेदोंके गायक हैं अथवा ब्रह्म नामसे आपकी महिमाका गान किया जाता है, आपको नमस्कार है। आप तपःस्वरूप और तपस्याका फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही स्तवन करनेयोग्य देवता हैं, स्तुति भी आपका ही स्वरूप है तथा आप अपने भक्तजनोंकी स्तुतिमें तत्पर रहते हैं, आपको नमस्कार है। आप श्रुतिरूप हैं और श्रुतियोंमें प्रतिपादित सदाचार आपको विशेष प्रिय है, आपको नमस्कार है। अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज सभी जीव आपके स्वरूप हैं; उन सभी रूपोंमें आपको नमस्कार है। आप देवताओंमें इन्द्र, ग्रहोंमें सूर्य, लोकोंमें सत्यलोक, समुद्रोंमें क्षीरसागर, नदियोंमें गंगा, सरोवरोंमें मानस, पर्वतमें हिमवान्, धेनुओंमें कामधेनु, धातुओंमें सुवर्ण, पत्थरोंमें स्फटिक, फूलोंमें नीलकमल, वृक्षोंमें तुलसी, सम्पूर्ण पूजनीय | शिलाओंमें शालग्राम शिला, मुक्तिदायक क्षेत्रोंमें काशी, तीर्थोंमें प्रयाग, रंगोंमें श्वेत रंग, मनुष्योंमें ब्राह्मण, पक्षियोंमें गरुड़, कर्मेन्द्रियोंमें वाणी, वेदोंमें उपनिषद्, मन्त्रोंमें प्रणव, अक्षरोंमें अकार, यज्ञकर्ताओंमें सोमरूपधारी, प्रतापियोंमें अग्नि, क्षमाशीलोंमें क्षमा (पृथ्वी), दाताओंमें मेघ, पवित्रोंमें परम पवित्र, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंमें धनुष, वेगवानोंमें वायु, इन्द्रियोंमें मन, भयशून्य अंगोंमें हाथ, व्यापक वस्तुओंमें आकाश, आत्माओंमें परमात्मा, सम्पूर्ण नित्यकर्मोंमें सन्ध्योपासना, यज्ञोंमें अश्वमेध-यज्ञ, दानोंमें अभयदान, लाभोंमें पुत्रलाभ, ऋतुओंमें वसन्त, युगोंमें प्रथम (सत्ययुग), तिथियोंमें अमावास्या, नक्षत्रोंमें पुष्य, सब पर्वोंमें संक्रान्ति, योगोंमें व्यतीपात, तृणोंमें कुश और सब पुरुषार्थोंमें मोक्ष हैं। अजन्मा प्रभो! सम्पूर्ण बुद्धियोंमें आप धर्मबुद्धि हैं, सब वृक्षोंमें पीपल हैं, लताओंमें सोमलता हैं, समस्त पवित्र साधनोंमें प्राणायाम हैं तथा सम्पूर्ण शिवलिंगोंमें आप सब कुछ देनेवाले साक्षात् विश्वनाथ हैं। मित्रोंमें पत्नी और सब बन्धुओंमें धर्म आप ही हैं। नारायण ! इस चराचर जगत्में आपसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है। आप ही माता, आप ही पिता, आप ही सुहृद्, आप ही महान् वैभव, आप ही सौख्य-सम्पत्ति तथा आप ही आयु और जीवनके स्वामी हैं। वही कथा है, जहाँ आपके नामकी महिमा बतायी जाती है। वही मन है, जो आपको समर्पित होता है। वही कर्म है, जो आपकी प्रसन्नताके लिये किया जाता है और वही तपस्या है, जिससे आपकी स्मृति होती है। धनियोंका वही धन शुद्ध है, जो आपके लिये व्यय किया जाता हो। विष्णो ! वही काल सफल है, जिसमें आपकी पूजा होती है। यह जीवन तभीतक कल्याणकारी है, जबतक हृदयमें आपका चिन्तन होता रहता है। आपका चरणोदक पीनेसे सब रोग शान्त हो जाते हैं। गोविन्द ! आपके वासुदेव नामका कीर्तन करनेसे अनेक जन्मोंद्वारा उपार्जित महान् पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। अहो! मनुष्योंमें कैसा अद्भुत महान् मोह

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *
७५९


है, कैसा प्रमाद है कि वे भगवान् वासुदेवकी अवहेलना करके दूसरोंको रिझानेके लिये परिश्रम करते हैं। भगवान्के नामोंका जो कीर्तन किया जाता है, वही परम मंगल है, वही धनका उपार्जन है और वही जीवनका फल है। भगवान् अधोक्षज (विष्णु)-से भिन्न कोई धर्म नहीं है, नारायणसे परे कोई अर्थ नहीं है, केशवसे भिन्न कोई काम नहीं है और श्रीहरिके बिना मोक्ष नहीं है। भगवान् वासुदेवका स्मरण और ध्यान न हो तो यही सबसे बड़ी हानि है, यही महान् उपद्रव है और यही बड़ा भारी दुर्भाग्य है। अहो! भगवान् विष्णुकी आराधना मनुष्योंके लिये क्या-क्या नहीं करती। पुत्र, मित्र, स्त्री, धन, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ तो वही देती है। श्रीहरिकी आराधना पापको हर लेती है, रोगोंका नाश करती है और मानसिक चिन्ताओंको मिटा देती है। इतना ही नहीं, वह धर्मको बढ़ाती और शीघ्र ही मनोवांछित वस्तु प्रदान करती है। यदि पापी भी प्रसंगवश भी भगवान्के युगल चरणोंका निर्द्वन्द्व ध्यान करता है, तो वह उसके लिये परम हितकी बात है। पापियोंके जो महापाप और सामान्य पाप हैं, उन सबको भगवान्के ध्यानपूर्वक किया हुआ नामोच्चारण अविलम्ब हर लेता है। जैसे आगकी चिनगारी भूलसे भी छू जाय तो वह जला ही देती है, उसी प्रकार होठोंसे श्रीहरिनामका स्पर्श होते ही वह समस्त पापोंको हर लेता है*। जो अपने चित्तको शान्त करके उसे क्षणभर भी कमलाकान्तके चिन्तनमें लगाता है तो उसके यहाँ लक्ष्मी निश्चल होकर रहती है। भगवान् विष्णुका चरणामृत पान करना ही सबसे बड़ा धर्म है, यही सर्वोत्तम तप है और यही सर्वोत्कृष्ट तीर्थ है। यज्ञपुरुष! जो आपको भोग लगाये हुए नैवेद्यका प्रसाद भक्तिपूर्वक ग्रहण करता है, उस परम बुद्धिमान् मनुष्यने मानो निश्चय ही यज्ञका पुरोडाश प्राप्त कर लिया। जो मनुष्य भगवान् विष्णुका चरणोदक शंखमें रखकर उससे अपने सिर आदि अंगोंका अभिषेक करता है, वही अवभृथ-स्नान करता है और वही गंगाजीके जलमें गोता लगाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा इतर जातिका मनुष्य, कोई भी क्यों न हो, यदि वह भगवान् विष्णुकी भक्तिसे युक्त है तो उसे सर्वश्रेष्ठ जानना चाहिये। जो प्रतिदिन द्वारकाके गोमतीचक्रके साथ शालग्रामकी बारह शिलाओंका पूजन करता है, वह वैकुण्ठधाममें प्रतिष्ठित होता है। जिसके घरमें प्रतिदिन तुलसीकी पूजा होती है, उसके घरमें कभी यमराजके दूत नहीं जाते। जिसके मुखमें भगवन्नामके अक्षर हों, ललाटमें गोपीचन्दनका तिलक हो और जिसका वक्षःस्थल तुलसीकी मालासे सुशोभित हो, उसे यमराजके दूत छू नहीं सकते। गोपीचन्दन, तुलसी, शंख, शालग्राम शिला और गोमतीचक्र—ये पाँच वस्तुएँ जिसके घरमें विद्यमान हैं, उसे पापका भय कैसे हो सकता है। जो मुहूर्त, जो क्षण, जो काष्ठा और जो निमेष भगवान् विष्णुका स्मरण किये बिना बीत जाते हैं, उन्हींमें मनुष्य यमके द्वारा लूटा जाता है। कहाँ तो आगकी जलती हुई चिनगारियोंके समान हरि-नामके दो अक्षर और कहाँ रूईकी ढेरीके समान पातकोंकी बड़ी भारी राशि। मैं तो गोविन्द, परमानन्द, मुकुन्द एवं मधुसूदन आदि नामोंवाले भगवान् विष्णुको छोड़कर दूसरेको नहीं जानता, नहीं भजता और नहीं स्मरण करता हूँ। श्रीहरिके बिना मैं दूसरेको न तो नमस्कार करता हूँ, न उसकी स्तुति करता हूँ, न नेत्रोंसे उसे देखता हूँ, न शरीरसे उसका स्पर्श करता हूँ, न उसके पास जाता हूँ और न उसकी महिमाके गीत ही गाता हूँ। मैं जलमें, स्थलमें, पातालमें, अग्निमें, वायुमें, पर्वतमें, विद्याधरमें, असुर और देवताओंमें, किन्नरमें, वानरमें, नरमें, तिनकेमें, स्त्रियोंके समुदायमें, पत्थरमें, वृक्ष, झाड़ी और लताओंमें, सर्वत्र श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित वक्षवाले श्यामसुन्दर श्रीहरिको ही देखता हूँ। प्रभो! आप सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे निवास करते हैं। आप ही सबके साक्षात् साक्षी हैं। अपने बाहर और भीतर आप सर्वव्यापी


* प्रमादादपि संस्पृष्टो यथानलकणो दहेत् । तथौष्ठपुटसंस्पृष्टं हरिनाम हरेदघम् ॥ (स्क० पु०, का० पू० २१। ५७)