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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

७४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सम्पूर्ण पितरोंका उद्धार कर देता है। जैसे गयामें पिण्ड देनेसे पितर तृप्त होते हैं, उसी प्रकार इस चन्द्रोदकुण्डके समीप श्राद्ध करनेसे भी उनकी तृप्ति होती है। काशीक्षेत्रमें निवास करनेवाले लोगोंको तारकमन्त्रके ज्ञानकी प्राप्तिके लिये चैत्रकी महापूर्णिमाको यहाँ यात्रा करनी चाहिये। यह यात्रा इस क्षेत्रके निवासमें आनेवाले विघ्नका निवारण करनेवाली है। काशीसे अन्यत्र निवास करनेवाला पुरुष भी यदि यहाँ आकर चन्द्रेश्वरकी भलीभाँति पूजा कर ले तो वह पापराशिका भेदन करके चन्द्रलोकको प्राप्त होगा। सोमवारका व्रत करनेवाले और सोमयागमें सोमरस पीनेवाले मनुष्य चन्द्रमाके समान प्रकाशमान विमानद्वारा जाकर सोमलोकमें ही निवास करते हैं।

अगस्त्यजी कहते हैं—प्रिये! भगवान्‌के दोनों दिव्य पार्षद उस दिव्य मार्गमें शिवशर्माको यह कल्याणकारिणी कथा सुनाते हुए परम उज्ज्वल नक्षत्रलोकमें जा पहुँचे।

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बुधलोक और शुक्रलोककी स्थिति, बुध और शुक्रके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति और वरदान-प्राप्ति

अगस्त्यजी कहते हैं—तदनन्तर शिवशर्माको बुधका लोक दृष्टिगोचर हुआ। तब उन्होंने पूछा—'भगवत्पार्षदो! यह अनुपम लोक किसका है?'

भगवान्‌के पार्षदोंने कहा—शिवशर्मन्! यह चन्द्रमाके पुत्र बुधका लोक है। बुध अपने पिता चन्द्रदेवकी आज्ञा लेकर काशीपुरीमें गये। वहाँ उन्होंने अपने नामसे बुधेश्वरको स्थापित किया और हृदयमें भगवान् शिवका ध्यान करते हुए दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। तब सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी विश्वभावन भगवान् विश्वनाथ बुधेश्वर नामसे प्रकट हुए। उनका स्वरूप ज्योतिर्मय था। वे प्रसन्नचित्त होकर बोले—'बुध! तुम वर माँगो।'

बुध बोले—पूतात्मा वायुरूप! आपको नमस्कार है (अथवा पवित्र अन्तःकरणवाले आप परमेश्वरको नमस्कार है)। ज्योतिःस्वरूप महेश्वर! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपका ही स्वरूप है, आपको नमस्कार है। आप रूपसे अतीत, निराकार हैं, आपको नमस्कार है। सबकी पीड़ाओंका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। शरणागतोंके लिये कल्याणरूप आपको नमस्कार है। आप सबके ज्ञाता और सर्वस्रष्टा हैं, आपको नमस्कार है। आप परम दयालु हैं, आपको नमस्कार है। भक्तिभावसे आप प्राप्त होने योग्य हैं, आपको नमस्कार है। आप तपस्याओंका फल देनेवाले और तपःस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। शम्भो! शिव! शिवाकान्त! शान्त! श्रीकण्ठ! शूलपाणे! चन्द्रशेखर! सर्वेश! शंकर! ईश्वर! धूर्जटे! पिनाकपाणे! गिरीश! शितिकण्ठ! सदाशिव! महादेव! आपको नमस्कार है। देवदेव! आपको नमस्कार है। स्तुतिप्रिय महेश्वर! मैं स्तुति करना नहीं जानता। आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी निश्चल भक्ति हो।

उनकी स्तुतिसे प्रसन्न हो भगवान् महेश्वर बोले—महाभाग! तुम्हारा स्थान नक्षत्रलोकसे ऊपर होगा और तुम समस्त ग्रहोंमें अधिक सम्मान प्राप्त करोगे। तुम्हारे द्वारा स्थापित की हुई यह मेरी मूर्ति सबको बुद्धि देनेवाली, दुर्बुद्धि हरनेवाली और तुम्हारे लोकमें निवास देनेवाली है। ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीका प्रसाद प्राप्त करके बुध पुनः स्वर्गलोकमें लौट आये।

काशीमें बुधेश्वरकी पूजासे उत्तम बुद्धि पाकर मनुष्य अगाध संसारसागरमें प्रवेश करते हुए डूब नहीं सकता और अन्तमें वह बुधलोकमें निवास करता है। चन्द्रेश्वरके पूर्वभागमें बुधेश्वरका दर्शन

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७४७

करके मनुष्य मृत्युकालमें भी कभी बुद्धिसे हीन नहीं होता।

महामते शिवशर्मन्! बुधलोकसे ऊपर यह परम अद्भुत शुक्रलोक है। यहाँ दानवों और दैत्योंके गुरु शुक्राचार्य निवास करते हैं, जिन्होंने सहस्र वर्षोंतक तपस्या करके महादेवजीसे मृत्युसंजीवनी नामवाली महाविद्या प्राप्त की थी। इस दुर्लभ विद्याको देवगुरु बृहस्पति भी नहीं जानते। भृगुवंशी शुक्रने अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज—इन चार प्रकारके प्राणियोंको मुक्ति प्रदान करनेवाली काशीपुरीमें जाकर एक शिवपूर्तिको स्थापित किया और बिल्वपत्र आदि सहस्रों प्रकारके पत्तों और पुष्पोंसे उसका भलीभाँति पूजन किया। चन्दन और यक्षकर्दमसे लेपन किया। सुगन्धित उबटन लगाया, नृत्य और गीतसे भी भगवान्‌को रिझाया तथा भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री समर्पित करके सहस्रनाम आदि स्तोत्रोंसे भगवान् शंकरका स्तवन किया। इस प्रकार पाँच हजार वर्षोंतक शुक्राचार्यने भगवान् शिवकी भलीभाँति आराधना की। तत्पश्चात् इन्द्रियोंसहित चित्तके चांचल्य (विक्षेप)-रूपी महान् मलको ध्यानरूपी जलसे धोकर अपने निर्मल किये हुए चित्तरत्नको उन्होंने पिनाकपाणि भगवान् शिवकी सेवामें समर्पित कर दिया। तब भगवान् शंकर प्रसन्न हो सहस्रों सूर्योंसे भी अधिक तेजस्वी रूप धारण कर उस मूर्तिसे प्रकट हुए और बोले—'भृगुनन्दन! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।'

भगवान् शंकरका वचन सुनकर शुक्राचार्यने दोनों हाथ जोड़ जय-जयकार करते हुए उनका इस प्रकार स्तवन किया। 'सूर्यस्वरूप जगदीश्वर! आप अपनी प्रभासे निशाचरोंको प्रिय लगनेवाले अन्धकारको तिरस्कृत करके उसे सर्वथा विलुप्त कर देते और तीनों लोकोंके हितके लिये आकाशमें देदीप्यमान होते हैं, अतः आपको नमस्कार है। हे चन्द्रस्वरूप शिव! आप अमृतमयी किरणोंसे परिपूर्ण हैं, समस्त अन्धकारको दूर भगानेवाले और परम सुन्दर हैं। आप संसारमें निरन्तर असीम एवं महान् प्रकाश फैलाकर कुमुद पुष्पोंको प्रमोद देते तथा संसारके प्राणियोंके लिये आनन्दका समुद्र उड़ेल देते हैं। इतना ही नहीं, आप समुद्रको भी आनन्दसे परिपूर्ण करते हैं, अतः आपको नमस्कार है। हे वायुरूप परमेश्वर! आप नम्रता एवं विनयसे रहित चराचर जगत्‌को भग्न करनेवाले हैं, सब जीवोंको अपनी प्राणशक्ति देकर बढ़ानेवाले हैं, वायुभक्षी सर्पोंको सन्तुष्ट करनेवाले हैं, सर्वव्यापी! आप सदा पावन पथपर चलते हुए सबके उपास्य हैं। सम्पूर्ण जगत्‌को जीवन प्रदान करनेवाले देव! आपके बिना इस संसारमें कौन जीवित रह सकता है, आपको नमस्कार है। हे अग्निस्वरूप महेश्वर! आप सम्पूर्ण जगत्‌के एकमात्र पवित्र करनेवाले और प्रणतजनोंके रक्षक हैं, अमृतब्रह्मस्वरूप हैं। सम्पूर्ण विश्वके अन्तरात्मा पावक! क्या आपकी पावनशक्तिके बिना यह आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक जगत् कभी जीवित रह सकता है? कदापि नहीं। आपको किया हुआ नमस्कार प्रतिक्षण शान्ति देनेवाला होता है। जलस्वरूप परमेश्वर! आप सम्पूर्ण जगत्‌में परम पवित्र हैं,

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आपका उत्तम चरित्र परम विचित्र है। हे विश्वनाथ ! आप इस विचित्र जगत्‌को जलपान और स्नानकी सुविधा देकर निश्चय ही बाहर-भीतरसे पवित्र एवं निर्मल कर देते हैं, अतः आपको मैं नमस्कार करता हूँ। हे आकाशस्वरूप महादेव ! हे ईश्वर ! आपके द्वारा बाहर और भीतरसे अवकाश मिलनेके कारण यह सम्पूर्ण विश्व नित्य विकसित होता रहता है। सदा सबपर दया रखनेवाले प्रभो ! आपसे ही यह जगत् जीवन धारण करता है और आपमें ही स्वभावतः इसका लय होता है, अतः मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे पृथ्वीरूप परमेश्वर ! हे विभो ! हे विश्वनाथ ! हे अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले शिव ! इस सम्पूर्ण विश्वको यहाँ आपके सिवा दूसरा कौन धारण करता है? गिरिराजनन्दिनी उमा और नागराज वासुकि आपके आभूषण हैं, आप परात्पर हैं। शान्ति, क्षमा आदि गुणोंसे विभूषित देवताओंमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई स्तवन करने योग्य नहीं है। अथवा शम, दम आदि साधनोंसे सम्पन्न संत-महात्माओंके द्वारा स्तवन करने योग्य आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे आत्मस्वरूप शिव ! हे अज्ञानका अपहरण करनेवाले हर ! सबके अन्तरात्मामें निवास करनेवाले परमात्मस्वरूप ! अष्टमूर्ते ! आपकी इन रूप-परम्पराओं—सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश और आत्मा—इन आठ मूर्तियोंसे यह समस्त चराचर जगत् व्याप्त है। आप प्रत्येक रूपमें व्यापक होनेके कारण तदनुरूप प्रतीत होते हैं, अतः मैं सदा आपको नमस्कार करता हूँ। प्रभो ! प्रणतजनोंको प्राप्त होनेवाले सम्पूर्ण अर्थसमूहोंमें आप ही परमार्थस्वरूप हैं। भगवती उमा आपके चरणारविन्दोंकी वन्दना करती हैं। आप वन्दनीय पुरुषोंके द्वारा भी अतिशय वन्दनीय हैं। आप ही इस विश्वके उत्पादक हैं। आपकी मूर्ति सम्पूर्ण विश्वके प्राणियोंका हित साधन करनेवाली है। आपकी पूर्वोक्त आठ मूर्तियोंद्वारा यह विशाल जगत् व्याप्त है, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ।'

भृगुनन्दन शुक्रने अष्टमूर्त्यष्टक स्तोत्रसे इस प्रकार अपने इष्टदेव शिवकी स्तुति करके धरतीपर मस्तक टेककर उन्हें बार-बार प्रणाम किया। तब महादेवजीने उन्हें अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर उठाया और इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन्‌! मेरे द्वारा तपोबलसे प्रकट की हुई जो मेरी मृतसंजीवनी नामक निर्मल विद्या है, उस मन्त्ररूपा विद्याका ज्ञान आज मैं तुम्हें कराऊँगा। उस विद्याके लिये तुम्हारी योग्यता है। तुम जिस-जिस व्यक्तिके लिये इस विद्याका जप करोगे, वह-वह निश्चय ही जीवित हो उठेगा। आकाशमें तुम्हारा तेज सब नक्षत्रोंसे भी अधिक प्रकाशित होगा। तुम ग्रहोंमें श्रेष्ठ माने जाओगे। तुम्हारे उदय होनेपर ही विवाह आदि शुभ एवं धार्मिक कार्य सफल होंगे। तुम्हारे द्वारा स्थापित किये हुए इस शुक्रेश्वरका जो मनुष्य पूजन करेंगे, उन्हें सिद्धि प्राप्त होगी। जो एक वर्षतक प्रति शुक्रवारको केवल रात्रिमें भोजन करनेका नियम लेंगे और तुम्हारे दिनमें शुक्रकूपमें स्नान करके तर्पण आदि कर्म करनेके पश्चात् शुक्रेश्वरकी पूजा करेंगे, वे मनुष्य अधिक वीर्यवान्, पुत्रवान्, सौभाग्यशाली एवं सुखी होंगे।' यह वरदान देकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये।

जो शुक्रेश्वरके भक्त होते हैं, वे शुक्रलोकमें निवास करते हैं। शुक्रेश्वर विश्वनाथके दक्षिण भागमें है। उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य शुक्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। महामते ! इस प्रकार तुम्हें शुक्रलोककी स्थिति बतायी गयी।

अगस्त्यजी कहते हैं—प्रिये ! इस प्रकार शुक्रलोककी कथा सुनते हुए शिवशर्माने अपने समीप मंगललोकको देखा।

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  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७४९

मंगल, बृहस्पति और शनिके लोकोंकी स्थिति

शिवशर्माने पूछा- यह किसका लोक है? भगवत्पार्षदोंने कहा-शिवशर्मन्! यह मंगलग्रहका लोक है। मंगलकी उत्पत्ति पृथ्वीसे हुई है, पृथ्वीमाताने ही उनका स्नेहपूर्वक पालन-पोषण किया है। जहाँ जगत्‌का हित करनेवाली असी और वरणा नामक दो शोभायमान नदियाँ उत्तरवाहिनी गंगासे मिली हैं, जहाँ मृत्युको प्राप्त हुए देहधारी जीव भगवान् विश्वनाथका महान् अनुग्रह प्राप्त करके अमृतमय ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं, उस काशीपुरीमें जाकर मंगलने अपने नामसे अंगारकेश्वरको स्थापित किया और वहाँ वे तबतक तपस्या करते रहे जबतक कि उनके शरीरसे प्रज्वलित अंगारके समान तेज नहीं निकला। अंगारके समान तेज प्रकट होनेसे वे सब लोकोंमें अंगारक नामसे विख्यात हुए। तदनन्तर उनसे सन्तुष्ट हुए महादेवजीने उन्हें महान् ग्रहका पद प्रदान किया। जो मनुष्य अंगारकचतुर्थीको उत्तरवाहिनी गंगाके जलमें स्नान करके अंगारकेश्वरकी पूजा और उन्हें नमस्कार करेंगे, उन्हें कभी कहीं भी ग्रहजनित पीड़ा नहीं होगी।

अगस्त्यजी कहते हैं- इस प्रकार सुन्दर एवं पुण्यमयी कथा कहते हुए भगवत्पार्षदोंको देवगुरु बृहस्पतिकी पुरी दृष्टिगोचर हुई।

शिवशर्माने पूछा- यह किसकी पुरी है? भगवत्पार्षदोंने कहा-सखे! प्रजापति अंगिराके पुत्र देवपूज्य बृहस्पति हुए। वे अपनी बुद्धिसे देवताओं और विद्वानोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। शान्त और जितेन्द्रिय हैं, उन्होंने क्रोधको जीत लिया है। उनकी वाणी मधुर और अन्तःकरण निर्मल है। वे वेदों और वेदार्थोंके तत्त्वज्ञ, समस्त कलाओंमें कुशल, निर्मल, समस्त शास्त्रोंमें पारंगत तथा नीतिविद्याके विशेषज्ञ हैं। वे हितका उपदेश करनेवाले, हितकारक, रूपवान्, सुशील, गुणवान्, देश-कालको जाननेवाले, समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और गुरुजनोंके प्रति भक्ति रखनेवाले हैं। उन्होंने काशीमें तपस्वीजनोंकी वृत्तिका आश्रय लेकर और शिवजीकी मूर्तिकी स्थापना करके बड़ी भारी तपस्या की। तब भगवान् शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले- 'बृहस्पते! वर माँगो।' भगवान् शंकरको अपने सामने उपस्थित देख बृहस्पतिजी हर्षमें भर गये और इस प्रकार स्तुति करने लगे- 'चन्द्रमाके समान गौर कान्तिवाले, शान्तस्वरूप शंकर! आपकी जय हो। आप रुचिके अनुकूल मनोहर पदार्थों एवं चारों पुरुषार्थोंको देनेवाले हैं। सर्वस्वरूप, सब कुछ देनेवाले तथा नित्य शुद्ध हैं। पवित्र भक्तोंद्वारा शुद्धभावसे दी हुई महती उपहार-सामग्रीको ग्रहण करते हैं। भक्तजनोंपर आयी हुई घोर सन्ताप-परम्पराका आप नाश करनेवाले हैं। आपने सबके हृदयाकाशको व्याप्त कर रखा है। प्रणतजनोंको आप मनोवांछित वर देनेवाले हैं। शरणागत भक्तोंके पापरूपी महान् वनको जलानेके लिये दावानलस्वरूप हैं। अपने शरीरसे भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते रहते हैं। आपका श्रीअंग परम सुन्दर है। आप कामदेवके बाणोंको सुखा देनेवाले हैं। धैर्यनिधे! आपकी जय हो। आप मृत्यु आदि विकारोंसे सर्वथा रहित हैं तथा अपने चरणोंमें प्रणाम करनेवाले भक्तजनोंको भी मृत्यु आदि विकारोंसे रहित कर देते हैं। पुण्यात्मा पुरुषोंका मनोरथ पूर्ण करते और सर्पोंको आभूषणरूपमें धारण करते हैं। आपका वामांग भाग गिरिराजनन्दिनी उमासे व्याप्त है। आपने अपने सर्वव्यापी स्वरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। तीनों लोक आपके ही स्वरूप हैं, फिर भी आप इन सभी

७५०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रूपोंसे परे हैं। आपकी दृष्टि बड़ी सुन्दर है। आप अपने नेत्रोंके खोलने-मीचनेसे जगत्‌की सृष्टि और प्रलय करनेवाले हैं। आपने ही अग्निदेवको प्रकट किया है। जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले भूतनाथ! एकमात्र आप ही प्रमथगणोंके पालक और स्वामी हैं। अपनी शरणमें आये हुए पतितजनोंपर भी आप अपना वरद हस्त फैलाते रहते हैं। आप सम्पूर्ण भूतलमें फैले हुए आवरणका निवारण करनेवाले तथा प्रणवनादरूपी सुधाधौलिगृहमें निवास करनेवाले हैं। आपने चन्द्रमाको अपने ललाटमें धारण कर रखा है। गिरिराजकुमारी पार्वतीके द्वारा सर्वथा सन्तुष्ट रहनेवाले शिव! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। शिव! देव! गिरीश! महेश! विभो! आप वैभव प्रदान करनेवाले और कैलास पर्वतपर सोनेवाले हैं। पार्वतीवल्लभ! आप सबको सुख देनेवाले हैं। चन्द्रधर! आप भक्तिका विघात करनेवाले दुष्टोंको कठोर दण्ड देनेवाले हैं। तीनों लोकोंको सुखी बनाइये। सबकी पीड़ा हरनेवाले महादेव! मैं कालसे भी नहीं डरता। अमोघमते! आप शीघ्र मेरी पापराशिका विनाश कीजिये। शिवके चरणारविन्दोंमें नमस्कार करनेके सिवा दूसरी किसी विचारधाराको मैं जीवोंके लिये कल्याणकारी नहीं मानता, अतः आपके चरणोंमें ही मस्तक झुकाता हूँ। इस सम्पूर्ण विशाल जगत्‌में भगवान् शिवको सन्तुष्ट करना ही सब पापोंका नाशक तथा परम गुणकारी है। हे ईश! आप त्रिगुणमय प्रपंचसे अतीत, नागराज वासुकिका महान् कंगन धारण करनेवाले तथा प्रलयकालमें सबका विनाश करनेवाले हैं, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ।'

इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके बृहस्पतिजी मौन हो गये। इस स्तुतिसे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने कहा—'ब्रह्मन्! तुमने बृहत् तप किया है, इसलिये बृहत् अर्थात् बड़े-बड़े देवताओंके पति (पालक) बने रहो। तुम ग्रहोंमें बृहस्पति नामसे पूजित होओ। तीन वर्षोंतक तीनों समय इस स्तोत्रका पाठ करनेसे जिस पुरुषके प्रति सरस्वती उदित हों, उसकी वाणी संस्कृत होगी*। इस स्तोत्रके पाठसे किसीकी दुराचारमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। तुम्हारे द्वारा स्थापित की हुई इस मूर्तिकी पूजा करके इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला पुरुष मनोवांछित फल प्राप्त करेगा। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह मूर्ति काशीमें बृहस्पतीश्वरके नामसे विख्यात होगी। बृहस्पतिवार और पुष्य नक्षत्रके योगमें इसकी पूजा करके मनुष्य जो कार्य प्रारम्भ करेंगे, उसमें उन्हें सिद्धि प्राप्त होगी। चन्द्रेश्वरके दक्षिण और वीरेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें स्थित बृहस्पतीश्वरका पूजन करके मनुष्य बृहस्पतिलोकमें सम्मानित होगा।'

अगस्त्यजी कहते हैं—लोपामुद्रे! बृहस्पति-लोकके ऊपर जाकर शिवशर्माने शनिका लोक देखा और उसके विषयमें प्रश्न किया। तब दोनों भगवत्पार्षदोंने कहा—'ब्रह्मन्! यह सूर्यके पुत्र शनिकी पुरी है। भगवान् सूर्यसे सवर्णाके गर्भसे शनैश्चरकी उत्पत्ति हुई। शनैश्चरने देववन्दित काशीपुरीमें जाकर शिवलिंग स्थापित किया और उसके समीप बड़ी भारी तपस्या करके शिवपूजनके प्रभावसे इस शनिलोकको तथा ग्रहकी पदवीको प्राप्त किया। काशीमें परम सुन्दर शनैश्चरेश्वरका दर्शन करके शनिवारको उनकी पूजा करनेसे शनैश्चरकी बाधा नहीं होती है। विश्वनाथजीसे दक्षिण और शुक्रेश्वरसे उत्तर भागमें शनैश्चरेश्वरकी पूजा करके मनुष्य इस शनिलोकमें आनन्दका भागी होता है।'


\* अस्य स्तोत्रस्य पठनादपि वागुदियाच्च यम्। तस्य स्यात्संस्कृता वाणी त्रिभिर्वर्षैस्त्रिकालतः॥  
(स्क० पु०, का० पू० १७ । ४६)
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७५१

सप्तर्षिलोक और ध्रुवलोककी स्थिति, ध्रुवकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति

अगस्त्यजी कहते हैं—तदनन्तर शिवशर्माने सप्तर्षिमण्डलको अपने नेत्रोंसे देखा और पूछा—'यह अनुपम तेजोमय शुभ लोक किसका है?'

दोनों भगवत्पार्षदोंने कहा—ब्रह्मन्! इस लोकमें सदा निर्मल अन्तःकरणवाले सप्तर्षि निवास करते हैं। ब्रह्माजीके द्वारा सृष्टिकार्यमें नियुक्त होकर वे यहीं रहते हैं। मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा और महाभाग वसिष्ठ—ये ब्रह्माजीके मानसपुत्र हैं। पुराणोंमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। सम्भूति, अनसूया, क्षमा, प्रीति, सन्नति, स्मृति और अरुन्धती—ये क्रमशः इन सात ऋषियोंकी पत्नियाँ हैं, जो लोकमाता कही गयी हैं। इन सप्तर्षियोंने काशीक्षेत्रमें जाकर अपने-अपने नामसे एक-एक शिव-मूर्ति स्थापित की और शिवमें बड़ी भक्ति रखकर अत्यन्त कठोर तपस्या प्रारम्भ की। इनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने इन्हें प्रजापतिका पद दिया। जो लोग प्रयत्नपूर्वक काशीमें अत्रीश्वर आदि शिव-मूर्तियोंका दर्शन करते हैं, वे उज्ज्वल तेजसे सम्पन्न हो इस प्राजापत्यलोकमें निवास करते हैं। अत्रीश्वर लिंग गोकर्णेश्वरकुण्डके पश्चिम तटपर प्रतिष्ठित है। कर्कोटककुण्डके ईशानकोणमें मरीचिकुण्ड है। वहीं मरीचीश्वर-संज्ञक शिवलिंग प्रतिष्ठित है। पुलहेश्वर और पुलस्त्येश्वर लिंग स्वर्गद्वारके पश्चिम भागमें हैं। आंगिरसेश्वर लिंग हरिकेश वनमें स्थित है। वसिष्ठेश्वर लिंग वरणा नदीके रमणीय तटपर है। क्रत्वीश्वर लिंग भी वहीं है। शुभकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंद्वारा काशीतीर्थमें सेवित होनेपर ये सातों लिंग इहलोक और परलोकमें मनोवांछित फल देते हैं। इस सप्तर्षिलोकमें महापुण्यमयी पतिव्रता एवं परम सुन्दरी वसिष्ठपत्नी अरुन्धती रहती हैं, जिनके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य गंगास्नानका फल पाता है। भगवान् नारायण अरुन्धतीके पातिव्रत्यसे सन्तुष्ट होकर लक्ष्मीजीके सामने प्रसन्नतापूर्वक उनकी चर्चा किया करते हैं और कहते हैं—'कमले! पतिव्रताओंमें अरुन्धतीका अन्तःकरण जैसा शुद्ध है, वैसा कहीं किसीका भी नहीं है। वैसा रूप, वैसा शील-स्वभाव, वैसी कुलीनता, वह कला-कौशल, वह पतिसेवापरायणता, वह माधुर्य, वह गम्भीरता और वह गुरुजनोंको सन्तुष्ट रखनेका भाव जैसा अरुन्धती देवीमें है, वैसा अन्य स्त्रियोंमें कहीं नहीं है। जो वार्तालापके प्रसंगमें अरुन्धतीका नाम भी लेती हैं, वे युवतियाँ संसारमें धन्य हैं, सौभाग्यवती हैं और शुद्ध चित्तवाली हैं।

तदनन्तर शिवशर्माके समक्ष ध्रुवलोक प्राप्त हुआ। उसे देखकर उन्होंने पूछा—'भगवत्पार्षदो! यह कौन लोक है?'

भगवत्पार्षदोंने कहा—ब्रह्मन्! स्वायम्भुव मनुके एक पुत्रका नाम उत्तानपाद था। राजा उत्तानपादके दो पुत्र हुए। रानी सुरुचिके गर्भसे उत्तमका जन्म हुआ था, जो ज्येष्ठ था और सुनीतिके गर्भसे ध्रुव नामक पुत्र हुआ था, जो कनिष्ठ था। एक दिन राजा उत्तानपाद जब राजसभामें बैठे हुए थे, उस समय सुनीतिने अपने पुत्रको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके राजाकी सेवामें भेजा। विनयशील ध्रुवने धायके बालकोंके साथ वहाँ जाकर महाराज उत्तानपादके चरणोंमें प्रणाम किया और ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए पिताकी गोदमें उत्तम भैयाको बैठा देख बालोचित चपलताके कारण उसने भी पिताकी गोदमें चढ़नेकी चेष्टा की। सुरुचिने ध्रुवको पिताकी गोदमें चढ़नेके लिये उत्सुक देख फटकारते हुए कहा—'ओ अभागिनीके पुत्र! क्या तू महाराजकी गोदमें बैठना चाहता है? इस सिंहासनपर बैठनेके योग्य पुण्य तूने नहीं किया है। यदि तेरा कुछ

७५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पुण्य होता तो तू एक अभागिनी स्त्रीके पेटसे कैसे पैदा होता ? मेरे परम सुन्दर उत्तमको देख ले। वह सौभाग्यवतीकी अच्छी कोखसे पैदा हुआ है। इसीलिये वह पृथ्वीपतिके अंकमें सम्मानपूर्वक बैठा हुआ है।'

राजसभाके बीचमें सुरुचिके द्वारा इस प्रकार अपमानित होनेपर ध्रुवने गिरते हुए आँसुओंको रोक लिया और धैर्य धारण करके कुछ भी उत्तर नहीं दिया। राजाने भी उचित-अनुचित कुछ नहीं कहा। वे रानी सुरुचिके वशीभूत थे। कुमार ध्रुव राजाको प्रणाम करके बालकोंके साथ अपने घर लौट गया। सुनीतिने बालकके मुखकी कान्ति देखकर ही ताड़ लिया कि ध्रुवका अपमान हुआ है। उन्होंने बार-बार अपने पुत्रका मस्तक सूँघा और सान्त्वना देकर हृदयसे लगा लिया। एकान्तमें माता सुनीतिको देखकर बालक ध्रुव फूट-फूटकर रोने लगा। माताके नेत्रोंसे भी आँसू बहने लगे।

सुनीतिने समझा-बुझाकर आँचलसे ध्रुवका मुँह पोंछा और कहा—'बेटा! तुम्हारे रोनेका क्या कारण है, बताओ। महाराजके रहते हुए किसने तुम्हारा अपमान किया है?' माताके आग्रहपूर्वक पूछनेपर ध्रुवने कहा—'माँ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ। तुम और सुरुचि दोनों ही महाराजकी पत्नी हो, तो भी राजाको केवल सुरुचि क्यों प्यारी है और क्यों तुमपर उनका प्रेम नहीं है? मैं और उत्तम दोनों समानरूपसे राजकुमार हैं, फिर सुरुचिका पुत्र उत्तम क्यों उत्तम है और क्यों मैं अधम हूँ? राजसिंहासन क्यों उत्तमके ही योग्य है और क्यों मेरे योग्य नहीं है?'

ध्रुवका यह वचन सुनकर सुनीतिने लंबी साँस खींचकर कहा—वत्स! सुरुचिने जो कुछ कहा है, सब सत्य है। वह महाराजकी पटरानी है, इसलिये सब रानियोंमें अधिक प्रिय है। तात! उसने दूसरे जन्ममें बड़ा भारी पुण्य किया है। उसी पुण्यकी वृद्धिसे सुरुचिके प्रति राजा अच्छी रुचि रखते हैं। जो मेरी-जैसी अभागिनी स्त्रियाँ हैं, उनमें राजाकी वैसी प्रीति नहीं है। उत्तमने भी महान् पुण्यराशिका उपार्जन किया है, इसीलिये उसने उस पुण्यात्मा स्त्रीकी उत्तम कोखमें निवास किया है और यही कारण है कि वह राजसिंहासनपर बैठनेका अधिकारी माना गया है। महामते! थोड़ी तपस्या करनेके कारण मैं और तुम राजाके समीप पहुँचकर भी राजलक्ष्मीके पात्र नहीं हो सके। बेटा! अपना पूर्वजन्मका कर्म ही मान और अपमानमें कारण होता है, अतः तुम इसके लिये शोक न करो।

ध्रुव बोला—माँ! यदि मैं मनुके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, राजा उत्तानपादका पुत्र हूँ और तुम्हारी कोखसे पैदा हुआ हूँ तो मेरी बात सुनो। यदि तपस्या ही सब सम्पत्तियोंका कारण है तो आजतक जो स्थान दूसरोंके लिये दुर्लभ रहा है, उसे भी मैंने प्राप्त कर लिया, ऐसा समझो। माँ! तुम केवल मुझे तपस्याके लिये जानेकी आज्ञा दे दो और अपने आशीर्वादसे मेरा उत्साह बढ़ाओ।

तब सुनीतिने कहा—राजकुमार! तुम्हारी आयु अभी कम है, अतः मैं तुम्हें वनमें जानेकी आज्ञा देनेमें असमर्थ हूँ। तथापि इस समय आज्ञा देती हूँ। तपस्याके लिये तुम्हारे जानेपर मेरे कठोर प्राण

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *७५३

किसी तरह कण्ठमें अटके रहेंगे।

इस प्रकार माताकी आज्ञा पाकर ध्रुवने उनके चरणकमलोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और वह वहाँसे चल दिया। माताने मार्गमें पुत्रकी रक्षाके लिये शतशः आशीर्वाद दिये। वह तरुणोंके समान पराक्रमी बालक अपने महलसे निकलकर वनमें गया। उस समय अनुकूल वायु चलकर उसे मार्ग दिखा रही थी। वनमें ध्रुवने सप्तर्षियोंको देखा। भोले-भाले असहाय जीवोंका भाग्य सहायक होता है। कहाँ राजकुमार और कहाँ वह घोर जंगल; परंतु जहाँ जिसकी शुभ या अशुभ भवितव्यता होती है, वहाँ उस मनुष्यको वह अपनी रस्सीमें बाँधकर खींच लेती है। मनुष्य अपने बुद्धिविभवसे कुछ और करनेकी चेष्टा करता है, किंतु भावीकी सहायतासे विधाता कुछ और ही कर डालता है। सप्तर्षियोंका दर्शन करके ध्रुव बहुत प्रसन्न हुआ और उनके पास जा हाथ जोड़े हुए प्रणाम करके ललित वाणीमें बोला—'मुनिवरो! आप मुझे राजा उत्तानपादका पुत्र ध्रुव जानें। मैं माता सुनीतिकी कोखसे पैदा हुआ हूँ।' वे सप्तर्षिगण स्वभावसे ही मधुर आकृतिवाले, अतिशय नीतिकुशल, मृदुल, गम्भीरभाषी उस तेजस्वी बालकको देखकर इस प्रकार बोले—'बालक! तू अपने खेदका कारण बता।' उनके सहज स्नेहसे सने हुए वचन सुनकर ध्रुवने कहा—'मुनीश्वरो! मेरी माताने मुझे महाराजकी सेवामें भेजा था। जब मैं वहाँ जाकर उनकी गोदीमें बैठनेको उत्सुक हुआ तब विमाता सुरुचिने मेरा बहुत तिरस्कार किया। उसने अपने पुत्र उत्तमको तो उत्तम बताया और मुझको तथा मेरी माताको धिक्कार देकर अपनी प्रशंसा की। यही मेरे खेदका कारण है।'

बालक ध्रुवकी यह बात सुनकर सप्तर्षि आपसमें एक-दूसरेकी ओर देखकर उसके क्षत्रियस्वभावकी चर्चा करने लगे—'अहो! देखो तो सही इस छोटे-से बालकमें भी अपमान सहन करनेकी शक्ति नहीं।'

ऋषि बोले—वत्स! हमसे तुम्हारा क्या काम है? तुम्हारा कौन-सा मनोरथ है?

ध्रुवने कहा—मुनियो! मेरे सर्वोत्तम बन्धु जो उत्तम हैं, वे पिताजीके दिये श्रेष्ठ राजसिंहासनपर बैठें। मैं आपके द्वारा इतनी ही सहायता चाहता हूँ कि मैं बालक होनेके कारण प्रायः कुछ साधन-भजन नहीं जानता, अतः मेरे लिये आप उसीका उपदेश करें। मैं पिताके दिये हुए सिंहासनको नहीं चाहता, मैं तो अपनी भुजाओंके बलसे उपार्जित उस उत्तम वस्तुको पाना चाहता हूँ, जो मेरे पिताके लिये भी आशातीत हो। जो पिताकी सम्पत्ति भोगनेवाले हैं, वे प्रायः यशके धनी नहीं होते। श्रेष्ठ मनुष्य तो उन्हें जानना चाहिये, जो पितासे भी अधिक उन्नति करके दिखा दें।

इस प्रकार उसके नीतिसे युक्त वचन सुनकर मरीचि आदि मुनियोंने उससे इस प्रकार कहा—

मरीचि बोले—प्रिय वत्स! मैं झूठ नहीं कहता, तुम जिस स्थानको पानेकी बात करते हो, उसे, जिसने भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंकी आराधना नहीं की है, वह पुरुष कैसे पा सकता है?

अत्रिने कहा—जिसने भगवान् गोविन्दके चरणकमलोंकी धूलिके रसका आस्वादन नहीं किया है, वह आशातीत समृद्धिशाली पदको नहीं पा सकता।

अंगिरा बोले—जो भगवान् लक्ष्मीपतिके कान्तिमान् चरणकमलोंका भलीभाँति चिन्तन करता है, उसके लिये सम्पूर्ण सम्पदाओंका स्थान दूर नहीं है।

पुलस्त्यने कहा—ध्रुव! जिनके स्मरणमात्रसे महापातकोंकी परम्पराका सर्वथा नाश हो जाता है, वे भगवान् विष्णु ही सब कुछ देनेवाले हैं।

पुलह बोले—जिनको प्रकृति और पुरुषसे परे परब्रह्म कहते हैं तथा जिनकी मायासे सम्पूर्ण जगत्का विस्तार किया गया है, वे भगवान् विष्णु ही सब कुछ देंगे।

क्रतुने कहा—जो यज्ञपुरुष हैं, सर्वत्र व्यापक

७५४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हैं, सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य तथा समस्त जगत्के अन्तरात्मा हैं, वे भगवान् जनार्दन यदि सन्तुष्ट हो जायें तो क्या नहीं दे सकते हैं?

वसिष्ठ बोले—राजकुमार! जिनके भ्रूभंगमात्रसे अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ आज्ञाके अनुसार कार्य करनेको प्रस्तुत रहती हैं, उन भगवान् हृषीकेशकी आराधना करनेपर मोक्ष भी दूर नहीं है।

ध्रुवने कहा—मुनीश्वरो! आपने भगवान् विष्णुकी आराधनाके विषयमें जो विचार व्यक्त किया है, वह सत्य है। परंतु भगवान् विष्णुकी आराधना कैसे की जाती है, उसकी विधि क्या है, इसका उपदेश करें।

मुनि बोले—खड़े होते, चलते, सोते, जागते, लेटे अथवा बैठे हुए सब समय भगवान् नारायणके नामका जप करना चाहिये। चार भुजाधारी भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए वासुदेवस्वरूप द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) द्वारा जप करके कौन सिद्धिको नहीं प्राप्त हुआ है*? अलसीके फूलकी भाँति श्याम कान्तिवाले पीतवस्त्रधारी सर्वात्मा अच्युतका एक क्षण भी ध्यान करनेवाला कौन ऐसा पुरुष है, जो इस भूतलपर सिद्धिको नहीं पाता? भगवान् वासुदेवका जप करनेवाला मनुष्य स्त्री, पुत्र, मित्र, राज्य, स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) सब कुछ निःसन्देह प्राप्त कर लेता है। वासुदेवके मन्त्र-जपमें लगे हुए पापी मनुष्योंको भी विघ्न तथा भयंकर यमदूत नहीं छू सकते। महा समृद्धिशाली और विष्णुभक्त तुम्हारे दादा मनुने भी राज्यकी कामनासे इस महामन्त्रका जप किया था। तुम भी इसी मन्त्रसे भगवान् वासुदेवकी आराधनामें लग जाओ। इससे तुम शीघ्र ही मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लोगे।

ऐसा कहकर वे सब महात्मा मुनीश्वर वहीं अन्तर्धान हो गये। इधर ध्रुव भी भगवान् वासुदेवके चिन्तनमें मन लगाकर तपस्याके लिये चल दिये। जंगलसे निकलकर वे यमुनाके किनारे मनोहर मधुवनमें गये। वह भगवान् श्रीहरिका परम पवित्र आदिस्थान है, जहाँ पहुँचकर पापी जीव भी निष्पाप हो जाता है। वहाँ जाकर ध्रुवने वासुदेव नामक निरामय परब्रह्मका जप प्रारम्भ किया। उनके नेत्र ध्यानमें निश्चल रहते थे और वे सम्पूर्ण विश्वको वासुदेवमय देखते थे। सम्पूर्ण दिशाओंमें श्रीहरि हैं, वे ही पातालमें अनन्तरूपसे रहते हैं, आकाशमें भी वे ही अनन्तरूपसे व्याप्त हैं। यद्यपि वे एक हैं तथापि अनन्त रूपभेदके कारण अनन्तताको प्राप्त हुए हैं। जो सदा देवताओंमें वास करें अथवा देवताओंके वासस्थान हों या व्यापकशक्तिसे सर्वत्र देदीप्यमान हों, वे भगवान् वासुदेव कहलाते हैं। 'विष्ऌ व्याप्तौ' धातु है। इसका प्रयोग व्याप्ति अर्थमें होता है। (इसीसे 'विष्णु' शब्द बनता है) भगवान् विष्णुके सर्वव्यापी नाम एवं स्वरूपमें ही यह धातु पूर्णतः सार्थक होती है। जो परमेश्वर सम्पूर्ण हृषीक अर्थात् इन्द्रियोंके स्वामी होनेसे 'हृषीकेश' कहलाते हैं, वे ही सर्वत्र स्थित हैं। जिनके भक्त भी महाप्रलयमें अपने स्वरूपसे च्युत नहीं होते, वे भगवान् सम्पूर्ण लोकोंमें 'अच्युत' कहलाते हैं। जो एकमात्र अविनाशी एवं सर्वत्र व्यापक हैं, जो पालन-पोषण करने और स्वरूपकी प्राप्ति करानेके द्वारा इस समस्त चराचर विश्वका लीलापूर्वक भरण करते हैं, वे भगवान् विश्वम्भर यहाँ विराजमान हैं। ध्रुवकी आँखें भगवान् विष्णुके स्वरूपके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखती थीं। उन्होंने यह नियम बना लिया था कि केवल कमलनयन भगवान् विष्णु ही दर्शन करनेयोग्य हैं, दूसरा कोई नहीं। उनके कान गोविन्द, मुकुन्द, दामोदर, चतुर्भुज आदि शब्दोंके बिना दूसरा कोई शब्द नहीं ग्रहण करते थे। उनके दोनों हाथ गोविन्दके चरणारविन्दोंकी पूजा


* तिष्ठता गच्छता वापि स्वपता जाग्रता तथा। शयानेनोपविष्टेन जप्यो नारायणः सदा॥
द्वादशाक्षरमन्त्रेण वासुदेवात्मकेन च। ध्यायेश्चतुर्भुजं विष्णुं जप्त्वा सिद्धिं न को गतः॥
(स्क० पु०, का० पू० १९। १७-१८)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७५५

तथा उन्हें प्रिय लगनेवाले कर्मोंको छोड़कर और कोई कर्म नहीं करते थे। उनका मन अन्य सारी बातोंका मनन छोड़कर केवल भगवान्‌के द्वन्द्वरहित युगल चरणकमलोंका चिन्तन करता हुआ स्थिर हो गया था। तपस्या करते हुए ध्रुवके दोनों पैर भगवान् नारायणका आँगन छोड़कर अन्यत्र नहीं जाते थे। परम सारभूत तपस्या करते हुए राजकुमारने मौन धारण कर लिया था। केवल गोविन्दका गुणगान करनेमें वे अपनी वाणीको प्रमाणित करते थे। निरन्तर भगवान् कमलाकान्तके नामामृतरसका आस्वादन करती हुई ध्रुवकी रसना अन्य लौकिक रसोंकी स्पृहा त्याग चुकी थी। उनकी घ्राणेन्द्रिय श्रीमुकुन्दके युगल चरणारविन्दोंकी सुगन्धसे परमानन्दमें निमग्न रहती थी। इसलिये वह और किसी गन्धको नहीं सूँघती थी। राजकुमार ध्रुवके शरीरकी त्वचा-इन्द्रिय भगवान् मधुसूदनके युगल चरणोंका स्पर्श करती हुई सम्पूर्ण स्पर्शसुखको प्राप्त कर लेती थी। उनकी समस्त इन्द्रियाँ शब्दादि सभी विषयोंके आधार एवं सारभूत परात्पर भगवान् दामोदरकी सेवामें संलग्न हो कृतार्थ हो गयी थीं। ध्रुवकी तपस्यारूपी सूर्यका उदय होनेपर तीनों लोक सन्तप्त होने लगे। इन्द्र, सोम, अग्नि, वरुण, वायु, कुबेर, यम और निर्ऋति आदि समस्त दिक्पाल अपना-अपना पद खो जानेके भयसे शंकित हो उठे। ध्रुव पृथ्वीपर जहाँ-जहाँ पाँव रखते थे, वहाँ-वहाँ वह महान् भारसे दबने लगती थी। उनके अंगके स्पर्शमें आये हुए समस्त जल अपनी मलिनताका परित्याग करके सरस एवं स्वच्छ हो गये थे। राजकुमारने कौस्तुभमणिसे उद्भासित वक्षवाले पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुका ध्यान करनेके कारण सम्पूर्ण विश्वको तेजोमय ही देखा। उनकी तपस्याके भयसे इन्द्रको बड़ी भारी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—'ध्रुव चाहे तो मेरा इन्द्रपद अवश्य हर लेगा। अप्सराओंका समूह उस बालकपर अपना कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। काम और क्रोध उसे विचलित करनेमें समर्थ न होंगे। उसे डिगानेके लिये एक ही उपाय है, उसके पास भयंकर आकारवाले भूतोंकी सेना भेजें। बालक होनेके कारण वह भूतोंसे डरकर निश्चय ही अपनी तपस्या त्याग देगा।' ऐसा निश्चय करके इन्द्रने भूतोंकी सेना भेज दी। उन भूतोंमेंसे कोई यक्षिणी किसीके रोते हुए शिशुको उठा लायी और उसकी कोख फाड़कर उसका रक्त पीने लगी। फिर उसने उसकी हड्डियोंको चबा डाला और ध्रुवको सम्बोधित करके कहा—'अरे! इसी बालककी भाँति तेरी हड्डियोंको भी चबाकर मैं आज प्यास लगनेपर तेरा रक्त पीऊँगी।' किसी भूतनीने बवंडर (तूफान)-का रूप धारण करके कितने ही वृक्षों और गिरि-शिखरोंको तोड़-फोड़कर आकाशके मार्गको ढँक दिया और उस बालकको कम्पित करने लगी। परंतु उन भूत-भूतनियोंका भय त्यागकर ध्रुव केवल भगवान् नारायणके ध्यानमें तत्पर रहे। भय दिखानेवाली भूतावलियोंने देखा—ध्रुवके चारों ओर भगवान्‌का सुदर्शनचक्र प्रज्वलित हो उठा है। वह मण्डलाकार चक्र सूर्यकी परिधिके समान अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था। भगवान्‌ने भूतावलियोंसे भक्तकी रक्षाके लिये उसे प्रकट किया था। उस चक्रको देख डरी हुई भूतोंकी सेना ध्रुवको नमस्कार करके जैसे आयी थी, वैसे ही लौट गयी।

ब्रह्मन्! तदनन्तर भयभीत हुए सम्पूर्ण देवता इन्द्रके साथ ब्रह्माजीकी शरणमें गये और उनको प्रणाम करके सबने उनका स्तवन किया। तत्पश्चात् बोलनेका अवसर देख इस प्रकार कहा—'पितामह! उत्तानपादके तेजस्वी पुत्रने तपस्या करके तीनों लोकोंके सम्पूर्ण निवासियोंको सन्तप्त कर दिया है। तात! ध्रुवका मनोरथ क्या है, यह हम अच्छी तरह नहीं जानते। पता नहीं, वह महातपस्वी बालक हमलोगोंमेंसे किसके पदको चाहता है।'

**देवताओंकी यह बात सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माजी हँसकर बोले—**देवताओ! ध्रुव ध्रुवपद (अविनाशी स्थान) प्राप्त करना चाहता है। अतः

७५६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उससे तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये। तुम सब लोग निश्चिन्त होकर जाओ। वह तुम्हारा पद नहीं लेना चाहता। ध्रुव भगवान्‌का भक्त है, उससे किसीको कहीं भी भय नहीं होना चाहिये। यह निश्चित है कि भगवान् विष्णुके भक्त दूसरोंको सन्ताप देनेवाले नहीं होते। देवेश्वर श्रीविष्णुकी आराधना करके उनसे अपनी मनोवांछित वस्तु प्राप्त करके ध्रुव तुम सब देवताओंके भी स्थानोंको स्थिर करेगा।

ब्रह्माजीकी कही हुई यह बात सुनकर देवता बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चले गये। इधर भगवान् विष्णु उस अनन्यशरण बालकको स्थिरचित्त देखकर गरुड़पर आरूढ़ हो उसके पास गये और इस प्रकार बोले—'महाभाग! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।' यह अमृतके समान वचन सुनकर ध्रुवने आँखें खोल दीं और देखा—इन्द्रनीलमणिके समान श्याम तेजका पुंज सामने प्रकाशित हो रहा है। पीताम्बरधारी, मेघके समान श्याम गरुड़वाहन भगवान् विष्णुको ध्रुवने देखा। देखते ही ध्रुव दण्डकी भाँति उनके चरणोंमें पड़ गये और सब ओर लोटने लगे। फिर जैसे दुःखी बालक दीर्घकालके बाद पिताको देखकर रोता है, उसी प्रकार वे फूट-फूटकर रोने लगे। उस समय भगवान्‌के कमल-समान नेत्रोंमें करुणापूर्ण अश्रुजल भर आया और उन्होंने अपने हाथसे ध्रुवको उठाया तथा उनके धूलिधूसरित अंगोंको प्रेमपूर्वक सहलाया। देवाधिदेव श्रीहरिके स्पर्शमात्रसे ध्रुवके मुखसे संस्कृतमयी शुभ वाणी प्रकट हुई और उन्होंने इस प्रकार स्तवन किया—

ध्रुव बोले—सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करनेवाले हिरण्यगर्भस्वरूप आपको नमस्कार है। आप उत्तम ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। समस्त भूतोंका संहार करनेवाले हरस्वरूप! आपको नमस्कार है। पंचमहाभूतस्वरूप तथा समस्त भूत-प्राणियोंके स्वामी आपको नमस्कार है। सर्वशक्तिमान् अथवा जगत्‌के उत्पादक, पालनकर्ता आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। विषयोंकी तृष्णा हर लेनेवाले सच्चिदानन्द श्रीकृष्णस्वरूप आपको नमस्कार है। कूर्म और वाराह आदि अवतारोंके रूप आप समस्त विश्वका महान् भार सहन करते हैं, आपको नमस्कार है। लक्ष्मीजीके स्वामी एवं सुदर्शनचक्र धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। पृथ्वीको अपने दाढ़ोंपर उठानेवाले आप वाराहरूपधारी परमात्माको नमस्कार है। वेदान्तोंद्वारा आप ही जानने योग्य हैं, आपको नमस्कार है। आप अपने वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप सत्त्वादि गुणस्वरूप तथा सगुण एवं निर्गुण ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है। आपकी नाभिसे ब्रह्माण्डरूपी कमल प्रकट हुआ है, आपको नमस्कार है। आप पाञ्चजन्य नामक शंख धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। देवकीनन्दन! आपको नमस्कार है। दामोदर! हृषीकेश! गोविन्द! अच्युत! माधव! उपेन्द्र! मधुसूदन! और अधोक्षज! आपको नमस्कार है। आपका कहीं अन्त नहीं है, इसलिये अनन्त कहलाते हैं। आपको नमस्कार है। आप अनन्त नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। रुक्मिणीके पति! आपको नमस्कार है। मुकुन्द! परमानन्द! नन्दगोपके प्रिय! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। गोपालरूप धारण करके वंशी बजानेवाले! आपको नमस्कार है। गोपीवल्लभ! गोवर्द्धनधारी! आपको नमस्कार है। आपमें योगीजन रमण करते हैं, इसलिये आप राम हैं, रघुकुलके स्वामी होनेसे रघुनाथ हैं तथा रघुवंशमें अवतार ग्रहण करनेके कारण आप राघव कहलाते हैं। आपको बार-बार नमस्कार है। विभीषणको आश्रय देनेवाले आपको नमस्कार है। आप अजन्मा एवं जयस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। क्षण, निमेष आदि जितने कालभेद हैं, वे सब आपके ही स्वरूप हैं। आप अनेक रूप धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप शाङ्गि

ध्रुवकी सफल साधना

७५८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नामक धनुष, कौमोदकी गदा और सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप गौओं और ब्राह्मणोंके हितकारी हैं, आपको नमस्कार है। धर्मस्वरूप आपको नमस्कार है। सत्त्वगुण धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक हैं, आप परम पुरुष परमेश्वर हैं, आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों नेत्र, सहस्रों चरण, सहस्रों किरणें और सहस्रों मूर्तियाँ हैं, आपको नमस्कार है। श्रीकान्त ! यज्ञपुरुष ! आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य है और वेद आपको बहुत प्रिय हैं, आपको नमस्कार है। वेदस्वरूप, वेदोंके वक्ता और सदाचारके पथपर चलनेवाले आपको नमस्कार है। आप वैकुण्ठधामस्वरूप तथा वैकुण्ठधामके निवासी हैं, आपको नमस्कार है। विस्तृत यशवाले आप भगवान् गरुड़वाहनको नमस्कार है। विष्वक्सेन ! आपको नमस्कार है। जगन्मय जनार्दन ! आपको नमस्कार है। आप अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको माप लेनेवाले, सत्यस्वरूप तथा सत्यप्रिय हैं, आपको नमस्कार है। केशव ! आपको नमस्कार है। आप मायाशक्तिसे सम्पन्न हैं और वेदोंके गायक हैं अथवा ब्रह्म नामसे आपकी महिमाका गान किया जाता है, आपको नमस्कार है। आप तपःस्वरूप और तपस्याका फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही स्तवन करनेयोग्य देवता हैं, स्तुति भी आपका ही स्वरूप है तथा आप अपने भक्तजनोंकी स्तुतिमें तत्पर रहते हैं, आपको नमस्कार है। आप श्रुतिरूप हैं और श्रुतियोंमें प्रतिपादित सदाचार आपको विशेष प्रिय है, आपको नमस्कार है। अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज सभी जीव आपके स्वरूप हैं; उन सभी रूपोंमें आपको नमस्कार है। आप देवताओंमें इन्द्र, ग्रहोंमें सूर्य, लोकोंमें सत्यलोक, समुद्रोंमें क्षीरसागर, नदियोंमें गंगा, सरोवरोंमें मानस, पर्वतमें हिमवान्, धेनुओंमें कामधेनु, धातुओंमें सुवर्ण, पत्थरोंमें स्फटिक, फूलोंमें नीलकमल, वृक्षोंमें तुलसी, सम्पूर्ण पूजनीय | शिलाओंमें शालग्राम शिला, मुक्तिदायक क्षेत्रोंमें काशी, तीर्थोंमें प्रयाग, रंगोंमें श्वेत रंग, मनुष्योंमें ब्राह्मण, पक्षियोंमें गरुड़, कर्मेन्द्रियोंमें वाणी, वेदोंमें उपनिषद्, मन्त्रोंमें प्रणव, अक्षरोंमें अकार, यज्ञकर्ताओंमें सोमरूपधारी, प्रतापियोंमें अग्नि, क्षमाशीलोंमें क्षमा (पृथ्वी), दाताओंमें मेघ, पवित्रोंमें परम पवित्र, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंमें धनुष, वेगवानोंमें वायु, इन्द्रियोंमें मन, भयशून्य अंगोंमें हाथ, व्यापक वस्तुओंमें आकाश, आत्माओंमें परमात्मा, सम्पूर्ण नित्यकर्मोंमें सन्ध्योपासना, यज्ञोंमें अश्वमेध-यज्ञ, दानोंमें अभयदान, लाभोंमें पुत्रलाभ, ऋतुओंमें वसन्त, युगोंमें प्रथम (सत्ययुग), तिथियोंमें अमावास्या, नक्षत्रोंमें पुष्य, सब पर्वोंमें संक्रान्ति, योगोंमें व्यतीपात, तृणोंमें कुश और सब पुरुषार्थोंमें मोक्ष हैं। अजन्मा प्रभो! सम्पूर्ण बुद्धियोंमें आप धर्मबुद्धि हैं, सब वृक्षोंमें पीपल हैं, लताओंमें सोमलता हैं, समस्त पवित्र साधनोंमें प्राणायाम हैं तथा सम्पूर्ण शिवलिंगोंमें आप सब कुछ देनेवाले साक्षात् विश्वनाथ हैं। मित्रोंमें पत्नी और सब बन्धुओंमें धर्म आप ही हैं। नारायण ! इस चराचर जगत्में आपसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है। आप ही माता, आप ही पिता, आप ही सुहृद्, आप ही महान् वैभव, आप ही सौख्य-सम्पत्ति तथा आप ही आयु और जीवनके स्वामी हैं। वही कथा है, जहाँ आपके नामकी महिमा बतायी जाती है। वही मन है, जो आपको समर्पित होता है। वही कर्म है, जो आपकी प्रसन्नताके लिये किया जाता है और वही तपस्या है, जिससे आपकी स्मृति होती है। धनियोंका वही धन शुद्ध है, जो आपके लिये व्यय किया जाता हो। विष्णो ! वही काल सफल है, जिसमें आपकी पूजा होती है। यह जीवन तभीतक कल्याणकारी है, जबतक हृदयमें आपका चिन्तन होता रहता है। आपका चरणोदक पीनेसे सब रोग शान्त हो जाते हैं। गोविन्द ! आपके वासुदेव नामका कीर्तन करनेसे अनेक जन्मोंद्वारा उपार्जित महान् पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। अहो! मनुष्योंमें कैसा अद्भुत महान् मोह

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *
७५९


है, कैसा प्रमाद है कि वे भगवान् वासुदेवकी अवहेलना करके दूसरोंको रिझानेके लिये परिश्रम करते हैं। भगवान्के नामोंका जो कीर्तन किया जाता है, वही परम मंगल है, वही धनका उपार्जन है और वही जीवनका फल है। भगवान् अधोक्षज (विष्णु)-से भिन्न कोई धर्म नहीं है, नारायणसे परे कोई अर्थ नहीं है, केशवसे भिन्न कोई काम नहीं है और श्रीहरिके बिना मोक्ष नहीं है। भगवान् वासुदेवका स्मरण और ध्यान न हो तो यही सबसे बड़ी हानि है, यही महान् उपद्रव है और यही बड़ा भारी दुर्भाग्य है। अहो! भगवान् विष्णुकी आराधना मनुष्योंके लिये क्या-क्या नहीं करती। पुत्र, मित्र, स्त्री, धन, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ तो वही देती है। श्रीहरिकी आराधना पापको हर लेती है, रोगोंका नाश करती है और मानसिक चिन्ताओंको मिटा देती है। इतना ही नहीं, वह धर्मको बढ़ाती और शीघ्र ही मनोवांछित वस्तु प्रदान करती है। यदि पापी भी प्रसंगवश भी भगवान्के युगल चरणोंका निर्द्वन्द्व ध्यान करता है, तो वह उसके लिये परम हितकी बात है। पापियोंके जो महापाप और सामान्य पाप हैं, उन सबको भगवान्के ध्यानपूर्वक किया हुआ नामोच्चारण अविलम्ब हर लेता है। जैसे आगकी चिनगारी भूलसे भी छू जाय तो वह जला ही देती है, उसी प्रकार होठोंसे श्रीहरिनामका स्पर्श होते ही वह समस्त पापोंको हर लेता है*। जो अपने चित्तको शान्त करके उसे क्षणभर भी कमलाकान्तके चिन्तनमें लगाता है तो उसके यहाँ लक्ष्मी निश्चल होकर रहती है। भगवान् विष्णुका चरणामृत पान करना ही सबसे बड़ा धर्म है, यही सर्वोत्तम तप है और यही सर्वोत्कृष्ट तीर्थ है। यज्ञपुरुष! जो आपको भोग लगाये हुए नैवेद्यका प्रसाद भक्तिपूर्वक ग्रहण करता है, उस परम बुद्धिमान् मनुष्यने मानो निश्चय ही यज्ञका पुरोडाश प्राप्त कर लिया। जो मनुष्य भगवान् विष्णुका चरणोदक शंखमें रखकर उससे अपने सिर आदि अंगोंका अभिषेक करता है, वही अवभृथ-स्नान करता है और वही गंगाजीके जलमें गोता लगाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा इतर जातिका मनुष्य, कोई भी क्यों न हो, यदि वह भगवान् विष्णुकी भक्तिसे युक्त है तो उसे सर्वश्रेष्ठ जानना चाहिये। जो प्रतिदिन द्वारकाके गोमतीचक्रके साथ शालग्रामकी बारह शिलाओंका पूजन करता है, वह वैकुण्ठधाममें प्रतिष्ठित होता है। जिसके घरमें प्रतिदिन तुलसीकी पूजा होती है, उसके घरमें कभी यमराजके दूत नहीं जाते। जिसके मुखमें भगवन्नामके अक्षर हों, ललाटमें गोपीचन्दनका तिलक हो और जिसका वक्षःस्थल तुलसीकी मालासे सुशोभित हो, उसे यमराजके दूत छू नहीं सकते। गोपीचन्दन, तुलसी, शंख, शालग्राम शिला और गोमतीचक्र—ये पाँच वस्तुएँ जिसके घरमें विद्यमान हैं, उसे पापका भय कैसे हो सकता है। जो मुहूर्त, जो क्षण, जो काष्ठा और जो निमेष भगवान् विष्णुका स्मरण किये बिना बीत जाते हैं, उन्हींमें मनुष्य यमके द्वारा लूटा जाता है। कहाँ तो आगकी जलती हुई चिनगारियोंके समान हरि-नामके दो अक्षर और कहाँ रूईकी ढेरीके समान पातकोंकी बड़ी भारी राशि। मैं तो गोविन्द, परमानन्द, मुकुन्द एवं मधुसूदन आदि नामोंवाले भगवान् विष्णुको छोड़कर दूसरेको नहीं जानता, नहीं भजता और नहीं स्मरण करता हूँ। श्रीहरिके बिना मैं दूसरेको न तो नमस्कार करता हूँ, न उसकी स्तुति करता हूँ, न नेत्रोंसे उसे देखता हूँ, न शरीरसे उसका स्पर्श करता हूँ, न उसके पास जाता हूँ और न उसकी महिमाके गीत ही गाता हूँ। मैं जलमें, स्थलमें, पातालमें, अग्निमें, वायुमें, पर्वतमें, विद्याधरमें, असुर और देवताओंमें, किन्नरमें, वानरमें, नरमें, तिनकेमें, स्त्रियोंके समुदायमें, पत्थरमें, वृक्ष, झाड़ी और लताओंमें, सर्वत्र श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित वक्षवाले श्यामसुन्दर श्रीहरिको ही देखता हूँ। प्रभो! आप सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे निवास करते हैं। आप ही सबके साक्षात् साक्षी हैं। अपने बाहर और भीतर आप सर्वव्यापी


* प्रमादादपि संस्पृष्टो यथानलकणो दहेत् । तथौष्ठपुटसंस्पृष्टं हरिनाम हरेदघम् ॥ (स्क० पु०, का० पू० २१। ५७)

७६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

परमेश्वरको छोड़कर मैं दूसरेको नहीं जानता।

शिवशर्मन्! ऐसा कहकर भक्त ध्रुव चुप हो गये। तब भगवान् विष्णुने प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे देखते हुए कहा—'वत्स ध्रुव! मैंने तुम्हारे मनोरथको अच्छी तरह जान लिया है। देखो, सब प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षासे उत्पन्न होता है, उस वर्षाके कारण हैं सूर्यदेव, परंतु तुम सूर्यके भी आधार हो जाओ। आकाशमें भ्रमण करनेवाले समस्त ग्रह-नक्षत्र आदिका जो ज्योतिर्मण्डल है, उसके तुम आधार होओगे। इस दिव्य पदपर तुम पूरे कल्पभर शासन करोगे। तुम्हारी माता सुनीति भी तुम्हारे समीप आ पहुँचेगी। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो तुम्हारे द्वारा किये हुए इस उत्तम स्तोत्रका तीनों समय पाठ करेगा, उसकी पापराशि नष्ट हो जायगी और लक्ष्मी उसका घर नहीं छोड़ेगी; उसका मातासे वियोग नहीं होगा और भाई-बन्धुओंके साथ कभी कलह नहीं होगा।'

भगवान्‌के दोनों पार्षद कहते हैं—ब्रह्मन्! ध्रुवसे ऐसा कहकर भगवान् गरुड़ध्वज वहाँसे चले गये।


महर्लोक, जनलोक और तपोलोककी स्थिति; ब्रह्माजीके द्वारा सत्यलोकका महत्त्व-कथन और भारतवर्ष एवं वहाँके तीर्थोंकी महत्ता बताते हुए प्रयाग और काशीकी महिमाका प्रतिपादन

अगस्त्यजी कहते हैं—तदनन्तर वायुके समान वेगशाली वह विमान स्वर्गलोकसे ऊपर अत्यन्त अद्भुत महर्लोकमें जा पहुँचा। तब ब्राह्मणने पूछा—'यह मनोहर लोक कौन-सा है?'

दोनों भगवत्पार्षदोंने कहा—ब्रह्मन्! यह महर्लोक है, जो स्वर्गलोकसे भी अद्भुत है। जिन्होंने तपस्यासे अपनी पापराशि धो डाली है वे कल्पान्तजीवी तपस्वी यहाँ निवास करते हैं। भगवान् विष्णुका निरन्तर स्मरण करनेसे उनकी समस्त पापराशि नष्ट हो जाती है।

इस प्रकार वे दोनों पार्षद कह ही रहे थे कि आधे क्षणमें वह विमान उन सबको लेकर जनलोकमें जा पहुँचा। यहाँ ब्रह्माजीके मानसपुत्र निर्मल योगीश्वर एवं नैष्ठिक ब्रह्मचारी सनक, सनन्दन आदि निवास करते हैं। अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले अन्यान्य योगी भी सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे मुक्त हो अत्यन्त निर्मल होकर जनलोकमें निवास करते हैं। मनके समान वेगसे चलनेवाले उस विमानने जनलोकसे ऊपर जाकर शीघ्र ही तपोलोकको दृष्टिगोचर कराया, जहाँ वैराज नामवाले देवता निवास करते हैं। जिनका मन भगवान् वासुदेवमें लगा होता है, जो अपने समस्त कर्म वासुदेवको समर्पित कर देते हैं तथा तपस्याद्वारा भगवान् गोविन्दको सन्तुष्ट करके जो सब प्रकारकी इच्छाओंका त्याग कर चुके हैं, ऐसे जितेन्द्रिय महात्मा तपोलोकमें जाकर निवास करते हैं। जो तपस्याओंसे अपने शरीरको क्लेश देकर तपरूपी धनका संग्रह कर चुके हैं, वे ब्रह्माजीके समान आयुवाले होकर निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं।

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७६१ ---|---

पुण्यात्मा शिवशर्मा जबतक भगवत्पार्षदोंके मुखसे इस प्रकार तपोलोककी महिमा सुनते रहे, तबतक उनके नेत्रोंके सामने परम प्रकाशमय सत्यलोक आ पहुँचा। वहाँ जाते ही वे दोनों पार्षद उनके साथ तुरंत ही विमानसे उतर पड़े और उन सबने समस्त लोकोंके स्रष्टा ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया।

ब्रह्माजी बोले— भगवत्पार्षदो! ये बुद्धिमान् ब्राह्मण शिवशर्मा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं। स्मृतियों और धर्मशास्त्रोंमें बताये हुए सदाचारके पालनमें परम प्रवीण हैं तथा पापकर्मोंसे सदा विमुख रहे हैं। परम बुद्धिमान् द्विज शिवशर्मन्! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। वत्स! तुमने उत्तम तीर्थमें प्राणत्याग करके बहुत ही अच्छा किया। तुमने यह जो कुछ देखा है, वह सब शीघ्र नष्ट होनेवाला है। मेरे प्रत्येक दिनके अन्तमें प्रलय होता है और मैं दिनके प्रारम्भमें बार-बार सृष्टि करता हूँ। जब स्वर्गादि लोकोंकी यह अवस्था है तब मरणशील मनुष्योंकी तो बात ही क्या है। परंतु चार प्रकारके जीव (स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज तथा अण्डज) समुदायमेंसे मनुष्योंमें ही एक ऐसा गुण है कि वे कर्मभूमि भारतमें मनसहित चंचल इन्द्रियोंको जीतकर, गुणोंके शत्रु लोभका त्याग करके, धर्मकी परम्परा तथा धनराशिका नाश करनेवाले कामको विचारके द्वारा मनसे बाहर निकालकर, धैर्यसे क्रोधरूपी शत्रुको जीतकर और मदका परित्याग, अहंकारका निवारण तथा मोहका नाश करके, धर्मकी सीढ़ीपर चढ़कर, अनायास ही इस सत्यलोकमें आ जाते हैं। आर्यावर्तके समान देश, काशीके समान पुरी तथा विश्वनाथजीके समान लिंग इस ब्रह्माण्डमण्डलमें कहीं भी नहीं है। समुद्रके बीचमें अनेक द्वीप हैं, किंतु इस पृथ्वीपर जम्बूद्वीपके समान दूसरा कोई द्वीप नहीं है। जम्बूद्वीपमें भी नौ वर्ष हैं, जिनमें भारतवर्ष सबसे श्रेष्ठ है। इसे कर्मभूमि कहा गया है। यह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। किंपुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, वे देवभोग्य हैं; उनमें देवतालोग स्वर्गसे आकर रमण करते हैं। यह भारतवर्ष नौ हजार योजन विस्तृत है। इस भारतवर्षमें भी हिमवान् और विन्ध्यगिरिके बीचका भाग अत्यन्त पुण्यदायक है। इसमें भी गंगा और यमुनाके बीचका भाग पृथ्वीकी अन्तर्वेदी है। यहाँके क्षेत्रोंमें कुरुक्षेत्र सबसे बढ़कर है। उससे भी उत्तम नैमिषारण्यक्षेत्र है जो स्वर्गका श्रेष्ठ साधन है। इस समस्त भूमण्डलमें नैमिषारण्यसे तथा अन्य सब तीर्थोंसे भी बढ़कर तीर्थराज प्रयाग है। वह स्वर्ग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाला है। इसीलिये प्रयाग महान् क्षेत्र है और उसे सब तीर्थोंका राजा माना गया है। मैंने पूर्वकालमें सब यज्ञोंको एक ओर तराजूपर रखा और दूसरी ओर तीर्थोंमें श्रेष्ठ प्रयागको रखा, किंतु उसीका पलड़ा भारी रहा। दक्षिणा आदिसे पुष्ट समस्त यागोंकी अपेक्षा इस क्षेत्रको प्रधान देखकर विष्णु और शिव आदिने उसका नाम प्रयाग रख दिया। उसके नाममात्रका तीनों कालमें स्मरण करनेसे मनुष्यके शरीरमें कभी कहीं पाप नहीं ठहरता है। असंख्य जन्मान्तरोंमें जिस पापराशिका संग्रह किया गया है, व्रत, दान, जप और तपसे भी जिसको दूर करना अत्यन्त कठिन है, वह पापराशि भी जब कोई तीर्थराज प्रयागमें जानेके लिये उद्यत होता है, तब आँधीके मारे हुए वृक्षकी भाँति शरीरके भीतर थर-थर काँपने लगती है। तत्पश्चात् प्रयाग जानेका दृढ़ संकल्प लेकर जो आधा रास्ता तय कर लेता है, उस पुरुषके शरीरसे वह पापराशि पग-पगपर निकलनेकी इच्छा करती है। यदि भाग्यवश उस महात्माको तीर्थराज प्रयागका दर्शन हो जाता है, तब तो उसके पाप उसी प्रकार शीघ्र भाग जाते हैं, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार। सात धातुओंके बने हुए मानवशरीरमें जो-जो पाप हैं, वे केशोंमें आकर ठहरते हैं। अतः केशोंका मुण्डन करा देनेपर वे भी निकल जाते हैं। इस प्रकार निष्पाप होकर, गंगा-यमुनाके श्वेत-श्याम सलिलके संगममें स्नान करना चाहिये। उस स्नानसे मनुष्य महान् पुण्यराशि, मनोवांछित पुण्यमय भोग तथा स्वर्गको भी पाता है और जो निष्काम भावसे स्नान करता है, वह मोक्ष पाता है। ब्रह्मन्!

७६२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मैं सत्यलोक और प्रयागमें कोई अन्तर नहीं समझता, क्योंकि वहाँ रहकर जो शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे मेरे लोकके निवासी होते हैं। जिस भाग्यवान् मनुष्यकी हड्डियाँ भी प्रयागमें पड़ जाती हैं, उसे किसी जन्ममें लेशमात्र भी दुःख नहीं प्राप्त होता। ब्रह्महत्या आदि पापोंका प्रायश्चित्त करनेकी इच्छावाले पुरुषको ब्राह्मणकी आज्ञा लेकर विधिपूर्वक प्रयागतीर्थका सेवन करना चाहिये।

तीर्थराज प्रयागसे भी श्रेष्ठ तीर्थ है काशी। वह सम्पूर्ण भुवनोंमें सबसे उत्तम है। काशीमें देहावसान होनेसे अनायास मुक्ति होती है। इसमें संशय नहीं कि काशीक्षेत्र प्रयागसे भी अधिक रमणीय है, जहाँ साक्षात् भगवान् विश्वनाथ निवास करते हैं। विश्वनाथजीके निवासस्थान अविमुक्त नामक महाक्षेत्रसे अधिक रमणीय तीर्थ इस ब्रह्माण्डमें कहीं नहीं है। अविमुक्त क्षेत्र ब्रह्माण्डके भीतर रहकर भी ब्रह्माण्डमें नहीं है। इसकी लम्बाई पाँच कोस है। प्रलयकालमें एकार्णवका जल जैसे-जैसे बढ़ता है, वैसे-वैसे इस क्षेत्रको शिवजी ऊपर उठाते जाते हैं। काशीक्षेत्र महादेवजीके त्रिशूलकी नोकपर स्थित है। यह न तो आकाशमें स्थित है और न भूमिपर ही। किंतु मूढ़बुद्धि मनुष्य इसे इस रूपमें नहीं देख पाते। यहाँ सदा सत्ययुग रहता है, सदा महापर्व लगा रहता है। विश्वनाथजीके निवासस्थानमें ग्रहोंके अस्त-उदयजनित दोषकी प्राप्ति नहीं होती। वहाँ सदा उत्तरायण है, सदा महान् अभ्युदय है और सदैव मंगल है, जहाँ कि भगवान् विश्वनाथकी स्थिति है। विप्रवर! चौदहों भुवनोंकी सृष्टि मैंने ही की है, परंतु इस काशीपुरीके निर्माता साक्षात् भगवान् विश्वनाथ हैं, मैं नहीं। काशीमें देहत्याग करनेवालोंका नियन्त्रण स्वयं भगवान् विश्वनाथ करते हैं। जिन्होंने वहाँ रहकर भी पाप किये हैं, उनको दण्ड देनेवाले कालभैरव हैं। वहाँ कभी किसीको पाप नहीं करना चाहिये, क्योंकि वहाँ पाप करनेवालोंको दारुण रुद्रयातना भोगनी पड़ती है, जो नरकसे भी अधिक दुःसह है। जो मनुष्य दूसरोंकी निन्दा और परस्त्रीकी अभिलाषा करते हैं, उन्हें काशीका सेवन नहीं करना चाहिये; क्योंकि कहाँ काशी और कहाँ वह नरक। जो वहाँ सदा प्रतिग्रह लेकर धन संग्रह करनेकी अभिलाषा रखते हैं अथवा कपटपूर्वक दूसरोंका धन हड़प लेना चाहते हैं, ऐसे लोगोंको भी काशीका सेवन नहीं करना चाहिये। काशीमें रहनेवाले पुरुषको दूसरोंको पीड़ा देनेवाला कर्म सदाके लिये त्याग देना चाहिये। यदि वहाँ भी वही करना हो तो दुष्ट चित्तवाले पुरुषोंका काशीमें निवास करना किस कामका है। जो दूसरोंसे द्रोहकी बात सोचते, दूसरोंसे डाह रखते और सदा दूसरोंको सताया करते हैं, उनके लिये काशीपुरी सिद्धिदायक नहीं। इस पृथ्वीपर ज्ञानके बिना कहीं मोक्ष नहीं होता। वह ज्ञान न तो चान्द्रायण आदि व्रतोंसे प्राप्त होता है और न उत्तम देश, कालमें सत्पात्रोंको विधि एवं श्रद्धापूर्वक दिये हुए तुलापुरुष आदि मुख्य-मुख्य दानोंसे ही मिलता है। अहिंसा-ब्रह्मचर्य आदि यमों, शौच-सन्तोषादि नियमों, पूजन आदि सत्कर्मों तथा शरीरको सुखानेवाली कठोर तपस्याओंसे भी उसकी प्राप्ति नहीं होती। गुरुओंद्वारा दिये हुए महामन्त्रोंके जपसे, स्वाध्यायसे, शास्त्रोक्त विधिसे, अग्निहोत्र करनेसे, गुरुओंकी सेवासे, श्राद्धसे, देवपूजासे तथा अनेकों तीर्थोंकी यात्रा करनेसे भी उस ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती; क्योंकि योगके बिना ज्ञान नहीं होता। गुरुके उपदेश किये हुए मार्गसे निरन्तर अभ्यासपूर्वक तत्त्वार्थ विचार करना ही योग है। उस योगमें भी अनेक प्रकारके विघ्न आया करते हैं, अतः एक ही जन्ममें प्रायः ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती, परंतु इस काशीपुरीमें जप, तप और योगके बिना भी एक ही जन्ममें कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है। द्विजश्रेष्ठ ! तुमने शुद्ध बुद्धिसे काशीतीर्थमें जो कल्याणकारी पुण्यका उपार्जन किया है, उसका भारी फल महान् है। भगवत्पार्षदोंके सामने ही इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी मौन हो गये और महामना शिवशर्मा भी बहुत प्रसन्न हुए।

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७६३ ---|---

वैकुण्ठ और कैलासकी स्थिति तथा शिव और विष्णुकी अभिन्नता एवं महत्ताका निरूपण

अगस्त्यजी कहते हैं—तदनन्तर भगवान्‌के पार्षद ब्रह्माजीको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक चले और अपने विमानपर बैठकर वैकुण्ठधामके समीप जा पहुँचे। सत्यलोकसे जाते समय शिवशर्माने पुनः पूछा—'भगवत्पार्षदो ! अब हमलोग कितनी दूर आये हैं और अभी कितनी दूर और चलना है।'

भगवत्पार्षद बोले—ब्रह्मन् ! सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंका प्रकाश जहाँतक जाता है, समुद्र, पर्वत और वनसहित उतनी ही पृथ्वी मानी गयी है। उसके ऊपर आकाश है। पृथ्वीसे एक लाख योजन ऊपर सूर्यकी स्थिति है। पृथ्वीपर समुद्र, द्वीप, पर्वत और वनसहित जो कोई भी वस्तु है, वह सब भूलोकके नामसे विख्यात है। भूलोकसे लेकर सूर्यलोकतक भुवर्लोक कहलाता है। सूर्यसे ध्रुवलोकतक स्वर्गलोक कहलाता है। पृथ्वीसे एक करोड़ योजनकी ऊँचाईपर महर्लोक है, दो करोड़ योजन ऊँचे जनलोक है, चार करोड़ योजनकी ऊँचाईपर तपोलोक और पृथ्वीसे आठ करोड़ योजन ऊँचे सत्यलोक बताया गया है। सत्यलोकसे भी ऊपर वैकुण्ठधाम है, जो पृथ्वीसे सोलह करोड़ योजन ऊपर स्थित है, जहाँ सबको अभयदान करनेवाले साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपति निवास करते हैं*। वैकुण्ठकी अपेक्षा सोलहगुनी ऊँचाईपर शिवजीका निवासस्थान कैलासधाम अवस्थित है (अर्थात् वह पृथ्वीसे २ अरब ५६ करोड़ योजनकी दूरीपर स्थित है), जहाँ गिरिराजनन्दिनी उमा, गणेशजी, कार्तिकेयजी तथा नन्दी आदिके साथ कल्याणस्वरूप भगवान् विश्वनाथ विराजमान हैं। लीलास्वरूप धारण करनेवाले उन भगवान्‌का यह सब दृश्यप्रपंच खेलमात्र है। वे सम्पूर्ण विश्वके स्वामीरूपसे विख्यात हैं और यह समस्त जगत् उनकी आज्ञाका पालक है। श्रुतियोंमें साकार, निराकार, सर्वव्यापी, नित्य, सत्य एवं द्वैतरहित कहकर जिस परब्रह्मका प्रतिपादन किया गया है, वे ही भगवान् शिव हैं। वे समस्त कारणोंसे परे एवं परात्पर हैं। उन्हींके विषयमें श्रुतियाँ कहती हैं कि ब्रह्मका स्वरूप परमानन्दमय है। उन भगवान् शिवको वेद भी नहीं जानते, वाणी मनके साथ उनतक न पहुँचकर लौट आती है। वे अपने द्वारा आप ही जानने योग्य हैं, परम ज्योतिःस्वरूप हैं और सबके हृदयमें अन्तर्यामीस्वरूपसे स्थित हैं। योगी पुरुष समाधिमें उनका साक्षात्कार करते हैं। वे वाणीद्वारा अनिर्वचनीय हैं। मायासे अनेक रूप धारण करके वास्तवमें रूपरहित हैं। वे अनन्त हैं, अन्तकस्वरूप हैं। सर्वज्ञ एवं कर्मशून्य हैं। उनका ऐश्वर्यमय स्वरूप इस प्रकार है—वे अर्धचन्द्रका मुकुट धारण करते हैं। उनका कण्ठ तमालके समान श्यामवर्ण है। ललाटमें ज्योतिर्मय नेत्र प्रकाशित होता है। उनके शरीरका वामार्थ भाग नारीके रूपमें सुशोभित होता है। वे अपने हाथोंमें शेषनागका भुजबंद पहनते हैं। गंगाजीकी तरंगोंके संसर्गसे उनकी जटाका तटप्रान्त सदा धुलता रहता है। उनका अंग विभूतिसमूहसे उज्ज्वल प्रतीत होता है। भगवान् रुद्रके पर और अपर (सगुण-निर्गुण अथवा कार्य-कारण) दो रूप हैं, जो सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं। वे निराकार होकर भी साकार हैं। भगवान् शिव ही भोग और


* दिव्य वैकुण्ठधाम ब्रह्माण्डके अन्तर्गत नहीं, वह सबसे परे शुद्ध सच्चिदानन्दस्वरूप है। भगवान् और उनके परम धाममें कोई अन्तर नहीं है। वह सर्वत्र व्यापक होकर भी त्रिपादविभूति परमव्योममें अभिव्यक्त है। भागवतमें उसे मूर्तिमान् कैवल्य बताया गया है—'कैवल्यमिव मूर्तिमत्'। यहाँ जिस वैकुण्ठलोककी चर्चा की गयी है, वह ब्रह्मलोककी ही भाँति कोई अवान्तर लोक है।

७६४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मोक्षके कारण हैं। जैसे शिव हैं वैसे विष्णु हैं, जैसे विष्णु हैं वैसे शिव हैं। शिव और विष्णुमें तनिक भी अन्तर नहीं है*। भगवान् विष्णु शार्ङ्ग धनुष एवं कौमोदकी गदा धारण करके सम्पूर्ण त्रिलोकीका शासन करते हैं और साधुपुरुषोंकी रक्षाके लिये दानवोंका विनाश करते हैं। शिवशर्मन्! अब तुम भगवान् विष्णुके लोकमें निवास करो।

अगस्त्यजी कहते हैं—प्रिये लोपामुद्रे! इस प्रकार शिवशर्मा ब्राह्मण मोक्षपदको प्राप्त हुए। जो इस पुण्यमय उपाख्यानको सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो उत्तम ज्ञानको प्राप्त होता है।


अगस्त्यजीका श्रीशैलपर कार्तिकेयजीकी सेवामें जाना और उनके मुखसे काशीकी महिमा श्रवण करना

**व्यासजी कहते हैं—**सूत! इस प्रकार काशीकी महिमा सुनाते हुए अगस्त्यजीने अपनी पत्नीके साथ श्रीपर्वतकी परिक्रमा करनेके पश्चात् कार्तिकेयजीके सुन्दर एवं विशाल वनको देखा। वहाँ लोहित नामका पर्वत है। उस पर्वतके समीप मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने अपनी पत्नीके साथ छः मुखोंवाले साक्षात् कार्तिकेयजीका दर्शन किया और पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। तत्पश्चात् हाथ जोड़कर वैदिक सूक्तों तथा अपने बनाये हुए स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की। स्तुतिके पश्चात् 'नमो नमः' कहते हुए कार्तिकेयजीकी दो-तीन बार परिक्रमा करके उनके द्वारा बैठनेकी आज्ञा मिलनेपर वे उनके सामने बैठे।

**तब कार्तिकेयजीने कहा—**देवताओंके मुख्य सहायक मुनिवर अगस्त्यजी! कुशल तो है न? आप यहाँ आये हैं, यह मुझे मालूम हो गया था। विन्ध्याचल पर्वत ऊँचा उठ गया था, इसका भी मुझे पता है। वास्तवमें कुशल तो अविमुक्त नामक महाक्षेत्रमें ही है, जो भगवान् त्रिलोचनद्वारा सुरक्षित है और जहाँ साक्षात् भगवान् शिव मरे हुए प्राणियोंको मोक्षदान करते हैं। भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वर्लोकमें अथवा पातालमें या महर्लोक आदि ऊपरके लोकोंमें भी मैंने वैसा उत्तम क्षेत्र कहीं नहीं देखा है। मुने! यद्यपि मैं अकेला ही सर्वत्र विचरता रहता हूँ तथापि काशीक्षेत्रकी प्राप्तिके लिये यहाँ तपस्या करता हूँ। किंतु आजतक मेरा मनोरथ सफल नहीं हुआ। पुण्य, दान, जप, तप तथा नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा काशीक्षेत्र मिलनेवाला नहीं है। उसकी प्राप्ति तो केवल श्रीमहादेवजीके अनुग्रहसे होती है। अत्यन्त दुर्लभ काशीपुरीका निवास केवल ईश्वरके अनुग्रहसे ही सुलभ है। शरीर प्रतिदिन बूढ़ा होता जाता है, इन्द्रियाँ जराजर्जर हो रही हैं और आयुरूपी मृगको मृत्युरूपी शिकारी अपना निशाना बनाना ही चाहता है। ऐसी दशामें सम्पत्तिको विपत्ति जानकर और आयुको विद्युत्के समान चपल मानकर मनुष्य काशीपुरीका भलीभाँति सेवन करे। जबतक जीवनका अन्त न हो जाय, तबतक काशी न छोड़े। अहो! बुढ़ापा निकट आ गया है, रोग अत्यन्त पीड़ा दे रहे हैं तथापि नाना प्रकारकी चेष्टाओंमें लगा हुआ देहधारी जीव काशीका सेवन करना नहीं चाहता! अर्थोपार्जनका उपाय किये बिना भी धन प्राप्त हो सकता है, यह एक निश्चित बात है। अतः धनकी चिन्ता छोड़कर एकमात्र धर्मकी शरण ले। धर्मसे स्वर्ग भी सुलभ है, परंतु एक काशीपुरी अत्यन्त दुर्लभ है। पाशुपतयोग मोक्षका साधन है। प्रयागमें गंगा-यमुनाके संगमका सेवन भी मुक्तिप्रद है तथा उससे भी बढ़कर अविमुक्त क्षेत्र है, जो अनायास


* यथा शिवस्तथा विष्णुर्यथा विष्णुस्तथा शिवः। अन्तरं शिवविष्णोश्च मनागपि न विद्यते॥ (स्क० पु०, का० पू० २३।४१)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७६५

मोक्ष देनेवाला है। प्रतिदिन अविच्छिन्नरूपसे वेदोंका पाठ, मन्त्रोंका जप, अग्निहोत्र, दान, अनेक प्रकारके यज्ञ, देवताओंकी उपासना, त्रिरात्र अथवा पंचरात्र आदि आगमोक्त विधिसे आराधना, सांख्य, योग और श्रीविष्णुकी आराधना—ये सभी श्रेष्ठ कर्म मोक्षके साधन बताये गये हैं। अयोध्या, मथुरा आदि पुरियाँ भी मरे हुए जीवोंको मोक्ष देनेवाली बतायी गयी हैं। ये सभी कैवल्य मोक्षके साधन हैं, इसमें सन्देह नहीं। अन्य तीर्थ काशीकी प्राप्ति कराते हैं और काशीको प्राप्त होकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। इसीलिये वह पवित्र क्षेत्र इस ब्रह्माण्डमण्डलमें भगवान् विश्वनाथको सदा प्रिय है। सुव्रत ! मैं तो काशीसे आनेवाली वायुका भी स्पर्श चाहता हूँ। तुम तो साक्षात् काशीमें रहकर आये हो। जो जितेन्द्रिय होकर तीन रात भी काशीमें निवास करते हैं, उनकी चरणधूलिका स्पर्श अवश्य ही पवित्र कर देता है। तुम तो वहाँके निवासी ही थे, अतः तुम्हारे लिये क्या कहना है।

यों कहकर कार्तिकेयजीने अगस्त्य मुनिके सब अंगोंका स्पर्श किया और ऐसा करके उन्होंने अमृतके सरोवरमें स्नान करनेका सुख पाया। तत्पश्चात् 'जय विश्वनाथ' ऐसा कहकर उन्होंने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये और एक क्षणतक भगवान् शिवके अनिर्वचनीय स्वरूपका ध्यान किया। ध्यानसे निवृत्त होनेपर उनसे अगस्त्यजीने पूछा—'स्वामिन् ! आप मुझसे काशीकी महिमा कहिये। वह क्षेत्र मुझे बहुत प्रिय है।'

स्कन्द बोले—अगस्त्यजी ! काशीक्षेत्र इस लोकमें अत्यन्त गोपनीय बताया गया है। वहाँ सब प्रकारकी सिद्धि सन्निकट है; क्योंकि उसमें साक्षात् परमेश्वर सदा निवास करते हैं। काशीक्षेत्र आकाशमें स्थित है। वह इस भूलोकसे संलग्न नहीं है, किंतु इस बातको केवल योगीजन देख पाते हैं, अयोगी नहीं। जो पलभर भी अविमुक्त क्षेत्रके प्रति अतिशय भक्ति-भाव धारण करता है, उसने मानो ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक बड़ी भारी तपस्या कर ली। उसके द्वारा शिवसम्बन्धी सम्पूर्ण दिव्य व्रतोंका पालन हो जाता है। जो एक वर्षतक काशीमें क्रोधको जीतकर इन्द्रियसंयमपूर्वक रहता है, दूसरेके धनसे अपने शरीरका पोषण न करके पराये अन्नका परित्याग करता है, परनिन्दासे बचता है और प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करता रहता है, उसने पूर्वजन्ममें सहस्रों वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की है, ऐसा मानना चाहिये। जो काशीक्षेत्रके माहात्म्यको जाननेवाला मनुष्य जीवनभर काशीवास करता है, वह जन्म-मृत्युका भय छोड़कर परम गतिको प्राप्त होता है। जो मृत्यूपर्यन्त काशीका परित्याग नहीं करता, उसकी केवल ब्रह्महत्या ही नहीं दूर होती, अविद्या भी दूर हो जाती है। जो अनन्यचित्त होकर काशीक्षेत्रको नहीं छोड़ता, वह जरा-मृत्यु तथा गर्भवासके अत्यन्त दुःसह दुःखको त्याग देता है। जो बुद्धिमान् मानव इस पृथ्वीपर फिर जन्म लेना नहीं चाहता, वह देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा सेवित काशीक्षेत्रका कभी त्याग न करे। अन्तकालमें वातसे पीड़ित हुए मनुष्यके मर्मस्थान जब विदीर्ण होने लगते हैं, उस समय वह अपनी सुध-बुध खो बैठता है। इसी समय साक्षात् भगवान् विश्वनाथ प्राणत्यागकालमें उपस्थित हो उस मुमूर्षु जीवको तारक मन्त्रका उपदेश देते हैं, जिससे वह शिवस्वरूप हो जाता है। अतः अतिशय पापोंसे भरे हुए इस मानव-शरीरको अनित्य जानकर मनुष्य संसारभयका नाश करनेवाले काशीक्षेत्रका सेवन करे। जो विघ्नोंसे आहत होनेपर भी काशीक्षेत्रका त्याग नहीं करता, वह मोक्ष-सम्पत्तिको पाकर ऐसी स्थितिमें पहुँच जाता है, जहाँ दुःखका सर्वथा अभाव है। अतः कौन ऐसा बुद्धिमान् पुरुष है, जो बड़े-बड़े पापपुंजका नाश तथा पुण्योंकी वृद्धि करनेवाली और अन्तमें भोग एवं मोक्ष देनेवाली काशीपुरीका सेवन न करेगा? अविमुक्त क्षेत्रके माहात्म्यका मैं केवल छः मुखोंसे किस प्रकार वर्णन कर सकता हूँ, जब कि शेषनाग सहस्र मुखोंसे भी उसका वर्णन करनेमें असमर्थ हैं।