भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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११६ | सौंदर्य लहरी

नवम श्लोक में कहे अनुसार चक्रों के बेध के साथ तत्वों का भी वेध होना कहा गया है। और तत्वों के बेध से उन पर जय प्राप्त की जाती है, जिसको योग दर्शन में भूतजय, मनोजय और प्रकृतिजय कहा गया है।

भूतजय, इन्द्रियजय और मनो जय के साधन विभूति पाद के ४४, ४७, और ४८ सूत्रों में बताए गये हैं। स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व पर संयम करने से भूत जय होता है। विशेष धर्मी को प्रथम स्थूल और सामान्य धर्मी को दूसरा स्वरूप तन्मात्राओं को सूक्ष्म, अर्थात तीसरा रूप और तीनों गुणों का अन्वय उनका कारण रूप और उनके भोग और अपवर्ग के लिये उपयोगिता का ज्ञान, इन ५ स्तरों पर संयम अर्थात् धारणा ध्यान समाधि करने से प्रत्येक भूत का जय प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार इन्द्रियों की ग्रहण शक्ति, स्वरूप, अस्मिता (अहं की सूक्ष्म कारण वृत्ति,) अन्वय (तीनों गुणों से संबंध) और अर्थवत्त्व पर संयम करने से इन्द्रियों का जय होता है। इन्द्रियों के जय से मनोजय और क्रमशः प्रकृतिजय किया जाता है। यह राजयोग का साधन क्रम है। इस श्लोक में ५ भूतों और मन के स्थूल, सूक्ष्म आदि क्रम से व्यतिरेक स्वरूप पृथक्करण (analysis) को रश्मियों की संख्या द्वारा दिखाया गया है। सब तत्वों के द्विविध भेद ईडा और पिंगला गत भेद हैं। ईडा से संबंध रखने वाली किरणें चन्द्रमा अथवा शक्ति की किरणें और पिंगला से संबंध रखने वाली प्राण की किरणें, सूर्य अथवा शिव की किरणें हैं। इन को स्त्रीलिंग और पुंलिंग वाचक भी कह सकते हैं। सुषुम्ना में दोनों