सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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जो लगभग ३५ टीकायें इस स्तोत्र पर लिखी जा चुकी हैं, इस स्तोत्र के शंकर भगवत्पाद का विरचित होने का बहुत बडा प्रमाण हैं, क्योंकि प्रायः सब ही टीकाकारों का इस बात पर एक मत है, कि यह स्तोत्र भगवत्पाद श्री शंकराचार्य का ही विरचित है । इन टीकाकारों में से जो प्राचीन तम हैं असंदिग्ध रूप से सौन्दर्य लहरी को भगवत्पाद की कृति ही सिद्ध करते हैं । कैवल्य शर्मा, जो उडीसा के नरेश प्रतापरुद्रदेव के राज्यकाल १५०४ से १५३२ तक में हुए कहे जाते हैं अपनी टीका के प्रारम्भ में स्पष्ट लिखते हैं:—भगवान् परमकारुणिकः शंकरावतारः श्री शंकराचार्यः शिवशक्त्योरभेदं ज्ञापयितुं सकलप्रपंचसाक्षिण्याः ब्रह्माविनाभूतं चिच्छक्तेः स्तुतिद्वारा इत्यादि । कैवल्य शर्मा और उनके समकालीन लक्ष्मीधर एक मनोरमा संज्ञक ग्रंथ का उल्लेख करते हैं जो श्री शिवादि गुरुपारम्पर्य्य सत्सम्प्रदायानुसारि मुनीन्द्र श्री सच्चिदानन्दनाथ के शिष्य सहजानन्दनाथ विरचित है और श्री सच्चिदानन्दनाथ स्वामी का नाम शृंगेरीमठ के आचार्यों की नामावलि में मिलता है ( Vide Descriptive catalogue of Madras Mss., vol. XIX P. 7606 ) और एक ऐसे व्यक्ति की टीका जो आदि शंकराचार्य के संप्रदाय से सम्बन्ध रखता है, सौन्दर्य लहरी के भगवत्पाद की कृति होने का अच्छा प्रमाण है । लक्ष्मीधर ने सुभगोदय व्याख्यान नाम के श्री शंकराचार्य विरचित एक ग्रंथ का भी उल्लेख किया है, जो श्री गौडपादाचार्य विरचित सुभगोदय की टीका मालूम होती है । इस से यह स्पष्ट है कि शिवागम का तांत्रिक साहित्य श्री गौडपादाचार्य के काल में भी बहुत प्रचलित था, और श्री शंकराचार्य को गुरुपरम्परागत संप्रदायानुसार शक्तिदीक्षा