सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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जो लगभग ३५ टीकायें इस स्तोत्र पर लिखी जा चुकी हैं, इस स्तोत्र के शंकर भगवत्पाद का विरचित होने का बहुत बडा प्रमाण हैं, क्योंकि प्रायः सब ही टीकाकारों का इस बात पर एक मत है, कि यह स्तोत्र भगवत्पाद श्री शंकराचार्य का ही विरचित है । इन टीकाकारों में से जो प्राचीन तम हैं असंदिग्ध रूप से सौन्दर्य लहरी को भगवत्पाद की कृति ही सिद्ध करते हैं । कैवल्य शर्मा, जो उडीसा के नरेश प्रतापरुद्रदेव के राज्यकाल १५०४ से १५३२ तक में हुए कहे जाते हैं अपनी टीका के प्रारम्भ में स्पष्ट लिखते हैं:—भगवान् परमकारुणिकः शंकरावतारः श्री शंकराचार्यः शिवशक्त्योरभेदं ज्ञापयितुं सकलप्रपंचसाक्षिण्याः ब्रह्माविनाभूतं चिच्छक्तेः स्तुतिद्वारा इत्यादि । कैवल्य शर्मा और उनके समकालीन लक्ष्मीधर एक मनोरमा संज्ञक ग्रंथ का उल्लेख करते हैं जो श्री शिवादि गुरुपारम्पर्य्य सत्सम्प्रदायानुसारि मुनीन्द्र श्री सच्चिदानन्दनाथ के शिष्य सहजानन्दनाथ विरचित है और श्री सच्चिदानन्दनाथ स्वामी का नाम शृंगेरीमठ के आचार्यों की नामावलि में मिलता है ( Vide Descriptive catalogue of Madras Mss., vol. XIX P. 7606 ) और एक ऐसे व्यक्ति की टीका जो आदि शंकराचार्य के संप्रदाय से सम्बन्ध रखता है, सौन्दर्य लहरी के भगवत्पाद की कृति होने का अच्छा प्रमाण है । लक्ष्मीधर ने सुभगोदय व्याख्यान नाम के श्री शंकराचार्य विरचित एक ग्रंथ का भी उल्लेख किया है, जो श्री गौडपादाचार्य विरचित सुभगोदय की टीका मालूम होती है । इस से यह स्पष्ट है कि शिवागम का तांत्रिक साहित्य श्री गौडपादाचार्य के काल में भी बहुत प्रचलित था, और श्री शंकराचार्य को गुरुपरम्परागत संप्रदायानुसार शक्तिदीक्षा
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मिली थी। सुभगोदय का अर्थ 'सुभगा का उदय' अर्थात् 'कुण्डलिनी शक्ति का जागरण' किया जा सकता है। श्री शंकराचार्य विरचित प्रपंचसार संग्रह तंत्र भी इस बात की पुष्टि करता है, जिस पर भगवत्पाद के शिष्य श्री पद्मपादाचार्य ने टीका लिखी है। शार्दा-तिलक के टीकाकार राघवभट्ट ने अपनी ई. १४९३ में लिखित टीका में उसका उल्लेख किया है। इन प्रमाणों के होते हुए सब शंकाएं निरर्थक हैं। वेदोंके भाष्यकार सायनाचार्य ने भी प्रपंचसार संग्रह पर एक टीका लिखी है, और वेदान्त कल्पतरु अध्याय १ पाद ३ अधिकरण ८ सूत्र ३३ में भी प्रपंचसार संग्रह का उल्लेख मिलता है और वहां वह तंत्र शारीरकभाष्यकार श्री शंकर भगवत्पाद का लिखा हुआ बताया जाता है।
हमारी तो इन ऐतिहासिक समस्याओं से अधिक दिलचस्पी नहीं है; इसलिये इतना ही लिखना पर्याप्त समझते हैं, कि शारीरकमीमांसाभाष्य के पढने से यह बात स्पष्ट है कि शंकर भगवत्पाद ने वेद वेदान्तानुकूल स्मृत्युक्त सब योग और उपासनाओं को अंगीकार किया है और वेदवेदान्त विरुद्ध सिद्धान्तों का परिहार किया है, इसलिये तांत्रिक योग पद्धतियों और उपासनाओं को भी अपनाने में उनको आपत्ति नहीं हो सकती थी, जहां तक कि वे वेदवेदान्त का समर्थन करने वाली हैं, और प्रपंचसार संग्रह एवं सौंदर्य लहरी की सैद्धांतिक भूमिका श्रौत मार्ग के विपरीत नहीं है अपितु श्रौत सिद्धान्तों का समर्थन करती है। और जबकि सब ही पराचीन और अर्वाचीन विद्वानों का बहुमत इस बात के पक्ष में है कि सौंदर्य लहरी भगवत्पाद की ही रचना है तो उसके विरुद्ध शंका उठाकर वादविवाद में पडना वांछनीय नहीं।
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इस संबंध में एक शंका बहुदा यह भी उठाई जाती है कि शंकर भगवत्पाद विवर्तवाद के प्रवर्तक थे वे परिणामवाद के कदापि समर्थक नहीं बन सकते थे, परन्तु सौंदर्य लहरी में स्पष्ट रूप से परिणामवाद का समर्थन किया गया है, देखें श्लोक १ और ३५ । इस शंका का उत्तर स्वयं भगवत्पाद ब्रह्मसूत्र (२, १, १४) के भाष्य की अंतिम पंक्ति में इन शब्दों में देते हैं:—'अप्रत्याख्यायैव कार्य-प्रपंचं परिणाम प्रक्रियां चाश्रयति सगुणेषु उपासनेषूपयोक्ष्यते इति ।' अर्थात् कार्य प्रपंच को सिद्ध करने के लिये नही वरन् सगुण उपासना के उपयोग के लिये परिणामवाद का सूत्रकार ने आश्रय लिया है । भगवत्पाद ने ब्रह्म सूत्रों में सर्वत्र सत्कारणवाद को सिद्ध करते समय जगत् को सत्शक्ति का परिणाम ही सिद्ध किया है । आगे चलकर ब्रह्म सूत्र (२,१,२४) के भाष्य की अन्तिम पंक्ति में भी वे इन शब्दों में उपसंहार करते हैं:—'तस्मादेकस्यापि ब्रह्मणो विचित्रशक्तियोगात्क्षीरादिवत् विचित्र परिणाम उपपद्यते' ।
श्रीविद्या का प्रचार मद्रास प्रान्त में अधिक है, उत्तर भारत में उसका सर्वथा अभाव-सा प्रतीत होता है, यहां तक कि उत्तर भारत का विद्वत्समाज इस विद्या से अनभिज्ञ दिख पडता है । इसलिये हमने सौंदर्य लहरी पर यह व्याख्या हिंदी जानने वालों के लाभार्थ हिंदी में लिखने का साहस किया है । यद्यपि यह विषय प्रधानतया तान्त्रिक है, परन्तु हमने अपने विचारों की पुष्टि में उपनिषद् गीता जैसे सर्वमान्य शास्त्रों का ही उद्धरण इस दृष्टि से किया है कि तंत्रों का साहित्य वाममार्ग की कुत्सित प्रथाओं के कारण सामान्य जनता में अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता । परन्तु हम साथ ही पाठकों को यह भी बता-
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देना उचित समझते हैं कि तंत्रोक्त समयाचार शुद्ध सात्विक उपासना का मार्ग है और श्रीमच्छंकर भगवत्पाद की लेखनी से निकला हुआ यह स्तोत्र इस बात का सर्वोपरि प्रमाण है । श्रीभगवत्पाद का लिखित एक प्रपंचसार तंत्र भी मिलता है जिसे सैट् अवैलन महोदय ने अपनी तंत्रागम ग्रंथावलि में प्रकाशित किया है ।
श्रीविद्या पर परशुराम कल्पसूत्र, और उसके आधार पर संग्रहीत नित्योत्सव एवं भास्करराय का समस्त साहित्य पढने योग्य है । कैवल्य शर्मा ने सौंदर्य लहरी पर भाष्य लिखा है । संस्कृत जानने वाले विद्वानों को श्रीविद्या के रहस्यों को जानने के लिये उपरोक्त ग्रंथ अवश्य पढने चाहिये । श्रीविद्या के जिज्ञासुओं को त्रिपुरातापिनी, देवी, त्रिपुरा और भावनोपनिषदें भी देखने योग्य हैं । त्रिपुरा और भावनोपनिषदों को हम परिशिष्ट में दे रहे हैं ।
अंग्रेजी में सौंदर्य लहरी पर कई ग्रंथ लिखे जा चुके हैं, ३ ग्रंथ हमारे देखने में आये हैं । दि थियोसोफिकल पब्लिशिंग हाउस, अडयर का प्रकाशित और पंडित स० सुब्रह्मण्य शास्त्री (F. T. S.) और ट. र. श्रीनिवास अयंगार (B A. L. T.) की लिखित अंग्रेजी प्रति हमारे सामने है, जिसको पढकर हमें यह ग्रंथ हिंदी में लिखने की प्रेरणा मिली । हम उक्त दोनों सज्जनों के अनुगृहीत हैं क्योंकि उनके ग्रंथ से अनेक विषयों पर हमें पर्याप्त सहायता मिली है ।
साथ ही मैं श्री स्वामी शंकरानन्द भारतीजी, जिनको साहित्य-संसार महामहोपाध्याय वेदान्त वागीश श्री श्रीधर शास्त्री पाठक प्रोफेसर डेक्कन कालेज पूना के नाम से परिचित हैं, डॉ. दुर्गाशंकर
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नागरजी (कल्पवृक्ष के संस्थापक उज्जयनी, और श्री विनायकराव बापू वैशंपायनजी देवास का भी अनुग्रह प्रकट करना जरूरी समझता हूं जिनने अपना बहुमूल्य समय प्रदान करके ग्रंथ पर अपनी सहानुभूति एवं संम्मति प्रदान की है, जो ग्रंथ के पूर्व भाग में प्रकाशित की जाती हैं ।
परिशिष्ट मे नासदासीय ऋग्वेदीय सूक्त भी हिंदी अनुवाद सहित दिया जा रहा है ।
देवास-मध्यभारत }
सं० २००५ }
विष्णुतीर्थ
सांकेतिक चिन्ह
| संकेत | विवरण / ग्रन्थ |
|---|---|
| गी, गीता | श्री मद्भगवत् गीता |
| यो० द० | योगदर्शन |
| बृ०, बृह० | बृहदारण्यक उपनिषद् |
| क, कठ० | कठोपनिषद् |
| प्र०, प्रश्न० | प्रश्नोपनिषद् |
| दु० स० | दुर्गा सप्तशती |
| मु० | मुण्डकोपनिषद् |
| छा० | छान्दोग्य उपनिषद् |
| ऐत० | ऐतरेय उपनिषद् |
| श्वे० | श्वेताश्वतर उपनिषद् |
| ब्र०, ब्र० सू० | ब्रह्म सूत्र |
| ऐ० आ० | ऐत्तरीय अरण्यक |
| यो० शि० | योग शिखोपनिषद् |
| शा० ति० | शारदा तिलक |
| ऋक् | ऋग्वेद |
| तै० | तैत्तिरीयोपनिषद् |
| ना० | नारायणोपनिषद् |
| ल० स० | ललिता सहस्रनाम |
| सौ० ल० | सौन्दर्य लहरी |
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विषय सूची
प्रस्तावना
आनन्द लहरी
उपोद्घात पृष्ठ १–२८, शिवशक्ति पृष्ठ २, प्रयोजन पृ. ४, दीक्षा पृ. ७, शक्तिपात पृ. ७, ५ प्रकार का भ्रम और ३ प्रकार का मल पृ. ९, तत्त्वशुद्धि पृ. १०, ज्ञान के पूर्व योग और उपासना की आवश्यकता पृ. १४, उपासना का योग से सम्बन्ध पृ. २४, शिवशक्ति उपासना पृ २५, श्लो. १ पृ. २९–६० संक्षिप्त टिप्पणी पृ. २९, ब्रह्मकारणवाद पृ. ३०, ऋग्वेद में ब्रह्म का स्वरूप और सृष्टिक्रम पृ. ३१, शैवशक्ति दर्शनों के अनुसार सृष्टिक्रम और स्पन्दवाद पृ. ३४, बीजमंत्र द्वारा ब्रह्मोपासना पृ. ४२ स्पन्द ही शक्ति है पृ. ४४, प्राणतत्त्व और अध्यात्म तथा अधिभूत भाव पृ. ४७, हिरण्यगर्भ, प्राणतत्त्व और हिरण्यगर्भ पृ. ४९ अकृतपुण्य भजन नहीं कर सकते पृ. ५१, दीक्षा का शक्ति से सम्बन्ध पृ. ५२ श्री विद्या पृ. ५३, श्री विद्या का आधार वेद वेदान्त पृ. ५४, श्री चक्र पृ. ६०, श्लो. २ पृ. ६०, अणुकारणवाद पृ. ६१, शेष और कुण्डलिनी पृ. ६३, श्लो. ३ पृ. ६५, विद्या और अविद्या पृ. ६६, मुररिपुवराहस्य दंष्ट्रा पृ. ७३, श्लो. ४ पृ. ७५ वर अभिनय पृ. ७५, भय का मूल कारण पृ. ७७, बाला मंत्र पृ. ७७ श्लो. ५ पृ. ७८, साध्यसिद्ध विद्या पृ. ८३, श्लो. ६ पृ. ८४, काम दहन आख्यान पृ. ८५, श्लो. ७ पृ. ८७, माया का बन्धन पृ. ८९, श्लो. ८ पृ. ९२, श्लो. ९ पृ. ९५, षट्चक्र वेध अर्थात् अन्वेय भूमिका पृ. ९५, श्लो. १० पृ. १०१, श्री चक्र पृ. ९५, अवसरण अर्थात् अन्वय भूमिका पृ. १०१, श्लो. ११ पृ. १०५,
श्री चक्र निर्माण की विधि पृ. १०७, श्लो. १२ पृ. १११, भगवती का सौन्दर्य कल्पनातीत है पृ. ११०, श्लो १३ पृ. ११३. काय सम्पत् सिद्धि, श्लो. १४ पृ. ११५, तत्त्वों की किरणें ११५, किरणों का तत्त्वों से सम्बन्ध ११७, किरणों का वर्णमाला से सम्बन्ध ११८, किरणों की अधिष्ठातृ शक्तियां १२१, श्लो. १५ पृ. १२५, वाक् सिद्धि, श्लो. १६ पृ. १२७, श्लो. १७ पृ. १२९, श्लो. १८ पृ. १३०, मधुमती भूमिका की सिद्धि श्लो १९ पृ. १३२, काम कला का ध्यान, श्लो. २० शक्तिपात करने की सिद्धि, पृ. १३५, श्लो. २१ पृ. १३७, चक्रों और सहस्रार का सविस्तार वर्णन, पृ. १३९, चन्द्र सूर्य पृ. १४४ तत्त्वों और चक्रों के अधिदेवों की कलाओं के नाम १४७ आक्त के ऊपर ९ स्तर १४९, श्लो. २२ पृ. १५३, अहं ब्रह्मास्मि ज्ञान का उदय १५३, श्लो. २३ अर्ध-नारीश्वर सदाख्यतत्त्व का ध्यान, पृ. १५६, श्लो. २४ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव, पृ. १५७, श्लो. २५, पृ १५९, श्लो. २६ पृ. १६०, तीन प्रकार का पूजन १६१, श्लो. २७ पृ. १६२, श्लो. २८ पृ. १६४, श्लो २९ पृ. १६५, कैटभ भिद् १६६, श्लो. ३० पृ. ब्रह्मभाव १६८, श्लो. ३१ पृ. ६४ तंत्रों से भगवती का तंत्र स्वतंत्र है, १६०, श्लो ३२, ३३, १७५, हादिकादि विद्याओं के रूप पंचदशी और उसके आधार पर अन्य विद्यायें १८०, माला का विधान १८०, षोडशी विज्ञान १८१ नाद, बिन्दु और कला १८७, श्लो. ३४, शिव शक्ति का अंगी अंगवत् सम्बन्ध, पृ. १९०, श्लो. ३५, सारा विश्व शक्ति का परिभास है, १९३, श्लो. ३६ आज्ञा चक्र, १९६, श्लो. ३७ विशुद्ध चक्र, पृ. १९९.
३
श्लो. ३८ हृदय कमल, पृ. २०२, श्लो. ३९ स्वाधिष्ठान पृ. २०७, चक्र, विभिन्न स्तरों पर शक्ति के विभिन्न रूप २१० ग्रंथि त्रय और अध्यास २१३, बिन्दु त्रय पंचाग्नि विद्या और ब्रह्मचर्य २१५ श्रद्धा का ब्रह्मचर्य से सम्बन्ध २२४ गुरु शिष्य का सम्बन्ध और श्रद्धा २२४, श्लो. ४० मणिपूरक चक्र, पृ. २२७, श्लो. ४१ मूलाधार, पृ. २२८, शिवताण्डव पृ. २३१
सौन्दर्य लहरी (उत्तरार्ध)
उपोद्घात पृ. २३७, मुकुट का ध्यान श्लो. ४२ पृ. २४१, केशों का ध्यान श्लो. ४३ पृ. २४२, श्लो. ४४ पृ. २४३, अलकों का ध्यान श्लो. ४५ पृ. २४४, ललाट का ध्यान श्लो. ४६ पृ. २४५, भृकुटि का ध्यान श्लो. ४७ पृ. २४६, तीन नेत्रों का ध्यान श्लो. ४८ पृ. २४८, श्लो. ४९ पृ. २४९ श्लो. ५० पृ. २५२, श्लो. ५१ पृ. २५३, श्लो. ५२ पृ. २५४, श्लो. ५३ पृ. २५५, श्लो. ५४ पृ. २५७, श्लो. ५५ पृ. २५८, श्लो. ५६ पृ. २५९, श्लो. ५७ पृ. २६०, कनपटियों का ध्यान श्लो. ५८ पृ. २६०, मुख का ध्यान श्लो. ५९ पृ. २६१, श्लो. ६० पृ. २६२, नासिका का ध्यान श्लो. ६१ पृ. २६३, ओष्ठों का ध्यान श्लो. ६२ पृ. २६७ मुस्कान का ध्यान श्लो. ६३ पृ. २६८, जिव्हा का ध्यान श्लो. ६४ पृ. २६९, श्लो. ६५ पृ. २७०, बाणि का ध्यान श्लो. ६६ पृ. २७१, चिबुक का ध्यान श्लो. ६७ पृ. २७२, ग्रीवा का ध्यान श्लो. ६८ पृ. २७३, गले का ध्यान श्लो. ६९ पृ. २७३, चारों भुजाओं का ध्यान श्लो. ७० पृ. २७५
४
हाथों का ध्यान श्लो. ७१ पृ. २७६, दोनों स्तनों का ध्यान
श्लो. ७२ पृ. २७७, श्लो. ७३ पृ. २७८, श्लो. ७४ पृ. २७९
श्लो. ७५ पृ. २८०, नाभि का ध्यान श्लो. ७६ पृ. २८२,
श्लो. ७७ पृ. २८३, श्लो. ७८ पृ. २८५, श्लो. ७९ पृ. २८६
श्लो. ८० पृ. २८७, नितंब का ध्यान श्लो. ८१ पृ. २८८,
उरुयुग्म का ध्यान श्लो. ८२ पृ. २८९, जंघाओं का ध्यान श्लो. ८३
पृ. २८९, श्लो. ८४ पृ. २९१, श्लो. ८५ पृ. २९१, श्लो. ८६
पृ. २९३, श्लो. ८७ पृ. २९७, श्लो. ८८ पृ. २९८, श्लो. ८९
पृ. २९९, श्लो. ९० पृ. ३००, चरणों की गति का ध्यान
श्लो. ९१ पृ. ३०१, पलंग का ध्यान श्लो. ९२ पृ. ३०२,
पूरे शरीर का ध्यान श्लो. ९३ पृ. ३०४, भगवती के शृंगारार्थ
दर्पण का ध्यान श्लो. ९४ पृ. ३०७, शृंगार के डिब्बे का ध्यान
श्लो. ९५ पृ. ३१०, भगवती की सपर्या की असुलभता श्लो. ९६
पृ. ३११, श्लो. ९७ पृ. ३१२, श्लो. ९८ पृ. ३१३, घटा
अवस्था श्लो. ९९ पृ. ३१४, प्रार्थना श्लो. १०० पृ. ३१५,
श्लो. १०१ पृ. ३१६, समर्पण श्लो. १०२ पृ. ३१८, श्लो १०३,
पृ. ३१८, उपसंहार पृ. ३१९,
श्री
आनंद लहरी
आदौ गणपतिं नत्वा, नत्वा शिवं जगद्गुरुम् ।
आचार्यं शंकरं नत्वा भजे त्रिपुरसुन्दरीम् ॥
सौन्दर्य लहरी १०३ श्लोकों का एक बृहत् स्तोत्र है जो श्री १००८ आदि शंकराचार्य शंकर भगवत्पाद का विरचित है । इस स्तोत्र में भगवती की स्तुति की गई है। कविता और साहित्य की दृष्टि से भी इसका स्थान ऊंचा है। परन्तु विवर्तवाद के प्रवर्तक की लेखनी से निकला हुवा यह स्तोत्र तांत्रिक उपासना के रहस्यों पर प्रकाश डालता है और साथ ही प्रक्रियात्मक योग साधन की आवश्यकता सिद्ध करता है, इसलिये साधकों के लिये इसका विशेष महत्व है। सौन्दर्य लहरी की विशेषता इस बात में है कि केनोपनिषद् की बहुशोभमाना उमा हैमवती, अथवा पुराणों की उमा हिमशैल-सुता पार्वती के मानुषी स्त्री रूप को सामने रखते हुए भी उसे सृष्टि की आदि कारण भूता शक्ति, योगियों की षट्चक्राधिष्ठात्री कुण्डलिनी शक्ति, तांत्रिक श्री चक्रस्थ श्री विद्या की अधिदेवता महात्रिपुरसुन्दरी, और सकल ब्रह्माण्ड में स्थूल रूप से स्वयं व्यक्त होने वाली विराट अधिभूता शक्ति का निर्गुण ब्रह्म की
२ सौंदर्य लहरी
सत् चित् आनन्द से अभिव्यक्त होने वाली चिति अर्थात् चिन्मयी शक्ति के साथ समन्वय करके अद्वैतवाद का ही प्रतिपादन किया गया है। स्थूल बहिर्दृष्टि रखने वाले उपासकों का उपास्यदेव बहुधा किसी न किसी रूप में व्यक्तित्व की भावना की प्रधानता लिये होता है, परन्तु एक दार्शनिक का दृष्टिकोण, जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्तरों पर अपना लक्ष्य रखता है, उपासक के मूर्तिमान एकदेशीय व्यक्तिमापन्न रूप से सन्तुष्ट नहीं होता, वह सदा दोनों का समन्वय करने का यत्न किया करता है। जैसा कि श्री भगवान स्वयं गीता में कहते हैं:—
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ ( गीता ७-२४ )
**अर्थ:—**बुद्धिहीन मनुष्य मुझ अव्यक्त को व्यक्तिमापन्न मानते हैं। क्योंकि वे मेरे उत्तम अव्यय परं भाव को नहीं जानते !
सौन्दर्य लहरी को पढने से यह बात स्पष्ट दिखने लगती है।
शिव शक्ति
ब्रह्म अक्षर है, अर्थात् उसमें कभी किसी प्रकार का परिणाम नहीं होता, वह अपरिणामी, अव्यय, अविनाशी है, परन्तु जगत के सृष्टि स्थिति संहार का अभिन्न-निमित्तोपादान कारण भी है, इसलिये सर्वशक्तिमान है। शक्ति शक्तिमान से भिन्न नहीं कही जा सकती और न वह शक्तिमान से पृथक ही हो सकती है, यद्यपि सब कर्म शक्ति की ही क्रिया से सम्पादित होते हैं। अर्थात शक्ति ही सारे जगत का कारण है, तो भी शक्तिमान की शक्ति शक्तिमान की इच्छा के ही आधीन
सौंदर्य लहरी ३
कार्य करती है। स्वतंत्र रूप से उसकी कोई सत्ता नहीं होती, या यों कहें कि शक्तिमान की इच्छा ही शक्ति है। परन्तु वह उसका अंग भी नहीं कही जा सकती; अर्थात दोनों में अंग अंगी का सम्बन्ध नहीं है। दोनों में कोई वास्तविक भेद नहीं कहा जा सकता। जो भिन्नता दीख पडती है, वह सर्वथा व्यवहारिक ही है पहिले शक्तिमान में इच्छा अथवा संकल्प के रूप में उसका उदय होता है फिर वह क्रिया और ज्ञान का रूप धारण कर लेती है। इच्छा क्रिया और ज्ञान के रूपों में अभिव्यक्ति होने पर भी शक्ति एक ही है, और शक्तिमान का ही रूप है; परन्तु वह शक्तिमान का परिणाम अथवा विकार भी नहीं है। क्योंकि ब्रह्म अपरिणामी है।
श्वेताश्वेतरोपनिषत् का कथन है कि :—
ब्रह्मवादियों की समाज में यह प्रश्न उपस्थित हुवा कि हम कहां से पैदा हुवे, हम किस के आधार पर जीवित और प्रतिष्ठित हैं, और किस के कारण सुख दुःख के चक्कर में पडे हैं। तो उन्होंने ध्यान योग द्वारा देखा कि सब का कारण एक शक्ति ही है, जो जड नहीं बरन देवात्मिका चेतन शक्ति है। “ते ध्यान योगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्”। यह हम कह चुके हैं कि शक्ति शक्तिमान की ही इच्छा के परतन्त्र है, अथवा वह शक्तिमान की इच्छा की ही अभिव्यक्ति है। ब्रह्मसूत्र अध्याय १. पाद ४ सूत्र ३ “तदधीनत्वादर्थवत्” के भाष्य में शंकर भगवत्पाद कहते हैं:-
४ | सौंदर्य लहरी
"परमेश्वराधीनात्वियमस्माभिः प्रागवस्था जगतोऽम्युपगम्यते न स्वतंत्रा । अर्थवती ही सा नहि तया विना परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वं सिद्धयति । शक्तिरहितस्य तस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः ।
**अर्थ:—**हम तो जगत की प्रागवस्था परमेश्वर के आधीन मानते हैं, न कि स्वतंत्र । क्योंकि वह अर्थवती अर्थात सार्थक है उसके बिना तो परमेश्वर का सृष्टि करना भी सिद्ध नहीं होता शक्ति रहित परमेश्वर में प्रवृत्ति का अभाव होने के कारण ।
जब कि शक्ति की शक्तिमान से पृथक स्वतंत्र सत्ता नहीं, तो शक्ति की महिमा का स्तवन करना शक्तिमान का ही गुणगान करना है । किसी मनुष्य की वीरता अथवा कला कौशल की बडाई करने से उस मनुष्य की ही वडाई समझी जाती है । इसी प्रकार आदि शक्ति की भी उपासना, पूजन, स्तवन आदि द्वारा परमात्मा की ही उपासना, पूजन अथवा स्तवन करना है ।
प्रत्येक ग्रंथ में चार अंग हुवा करते हैं—१ प्रयोजन २ विषय ३ उपाय और ४ सम्बन्ध ।
प्रयोजन | पाठकों को किसी भी ग्रंथ के स्वाध्ययन करने से पहिले यह जानना आवश्यक है, कि ग्रंथकार का इस ग्रंथ के लिखने में क्या प्रयोजन है, उसका विषय क्या है, अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिये ग्रंथकार ने क्या क्या उपाय अथवा साधन बताये हैं, और अन्त में यह भी जानना आवश्यक है कि इन तीनों का परस्पर क्या सम्बन्ध है ।
सौंदर्य लहरी ५
श्री मच्छङ्कर भगवतपाद का किसी भी ग्रंथ के लिखने में मोक्ष के एक मात्र साधन तत्त्वज्ञान की अपरोक्षानुभूति की उपलब्धि के सिवाय दूसरा अन्य प्रयोजन नहीं हो सकता। विषय चाहे कुछ भी क्यों न हो। सौंदर्य लहरी का विषय भगवंती का स्तवन है। स्तुति मनन का एक साधन है, जिससे तत्त्व दर्शन और तत्त्व दर्शन से अपरोक्ष ज्ञान होता है। कोई शंका करे कि योग और उपासना कर्म-कांड के विषय हैं, और कर्म का फल ज्ञान नहीं होता; उनको यह समझना जरूरी है कि योग अथवा उपासना के बहिरंग और अन्तरंग दो स्तर होते है। वहिरंग क्रियाएं कर्म प्रधान हुवा करती हैं, जिनका प्रयोजन मन को परमार्थ की ओर आकर्षित कराना मात्र है। जैसे बालक की पढने में रुचि बढाने के लिये पहिले उसे खिलौनों के विचित्र खेलों द्वारा kindergarten की आधुनिक पद्धति के अनुसार खेल में ही प्रवृत्त किया जाता है। उपासना का बाह्य कर्म-कांड ज्ञान का कारण नहीं। परन्तु उपासना के समय उपासक का चित्त भावना से युक्त होता है। भावना रहित उपासना प्राणहीन समझनी चाहिये। भावना और ध्यान ही उपासना और योग के बाह्य कर्माडम्बर रूपी स्थूल शरीर में प्राण का काम करते हैं।
तज्जपस्तदर्थ भावनम्। (यो. द. १, २८)
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽन्तरायाभावश्च (यो. द. १, २९)
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना (गी. १३.२४)
भगवान का अनन्य, तैलधारा प्रवाहवत, अनवच्छिन्न चिन्तन अथवा योग का "आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचदपि चिन्तयेत्" साधन
६ | सौन्दर्य लहरी
वेदान्त का निदिध्यासन ही है। जीव ब्रह्मैक्यज्ञान तो वाणी से कथन मात्र का ज्ञान अथवा बुद्धि की समझ का परोक्ष ज्ञान नहीं, वह तो ध्यान की वह भूमिका है जिस पर आरूढ होने पर जीव की अहँ वृत्ति में देहाभिमान की वृत्ति तनु होकर ब्रह्म वृत्ति बढने लगती है, अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पण करके मन उपास्य देव से तल्लीनता प्राप्त कर लेता है। ऐसे दृढ भावना युक्त ध्यान अथवा अनन्य चिंतन का फल ही तत्त्व दर्शन है। उपासना के अन्तरंग स्तरों पर प्रगति होने के साथसाथ बाह्य कर्म-कांड का आडम्बर स्वयं छूटने लगता है।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
\hfill (गीता ३. १७)
सौन्दर्य लहरी का विषय तो भगवती का स्तवन ही है। परन्तु उसकी शैली ऐसी है कि स्तुति के बहाने प्रथम ४१ श्लोकों में श्री विद्या के रहस्य, हादि कादि विद्या का उद्धरण, षट्-चक्र-वेध का प्रकरण, ग्रंथि त्रय का वर्णन इत्यादि साधनोपायों का दिग्दर्शन कराकर जीव ब्रह्म की एकता पर साधक का लक्ष्य कराया गया है, उक्त साधन-क्रम को तीन स्तरों में बांटा जाता है, जिनकी दीक्षा के लिये किसी समर्थ गुरु की शरण लेनी पडती है, क्योंकि साधन का रहस्य पुस्तकों के पढने से नही मिलता ! वह गुरु कृपा का ही विषय है, और गुरु की कृपा ही दीक्षा तत्त्व है।
सौंदर्य लहरी ७
दीयते शिव सायुज्यं क्षीयते पाश बन्धनम् ।
अतो दीक्षेति कथिता बुधैःसच्छास्त्रवेदिभिः ॥
दीक्षा
दीक्षा ३ प्रकार की होती है, १ आणवी, २ शाक्ति और ३ शांभवी। प्रथम आणवी दीक्षा में मंत्र दीक्षा द्वारा श्रीचक्र के पूजन सहित कादि हादि विद्याओं में प्रवेश कराकर, बहिर्पूजन में जो कर्म प्रधान है, साधक को दीक्षित किया जाता है । अंतिम दोनों दीक्षाएं वेध दीक्षाएं कहलाती हैं, जिनमें गुरु शिष्य पर शक्तिपात करके शिष्य की कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर देता है । शक्ति दीक्षा में षट्-चक्र के वेध द्वारा ग्रंथित्रय अर्थात रुद्रग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और ब्रह्म ग्रंथि का वेध किया जाता है । इसीलिये इसको वेध दीक्षा भी कहते हैं । अंतिम शांभवी दीक्षा में जो तीव्रतम दीक्षा है, जीव ब्रह्मैकत्व ज्ञान का प्रस्फुटन होता है, इसीलिये इसको महावेध दीक्षा भी कहते हैं ।
शक्तिपात
यह ऊपर कहा जा चुका है कि उपरोक्त दीक्षाएं गुरु के शक्तिपात रूपी अनुग्रह के द्वारा ही संपादित होती हैं। शक्तिपात दीक्षा में गुरु अधिकारी जिज्ञासु को स्पर्श, अवलोकन, मंत्र देकर वाणी द्वारा अथवा संकल्प मात्र से अनुगृहीत करता है; यदि शिष्य अपने को अनुगृहीत अनुभव न करे, तो दीक्षा का होना न होने के तुल्य समझना चाहिये ।
श्री मच्छङ्कराचार्य ने सौंदर्य लहरी जैसा ग्रंथ लिख कर मानव समाज पर बडी कृपा की है क्योंकि केवल वाचक ज्ञानियों को यह
८ सौंदर्य लहरी
बताना अत्यावश्यक है कि बिना गुरु के शक्तिपात रूपी अनुग्रह के जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान का होना दुर्लभ ही नहीं असंभव है, कहा है:—
दुर्लभो विषय त्यागो दुर्लभं तत्व दर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥
नहीं तो क्या यह आश्चर्य अत्याश्चर्य नहीं है कि ब्रह्म-सूत्रों के भाष्यकार एक ऐसे विषय को इतनी महानता दें, जो वेदांत की परिपाठी से सर्वथा असंगत हो । इस विषय का अधिक स्पष्टीकरण करने के लिये हम नीचे श्री वासुदेव ब्रह्मेन्द्र सरस्वतीजी के 'ब्रह्मशिका' नामक पुस्तक से संग्रहीत निम्न-श्लोक उद्धृत करते हैं:—
तत्वज्ञानेन मायायाबाधो नान्येन कर्मणा ।
ज्ञानं वेदांतवाक्योत्थं ब्रह्मात्मैकत्व गोचरम् ॥
तच्चदेवप्रसादेन गुरोः साक्षान्निरीक्षणात् ।
जायते शक्तिपातेन वाक्यादेवाधिकारिणाम् ॥
**अर्थ:—**तत्वज्ञान से ही माया का बाध होता है। अन्य कर्म से नहीं, जो ज्ञान वेदान्त के महावाक्यों द्वारा ब्रह्म और जीवात्मा के एकत्व की अनुभूति दिलाता है वह ज्ञान ईश्वर के प्रसाद से और गुरु के साक्षात निरीक्षण अथवा वचन से शक्तिपात द्वारा अधिकारियों में प्रकाशित होता है।
गीता में भगवान ने भी कहा है:—
" तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति "(गीता ४,३८)
**अर्थ:—**वह (ज्ञान) स्वयं योग सिद्ध को यथा समय अपने अन्तर में ही मिलता है।
सौंदर्य लहरी ९
पांच प्रकार का भ्रम और तीन प्रकार का मल
अज्ञान से उत्पन्न होने वाला भ्रम पांच प्रकार का होता है।
जीवेश्वरौ भिन्नरूपौ इति प्रथमः,
आत्मनिष्ठं कर्तृगुणं वास्तवं वा द्वितीयकः,
शरीरत्रय- संयुक्तजीवः संगी तृतीयकः,
जगत्कारण- रूपस्यावेकारित्वं चतुर्थकः,
कारणाद्भिन्नजगतः सत्यत्वं पंचमों भ्रमः— (अन्नपूर्णोपनिषत्)
जीव ब्रह्म का भेद पहला भ्रम है। आत्मा में कर्ता भोक्तापन्न वास्तविक है या नही, यह दूसरा भ्रम है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों के संयोग से इतरेत्तर अध्यास के कारण आत्मा संगी हो गया है, यह तीसरा भ्रम है। प्रथम मायामल, दूसरा कर्तामल और तीसरा आणव मल कहलाता है। चौथा और पांचवा भ्रम दोनों जगत और उसके अभिन्न निमित्तोपादान कारण-ब्रह्म सम्बन्धी हैं। पहिला भ्रम जगत के कारणस्वरुप अपरिणामी ब्रह्म तत्व में विकारीपन की प्रतीति कराता है, और दूसरा, कारण और कार्य में भेद बुद्धि उत्पन्न कराता है। मायामल, कर्तामल और आणव मल की निवृत्ति कुण्डलिनी शक्ति के जागरगोपरांत षट् चक्र वेध द्वारा तत्व शुद्धि होने पर होती है। तत्व ३६ हैं जिनका वर्णन आगे आयगा। उनमें पांच युद्ध तत्व; सात शुद्धाशुद्ध तत्व और चौबीस अशुद्ध तत्व होते हैं। प्रथम पांच शुद्ध तत्वों को छोडकर शुद्धि शेष इकत्तीस तत्वों की होती है,