स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
DevanagariHindipublished519 पृष्ठ
पृष्ठ 106, कुल 519 में से
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[३] विशेष ध्यातव्य
कतिपय ऐसी स्पन्दकारिकायें भी हैं जो कि भट्टकल्लट के 'स्पन्दसर्वस्व' में तो नहीं हैं किन्तु अन्य ग्रन्थों में हैं; यथा—
| कारिका | वह ग्रन्थ जिसमें यह कारिका उद्धृत की गई है— |
|---|---|
| १. 'लब्ध्वाप्यलभ्यमेतज्ज्ञानधनं, हृद्गुहान्तकृतनिहितेः ।<br>वसुगुप्तवच्छिवाय हि, भवति सदा सर्वलोकस्य ॥'<br>— 'स्वोपज्ञपरिमल' में उद्धृत ॥ | 'महार्थमंजरी' की 'स्वोपज्ञ<br>'परिमल' टीका श्लोक<br>क्रमाङ्क १ |
| २. वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः ।<br>रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः ॥<br>— 'स्पन्दप्रदीपिका' (का० ५३)<br>(यह कारिका 'स्पन्दकारिकाविवृति' में नहीं है ।)<br>उपर्युक्त कारिका (क्र० २) उत्पलाचार्य की टीका<br>'स्पन्दप्रदीपिका' में है, तो उनके परवर्ती ग्रन्थकार<br>रामकण्ठाचार्य की 'स्पन्दकारिकाविवृति' में भी होनी<br>चाहिए थी किन्तु वहाँ उल्लिखित नहीं है । | 'स्पन्दप्रदीपिका' में तो है<br>किन्तु 'स्पन्दसर्वस्व'<br>(कल्लट की टीका) में नहीं<br>है । 'स्पन्दसर्वस्व' में मात्र<br>५२ कारिकायें हैं । |
| ३. अन्तिम कारिका (विभिन्न टीकाओं में)—<br>(क) 'अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् ॥'<br>— 'स्पन्दसर्वस्व' (५२)<br>— 'स्पन्दकारिकाविवृति (५२)<br>(ख) 'वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः'<br>— 'स्पन्दप्रदीपिका' (५३) | |
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