स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः ९३
क्योंकि—कार्यकारणभाव (या बाध्यबाधकभाव तब तक सिद्ध ही नहीं हो सकता जब तक कि पूर्वदशा एवं उत्तरदशा का एक ही प्रमाता न हो—) कार्यकारणभावो हि बाध्यबाधकताऽपि च । पूर्वापरैकमातारमन्तरेण प्रसिद्धयतः ॥१ जब प्रत्येक क्षण विलक्षण (पृथक्-पृथक्, पूर्वापरा सम्बद्ध) होंगे, प्रत्येक संविद् पृथक्-पृथक् होगी तो पूर्ववर्ती प्रमाण से उत्तरवर्ती प्रमेय को बोध कैसे होगा ? सम्बन्ध का ग्रहण किए बिना प्रमाण की गति क्या होगी? संवेत्ता के बिना मिथ्याज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध कैसे होगा? एक क्षण के अनन्तर यदि शुक्तिका रजत हो जाय तो उसे रोक कौन सकेगा?२ वस्तुतः संवेत्ता के एक हुए बिना प्रमाण-अप्रमाण का भेद ही नहीं रहेगा । ऐसी स्थिति में तो घट की सिद्धि होगी किन्तु पट का अनुभव होगा । ३ 'यह वही व्यक्ति है; यह वही वस्तु है; यह वही दृश्य है'—इत्यादि प्रत्यय भी क्षणिकवादियों के मतानुसार संभव नहीं हैं । अतः पूर्वविज्ञान की स्मृति जिसे 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं—यह 'सर्वथा प्रामाणिक है क्योंकि लोकसिद्ध है और दैनन्दिन अनुभवगत है । इसलिए नित्यस्वभाव आत्मा ही संवेत्ता है । वास्तविक बात तो यह है कि एक प्रमाता आत्मा की सिद्धि के बिना प्रमाण भी अप्रमाण हो जाएगा क्योंकि सब कुछ क्षणिक और अनिश्चित रहेगा । क्षणिक ज्ञान में कार्य कारण की सिद्धि कैसे होगी? स्मृति-बीज कैसे होगा? कारण का नाश कैसे हो गया ? यदि नाश नहीं हुआ तो विनाशी कार्य का कारण कैसे हुआ ? अभाव से भाव-परम्परा कैसे चल सकती है? यदि कार्य का नाश नहीं होता तो वह क्षणिक कैसे हुआ? जो दूसरे क्षण रह सकता है वह सौ क्षण तक भी रह सकता है । अभिप्राय यह कि भाव स्थिर हैं । स्वरूपतः भाव का अभाव नहीं होता- 'नासतो विद्यते भावः नाभावो विद्यते सतः ।' आत्मज्ञान में कुछ भी क्षणिक दृष्टिगत नहीं होता । निश्चय के बिना बाध्य-बाधक भाव भी सिद्ध नहीं होता । स्थिरता के बिना शुक्ति में रजत-भ्रान्ति मिटाने का क्या अर्थ होगा? अतः ज्ञान एक है, नित्य है और वह क्षणिक एवं अनेक नहीं हो सकता । 'प्रामाण्ये क्षणिकत्वेन प्रत्यक्षेणोपपद्यते । प्रागभावादुत्तरज्ञानदार्ढ्यात् प्रामाण्यसिद्धितः ॥ प्रतिक्षणमथान्यत्वात् सामान्यस्याग्रहे सति । विलक्षणाः क्षणाः सर्वे प्रामाण्ये किं निबन्धनम् ॥ सम्बन्धस्याग्रहश्चापि तेन मानस्य का गतिः । मिथ्याज्ञानस्य मिथ्यात्वं ब्रूहि वा किं निबन्धनम् ॥ क्षणान्तरे शुक्तिकायां रजतं केन वार्यते । भिन्नज्ञानस्य कर्तृत्वे सर्वं प्रामाण्यमाप्नुयात् ॥
१-३. स्पन्दप्रदीपिका ।