स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
प्रथमः निष्यन्दः ९३
क्योंकि—कार्यकारणभाव (या बाध्यबाधकभाव तब तक सिद्ध ही नहीं हो सकता जब तक कि पूर्वदशा एवं उत्तरदशा का एक ही प्रमाता न हो—) कार्यकारणभावो हि बाध्यबाधकताऽपि च । पूर्वापरैकमातारमन्तरेण प्रसिद्धयतः ॥१ जब प्रत्येक क्षण विलक्षण (पृथक्-पृथक्, पूर्वापरा सम्बद्ध) होंगे, प्रत्येक संविद् पृथक्-पृथक् होगी तो पूर्ववर्ती प्रमाण से उत्तरवर्ती प्रमेय को बोध कैसे होगा ? सम्बन्ध का ग्रहण किए बिना प्रमाण की गति क्या होगी? संवेत्ता के बिना मिथ्याज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध कैसे होगा? एक क्षण के अनन्तर यदि शुक्तिका रजत हो जाय तो उसे रोक कौन सकेगा?२ वस्तुतः संवेत्ता के एक हुए बिना प्रमाण-अप्रमाण का भेद ही नहीं रहेगा । ऐसी स्थिति में तो घट की सिद्धि होगी किन्तु पट का अनुभव होगा । ३ 'यह वही व्यक्ति है; यह वही वस्तु है; यह वही दृश्य है'—इत्यादि प्रत्यय भी क्षणिकवादियों के मतानुसार संभव नहीं हैं । अतः पूर्वविज्ञान की स्मृति जिसे 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं—यह 'सर्वथा प्रामाणिक है क्योंकि लोकसिद्ध है और दैनन्दिन अनुभवगत है । इसलिए नित्यस्वभाव आत्मा ही संवेत्ता है । वास्तविक बात तो यह है कि एक प्रमाता आत्मा की सिद्धि के बिना प्रमाण भी अप्रमाण हो जाएगा क्योंकि सब कुछ क्षणिक और अनिश्चित रहेगा । क्षणिक ज्ञान में कार्य कारण की सिद्धि कैसे होगी? स्मृति-बीज कैसे होगा? कारण का नाश कैसे हो गया ? यदि नाश नहीं हुआ तो विनाशी कार्य का कारण कैसे हुआ ? अभाव से भाव-परम्परा कैसे चल सकती है? यदि कार्य का नाश नहीं होता तो वह क्षणिक कैसे हुआ? जो दूसरे क्षण रह सकता है वह सौ क्षण तक भी रह सकता है । अभिप्राय यह कि भाव स्थिर हैं । स्वरूपतः भाव का अभाव नहीं होता- 'नासतो विद्यते भावः नाभावो विद्यते सतः ।' आत्मज्ञान में कुछ भी क्षणिक दृष्टिगत नहीं होता । निश्चय के बिना बाध्य-बाधक भाव भी सिद्ध नहीं होता । स्थिरता के बिना शुक्ति में रजत-भ्रान्ति मिटाने का क्या अर्थ होगा? अतः ज्ञान एक है, नित्य है और वह क्षणिक एवं अनेक नहीं हो सकता । 'प्रामाण्ये क्षणिकत्वेन प्रत्यक्षेणोपपद्यते । प्रागभावादुत्तरज्ञानदार्ढ्यात् प्रामाण्यसिद्धितः ॥ प्रतिक्षणमथान्यत्वात् सामान्यस्याग्रहे सति । विलक्षणाः क्षणाः सर्वे प्रामाण्ये किं निबन्धनम् ॥ सम्बन्धस्याग्रहश्चापि तेन मानस्य का गतिः । मिथ्याज्ञानस्य मिथ्यात्वं ब्रूहि वा किं निबन्धनम् ॥ क्षणान्तरे शुक्तिकायां रजतं केन वार्यते । भिन्नज्ञानस्य कर्तृत्वे सर्वं प्रामाण्यमाप्नुयात् ॥
१-३. स्पन्दप्रदीपिका ।
९४ स्पन्दकारिका अन्यस्वरूपसंसिद्धावन्यसिद्धिर्भवेद्यदि । घटस्वरूपसंसिद्धौ पटस्यावगमो भवेत् ॥ योऽयं स एवाऽयमिति प्रत्ययः स्थिरकालजः । कर्तुं शक्यो न तद्वादि प्रामाण्यात् क्षणिकैस्ततः ॥ प्राग्विज्ञानस्मृति प्रत्यभिज्ञा नित्यं प्रतिष्ठिताः । अतो नित्य स्वभावस्यैवात्मनः कर्तृतोदिता ॥ एक प्रमात्रभावात् स्यात् क्षणिकत्वाद् निश्चयात् । प्रमाणमप्यप्रमाणं स्याद् बौद्धान्यं हि निराश्रयम् ॥ बौद्धायन संहिता में भी कहा गया है कि— कार्यकारणभावस्तु नास्ति ज्ञाने क्षणक्षयः । क्षणं द्वितीयं नास्ते चेद् स्मृति बीजं कथं भवेत् ? जनकं तत् कथं नष्टमनष्टं वाप्यनष्टकम् । नष्टस्य जनकत्वं चेदभावादभावसन्ततिः ॥ जनकत्वेत्वनष्टस्य क्षणभंगः प्रहीयते । द्वितीयं यत्क्षणं तिष्ठेत्तदास्ते शतमप्यथ ॥ जनकत्वेऽर्थनिष्ठस्य अर्थे नाभावमेति तत् । तस्माद्भावाः स्थिरा सर्वे न च्यवन्ते स्वरूपतः ॥ आत्मावबोधविषये स्वस्थिराः क्षणिका न ते । बाध्यबाधकभावोऽपि न स्यान्निश्चायकं बिना ॥ शुक्तौ हि रजतज्ञानभ्रान्तिभंगोऽस्ति नान्यथा । तस्माज्ज्ञानं नित्यमेकं क्षणिकानि बहूनि नो ॥ ‘सत्कार्य सिद्धि’ में कहा गया है—‘यदि प्रत्येक विज्ञान स्वतन्त्र हो तो एक दूसरे का संवेदन नहीं हो सकता । अतः पूर्वावस्था एवं उत्तरावस्था दोनों का ज्ञाता एक प्रमाता होता है और वह विचित्र वृत्तियों के द्वारा व्यवहार का आश्रय बनता है । अनेक वृत्ति— ज्ञानों का अनुसन्धान एक अजन्मा ज्ञान को होता है ।’ गीता का यह वचन सर्वथा सत्य है कि एक ही चेतन स्मृति ज्ञान और अपोहन का कारण है ।’ विरोधियों के कुतर्क पाषाणों को चबाने में कोई लाभ नहीं है । ‘सत्कार्य सिद्धि’ में ठीक ही कहा गया है— ‘न हि स्वनिष्ठे विज्ञाने इतरेतरवेदनम् । तस्मात् पूर्वापरावस्था प्रमाणं परिपिण्डितः । एकः प्रमाता चित्राभिर्वृत्तिभिर्व्यवहारभाक् ॥ प्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है— एवमन्योन्यभिन्नानाम परस्पर वेदिनाम् । ज्ञानानामनुसंधानजन्मा नश्येज्जनस्थितिः । न चेदन्तः कृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः । स्यादेकश्चिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥
प्रथमः निष्यन्दः ९५ गीता में भी कहा गया है—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च' 'इत्यलं कुतर्काश्मनां चर्वणेन' (कुतर्कों के पत्थर चबाना बन्द करो।)।१ संवेत्ता का स्वरूप क्या है? 'किंभूते संवेत्तरि'? किस प्रकार के संवेत्ता में? यह वह संवेत्ता है जिसमें सुख-दुःख, मोह—प्रबोध आदि समस्त अवस्थायें स्थित हैं । ये अवस्थायें उसमें सूत में मणियों की भाँति अनुस्यूत हैं । 'मैं पहले सुखी था, आज मैं दुःखी हूँ',-इस अनुभव में सुख एवं दुःख में भेद तो है किन्तु 'मैं-मैं' में भेद नहीं है । इस स्मृति एवं प्रत्यभिज्ञा का उसीको अनु- सन्धान हुआ करता है । इन अवस्थाओं में भी वह नहीं है क्योंकि ये अवस्थायें विकल्पमात्र हैं एवं अनित्य हैं । संवेत्ता इनसे अतिरिक्त है । अविद्यावरण तो केवल उपरागमात्र है यथा चन्द्रमा सूर्य पर ग्रहण । अंधकार से आच्छन्न होने पर रस्सी साँप नहीं बन जाती और न तो नष्ट होती है । इसी प्रकार आत्मा का कुछ बिगाड़ नहीं सकती—भर्तृहरि कहते हैं—२ नाच्छादितस्य तमसा रज्जुखण्डस्य विक्रिया । नाशो वा क्रियते यद्वत्तद्वन्नाविद्ययाऽऽत्मनः ॥ 'संवित्प्रकाश' में भी कहा गया है कि स्फटिक का स्वभाव अत्यन्त निर्मल है किन्तु जपाकुसुम आदि का उपराग होने पर स्फटिक लाल दिखाई पड़ने लगता है । भगवान् संवेत्ता का अत्यन्त निर्मल शरीर भावसमासक्त होकर विविध प्रकार का उपलब्ध होता है । यथा स्फटिक रंगीन नहीं होता वैसे ही भाव युक्त होने पर संवित् वैसी ही नहीं हो जाता । यह आत्म संवित् भी उपरक्त होने पर भी अपने निजरूप का परित्याग नहीं किया करता । रूपान्तरित न होने पर भी रूपान्तरित के तुल्य दृष्टिगोचर अवश्य होता है । जो कुछ भी दिखाई पड़ता है सब कुछ उसीका तो विलास है—३ अत्यन्ताच्छस्वभावत्वात् स्फटिकस्य यथा स्वकम् । रूपं परोपरक्तस्य नित्यमेवोपलभ्यते ॥ तथा भावसमासक्तं भगवंस्तावकं वपुः । अत्यन्तनिर्मलतया पृथक् तैनोपलभ्यते । नैतावताऽसौ स्फटिकः पृथङ्नास्त्येव रञ्जकात् । भावरूपपरित्यक्ता तव वा निर्मला तनुः ॥४ उपराग की स्थिति में भी शुद्धत्व नष्ट नहीं होता— उपरागेऽपि शुद्धत्वं न त्यक्तमनया प्रभो । परित्यज्य निजं रूपं संविदाख्या कुतश्च यत् । अथाऽप्राप्त्यैव तद्रूपं भवेद्रूपान्तरानुगा । तद्रूपापि हि दृश्येत कारणेऽस्यापि संभवात् ॥५ शुद्धानुभव विविध आकारों द्वारा अपने आकार का परित्याग नहीं कर देता बल्कि १-३. उत्पलदेवाचार्य । ४-५. स्पन्दप्रदीपिका ।
९६ स्पन्दकारिका अविच्छिन्न रूप में सदा निर्मल रहा करता है। श्वेत वस्त्र पर कोई रंग चढ़ा, उतर गया दूसरा चढ़ा और पुनः उतर गया । श्वेत वस्त्र ज्यों का त्यों रह जाता है। इसी प्रकार शुद्ध चेतन तत्तत् आकारों के राग से तत्तदाकार दिखाई तो पड़ता है किन्तु वस्तुतः रहता शुद्ध ही है । नील, पीत, सुख दुःख—सभी में चित् स्वरूप अखण्डित ही रहता है । चित्र-विचित्र उपाधि सम्पदा से विकल्प उसे विशिष्ट-विशिष्ट दिखाई देता है—१ सदैव शुद्धोऽनुभवो यं प्रत्याकारकर्बुरः । आकारान्तरसंचारकाले तस्यापि निर्मलः ॥ यथा जात्या सितं वस्त्रं रक्तं रागेण केनचित् । तत्पदप्राप्त शुक्लत्वं पुन रागान्तरं श्रयेत् ॥ एवं शुद्धा चितिर्जात्या यदाकारोपरागिणी । तत्त्यागापरसंचारमध्ये शुद्धैव तिष्ठति ॥२ नीले पीते सुखे दुःखे चित्स्वरूपमखण्डितम् । विशिनष्टि विकल्पस्तच्चित्रयोपाधिसम्पदा ॥३ आचार्य रामकण्ठ 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं 'अहं सुखी इत्यादयो याः संविदः ता अन्यत्र वर्तन्ते' ततः असौ स्वभावात् एकस्मात् न निवर्तते ॥४ अर्थात् 'मैं सुखी हूँ'—आदि जो ज्ञान है वह अन्यत्र रहा करता है अतः आत्मतत्त्व अपने एकात्मक स्वभाव से कभी निर्वर्तित नहीं हुआ करता । 'मैं सुखी हूँ, मै दुःखी हूँ'—आदि संवेदन अन्तरंग है और वे बुद्धि पर अवलम्बित हैं । अन्य संवेदन देहादिक पर अवलम्बित हैं । उनका अपना सीधा सम्बन्ध उन्हीं से है—आत्मतत्त्व से नहीं । 'अन्यत्र'—अन्य जगह, अर्थात् शरीर, इन्द्रियमान, बुद्धि आदि जगहों में । 'वर्तन्ते' स्थित हैं । 'स्फुटम्'—यह बात सुस्पष्ट हैं या 'स्पष्टतया'। 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ'—इत्यादि संविद—आत्मा में नहीं प्रत्युत् अन्यत्र बुद्धि, शरीर एवं प्राण आदि में रहते हैं तथापि सुखादिक से पृथक् उपलब्धि में भी अभेदात्मना रहते हैं—जैसे कि नदियाँ समुद्र में—'सरितः सागरे इव तत्र विगलितान्योन्यभेदा ऐक्येन अवतिष्ठन्ते, तादात्म्यं आपद्यन्ते ।'५ 'स्फुटम्' = स्वानुभवसंवेद्य होने के कारण सुप्रकट ही हैं ।६ 'संविदः' शब्द का (बहुवचनान्त) प्रयोग क्यों किया गया ? कारण यह है कि—एक ही उपलब्धिरूप संवित् 'अहमोऽस्मि' के रूप में पारमार्थिकी स्फुरण से भी संवलित होता है और वही माया शक्तिजनित एवं तथाविध स्वभाव-परामर्श के अभाव के कारण अनित्य सुखदुःखादि का वेदक होने के कारण—'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ— १-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४. स्पन्दकारिकाविवृति । ५-६. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।
प्रथमः निष्यन्दः ९७ इत्यादि संवेदन द्वारा बुद्धि आदि अवस्थाओं के साथ सामानाधिकरण्य स्थापित कर लेने के कारण अनेक संवेदनों के मध्य विचरण करता है अतः कारिकाकार ने 'संविदः' (बहुवचनान्त) शब्द का प्रयोग किया है। आचार्य रामकण्ठ ठीक ही कहते हैं कि यदि सुखादिक वेद्य वस्तु के संबन्ध के कारण संवित् भी सुखादिवत् विभिन्नरूपों वाला बन जाता तो स्मृति एवं प्रत्यभिज्ञानुसंधान न हो पाता। ऐसा न होने पर समस्त व्यवहारोच्छेद हो जाता किन्तु यह स्थिति तो अभीष्ट है नहीं। कारिकाकार 'अन्यत्र' शब्द के पूर्व 'एताः संविदः' विशेषण का प्रयोग करते हैं। ये संवेदन (ज्ञान) किस स्वरूप वाले 'अन्यत्र' में रहते हैं? ये 'सुखाद्यवस्था' में अनुस्यूत रूप वाले अन्यत्र' में रहते हैं। अर्थात् समस्त सुख-दुःख-मोहरूप विशिष्ट अवस्थाओं में उत्पादविनाशधर्मक होने के कारण अनित्य दशाओं में, वेद्यत्व के सामान्य होने के कारण शब्दादिविषय समानवृत्तियों में एवं 'अहमोऽस्मि' अनुभूति के ज्ञान से संवलित उपलब्धा के भीतर विद्यमान रहते हैं। 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, इन प्रत्ययों में दो अर्थ स्फुरित होते हैं— १. सुखाद्यात्मा वेद्यरूप एवं २. अहमिति अपर वेदक रूप 'वेद्यत्वरूप'—घटादिक अनित्य पदार्थों के नानात्व को द्योतित करने वाला। 'वेदकरूप' = पूर्वापरावस्था में व्यापक होने के कारण समस्त प्रमातृ प्रसिद्ध, समस्त व्यवहारों के कारणों के अनुसंधानक, नित्य स्थित एवं उपलब्ध रूप एकात्मक संवित् तत्त्व। अवस्थायें जाग्रदादि भेदों के कारण अनेक हैं किन्तु संवित् तत्त्व उसमें संचरण करने पर भी अभिन्नलक्षण एवं एक रूप वाला ही रहता है। 'मैं सुखी हूँ' एवं 'मैं दुःखी हूँ' ये दोनों अवस्थायें भिन्न-भिन्न हैं। एक ही संवेत्ता दोनों अवस्थाओं का संवेदन करता है किन्तु उसके स्वरूप में एकानुसंधातृनिबद्धावस्था होने के कारण एक से अधिक न होने की अभिन्नता (एकता) बनी रहती है। वह नित्य निरावरणा रूप होने के कारण सर्वत्र अनिरुद्ध, स्वयंसिद्ध एवं तात्त्विक स्वभाव में मात्र शङ्कर है और वही समस्त अवस्थाओं में अनुस्यूत है—'स च अनुस्यूत एव सर्वासु अवस्थासु।' उनको 'पर स्वभाव' कहा गया है—'स स्वभावः परः स्मृतः ॥' आचार्य क्षेमराज का कथन है कि चौथी कारिका सौगतों के सिद्धान्त का खण्डन करने के उद्देश्य से कही गई है। सौगत तर्क की शक्ति पर, ज्ञान के सातत्य में विश्वास रखते हैं।१ 'ये सभी सुख-दुःख एक ही चेतना के विविध रूप हैं तथापि ये विभिन्न रूपों एवं विभिन्न आकारों में स्थित हैं' मीमांसक कहते हैं—'यह सभी कुछ आत्मा ही है जो कि १. स्पन्दनिर्णय। स्पं० ७
९८ स्पन्दकारिका सुखादि के द्वारा सदैव छायी रहती है तथा जो कि अपनी चेतना के द्वारा ही सत्ता में बनी रहती है।' 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं आसक्त हूँ'—ये एवं इसीप्रकार के अन्य ज्ञान केवल एक सत्ता में रहते हैं जिसमें कि आनन्दादिक अवस्थायें अनुस्यूत रहती हैं।१ वहीं मैं, जो कि 'सुखी हूँ, दुःखी हूँ,' का अनुभव करता है, वही 'सुखानुशय (सुख के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध) के कारण रागी एवं दुःखानुशय के कारण द्वेषवश द्वेषी हो जाता है। उसके ये सभी प्रत्यय (ज्ञान) एक ही नित्य आत्मतत्त्व में पाये जाते हैं। एवं ये प्रत्यय एक नित्य एवं साक्षी रूप में स्थित आत्मतत्त्व में विश्राम ग्रहण करते हैं। अन्यथा अवबोधों के अन्तर्सम्बन्धों एवं उनके प्रभावों पर आधृत अन्य विचार अपने आप नष्ट हो जायेंगे तथा विचार गतिशील नहीं हो सकते।२ 'च'—और इस श्लोक में 'च' शब्द तीन बार प्रयुक्त हुआ है। वह सम्बन्ध को विकसित करता है क्योंकि यह एक वस्तु के साथ दूसरे का संबन्ध द्योतित करता है। 'एक में' शब्द, 'उसमें' शब्द द्वारा, विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है। अर्थ यह है कि—जिसमें सुखादिक अवस्थायें अनुस्यूत हैं। ये ऐसे अन्तर्विद्ध हैं यथा माला में मणियों के दाने।३ 'ताः' = वे। वे क्षणवादी दार्शनिक जो कि ज्ञान की क्षणभंगुरता में विश्वास रखते हैं सब कुछ क्षणिक मानते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि क्षण-क्षण परिवर्तित होने वाली घटनाओं की परिवर्तन परम्परा या क्षणभंगुरता की दृश्यावलियों को तो केवल वही देख सकता है जो कि इन सभी परिवर्तनों एवं क्षणक्षण की घटनाओं से अप्रभावित रहकर स्थायी सत्ता रखकर इनकी क्षण-क्षण में होने वाली विनाश लीलाओं को देख सके। यदि ऐसी कोई स्थायी एवं अक्षणात्मक सत्ता मान ली जाती है तो 'क्षणिकवाद सिद्धान्त' अपने आप खण्डित हो जाता है।४ 'ज्ञान' स्मृति से उत्पन्न होते हैं। 'स्मृति' भूतकालिक घटना का पुनर्जागरण है। यदि प्रत्येक वस्तु क्षण-क्षण में परिवर्तित हो जाती है तो 'स्मृति' संभव ही नहीं हो सकती क्योंकि तब तक स्मरण करने वाला संवेत्ता परिवर्तित हो जायेगा। अतः क्षण भर के पूर्व का संवेत्ता एक क्षण के बाद तो रह नहीं जायेगा (प्रत्युत एक क्षण के बाद एक नया संवेत्ता उत्पन्न हो जाएगा) अतः उसे भूतकाल की ये स्मृतियाँ कैसे हो सकती हैं? आचार्य क्षेमराज एक प्रश्न यह भी उठाते हैं कि मूलभूत यथार्थतत्त्व वह तो हो नहीं सकता जिसमें कि सुखादिक अवस्थायें अनुस्यूत रहती हैं अतः वह सुखादि से अनुस्यूत चेतना आत्मा भी नहीं हो सकती क्योंकि आत्मा का स्वरूप लक्षण चैतन्य है—'चैतन्यमात्मा' ।५ जब यह आत्मा अपनी निजी अशुद्धियों के द्वारा उपहित हो जाता है उस स्थिति में अपने यथार्थ स्वरूप को आच्छादित कर लेता है और ऐसी स्थिति में ही सुखदुखादि अवस्थाओं का अनुभव करता है। सुखदुखादि का अनुभविता 'पुर्यष्टक' है न १. स्पन्दनिर्णय। २-४. क्षेमराजाचार्य—स्पन्दनिर्णय। ५. शिवसूत्र।
प्रथमः निष्यन्दः ९९ कि स्वस्वरूपावस्थित पूर्णचेतन संवित् तत्त्व । इस स्थिति में भी उसके लिए सुखदुखादि का स्थायी या नित्यात्मक अवरोध नहीं है क्योंकि वह उनसे मुक्त भी हो सकता है । कारिकाकार ने 'मैं कृश हूँ' 'मैं पृथुल हूँ'—इत्यादि न कहकर 'मैं सुखी हूँ—मैं दुःखी हूँ'—इत्यादि का प्रयोग क्यों किया? इसलिए किया क्योंकि ग्रन्थकार यह प्रस्तुत करना चाहता है कि—'शिव के साथ मेरी निजी आत्मा स्वरूप से अभिन्न है'—यह अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है । यह अनुभव पुर्यष्टक की स्थिति में भी होता है । किन्तु ये अनुभव ज्ञानी एवं आनन्दमय शङ्कर के यथार्थ स्वरूप में कहीं भी स्थान नहीं पाते । शङ्कर ही यथार्थ सत्य है । यथार्थ तत्त्व सुखदुःखादि से उपहित नहीं है । साधक पुर्यष्टकत्व से मुक्ति की साधना का लक्ष्य रखकर आगे बढ़ता है । 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—आदि के प्रत्यय शरीर, इन्द्रिय, मन एवं जागतिक वासनाओं से ऊपर उठने पर नष्ट हो जाते हैं अन्तर्पथ की यात्रा के समय भी ऐसा ही होता है । 'सम्यक् पुर्यष्टक शमनाय एवं आस्थेय इति ॥'१ आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि रहस्यगुरुप्रवर, अनुभवागमज्ञ, कारिकाकार ने युक्तियों, तर्कों एवं उपपत्तियों द्वारा समस्त वादों की अनुपपन्नता का अनुवदन करते हुए स्पन्दतत्त्व का ही प्रतिपादन किया है । 'स्पन्दतत्त्वमेवास्तीति प्रतिजानाति ।'२ इसीलिए वे अगले श्लोक में कहते हैं कि जहाँ सुख, दुःख, ज्ञाता एवं ज्ञेय नहीं है एवं जहाँ क्षणभंगुरता (अनित्यता) की भी अवस्था नहीं है वही पारमार्थिक तत्त्व है— 'न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यं ग्राहकं न च । न चास्ति मूढ़भावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ (का०५) निष्कर्ष—रामकण्ठ कहते हैं कि 'मैं सुखी या दुःखी हूँ आदि जो संवेदानायें हैं वे अन्यत्र स्थित हैं अतः यह स्पन्द तत्त्व अपने एकात्मक अविचल स्वस्वंभाव से कभी प्रत्यावर्तित या निवर्तित नहीं होता ॥३ 'आदि' = देहादिक आलम्बन ॥ ये संवेदनायें उपलब्धा स्पन्द से पृथक् तो हैं किन्तु इन भिन्न-भिन्न समस्त अवस्थाओं में एक ही संवित् तत्त्व अनुस्यूत है । १. एक ही संवित् तत्त्व उपलब्ध (अनुभवकर्ता) के रूप में अहं प्रतीति के साथ विद्यमान है ।४ २. वही माया शक्ति जनित तथाविध स्वभाव परामर्शाभाव के कारण सुखादिक अनित्य वस्तुओं का वेदक बनकर 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों से संक्रान्त होकर बुद्ध्याद्यवस्था सामानाधिकरण्य प्राप्त किए हुए स्थित है । ये समस्त संवेदनायें सुख, दुःख मोह आदि अवस्थाओं में स्थित हैं । इस संवेत्ता के दो रूप हैं— १. एकः सुखाद्यात्मा वेद्यरूपः । (घरादि की भाँति) २. द्वितीय है—अहमाकार संवेदन द्वारा अपर वेदक के रूप में । १-२. स्पन्दनिर्णय । ३-४. स्पन्दकारिकाविवृति ।
१०० स्पन्दकारिका इस प्रकार—सुखी दुःखी होने की अनुभूति के उपर्युक्त दो अर्थ हैं 'द्वौ अर्थौ स्फुरतः।' ३. 'स च अनुस्यूत एव सर्वासु अवस्थासु' ।१ 'स्पन्दशास्त्र' की मान्यता है कि—'जाग्रत,' 'स्वप्न', 'सुषुप्ति' आदि अवस्थाओं में एक ही अवस्थाता अवस्थित रहता है। अवस्थायें भिन्न हैं किन्तु अवस्थाता अभिन्नतया एक है। भट्टकल्लट कहते हैं—'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—'जो मैं पहले सुखी था वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों में 'अहं प्रतीति के रूप में एक ही वेदक अवस्थित रहता है जो सभी अवस्थाओं में अभिन्न एवं एक है। 'अन्यत्र'—जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति से अतिरिक्त। 'स चानुस्यूत एवं सर्वास्ववस्थासु, यस्मात् 'य एव अहं सुखी स एव अहं दुःखी, रक्तो वा पश्चात् स्थित' इति अनुस्यूतत्वेन, अन्यत्र अवस्थाव्यतिरिक्ते । यदागमः .... स स्वभावः परः स्मृतः।' स्पन्दात्म 'स्वभाव' समस्त अवस्थाओं में अवस्थित रहता है। मैं जो पहले सुखी था वही अब दुःखी या अनुरक्त हूँ—इत्याकारक अनुभवों में 'अहं प्रतीति' के रूप में एक ही अनुभविता का अवस्थान रहता है। कहा भी गया है— 'वह स्वभाव सब वस्तुओं में भिन्न एवं उत्कृष्ट कहा गया है।' 'क्षणवाद'— बौद्धदार्शनिकों का विज्ञानवाद—ज्ञान क्षणिक है। एक ज्ञान केवल तीन क्षण तक स्थायी रहते हैं। इसके उपरान्त उनका समय, विषय एवं आकार-प्रकार परिवर्तित हो जाता है। इन ज्ञानों में समानता या एकरूपत्व प्रतीत होता है। उसका कारण यह है कि प्राथमिक ज्ञानक्षणों के संस्कार उत्तरवर्ती ज्ञान क्षणों का आविर्भाव करते हैं। संस्कारों का स्वभाव ही स्थितिसंस्थापकता है। इसी का परिणाम है कि प्राथमिक ज्ञानक्षणों के संस्कार परवर्ती ज्ञान क्षणों को पूर्ववर्ती ज्ञानक्षणों के गुण, धर्म, आकार-प्रकार प्रदान करके उन्हें तद्रूप बना देते हैं। ज्ञान क्षणिक है। उनमें एकरूपता का कारण संस्कार प्रवाहों की अविरल श्रृंखला है। 'ज्ञान' स्वयं प्रकाश है उन्हें अपने प्रकाशन के लिए अन्यापेक्षा नहीं है। 'ज्ञान' एक प्रकारक ही नहीं प्रमाता (ज्ञानक्षणस्वरूप प्रमाता) भिन्न है अतः ज्ञान एवं ज्ञान प्रवाह (विज्ञान) भी भिन्न-भिन्न हैं। प्रत्येक ज्ञानक्षण स्वयंप्रकाश है अतः स्वभावभूत विश्वात्मा (स्पन्द = चैतन्य) आवश्यक नहीं है। ज्ञान के दो प्रकार हैं— १. प्राथमिक ज्ञान = 'निर्विकल्प ज्ञान'—इसके संस्कार—२. सविकल्पात्मक (द्वितीय) ज्ञान—(पूर्वानुभूत) नामरूपात्मक विकल्पों का सम्बन्धस्थापन । 'विकल्प' नामरूपात्मक हैं। १. स्पन्दकारिकाविवृति ।
प्रथमः निष्यन्दः १०१ ‘नाम’ (बौद्ध दर्शन) ┌───────────┬───────────┬───────────┐ वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान (सविकल्प ज्ञान) (निर्विकल्प ज्ञान) ‘नाम’ + ‘रूप’ ──> ‘रूप’ ── ‘वेदना’ ── ‘संज्ञा’ ── ‘संस्कार’ ── ‘विज्ञान’ इन पाँच स्कंधों का समुदाय ही सन्तान रूप में प्रवाहित ज्ञानधारा है । ‘विज्ञान’ एवं ‘आलय विज्ञान’ — ‘ज्ञान सन्तान’ चेतन आत्मा का स्मरण आदि कार्यों को पूर्ण करता है । ज्ञानक्षण के दो प्रकार हैं—१. निर्विकल्प ज्ञान २. सविकल्प ज्ञान । निर्विकल्प ज्ञानक्षण = ‘स्वलक्षणाभास’¹ (किसी वस्तु का प्रथम दृष्ट्या साक्षात्कार होने पर उस वस्तु से सम्बद्ध प्राथमिक ज्ञान) जिसमें वस्तु का नामरूपात्मक विकल्प से शून्य ज्ञान निहित हो । इसमें व्यावहारिक व्यापार संभव नहीं है । ‘ज्ञानसन्तान’ किसे कहते हैं— प्रमाता के हृदय में भिन्न-भिन्न कालखण्डों में, भिन्नविषयक एवं भिन्नाकारों से सम्बद्ध ज्ञानक्षणों की अविरलधारा अजस्र रूप में प्रवाहित होती रहती है और वही है— ‘ज्ञानसन्तान’ । बौद्धों की दृष्टि में यही ज्ञान सन्तान चेतन आत्मा का स्वरूप है और यही स्मरण, संकल्प, इच्छा, पूर्वानुस्मरण आदि का आधार है । इससे भिन्न किसी अन्य नित्य आत्मा की कल्पना व्यर्थ है । नामरूपात्मक विकल्प अनन्त हैं अतः तत्सम्बद्ध सविकल्प ज्ञानक्षण भी अनन्त है । ‘मैं’ की अनुभूति ‘शरीर सन्तान’ एवं विज्ञान सन्तान (ज्ञान सन्तान) से ही हो जाती है फिर आत्मा के कल्पना की क्या आवश्यकता है— १. ज्ञान स्वलक्षणाभासात्मक होते हैं—‘स्वलक्षणाभासं ज्ञानमेकम्’ । ‘अहंप्रतीति’ इत्यादि ज्ञान के लिए किसी नित्य आत्मा की व्यर्थ कल्पना अनावश्यक है क्योंकि यह कार्य तो स्वयं ज्ञान सन्तान ही कर देता है—। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१.२.२) में कहा गया है— ‘नित्यस्य कस्यचिद्द्रष्टुस्तस्या त्रानवभासतः । अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ॥’² २. लोकायत की दृष्टि— चार्वाक, बृहस्पति प्रभृति नास्तिक दार्शनिकों ने अपने चिन्तन को इस प्रकार प्रस्तुत किया है— १. ‘शरीरात्मवाद’ २. ‘अपत्यात्मवाद’ ३. ‘इन्द्रियात्मकवाद’ ४. ‘प्राणात्मवाद’ ५. ‘मनसात्मवाद’ ६. ‘बुद्ध्यात्मवाद’ । लोकायतिक दर्शन के मूलभूत सिद्धान्त निम्न ────────────────────────────────────────────────────────── १. नीलप्रकाशः ‘स्वलक्षणाभासनम्’ । ‘स्वम्’ अन्यानुयायि स्वरूपसंकोचभाजि ‘लक्षणं’ देशकालाकाररूपं यस्य तस्य ‘आभासः प्रकाशनम् अन्तर्मुखं यस्मिन्— ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी’ । २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी ।
१०२ स्पन्दकारिका हैं—(‘बृहस्पति’ सूत्र के अनुसार)— १) तत्त्व = ‘पृथिव्यापस्तेजोवायुरिति तत्त्वानि’ । २) शरीर, इन्द्रिय, विषय = ‘तत्समुदाये शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञा ।’ ३) चैतन्य = ‘तेभ्यश्चैतन्यम् ।’ ४) चैतन्योत्पत्ति = किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत् विज्ञानम् । पाँच भूत—(अन्न के संघटन से मादक शक्ति शराब आदि उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार भूतों के संघटन से) ‘विज्ञान’ (चैतन्य) उत्पन्न हो जाता है । ५) भूत ही चैतन्योत्पत्ति के कारण—‘भूतान्येव चेतयन्ते’ ६) आत्मा—चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः । ७) जीव = जलबुद्बुदवज्जीवाः । ८) परलोकाभाव—परलोकिकोऽभावात् परलोकाभावः । ९) मोक्ष—‘मरणोऽपवर्गः’ । १०) स्वर्गसुख = धूर्त-प्रलाप । धूर्त प्रलापस्त्रयी स्वर्गोत्पादकत्वेन विशेषाभावात्। ११) पुरुषार्थ—अर्थ कामौ पुरुषार्थों । १२) विद्या = दण्डनीतिरेवविद्या । १३) प्रमाण—प्रत्यक्षमेव प्रमाणम् ॥ १४) अनुसर्तव्य मार्ग = ‘लौकिको मार्गोऽनुसर्तव्यः ॥’ विज्ञानवादी बौद्ध मानते हैं कि ‘चित्त’ ही एकमात्र तत्त्व है अन्य नहीं—(यही चित्त ‘विज्ञान’ भी कहा जाता है) ॥ ‘चित्तं वर्ततेचित्तमेव विमुच्यते । चित्तं हि जायते नान्यच्चित्तमेवनिरुध्यते । चित्त ही मात्र एक परम सत्य है । चित्त ही जन्म लेता है, मुक्त होता है, और वही निरुद्ध होता है । ‘विज्ञान’ के निम्न पर्याय हैं—‘लंकावतार सूत्र’ । १. ‘चित्त’ २. ‘मन’ ३. ‘विज्ञप्ति’ ‘विज्ञान’ एवं आलय विज्ञान— ‘चित्तं मनश्च विज्ञानं संज्ञा वैकल्पवर्जिताः । विकल्पधर्मतां प्राप्ताः श्रावका न जिनात्मजाः ॥’ (‘लंकावतार’ ३।४०) चेतन क्रिया से सम्बद्धता, अतः—‘चित्त’ मनन क्रिय से सम्बद्धता, अतः— ‘मन’ एवं विषय—विग्रह की कारणता अतः यही—‘विज्ञप्ति’ कहलाता है—
प्रथमः निष्यन्दः १०३ 'चित्तमालयविज्ञानं मनो यन्मन्यनात्मकम् । गृह्णाति विषयान् येन विज्ञानं हि तदुच्यते ॥ (लंकावतार गाथा १०२) चित्त को छोड़कर कोई भी पदार्थ सत् नहीं है । 'तथता' 'शून्यता' 'निर्वाण' 'धर्मधातु' आदि सब उसी के पर्याय हैं । सभी उसी के नाम हैं । चित्त (आलय विज्ञान) ही 'तथता' है— 'दृश्यते न विद्यते बाह्यं चित्तं चित्रं हि दृश्यते । देहभोगप्रतिष्ठानं चित्तमात्रं वदाम्यहम् ॥' चित्त के दो रूप हैं—१. ग्राह्य विषय २. ग्राहक (विषयी)— चित्तमात्रं न दृश्योऽस्ति द्विधा चित्तं हि दृश्यते । ग्राह्यग्राहकभावेन शाश्वतोच्छेदवर्जितम् ।। (लंकावतार सूत्र ३।६५) ग्राहक, ग्राह्य एवं ग्रहण तीन हैं किन्तु ये तीनों विज्ञान या चित्त के परिणमन होने के कारण यथार्थ न होकर मात्र काल्पनिक हैं । वास्तविक एवं पारमार्थिक तत्त्व तो मात्र बुद्धि है—'बुद्धिस्वरूपमेकं हि वस्त्वस्तिपरमार्थतः । प्रतिभानस्य नानात्वान्न चैकत्वं विहन्यते ।' (सर्वस० सं०) विज्ञान एक है भिन्न-भिन्न नहीं । विज्ञान के भेद हैं—१. चक्षुर्विज्ञान, २. श्रोत्रविज्ञान, ३. घ्राण विज्ञान, ४. जिह्वा विज्ञान, ५. काय विज्ञान, ६. मनोविज्ञान, ७. क्लिष्ट मनोविज्ञान, ८. आलय विज्ञान । आलय विज्ञान ही आत्मा है और इसका प्रवाह सतत चलता रहता है । यह समष्टि चैतन्य है और एकाकार, एकरस, परिवर्तनशील (किन्तु आत्मा तो परिवर्तनशील नहीं हैं) एवं सर्व प्राणिगत है । इसका विजृंभण ही है विश्व ॥ १५) लोकायतिकों का जीवन-दर्शन— 'यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ?' १६) पुनर्जन्म एवं कर्म फल का भोग—'पुनरागमनं कुतः?' ॥ मीमांसा का सोपाधि आत्मवाद—कुमारिलभट्ट—'आत्मा' ज्ञान का कर्ता एवं ज्ञान का विषय दोनों है—ज्ञान का कर्ता एवं ज्ञान का कर्म दोनों है । प्रत्येक वस्तुज्ञान में आत्मा का ज्ञान नहीं होता । डेकार्टें (युरोपीय दार्शनिक) ने कहा था ---- ('मैं सोचता हूँ अत, मैं हूँ') किन्तु कुमारिल मानते हैं समस्त मननात्मक ज्ञानों में आत्म-संवित्ति नहीं है । न्याय-वैशेषिक—आत्मा में क्रिया नहीं है । (प्रभाकर का भी यही मत है ।) भाट्ट मीमांसक—आत्मा में क्रिया है । कर्म के दो प्रकार हैं—१. स्पन्द २. परिणाम । 'स्पन्द' (स्थान परिवर्तन) आत्मा में नहीं होता किन्तु परिणाम (रूप परिवर्तन) होता है । परिणामी वस्तु भी नित्य है (कुमारिलभट्ट) ॥ आत्मा परिणामी है तथापि
१०४ स्पन्दकारिका नित्य है। आत्मा में दो अंश है—१. चिदंश २. अचिदंश। चिदंश—आत्मा द्वारा प्रत्येक ज्ञान की अनुभूति क्षमता। अचिदंश—परिणमन, परिणाम। न्याय वैशेषिक—सुख, दुःख, इच्छा, प्रयत्न आदि आत्मा के विशेष गुण हैं—। भाट्टमत—सुख दुःख आदि आत्मा के अचिदंश के परिणाम है। 'वेदान्त' 'स्पन्द', 'प्रत्यभिज्ञा' एवं 'क्रम' = आत्मा चैतन्यस्वरूप है॥ कुमारिलभट्ट = आत्मा चैतन्यस्वरूप नहीं प्रत्युत् चैतन्य विशिष्ट है। आत्मा में चैतन्य आता कहाँ से है? शरीर-विषय-संयोग के द्वारा। आत्मा में 'चैतन्य समवादी धर्म के रूप में स्थित नहीं है—शरीर-विषय का संयोग होने पर आत्मा में चैतन्य का उदय होता है। स्वप्नावस्था में शरीर-विषय-संयोग नहीं अतः आत्मा में चैतन्य भी नहीं रहता। 'आत्मा' जड एवं बोधात्मक दोनों हैं। प्रभाकर—आत्मा में क्रियाशक्ति-क्रियावत्ता नहीं है। कुमारिल = प्रत्येक वस्तु ज्ञान में आत्मा का ज्ञान नहीं होता। आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं कर्म दोनों है। 'प्रभाकर'—एक ही वस्तु एक साथ कर्ता एवं कर्म दोनों एक साथ कैसे हो सकती है? प्रत्येक वस्तु ज्ञान में उसी ज्ञान के द्वारा आत्मा का ज्ञान भी कर्ता के रूप में प्रकाशित होता है। 'मैं लिख रहा हूँ' वाक्य में क्रिया के कर्ता के रूप में आत्मा ही प्रकट हो रही है। कुमारिल—आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं ज्ञान का विषय दोनों है। प्रभाकर = आत्मा को 'अहं' पद के ज्ञात (अहं प्रत्यय वेद्य) मानते हैं। प्रत्येक ज्ञान का कर्ता आत्मा है। कुमारिल = प्रभाकर का मत ठीक नहीं। आत्मा ज्ञान का कर्ता, ज्ञान का विषय दोनों है। 'आत्मानं विद्धि' में—आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं विषय दोनों है अतः कुमारिल का ही मत यथार्थ है न कि प्रभाकर का। कुमारिल—आत्मा का ज्ञान कैसे प्राप्य? (क) प्रत्येक वस्तुज्ञान में तो आत्मा का ज्ञान नहीं होता (ख) आत्मसंवित्ति में ही आत्मा का ज्ञान होता है। 'मैं अपने को जानता हूँ, वाक्य में क्रिया का कर्म क्या है? 'अपने को'। 'जानता हूँ' क्या है? क्रिया। 'आत्मा को' पद संकेतित करता है कि आत्मा का ज्ञान प्राप्त हो रहा है अतः कर्ता एवं कर्म दोनों आत्मा में स्थित है। मीमांसक मानते हैं कि कोई भी ज्ञान क्यों न हो उसके साथ कोई न कोई विशेषता (उपाधि) संलग्न रहती है। 'रजत' के ज्ञान के साथ रजतत्त्व की उपाधि संलग्न है। 'अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादि संविदः' (स्पन्द का०४) में सुखत्व-दुःखत्व की उपाधियों के द्वारा किसी आत्मा के अस्तित्व का अनुमान लगता है। मैं 'अहं सुखी च दुःखी च' के परामर्शों में दो अनुभव स्थित है—१. 'अहं' २. 'सुखी च दुखी च' सुख, दुःख की अनुभूति गुण रूप उपाधियाँ हैं। इनकी प्रतीति जिससे होती है वह है 'अहं'। 'अहं' = सुखदुःख उपाधि से विशिष्ट आत्मा।
प्रथमः निष्यन्दः १०५ सारांश— १. प्रत्येक ज्ञान के साथ कोई न कोई वैशिष्ट्य रहता ही है । रजत का ज्ञान होता है क्योंकि उसके साथ रजतत्व का वैशिष्ट्य है । किसी भी विशेषता या उपाधि का सम्बन्ध हुए बिना कोई ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । ‘मैं सुखी हूँ’ वाक्य में सुखत्व उपाधि (विशेषता) है जिससे कि सुख का ज्ञान संभव हो पाता है । सुख ‘सुखत्व’ गुण है । गुण के बिना गुणी, धर्म के बिना धर्मी, विशेषण के बिना विशेष्य का अस्तित्व नहीं है । इस गुण, धर्म, विशेषण या वैशिष्ट्य का संवेदक ही ‘आत्मा’ है । ‘सुखादिक गुणों का अनुभव बिना किसी अनुभविता के संभव नहीं है अतः ‘सुखादि चेत्यमानं हि क्वतन्त्र नानुभूयते ।’ (ई०प्र०वि०) आत्मा के चिदंश के द्वारा आत्मा ज्ञान का अनुभव करता है । आत्मा अचिदंश के द्वारा सुखत्व आदि उपाधियों (विशेषताओं) को प्राप्त करता है । आत्मा सुख-दुख- हर्ष-ग्लानि-भय-इच्छा-ईर्ष्या द्रोह-मोह-असूया से तद्रूप या तत्स्वरूप नहीं है प्रत्युत् तद्विशिष्ट हैं । वह आत्मा सुख, दुःख, भय, प्रेम आदि के द्वारा परिणाम-भाव प्राप्त करती है । **कुमारिलभट्ट—**आत्मा स्वयं चेतन नहीं प्रत्युत् शरीर और विषय के साथ संयोग होने की अवस्था में ‘चैतन्यविशिष्ट’ बन जाती है । इसीलिए स्वप्नावस्था में विषयादिक का सम्बन्ध च्युत हो जाने पर, आत्मा में चैतन्य नहीं रहता । अतः आत्मा जड़ भी है और बोधात्मक भी है— १. ‘इदं सुखमिदं ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् । अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥ २. ‘स आत्मा अहंप्रत्ययेनैव वेद्यः ॥ ३. चिदंशत्वेन दृष्टत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञा । विषयत्वं च अचिदंशेन, ज्ञान सुखादिरूपेण ॥ परिणामित्वम् ।। (अद्वैत ब्रह्मसिद्धिः) ॥ बौद्ध दृष्टि की पर्यालोचना— ‘मैं’ की अनुभूति से (संवेदन द्वारा) अनुमान के विषयीभूत और सुख-दुःख आदि उपाधियों से विशिष्ट वस्तु ही ‘आत्मा’ है । १. बौद्धों का दर्शन प्रकृति के बुद्धितत्त्व (विज्ञान-चित्त) तक ही सीमित हो जाता है—उसके परे आगे बढ़ ही नहीं पाता । २. यदि ज्ञान जड़ है तो किसी संवेदन को प्रकाश में कैसे ला सकता है? ३. यदि ज्ञान चेतन है तो किसी चेतन सत्ता को मानना पड़ेगा । ४. अपने को एवं विषय को प्रकाशित करना तो केवल चेतन सत्ता के ही अधिकार मात्र में है जड़तत्त्व के अधिकार में नहीं किंतु बौद्ध ऐसी चेतन सत्ता (आत्मा) स्वीकार ही नहीं करते । ‘ज्ञान सन्तान एव सत्त्वम्’ इति सौगता बुद्धि वृत्तिषु एव पर्य- वसिताः ।।' (प्र०ह० सूत्र ८ की व्याख्या—क्षेमराज)—ज्ञान-सन्तान तो बुद्धि में पर्य- वसित है फिर बुद्ध्यातीत तत्त्व की प्राप्ति कैसे होगी? ज्ञान वेद्य तो बन सकते हैं किन्तु
१०६ स्पन्दकारिका वेदक नहीं बन सकते । 'वेद्य' अर्थ-प्रकाशक नहीं हो सकता । वस्तु के अनुभव क्षण में स्मृति क्षण नहीं, तथा स्मृति क्षण में अनुभवक्षण नहीं, तो फिर स्मृति क्षण में अनुभव क्षण के वस्त्वाकार, वस्तुस्वरूप कैसे प्रकाशित होंगे? इसे संस्कारों से समझाया जाय तो अनुभवकालिक संस्कार तो तद्गतज्ञान (निर्विकल्पक ज्ञान) को ही स्मृति क्षण में प्रस्तुत करेंगे फिर सविकल्पक ज्ञान होगा कैसे? स्पन्दशास्त्र कहता है कि इन दोनों (अनुभव क्षण रूप निर्विकल्पक ज्ञान एवं स्मृतिक्षण रूप सविकल्पक ज्ञान) ही ज्ञानक्षणों के मध्य इनसे पृथक् एवं स्वयंप्रकाश सत्ता 'स्पन्द' है जिसमें समस्त अनुभव, स्मृतियाँ, आकार, रूप, गुण, विशेषताएँ आदि बीज में स्थित जड़ तना, शाख फल आदि की भाँति मयूराण्ड रसन्याय से स्थित रहती है और यही चेतन सत्ता निर्विकल्प ज्ञान को सविकल्पक बनाती है । मीमांसा की आत्मविषयक दृष्टि की समीक्षा—यदि सुख-दुःख आदि से विशिष्ट 'मैं' की प्रतीति ही को आत्मा का स्वरूप मान लिया जाय तो चूँकि सुख-दुःख आदि वृत्तियाँ तो अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं अतः क्या इनसे अतीत स्तर पर आत्मा का अस्तित्व नहीं स्वीकार किया जाएगा ? उपनिषदों में तो आत्मा को इन्द्रिय, अर्थ, मन, बुद्धि आदि सभी से परे माना गया है— 'इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥' ऐसी स्थिति में सुख-दुःख-लाभ-हाँनि-ईर्ष्या-द्वेष-भय-मोह-प्रेम-द्रोह-आदि सभी से एवं मन-बुद्धि-चित्त तथा अहंकार से अतीत आत्मा के इस स्तर की व्याख्या कैसे की जा सकेगी? यदि सुखदुःखादिक चित्त वृत्तियों की पराधीनता में ही आत्मा को अपनी सत्ता स्थिर रखनी है तो उसे चेतन एवं स्वतन्त्र कैसे कहा जा सकेगा ? यदि कुमारिल भट्ट आत्मा को चैतन्यस्वरूप न मानकर चैतन्य-विशिष्ट स्वीकार करते हैं तो फिर आत्मा में यह चैतन्य कहीं बाहर से आया हुआ स्वीकार करना पड़ेगा । बाहर से यह कहाँ से आया? चैतन्य को आत्मा का स्वस्वरूप न मानकर उसे उसका 'विशेषण' (गुण) बताना और आत्मा को उसका 'विशेष्य' बताना तथा—गुण-गुणी, धर्म-धर्मी, विशेषण-विशेष्य के सम्बन्ध में बाँधना आत्मा की चेतनता एवं स्वतन्त्रता पर कुठाराघात है । विश्वात्मा तो गुणों को सत्ता प्रदान करके भी स्वयं गुणातीत है—रूप देकर भी रूपातीत है—आकार देकर भी आकारातीत है—इन्द्रियाँ देकर भी इन्द्रियातीत है । मीमांसक भी आत्मा को सुखदुःखादिविशिष्ट 'अहं' की प्रतीति कहकर परतत्त्व को मात्र बुद्धि की सीमा तक ही सीमित मानकर प्रकृति के विकार बुद्धि को ही लक्ष्मणरेखा मानकर उससे परे चिन्तन नहीं कर पाते और बुद्धि के स्थूल धरातल पर ही अपनी तात्त्विक यात्रा समाप्त कर देते हैं । लोकायतों की दृष्टि की समीक्षा—चार्वाकी दृष्टि (बार्हस्पत दृष्टि) देहात्मवाद, प्रत्यक्षवाद एवं आधिभौतिक सुखवाद के स्थूलतम धरातल पर आधृत हैं । इसमें आत्मा,
प्रथमः निष्यन्दः १०७ धर्म, शुद्धाचरणा, शाश्वतिक मूल्य, पुनर्जन्म, कर्म फलों के भोग, स्वर्ग, तप, संयम नैतिकता आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। इसका लक्ष्य मात्र एक है— १. ऐन्द्रियसुखोपभोग २. भौतिक सुख-समृद्धि । २. 'यावज्जीवेत सुखं जीवेत्' तक तो ठीक है किन्तु 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्'— समाज का आदर्श नहीं बन सकता। ३. चावल, महुआ, अंगूर आदि को सड़ाकर आसवन प्रक्रिया से जो शराब बनती है उसका मत्तकारी प्रभाव क्षणिक होता है किन्तु चेतना (चैतन्य) को भी शराब के नशे के समान कहना ठीक नहीं है—आत्मा या चैतन्य क्षणस्थायी नशा नहीं है प्रत्युत् प्रत्येक प्राणी का सार्वकालिक, सार्वदेशिक एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। यही उसकी चेतना—प्रत्यभिज्ञा एवं अस्तित्त्व है। कारिकाकार का कथन है कि—'मैं सुखी हूँ—मैं दुःखी हूँ, मैं अनुरक्त हूँ'—इस प्रकार के दूसरे विकल्पज्ञान—शरीर आदि से भिन्न—किसी दूसरी की वेदक सत्ता के साथ ही सम्बद्ध है और वह वेदक सत्ता (आत्मा) स्वयमेव इन सभी से पूर्णतया भिन्न होने पर भी इन सभी में अनुस्यूत है। 'अन्यत्र' पद उस स्वभाव का द्योतक है जो स्वयं समस्त अवस्थाओं से भिन्न है— 'स स्वभावः परः स्मृतः ।' यही है आत्मा ॥ निष्कर्ष-रामकण्ठाचार्य—'स्वयंसिद्ध, नित्यनिरावरणरूप, सर्वत्र अनिरुद्ध एवं तात्त्विक स्वस्वभाव शङ्कर ही वह आत्मा एवं स्वस्वभाव है और समस्त अवस्थाओं से पृथक् होते हुए भी सारी अवस्थाओं में से ही अनुस्यूत है। उत्पलदेवाचार्य के मतानुसार यद्यपि आत्मा के दो भेद हैं—१. मित २. अपरिमित 'द्विधा स एष एवात्मा मितोऽपरिमितस्तथा' १. (अणु) २. परमात्मा। किन्तु इनमें भी स्वभावतः ऐक्य है। पारमार्थिक तत्त्व का स्वरूप न दुखं न सुखं यत्र न ग्राह्यं ग्राहकं न च । न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ ५ ॥ जहाँ (जिस स्पन्द तत्त्व में) न दुःख है, न सुख है, न ग्राह्य है और न तो ग्राहक (का भाव) है तथा जहाँ मूढ़भाव (अज्ञान, वेद्य-विमर्श की क्षमता का अभाव) भी नहीं है वही स्पन्दतत्त्व परमार्थतः सत् है ॥ ५ ॥
- सरोजिनी * सुख-दुःख, मोह आदि त्रिगुणात्मक अन्तःकरण के विषय हैं न कि स्पन्दतत्त्व के। संवित् भट्टारिका सूक्ष्म प्राण बनने के अनन्तर अन्तःकरण का रूप धारण करती है। अन्तःकरण ही सुखादिक के आश्रय है। शङ्कर के रूप में स्थित स्पन्द तत्त्व का यहाँ निषेधपरक विवेचन किया गया है। ग्राह्यं = आन्तरग्राह्य । बाह्य ग्राह्य । प्रमेय (Perceptible)
१०८ स्पन्दकारिका ग्राहक = प्रमाता । पुर्यष्टक । शरीर । इन्द्रियाँ आदि । (प्रमाता = Perceiver) ग्राह्य— १. आन्तर ग्राह्य २. बाह्य ग्राहक | | सुख दुःख राग द्वेषादिक नील पीत आदि ।१ इसके पूर्व के श्लोकों में ग्रन्थकार महोदय समस्त सिद्धान्तों की, अधिकार में न आ सकने की स्थिति (Untenability) का विवेचन करने के उपरान्त अब स्पन्द तत्त्व का विवेचन कर रहे हैं । यह स्पन्द तत्त्व ही एक मात्र यथार्थ सत्ता है अन्य नहीं क्योंकि यह तर्काश्रित है । जहाँ सुख, दुःख, ज्ञाता एवं ज्ञेय की सत्ता नहीं है और जहाँ मूढभाव (अज्ञान या Insentiency) या जीवन्तता का अभाव नहीं है वही वास्तविक रूप में स्थित तत्त्व है ।२ इस जगत् या जीवन में जो थोड़ा बहुत सुख-दुःख, नील-पीत आदि बाह्य ग्राह्य एवं पुर्यष्टक, शरीर तथा इन्द्रियाँ आदि ग्राहक हैं वे पारमार्थिक सत्ता नहीं हैं । मैं तर्क के साथ कह सकता हूँ कि प्रमेय (Perceptible) चाहे वह आन्तरिक हो और चाहे वह बाह्य हो यथा सुख-दुःखादिक 'आन्तरिक' एवं नील-पीत आदि 'बाह्य' या प्रमाता हो यथा पुर्यष्टक शरीर एवं इन्द्रियाँ आदि ये प्रामाणिक रूप में अपनी वास्तविक सत्ता नहीं रखते क्योंकि ये सुषुप्ति की भाँति अनुभूयमान नहीं होते । वे जब भी कभी संचेत्यमान (अनुभूत) होते हैं तो केवल चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि मेरे दादा गुरु (Great grand teacher) उत्पलाचार्य ने कहा है कि—३ 'प्रकाशात्मा प्रकाश्योऽर्थो ना प्रकाशश्च सिध्यन्ति ।' (ई० प्र० १।५।३) इस प्रकार कहकर रहस्यतत्त्वविद् 'अस्मत्परमेष्ठी' श्रीमत् उत्पलदेवपाद अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं कि वह वस्तु जो कि प्रकाश में आ सकती है वह प्रकाशक की ही प्रकृति या स्वभाव की है । जिसमें प्रकाश नहीं है उसकी सत्ता होना भी संभव नहीं है । 'तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः' भी यह प्रमाणित है । इस प्रकार सुख-दुखादि नीलादिक ग्राह्य एवं उसके ग्राहक जहाँ नहीं हैं । वहाँ प्रकाशैकधनं तत्त्व स्थित है— 'दुःखसुखादि नीलादि तद्ग्राहकं च यत्र नास्ति तत्प्रकाशैकघनं तत्वमस्ति ।'४ शून्यवाद का खण्डन—आचार्य क्षेमराज स्पन्द तत्त्व को शून्य तत्त्व से पृथक् सिद्ध करने हेतु शून्यवाद का खण्डन करते हुए कहते हैं कि—शून्यावस्था (State of vacuum) भी नहीं है । क्योंकि यथार्थ तत्त्व वह है जहाँ शून्यावस्था (शून्य स्थान) है ही नहीं ! 'शून्य' (Vacuum) या तो व्यक्त होगा या अव्यक्त । यदि यह व्यक्त नहीं होता तब यह कैसे कहा जा सकता है कि इसका अस्तित्व है । यदि यह अभिव्यक्त होता है तो यह अभिव्यक्ति स्वभावात्मक है । अभिव्यक्ति का लोप तो संभव नहीं है क्योंकि इसकी अनुपस्थिति में—अभिव्यक्ति का अभाव रह नहीं सकता ।५ १-५. स्पन्दनिर्णय ।
प्रथमः निष्यन्दः १०९ मूढभाव का द्वितीय अर्थ—वास्तविक तत्त्व तो वह है जहाँ कि ब्रह्म की अचेतनता का कोई रूप अस्तित्व नहीं रखता और जो कि प्रकाश के साथ एकरूप है और जो 'विज्ञान' ब्रह्म के साक्ष्य पर ज्ञानस्वरूप है—क्योंकि यहाँ तक वेदान्तियों का ब्रह्म भी, बिना स्वातन्त्र्यस्वरूपी स्पन्दतत्त्व की शक्ति के निष्प्राण (Insentient) है । प्रत्यभिज्ञा में कहा गया है कि 'विचारणा या चिन्तन प्रकाश के स्वरूप का निर्माण करता है अन्यथा प्रकाश, चाहे वह वस्तुओं को प्रकाशित ही क्यों न करता हो स्फटिक की भाँति निष्प्राण वस्तु ही होगा ।¹ भट्टनायक कहते हैं—'ओ देव! ब्रह्म कितना फल वहन कर सकता है क्योंकि वह उदासीन है । यदि तुम्हारा नियामक पुरुषात्मक बल वहाँ न होता और तुम्हारी उपासना की सुन्दर नारी के रूप में तुम्हारी नियमन करने की पुरुषात्मक शक्ति न होती तो उदासीन (तटस्थ) ब्रह्म कितना फल वहन करता? 'नपुंसकमिदं नाथ परं ब्रह्म फलेत्किम् । त्वत्पौरुषी नियोक्त्री चेन्न स्यात्त्वद्भक्तिसुन्दरी ॥' भट्टनायक वेदान्तियों के ब्रह्म को 'नपुंसक' कह रहे हैं । इस प्रकार वही मात्र यथार्थतः सत्तावान् है जोकि सहज (अकृत्रिम) पूर्णतम, तर्क-अनुभव-आगम-प्रमाणित है न कि नीलादिक बाह्य पदार्थ । क्योंकि गुरुदेव ने कहा है—२ 'एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशास्यैव सन्त्यमी । जडाः प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः स्वपरात्मभिः ॥ (अजड पृ० १३) भर्तृहरि ने भी कहा है— 'यदासौ च यदन्ते च तन्मध्ये तस्य सत्यता । न यदाभासते तस्य सत्यत्वं तावदेव हि ॥' निर्जीव (निष्प्राण = जड़) वस्तुएँ असत् (Non-existent = सत्ता शून्य) की भाँति हैं—यदि हम उनके आत्मतत्त्व की तुलना में देखें तो या प्रकाश की दृष्टि से उन्हें देखें तो । अपनी आत्मा का प्रकाश मात्र ही सत्तावान् है ।³ इस प्रकार इस सूत्र में यह प्रतिपादित किया गया है कि सर्वोच्च सत्ता (Ulti- mate Reality) स्पन्द तत्त्व के रूप में विद्यमान है । संवित्संतानवादियों, प्रमातृतत्त्व- वादियों, नानात्ववादियों, अभाववादियों एवं ब्रह्मवादियों का मत अनुपपन्न होने के कारण—'पारमार्थिकं स्पन्दशक्तिरूपमेव तत्त्वमस्तीति प्रतिज्ञातम् ॥'—अर्थात् स्पन्द शक्ति मात्र ही एक मात्र तत्त्व है ।४ अन्य मत मतान्तरों की निरर्थकता (Absundity) को सिद्ध करने के उपरान्त सुख के रूप में चेतना के सातत्य के प्रतिपादकों के मतों का खण्डन करने के उपरान्त । आनन्द के कारण ही प्रमा होने के सिद्धान्त, प्रमाता एवं प्रमेयों के बहुत्व के सिद्धान्त, १-४. स्पन्दनिर्णय ।
११० स्पन्दकारिका विचारशून्य प्रकाश के रूप में वेदान्त के ब्रह्म के सिद्धान्त का खण्डन करके ग्रन्थकार ने स्पन्दतत्त्व को ही उच्चतम एवं सर्वान्त्यपरा सत्ता स्वीकार किया है । सारांश—१ १. संवित्सन्तानवादियों का खण्डन २. प्रमातृतत्त्ववादियों का खण्डन ३. नानात्ववादियों का खण्डन ४. अभाववादियों का खण्डन ५. ब्रह्मवादियों का खण्डन ६. स्पन्दतत्त्ववाद का मण्डन स्पन्दतत्त्ववाद का प्रतिपादन— एक मात्र वही एक तत्त्व है जो कि अपनी स्फुरत्ता पर आधृत है । समस्त दुःख, सुख, ज्ञेय, ज्ञाता एवं उसका अभाव आदि शून्य बन जाता है क्योंकि समस्त विश्व इसका भोग समझा गया है । (पृ० ४०) 'स्फुरत्तासारे स्पन्दतत्त्वे स्फुरति दुःखसुखग्राह्यग्राहके' शाङ्कर मार्ग में तो दुःख भी सुख, विष भी अमृत, संसार भी अमृत बन जाते हैं— 'दुःखान्यपि सुखायन्ते विषमप्यमृतायते । मोक्षायते च संसारो यत्र मार्गः स शाङ्करः ॥' (उ०स्तो०) शाङ्कर मार्ग क्या है? परा शक्तिरूप प्रसर ही शाङ्कर मार्ग है—'शाङ्करो मार्गः शङ्करात्मस्वभाव-प्राप्ति हेतुः पराशक्तिरूप प्रसरः ॥' वह 'स्पन्दतत्त्व' परमार्थतः है क्योंकि वह नित्य है—'तत् स्पन्द तत्त्वं परमार्थत- तोऽस्ति नित्यत्वात्तस्य' । उसमें न आध्यात्मिक दुःखादिक है और न तो वैषयिक सुख । घटपटादि ग्राह्य भी नहीं हैं । मैं इन्हें ग्रहण करने वाले सविकल्पक ग्राहकरूप प्राकृत अहंकार हूँ—ऐसा भी नहीं है क्योंकि अहंकार तो अविद्या के बिना होता ही नहीं है । इससे अधिष्ठातारूप ग्राहक अहंकार का अभाव बताना अभीष्ट नहीं है क्योंकि उसको तो जानना ही है ।२ 'तत्त्वगर्भ' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—परमार्थ में ग्राह्य एवं ग्राहक कुछ भी नहीं है । परमार्थ के ज्ञान के बिना अपनी छाया ही आभास के समान जान पड़ती है । तब वह स्पन्दतत्त्व क्या पाषाण के समान मूढ़ या शून्य है? नहीं-नहीं वह जड़ नहीं है, वह स्वप्रकाश एवं सर्वावभासक है । जिस प्रकार शीतकाल और उष्णकाल के मध्य न शीत है न ऊष्ण है वैसे ही सुख-दुःख के मध्य न सुख है न दुःख है परन्तु वह दोनों में है— परमार्थेन न ग्राह्यं ग्राहकं वा न किञ्चन । यस्मादृते तत् स्वाभासमस्वाभासमिवेक्ष्यते ॥ 'न चस्ति मूढभावोऽपि ॥' किसी मुनि ने कहा भी है—३ 'यथा शीतोष्णयोर्मध्ये काले नोष्णो न शीतलः ।
१. स्पन्दनिर्णय । २-३. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।
प्रथमः निष्यन्दः १११ एवं हि सुख दुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं विभोः ॥' 'तत्त्वस्तुति' में कहा गया है—'जैसे आकाश में बिना अन्य भाव सम्बन्ध के सूर्य का उदय होता है इसी प्रकार वेद्य के बिना ही अपनी सत्ता का प्रकाश होता है— 'समुदेति यथा भावैर्विना भानुर्नभस्तले । वेद्यं विनैव भगवन् भवान् केन स्वतोदयः ॥' विशेषण के बिना सामान्य या व्यक्ति के बिना जाति का पृथक् निर्देश नहीं किया जा सकता किन्तु यह तो नहीं कहा जा सकता कि सामान्य जाति है ही नहीं । स्वसंवेदन —संवेद्य, संविन्मयी स्थिति, नित्य शुद्ध निजस्वरूप है । उसमें सुख दुःख की कोई विशेषता नहीं है—१ यथोद्धृतविशेषस्य सामान्यस्य निजा स्थितिः । पृथङ् न शक्या निर्देष्टुं न च तन्नास्ति तावता ॥ एवं नित्या निजा शुद्धा सुखदुःखाविशेषिता । स्वसंवेदनसंवेद्या तव संविन्मयी स्थिति ॥' और तो और नागार्जुन ने भी कहा है—'सब आलम्बन, धर्म, सभी तत्त्व एवं सभी क्लेशाशयों से सम्पूर्णतः शून्य है वह तत्त्व । किन्तु परमार्थतः शून्य नहीं है— 'सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्वैरशेषतः । सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥' 'आलोकमाला' में तो और विलक्षण ढंग से इसे प्रतिपादित करते हुआ कहा गया है कि—वह तमोवृत्ति के विरुद्ध है, अतः तमोवृत्ति कभी अवकाश नहीं देती । वह वस्तुतः सामान्य जनों के लिए कोई अविज्ञेय अवस्था है—उसे हम 'शून्यता' कहते हैं । लोक रूढि में जो नास्तिकता का बोधक—'शून्यता' शब्द है वह हमारे शून्य शब्द का अर्थ नहीं है—२ 'विरुद्धत्वात्तमोवृत्तेर्नावकाशं ददाति या । सावस्था काऽप्यविज्ञेया मादृशा शून्यतोच्यते ॥ न पुनर्लोकरूढ्यैव नास्तिक्यार्थानुपातिनी । इस श्लोक के पूर्व स्वस्वभाव को शिव के रूप में प्रतिपादित करके इस श्लोक में उसके लक्षणों का अनुवाद (निरूपित विषय की व्याख्या या प्रमाण को प्रमाण के रूप में उसका पुनर्कथन या समर्थन) करते हुए परमार्थ सत्ता का प्रतिपादन करने हेतु ग्रन्थकार निम्न कारिका कहता है—'न दुःखं ... परमार्थतः ॥' 'यस्तु वेदकः स एक एव परमार्थ सन् इत्यर्थः' जो वेदक है वही मात्र सत् है ।' 'तत्' = वह । वक्ष्यमाण एवं स्वस्वभावशब्दवाच्य विशिष्ट वस्तु अर्थात् परमार्थ सत्ता । 'परमार्थतः' = तत्त्वतः ॥ अर्थात् जिसके अतिरिक्त सभी पदार्थ असत्यसद्भाव हों, मिथ्या या असत्य हों । वह क्या है ? जहाँ न दुःख है और न सुख है, न ग्राह्य है न ग्राहक है और न तो मूढभाव ही है वही परमार्थ है । १-२. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।
११२ स्पन्दकारिका यहाँ पर सुखादिरूपता का प्रतिषेध होने के कारण इसके वेद्यत्व का भी प्रतिषेध किया गया है। वेद्य के अनेक प्रकार है यथा १. बाह्य वेद्य २. आन्तर वेद्य ।। आभ्यन्तर वेद्य = अन्तःकरण द्वारा वेद्य होने के कारण आभ्यन्तर वेद्य कहलाते हैं । 'बाह्य वेद्य' = शब्दादिक पदार्थ 'वेद्य' पदार्थों को ही 'ग्राह्य' भी कहते हैं। ये श्रोत्र आदि बाह्य इन्द्रियों द्वारा गृहीत होते हैं और अन्तःकरण के द्वारा सुखादिक के रूप में अनुभूति के विषय बनते हैं। 'वेद्यते इति वेद्यः' ।। ग्राहक या वेदक भी मायीय प्रमाता है न कि तात्त्विक । बहु उपलब्धृमात्रस्वरूप है किन्तु वह तत्त्वतः नित्य है। इस प्रकार जहाँ पर देहादिक में अहंकार रखने वाला ग्राहक भी नहीं है ।१ कहीं-कहीं 'ग्राह कम्' पाठ भी है। 'ग्राहक' = इन्द्रियाँ (जहाँ इन्द्रियाँ भी नहीं है।) इस प्रकार जिस परम पद में—ग्राह्य-ग्राहक स्वरूप से व्यतिरिक्त ग्रहीतृमात्रस्वभाव पर तत्त्व है वही परमार्थ है ।२ 'न च मूढभावोऽपि' = जहाँ मूढ़भाव भी नहीं है । अर्थात् यदि यह कहा जाय कि यदि सुख-दुःख, ग्राह्य-ग्राहक आदि कोई सत्ता उस पद में नहीं है तो मूढावस्था तो होगी ही?—इसी के निराकरणार्थ ग्रन्थकार कहता है कि वहाँ मूढ़ावस्था भी विद्यमान नहीं है ।३ मूढ़भाव = 'मूढस्य भावो मूढत्वं' अर्थात् वेद्यवेदनसामर्थ्याभाव । मूढ़भाव भी इसलिए विद्यमान नहीं है क्योंकि यदि वहाँ मूढ़भाव विद्यमान होता तो व्यक्ति को अनुभव में आता कि 'मैं मूढ़ था'—और ऐसा प्रत्यवमर्श होने पर वेद्यता की सत्ता तो बनी ही नहीं रहती जो कि परमार्थ पद में है ही नहीं। यदि वेद्यता बनी रहती तो मूढ़ावस्था का किस प्रकार वेदकैकस्वभाववस्तुरूपत्व हो पाता ? यदि वहाँ पर मूढ़ भाव की भी सत्ता विद्यमान नहीं रहती है तब तो उसकी प्रतिपत्ति के गोचरीभूत समस्त वेद्यवस्तुरूपता के प्रतिषेध के कारण वहाँ अभाव की सत्ता विद्यमान मानी ही जानी चाहिए—इसी पूर्वपक्ष के प्रतिक्षेपार्थ ग्रन्थकार ने कहा कि—'तदस्ति परमार्थतः ।'४ वह सद्रस्तु ('तत्') परमार्थतः (तत्त्वतः) सत्ताशील है । क्योंकि वह नित्यरूप से अविलुप्त है और उपब्धृमात्रलक्षणस्वभाव है। चूँकि कल्पनामात्रलब्धात्मक सुखादिक पदार्थ क्षणभंगुर वेद्य पदार्थ हैं अतः वेदक मात्र स्वभाव वाले आत्मा से ये वेद्य पदार्थ भिन्न होते हुए भी उनकी ही कल्पना होने के कारण उनसे भिन्न भी नहीं है—जो जो वेद्य भूमिका में हैं वे सभी अनित्य होने के कारण असत् है—'यत् यत् वेद्यभूमिकायां वर्तते तत् सर्वं असत् अनित्यत्वात्' ।५ पारमार्थिक सत्ता क्या है?—कारिकाकार ने परमार्थ सत् को दुःख, सुख, ग्राह्यता । ग्राहकता, मूढ़भाव इत्यादि सभी से परे माना है— १-४. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका । ५. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति।