भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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४६ २. जैमिनि के मत से ब्रह्म शब्द की मुख्यार्थता समर्थन ३. का बादरायण के मत से प्रतीकोपासना रहित उपासकों का निरूपण । —पृ० ११७४-८३ (चतुर्थ पाद) १. संपद्याविर्भावाधिकरण (सूत्र १-३) परज्योति परब्रह्म की प्राप्ति के अनन्तर जीव के स्वरूपाविर्भाव का निरूपण प्रकरणानुसार आत्मा की स्वाविक निष्पापता का समर्थन । —पृ० ११८४-८७ २. अविभागेन दृष्टत्वाधिकरण (सूत्र ४) मुक्त पुरुष की अभिन्नरूप से ब्रह्मानुभूति का समर्थन । —पृ० ११८७-९२ ३. ब्राह्माधिकरण (सूत्र ५-७) १. जैमिनि के मत से अपहतपाप्मता आदि गुणविशिष्ट ब्रह्म रूप से मुक्तात्मा के आविर्भाव का निरूपण । २. औडुलोमि के मत से चैतन्यात्मक ब्रह्मरूप में स्वरूपाविर्भाव का निरूपण । ३. बादरायण के मत से दोनों स्वरूपाविर्भाव का प्रतिपादन । —पृ० ११९२-९५ ४. संकल्पाधिकरण (सूत्र ८-९) मुक्त पुरुष के स्वेच्छानुसार ज्ञाति प्रिय समागम का निरूपण । मुक्त पुरुष की पराधीनता का निराकरण । —पृ० ११९६-९७ ५. अभावाधिकरण (सूत्र १०-१६) १. बादरि के मत से मुक्त पुरुष के शरीरादि अभाव का प्रतिपादन । २. जैमिनि के मत से मुक्त पुरुष के शरीरादि सद्भाव का समर्थन । ankurnagpal108@gmail.com