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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1444, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1444

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (द्वितीय भाग) अध्याय-विवरण पन्द्रहवाँ अध्याय— 1-47 महाप्रभुकी गोप और हनुमानके वेशमें लीला, श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ एकान्तमें परामर्श, श्रीवासके द्वारा नवद्वीपमें माताको सांत्वना-वाक्य भेजना, राघव पण्डित, खण्डवासी मुकुन्द और रघुनन्दन, मुरारी गुप्त, वाचस्पति आदि भक्तोंके गुणोंकी व्याख्या करके प्रत्येकको सेवा निर्देश करके विदायी देना। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नोंके उत्तरमें सभी साधकोंके नित्य कर्त्तव्योंका उपदेश देना, वासुदेवके अपूर्व जीवोंपर दया-सूचक वाक्यकी आलोचना, सार्वभौमके घरमें भिक्षा और भट्टके दामाद अमोघका उद्धार। सोलहवाँ अध्याय— 49-90 अगले वर्ष गौड़देशसे वैष्णव-गृहिणियोंका भक्तोंके साथ महाप्रभुके लिये नैवेद्य एकत्रित करके पुरीमें आगमन और चातुर्मासके अन्तमें गौड़देशमें लौट जाना। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नके उत्तरमें वैष्णवोंके अधिकार-तारतम्यका निर्देश, विद्यानिधिका श्रीक्षेत्रमें ‘ओड़नषष्ठी’-दर्शन, विजयदशमीके दिन महाप्रभुकी वृन्दावन-यात्रा, महाप्रभुके साथमें गदाधरकी जानेकी इच्छा और उनका महाप्रभुके प्रति अनुपम प्रेम, गदाधरको विदायी देकर जलपथसे पानिहाटी, कुमारहट्ट और विद्यानगरसे होते हुए कुलियामें आगमन और अनेक अपराधियोंके अपराधोंका मोचन, रामकेलिमें रूप-सनातनके साथ साक्षात्कार, सनातनके इङ्गितानुसार कनाई-नाटशालासे पुरीकी ओर वापस लौटना, उसके द्वारा नृसिंहानन्द ब्रह्मचारीके ध्यानके आवेशमें उच्चारित भविष्यवाणीकी सफलताका विधान, पथमें शान्तिपुरमें आकर रघुनाथको उपदेश देना और अन्तमें पुरीमें वापस लौटना। सत्रहवाँ अध्याय— 93-127 बलभद्र ब्राह्मणके साथ वृन्दावन-यात्रा, झारिखण्ड मार्गसे काशीमें आगमन, तपनमिश्रके घरमें अवस्थान, कृष्णनामापराधी मायावादियोंकी निन्दा, मथुरा जाकर माधवेन्द्रपुरीके शिष्य सनोड़िया ब्राह्मणको वैष्णव जानकर जातिबुद्धि न करके उसके घरमें भोजन, वृन्दावनमें स्थित द्वादश-वनोंमें भ्रमण और कृष्णप्रेमविकार। अठारहवाँ अध्याय— 129-169 वृन्दावनमें सभी कृष्णलीला-स्थानोंका दर्शन, बलभद्रके कालिय हृदमें मछुआरे कृष्णवर्ण नाविकको ‘कृष्ण’-भ्रमरूप विवर्त्त दूर करना, उस देशके वासियोंको जीव और कृष्णके स्वरूपका वर्णन, मथुरासे वापस लौटते हुये मार्गमें बिजली-खाँ और उसके सङ्गियोंका उद्धार करना, मुसलमानशास्त्रसे कृष्णभक्ति-संस्थापन, त्रिवेणीमें आगमन। उन्नीसवाँ अध्याय— 171-219 श्रीरूपका अपने देशमें अपने घरमें आगमन, राजकार्यको त्याग करनेके कारण सनातनको कारावास, अनुजके साथमें श्रीरूपका गृहत्याग और प्रयागमें महाप्रभुके साथ मिलन, वल्लभाचार्यको महाप्रभुके द्वारा दोनों भाइयोंका परिचय देना, महाप्रभु और रघुपति उपाध्यायका वार्तालाप, दशाश्वमेध-घाटपर श्रीरूपको कृष्णभक्तिरसतत्त्वकी शिक्षा प्रदान करना और वृन्दावनमें iv ।

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