भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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498 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/123-135 ] तार मध्ये प्रभुर सिंहद्वारे पतन। अस्थि-सन्धि-त्याग, अनुभावेर उद्गम ॥ 124 ॥ चटक-पर्वत देखि' प्रभुर धावन। तार मध्ये प्रभुर किछु प्रलाप-वर्णन ॥ 125 ॥ अनुवाद—चौदहवें अध्यायमें महाप्रभुमें दिव्योन्मादके आरम्भका वर्णन हुआ है, जिसमें उनका शरीर तो जगन्नाथपुरीमें था, किन्तु उनका मन वृन्दावन चला गया। इसी अध्यायमें महाप्रभुका सिंहद्वारपर पड़े मिलना, उनकी अस्थियोंके जोड़ोंका खुलना और अनुभावके उदित होनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है। इसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा चटक पर्वतको देखकर दौड़ना और उनके द्वारा किये गये कुछ प्रलापका वर्णन हुआ है॥ 123-125 ॥ पञ्चदश-परिच्छेदे-उद्यान-विलासे। वृन्दावनभ्रमे याँहा करिला प्रवेशे ॥ 126 ॥ तार मध्ये प्रभुर पञ्चेन्द्रिय-आकर्षण। तार मध्ये करिला रासे कृष्ण-अन्वेषण ॥ 127 ॥ अनुवाद—पन्द्रहवें अध्यायमें उद्यान-विलासका वर्णन है, जिसमें महाप्रभु वृन्दावनके भ्रमसे प्रवेश कर गये थे। इसी अध्यायमें श्रीकृष्णके द्वारा महाप्रभुकी पाँचों इन्द्रियोंका आकर्षण और महाप्रभुके द्वारा रासलीलामें श्रीकृष्णको ढूँढ़नेका प्रयास वर्णित हुआ है॥ 126-127 ॥ षोडशे-कालिदासे प्रभु कृपा करिला। वैष्णवोच्छिष्ट खाइबार फल देखाइला ॥ 128 ॥ शिवानन्देर बालके श्लोक कराइला। सिंहद्वारेर द्वारी प्रभुरे कृष्ण देखाइला ॥ 129 ॥ महाप्रसादेर ताँहा महिमा वर्णिला। कृष्णाधरामृतेर फल-श्लोक आस्वादिला ॥ 130 ॥ अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें श्रीकालिदासके द्वारा वैष्णवके उच्छिष्ट खानेके फलस्वरूप महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति, महाप्रभुके द्वारा श्रीशिवानन्द सेनके पुत्रके द्वारा श्लोककी रचना करवाना, सिंहद्वारके द्वारपालके द्वारा महाप्रभुको श्रीकृष्णको दिखलाना, महाप्रभुके द्वारा महाप्रसादकी महिमाको बतलाना और श्रीकृष्णके अधरामृतके फलके श्लोकके आस्वादनका वर्णन हुआ है॥ 128-130 ॥ सप्तदशे-गाभी-मध्ये प्रभुर पतन। कूर्माकार-अनुभावेर ताँहाइ उद्गम ॥ 131 ॥ कृष्णेर शब्दगुणे प्रभुर मन आकर्षिला। 'कास्त्र्यङ्ग ते' श्लोकेर अर्थ आवेशे करिला ॥ 132 ॥ भाव-शाबल्ये पुनः कैला प्रलापन। कर्णामृत-श्लोकेर अर्थ कैला विवरण ॥ 133 ॥ अनुवाद—सतरहवें अध्यायमें महाप्रभुका गैयाओंके बीचमें पड़े मिलना और कूर्माकार-अनुभावका वहींपर प्रकाशित होना, श्रीकृष्णके शब्द-गुणके द्वारा महाप्रभुके मनको आकर्षित करनेपर महाप्रभुके द्वारा आवेशमें 'कास्त्र्यङ्ग ते' श्लोकके अर्थका वर्णन करना और उनके द्वारा भाव-शाबल्यमें पुनः प्रलाप करना एवं कर्णामृतके श्लोकके अर्थका विवरण दिया गया है॥ 131-133 ॥ अष्टादश-परिच्छेदे-समुद्रे पतन। कृष्ण-गोपी-जलकेलि ताँहा दरशन ॥ 134 ॥ ताँहाइ देखिला कृष्णेर वन्यभोजन। जालिया उठाइल, प्रभु आइला स्व-भवन ॥ 135 ॥ अनुवाद—अठारहवें अध्यायमें महाप्रभुका समुद्रमें जा गिरना और श्रीकृष्ण एवं गोपियोंके द्वारा की जानेवाली जलक्रीड़ाका दर्शन, महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके द्वारा किये जाने वाले वन्य-भोजनका दर्शन, मछुवारेके द्वारा महाप्रभुको समुद्रसे निकालना एवं महाप्रभुके अपने वास-स्थानपर आना—ये सब प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 134-135 ॥