श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 820, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ दामोदर-नन्दन दामोदर पण्डित, ठाकुर 10/126 दुर्विज्ञेय नित्यानन्द-तोमार 17/109 'द्वितीय' शब्द-विधेय 16/60 दामोदर पण्डित-शाखा 10/31 दूर हइते आइला काजी 17/144 'द्वितीय श्रीलक्ष्मी' इहाँ 16/59 दामोदर-स्वरूप, आर गुप्त 13/46 दूर हैते देखि' ताँरे बले 17/284 द्वितीय परिच्छेदे 17/314 दार्थ्य लागि' 'हरेर्नाम'-उक्ति 17/23 देख, कोन् काजी आसि 17/134 द्वितीय-श्रीलक्ष्मीरिव 16/41 दिङ्मात्र लिखि, सम्यक् 10/159 देखि' आनन्दित हञा हासे 9/50 दिग्विजयी कहे मने 16/30 देखि' उपराग हासि' 13/100 दिने दिने पिता-मातार 14/93 देखिते आइसे येवा 13/24 ध दिव्य दिव्य लोक आसि' 14/80 देखिते देखिते वृक्ष लागिल 17/81 दिव्यमूर्त्ति लोक आसि' 13/83 'देखिनु' 'देखिनु' बलि' 17/232 दिव्य वस्त्र, दिव्य वेश 17/5 देखि' प्रभुर मूर्ति सर्वज्ञ 17/106 धन-धान्ये भरे घर 13/119 दिव्य सामग्री, दिव्य 8/52 देखि' शची धाञा आइला 14/26 धरिबारे गेला पुत्रे, गेला 14/72 दीक्षा-अनन्तरे हैल प्रेमेर 17/9 देखिया प्रभुर दुःख हइल 17/244 घरे यत भाण्ड छिल 14/43 दुँहा देखि' दुहार चित्ते 14/65 देखिया बालक-ठाम 13/115 धर्म-शिक्षा दिल बहु 14/83 दुँहार अन्तर-कथा दुँहे 12/48 देखिया मिश्रेर हइल 14/12 धर्मी, कर्मी, तपोनिष्ठ 17/260 दुइ कीर्त्तनीया रहे 10/147 देखिया सन्तुष्ट हैला शचीर 17/84 धान्यराशि मापे यैछे 12/12 दुइ गोसाञि 'हरि' बले 12/21 देखिया दोँहार चित्ते जन्मिल 14/8 दुइजने खट्मटि लागाय 10/23 देखिया अपूर्व हैला विस्मित 14/47 दुइ प्रकारेते करे 12/47 देउटि धरैन, यबे प्रभु 10/37 दुइ भाइ ताँर मुखे 10/97 देखे, दिव्यलोक आसि' 14/76 न दुइ भाइ-दुइ शाखा 10/8 देवता पूजिते आइल करि' 14/62 दुइ शब्दालङ्कार, तिन 16/72 देवपूजा-छले कैल दुँहे 14/65 दुइ शाखार उपशाखाय 10/10 देवानन्द-चारि भाइ 11/46 नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव 11/48 दुइ शाखार प्रेमफले सकल 10/88 देशे आगमन पुनः, प्रेमेर 17/9 नकुल ब्रह्मचारी-देहे प्रभुर 10/57 दुइ सहस्र वैष्णवेरे नित्य 10/99 देशेर आइला प्रभु शची 16/22 नगरिया पागल कैल सदा 17/209 दुइ स्थाने प्रभु-सेवा 10/122 देह-सम्बन्ध हैते ग्राम 17/148 नगरिया लोके प्रभु यबे 17/121 दुइ हस्ते वेणु बाजाय 17/14 देहरोग, भवरोग,-दुइ 10/51 “नगरे नगरे आजि करिमु 17/133 दुःख कारो मने नहे 14/61 दैवे एकदिन प्रभु पड़िया 15/28 नगरे नगरे भ्रमे कीर्त्तन 13/32 दुःख पाइ' मने आमि 12/39 दैवे वनमाली घटक शची 15/29 नगरे हिन्दुर धर्म बाड़िल 17/193 दुःखित हइला आचार्य 12/23 दोष-गुण-विचारे एइ 16/102 न जानि,-कि खाञा मत्त 17/208 दु-बाहुते दिव्य शङ्ख 13/112 द्वादश प्रबन्ध, ताते 17/328 नदीया-उदयगिरि 13/98 दुर्लभविश्वास, आर 12/59 द्वादश वत्सर शेष रहिला 13/39 नदीयाते गङ्गावास कैल 13/58 दुर्वा, धान्य, गोरोचन 13/114 द्वादशे 'अद्वैतस्कन्ध 17/324 नन्दन-आचार्य-शाखा जगते 10/39 दुर्वा, धान्य, दिल शीर्षे 13/117 द्वारे कपाट,-ना पाइल 17/60 284 | श्रीचैतन्यचरितामृत