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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ दामोदर-नन्दन दामोदर पण्डित, ठाकुर 10/126 दुर्विज्ञेय नित्यानन्द-तोमार 17/109 'द्वितीय' शब्द-विधेय 16/60 दामोदर पण्डित-शाखा 10/31 दूर हइते आइला काजी 17/144 'द्वितीय श्रीलक्ष्मी' इहाँ 16/59 दामोदर-स्वरूप, आर गुप्त 13/46 दूर हैते देखि' ताँरे बले 17/284 द्वितीय परिच्छेदे 17/314 दार्थ्य लागि' 'हरेर्नाम'-उक्ति 17/23 देख, कोन् काजी आसि 17/134 द्वितीय-श्रीलक्ष्मीरिव 16/41 दिङ्मात्र लिखि, सम्यक् 10/159 देखि' आनन्दित हञा हासे 9/50 दिग्विजयी कहे मने 16/30 देखि' उपराग हासि' 13/100 दिने दिने पिता-मातार 14/93 देखिते आइसे येवा 13/24 ध दिव्य दिव्य लोक आसि' 14/80 देखिते देखिते वृक्ष लागिल 17/81 दिव्यमूर्त्ति लोक आसि' 13/83 'देखिनु' 'देखिनु' बलि' 17/232 दिव्य वस्त्र, दिव्य वेश 17/5 देखि' प्रभुर मूर्ति सर्वज्ञ 17/106 धन-धान्ये भरे घर 13/119 दिव्य सामग्री, दिव्य 8/52 देखि' शची धाञा आइला 14/26 धरिबारे गेला पुत्रे, गेला 14/72 दीक्षा-अनन्तरे हैल प्रेमेर 17/9 देखिया प्रभुर दुःख हइल 17/244 घरे यत भाण्ड छिल 14/43 दुँहा देखि' दुहार चित्ते 14/65 देखिया बालक-ठाम 13/115 धर्म-शिक्षा दिल बहु 14/83 दुँहार अन्तर-कथा दुँहे 12/48 देखिया मिश्रेर हइल 14/12 धर्मी, कर्मी, तपोनिष्ठ 17/260 दुइ कीर्त्तनीया रहे 10/147 देखिया सन्तुष्ट हैला शचीर 17/84 धान्यराशि मापे यैछे 12/12 दुइ गोसाञि 'हरि' बले 12/21 देखिया दोँहार चित्ते जन्मिल 14/8 दुइजने खट्मटि लागाय 10/23 देखिया अपूर्व हैला विस्मित 14/47 दुइ प्रकारेते करे 12/47 देउटि धरैन, यबे प्रभु 10/37 दुइ भाइ ताँर मुखे 10/97 देखे, दिव्यलोक आसि' 14/76 न दुइ भाइ-दुइ शाखा 10/8 देवता पूजिते आइल करि' 14/62 दुइ शब्दालङ्कार, तिन 16/72 देवपूजा-छले कैल दुँहे 14/65 दुइ शाखार उपशाखाय 10/10 देवानन्द-चारि भाइ 11/46 नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव 11/48 दुइ शाखार प्रेमफले सकल 10/88 देशे आगमन पुनः, प्रेमेर 17/9 नकुल ब्रह्मचारी-देहे प्रभुर 10/57 दुइ सहस्र वैष्णवेरे नित्य 10/99 देशेर आइला प्रभु शची 16/22 नगरिया पागल कैल सदा 17/209 दुइ स्थाने प्रभु-सेवा 10/122 देह-सम्बन्ध हैते ग्राम 17/148 नगरिया लोके प्रभु यबे 17/121 दुइ हस्ते वेणु बाजाय 17/14 देहरोग, भवरोग,-दुइ 10/51 “नगरे नगरे आजि करिमु 17/133 दुःख कारो मने नहे 14/61 दैवे एकदिन प्रभु पड़िया 15/28 नगरे नगरे भ्रमे कीर्त्तन 13/32 दुःख पाइ' मने आमि 12/39 दैवे वनमाली घटक शची 15/29 नगरे हिन्दुर धर्म बाड़िल 17/193 दुःखित हइला आचार्य 12/23 दोष-गुण-विचारे एइ 16/102 न जानि,-कि खाञा मत्त 17/208 दु-बाहुते दिव्य शङ्ख 13/112 द्वादश प्रबन्ध, ताते 17/328 नदीया-उदयगिरि 13/98 दुर्लभविश्वास, आर 12/59 द्वादश वत्सर शेष रहिला 13/39 नदीयाते गङ्गावास कैल 13/58 दुर्वा, धान्य, गोरोचन 13/114 द्वादशे 'अद्वैतस्कन्ध 17/324 नन्दन-आचार्य-शाखा जगते 10/39 दुर्वा, धान्य, दिल शीर्षे 13/117 द्वारे कपाट,-ना पाइल 17/60 284 | श्रीचैतन्यचरितामृत

नन्द-नृसिंहानन्द ] नन्द-वसुदेव पूर्वे 13/59 | नारायण, कृष्णदास, आर 11/46 | निभृत हओ यदि, तबे 17/176 नन्दिनी, आर कामदेव 12/59 | नारायण-पण्डित एक बड़इ 10/36 | निमाइ बोलाइया तारे 17/213 “नमो नारायण, देह' करह 17/288 | नारायणी-चैतन्येर उच्छिष्ट 8/41 | 'निमाञि' नाम छाड़ि' 17/210 नम्र हञा शिरे धरौं 17/334 | नारायणेर चिह्नयुक्त श्रीहस्त 14/16 | निमाञिपण्डित-स्थाने करह 16/12 नरक भुञ्जिते चाहे जीव 10/42 | नारीगण कहे, - “नारिकेल 14/46 | निमाञि-मुखे रहि' बले 16/90 नरक हइते तोमार नाहिक 17/165 | नारी सब 'हरि' बले 14/22 | निरन्तर कैल ताहे 13/10 नरदेह, सिंहमुख, गर्ज्जये 17/179 | ना लह देवता-सज्ज, ना 14/53 | निरन्तर बाल्यलीला करे 11/39 नरहरि दास, चिरञ्जीव 10/78 | नाहि, नाहि, नाहि, - तिन 17/25 | निरन्तर शुने तैं हो 8/63 नर्त्तक गोपाल, रामभद्र 11/53 | नाहि पड़ि अलङ्कार, करियाछि 16/52 | निरवधि ताँर चित्ते 8/70 नर्त्तक, वादक, भाट 13/106 | निज-गुणामृते बाड़ाय 8/64 | निरवधि मत्त रहे, विवश 9/51 नवद्वीपे आरम्भिला 9/8 | निज तृतीय भाइ करि' 10/96 | निर्मल हृदये भक्ति कराइब 17/266 नवद्वीपे पुरुषोत्तम पण्डित 11/33 | निज निज भावे करेन 17/300 | निर्लोभ गङ्गादास, आर 10/151 नवमेते 'भक्तिकल्पवृक्षर 17/322 | निजाचिन्त्यशक्त्ये माली हञा 9/12 | निवृत्ति-मार्गे जीवमात्र 17/156 नाचिते नाचिते आइला 17/225 | “नित्य रात्रे करि आमि 17/42 | निश्चय करिते नारे साध्य 16/10 नाचिते नाचिते गोपाल 12/22 | नित्यानन्द-गोसाञि प्रभुर 17/116 | निस्तारिते आइलाम आमि 17/262 नाचिल चैतन्यप्रभु 10/46 | नित्यानन्द-चन्द्र बिना नाहि 11/37 | नीलाचले एइसब भक्त 10/122 नाचे, करे सङ्कीर्त्तन 13/103 | नित्यानन्द-नामे याँर 11/33 | नीलाचले चलेन पथे 10/55 ना जानि, कि मन्त्रौषधि 17/202 | नित्यानन्द-नामे हय 11/34 | नीलाचले तैंहो एक पत्रिका 12/29 ना जानि' शास्त्रेर मर्म 17/167 | नित्यानन्दप्रभु नृत्य करे 11/18 | नीलाचले प्रभुसङ्गे सब 10/124 ना दिया वा एइ फल 9/37 | नित्यानन्द प्रभुर प्रिय 11/28 | नीलाचले प्रभुसह प्रथम 10/129 'नाम' दिया भक्त कैल 16/19 | नित्यानन्द-प्रियभृत्य 11/31 | नीलाचले प्रभुस्थाने मिलिल 10/139 नाना द्रव्य पात्र भरि' 13/105 | नित्यानन्द बलिते हय 8/23 | नीलाचले रहि' प्रभुर करेन 10/127 नाना-भावोद्गम देहे अद्भुत 12/21 | नित्यानन्दभृत्य-परमानन्द 11/44 | नीलाचले रहे प्रभुर चरण 10/150 नाना मन्त्र पड़ेन आचार्य 12/24 | नित्यानन्द-लीला-वर्णने 8/48 | नीलाम्बर चक्रवर्त्ती कहिल 13/88 नाम-बले विष याँरे ना 10/75 | नित्यानन्द-सङ्गे नृत्य करे 17/227 | नीलाम्बर चक्रवर्त्ती हय 17/149 नाम-मात्र करि, दोष ना 10/6 | नित्यानन्द-हरिदास धरि' 17/245 | नैवेद्य काड़िया खा'न 14/51 नाम लैते प्रेम देन, बहे 8/31 | नित्यानन्द हैला राम 17/318 | नृत्य, गीत, प्रेमभक्ति 13/35 'नाम-सङ्कीर्त्तन कर' 16/15 | नित्यानन्दावेशे कैल मूषल 17/16 | नृसिंह-आवेश देखि' 17/93 नाम सार्थक हय, यदि 9/7 | नित्यानन्दे आज्ञा दिल 11/14 | नृसिंह-आवेशे प्रभु हाते 17/92 नाम-सूत्रे गाँथि' पर 17/32 | नित्यानन्दे दृढ़ विश्वास 11/25 | नृसिंहचैतन्य, मीनकेतन 11/53 नाम हैते हय सर्वजगत् 17/22 | नित्यानन्देर गण यत 11/21 | 'नृसिंहानन्द' नाम प्रभु 10/58 ना माने चैतन्य-माली 12/67 | नित्यानन्दे समर्पिल जाति 11/27 | नामे स्तुतिवाद शुनि' प्रभुर 17/73 | निभृतनिकुञ्जे बसि' देखे 17/283 | पद्य सूची | 285

[ पञ्च-प्रतिभार प पाइया अमृतधुनी, पिये 13/123 पुनः पुनः कहे श्रीवास 17/236 पाइया मानुष जन्म 13/123 पुनः यदि ऐछे करे 17/256 पञ्च अलङ्कारेर एबे शुनह 16/72 पाञा उपराग-छल 13/100 पुनरुक्तवदाभासे, नहे पुनरुक्त 16/76 पञ्चतत्त्व मिलि' यैछे 17/320 पाकिल अनेक फल 17/81 पुनरुक्तवदाभासे शब्दालङ्कार 16/77 पञ्चदशे 'पौगण्डलीला'र 17/326 पाकिल ये प्रेमफल अमृत 9/27 पुनरुक्ति-भये विस्तारिया 14/96 पञ्च दोष एइ श्लोके पञ्च 16/54 पाछे गुप्ते सेइ विप्रे 14/37 पुरुषोत्तम पण्डित, आर 12/63 पञ्चप्रबन्धे पञ्चवयस चरित 17/329 पाछे चतुर्भुज हैला, तिन 17/14 पुरुषोत्तम ब्रह्मचारी, आर 12/62 पञ्चम वर्षे बालक कहे 12/17 पाछे दुर्मत हैल दैवेर 12/8 पुरुषोत्तम, श्रीगालीम 10/112 पञ्चमे 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्व 17/318 पाछे विस्तार करिब 13/7 "पूर्वजन्मे छिला तुमि 17/108 पण्डित-गोसाञि आदि 17/301 पाछे विस्तारिया ताहार 8/45 पूर्वसिद्ध भाव दुँहार 15/29 पण्डित-गोसाञिर शिष्य 8/68 पाछे सम्प्रदाये नृत्य करे 17/137 पूर्वे आमि छिलाम 17/110 पण्डित-गोसाञिर शिष्य 8/59 पातसाह शुनिले तोमार 17/195 पूर्वे नाम छिल याँर 11/42 पण्डित जगदानन्द प्रभुर 10/21 पापक्षय गेल, हैला परम 17/217 पूर्वे महाप्रभु मोरे करेन 12/39 पण्डित, विदग्ध, युवा 14/55 पाप-तमो हैल नाश 13/98 पूर्वे भाल छिल एइ 17/206 पण्डितेर गण सब 12/89 पाषण्डि-प्रधान सेइ दुर्मुख 17/37 पूर्वे याँर घरे छिला 11/43 पडुया पलाया गेल 17/252 पाषण्डी मारिते याय नगरे 17/92 पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर 11/45 'पडुया बालक कैल मोर 16/89 पाषण्डी संहारि' भक्ति 17/53 पूर्वे येन जरासन्ध-आदि 8/8 पडुया सहस्र याहाँ 17/253 पाषण्डी संहारिते मोर एइ 17/53 पूर्वे यैछे छिला तुमि 17/109 पड़िते आइला स्तवे 17/91 पाषण्डी हासिते आइसे 17/35 पैता छिण्डिया शापे प्रचण्ड 17/62 'पतितपावन' नामेर साक्षी 10/120 पिता करि' याँरे बले 10/30 पौगण्ड-लीलाय लीला 15/32 पत्र पड़िया प्रभुर मने 12/33 पिता माता मारि' खाओ 17/154 पौगण्ड-लीलार सूत्र करिये 15/3 पथ छाड़ि' भागे लोक 17/93 पिता-माताय देखाइल 14/6 पौगण्ड वयस-यावत् 13/26 परम आनन्द पाइल वृक्ष 9/47 पितृकुल, मातृकुल 15/14 पौगण्ड-वयसे पड़ेन, पड़ान 13/28 परमतत्त्व, परब्रह्म, परम 17/106 पितृक्रिया विधिमते ईश्वर 15/24 पौगण्ड-वयसे प्रभुर मुख्य 15/3 परमानन्द गुप्त-कृष्णभक्त 11/45 पीताम्बर, माधवाचार्य, दास 11/52 पौर्णमासीर सन्ध्याकाले 13/89 परमानन्द पुरी, आर केशव 9/13 पुड़िल सकल दाड़ि 17/190 प्रक्षालन करि' कृष्णे 17/82 परमानन्दपुरी, आर स्वरूप 10/125 पुण्डरीक विद्यानिधि 10/14 प्रणतिते ह'बे इहार 17/266 परमानन्द महापात्र, ओड्र पुत्र पाञा दम्पति हैला 13/79 प्रतापरुद्र राजा, आर 10/135 परमेश्वरदास-नित्यानन्दैक 11/29 पुत्र-भृत्य-आदि करि' 10/61 प्रतापरुद्रेर स्थाने दिल 12/29 परिपूर्ण भगवान्-सर्वैश्वर्य 17/108 पुत्रमाता-स्नानदिने 13/118 प्रतिग्रह कभु ना करिबे 12/50 पल दुइ-तिन माठा करेन 10/98 पुत्र लागि' आराधिल 13/73 प्रतिग्रह नाहि करे, ना 10/50 पश्चाते पात्ना उड़ाञा 12/12 पुत्रेर प्रभावे यत 13/120 प्रतिभा, कवित्व तोमार 16/85 पश्चिमरे लोक सब मूढ़ 10/89 पुत्रेर लालन-शिक्षा 14/87 प्रतिभार वाक्य तोमार 16/48 286 | श्रीचैतन्यचरितामृत

प्रति-प्रेम ] प्रति वर्षे प्रभुर गण 10/55 | प्रभु ताँर नाम कैला 10/35 | प्रभुर निन्दाय सबार बुद्धि 17/257 प्रत्यब्दे प्रभुरे देखे 10/128 | प्रभु ताँर पूजा पाञा 14/68 | प्रभुर नृत्य देखि' नृत्य 17/101 प्रथम-चरणे पञ्च 'त' 16/74 | प्रभु ताँरे नमस्करि' 17/269 | प्रभुर पड़ुया दुइ 10/72 प्रथम परिच्छेदे कैलुँ 17/313 | प्रभु तारे कराइल निजरूप 17/231 | प्रभुर भोगसामग्री ये करे 10/25 प्रथमेइ नित्यानन्देर याँर 10/34 | प्रभु तारे प्रेम दिल 17/114 | प्रभुर मध्य-शेष-लीला 13/16 प्रथमे त' आचार्येरे 12/8 | प्रभु तारे प्रेम दिल 17/102 | प्रभुर लीलामृत तँहो 13/50 प्रथमे त' सूत्ररूपे 13/7 | प्रभु तुष्ट हञा साध्य 16/15 | प्रभुर विरह-सर्प लक्ष्मीरे 16/21 प्रथमेते वृन्दावन-माधुर्य 17/235 | 'प्रभु-पादौपाधान' याँर 10/33 | प्रभुर वृत्तान्त द्विज 17/253 प्रथमे षड्भुज ताँरे 17/13 | प्रभु पुनः प्रश्न कैल 17/107 | प्रभुर शाप-वार्त्ता शुने 17/64 “प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' ताँर 10/58 | प्रभुप्रिय गोविन्दानन्द 10/64 | प्रभुर हृदय द्रवे शुनि' 10/49 प्रभु आज्ञा दिल,-“तुमि 16/16 | प्रभु बोले,-“ए लोक 17/177 | प्रभुरे अनेक ग्रन्थ दियाछे 10/65 प्रभु आज्ञा दिल-“याह 17/130 | प्रभु बोलेन,-“आमि 17/145 | प्रभुरे कहेन,-“तोमार ना 12/44 प्रभु-आज्ञाय कर एइ 17/33 | प्रभु बोलेन-तुमि मोर 10/20 | प्रभुरे शान्त करि' आनिल 17/252 प्रभुकण्ठ हैते माला 8/75 | प्रभु यबे काशी आइला 10/153 | प्रभु श्रीवासेरे तोषि' 17/240 प्रभुके मिलिया पाइला 17/12 | प्रभु याँर नित्य लय 10/68 | प्रभु सङ्गे नृत्य करे 17/102 प्रभु कहे,-“आमा' पूज 14/66 | प्रभुर अङ्गे नाचे, डम्बुरु 17/99 | प्रभु-सङ्गे रहे गोविन्द 10/118 प्रभु कहे, आमि 'विश्वम्भर' 9/7 | प्रभुर अतिप्रिय दास 10/69 | प्रभु समर्पिल ताँरे 10/92 प्रभु कहे,-"एक दान 17/221 | प्रभुर अत्यन्त प्रिय 10/29 | प्रभु-स्थाने निवेदिल 17/129 प्रभु कहे,-“एकादशीते 15/9 | प्रभुर अनन्त-लीला 16/18 | प्रभुस्थाने याइते सबे 10/54 प्रभु कहे,-“कह श्लोकेर 16/45 | प्रभुर अभिषेक तबे 17/11 | प्रभु हासि' कैला,-“तुमि 17/110 प्रभु कहे,-'कुलीनग्रामेर 10/82 | प्रभुर आज्ञाते तँहो 10/108 | प्रवृत्ति-मार्गे गोवध 17/157 प्रभु कहे,-"गोदुग्ध 17/153 | प्रभुर आज्ञा पाञा 10/157 | प्रसङ्गे करिल एइ 17/310 प्रभु कहे,-"तोमा-सबाके 14/54 | प्रभुर आज्ञाय नित्यानन्द 10/117 | प्रसन्न हइल सब 13/95 प्रभु कहे,-"देवेर वरे 16/44 | प्रभुर आविर्भाव-पूर्वे यत 13/63 | प्रसन्न हैल दशदिक् 13/97 प्रभु कहे,-"प्रश्न लागि' 17/152 | प्रभुर उपरे यँहो कैल 10/31 | प्रहरेक महाप्रभुर चरित्र 10/100 प्रभु कहे,-“बाउलिया 12/49 | प्रभुर कहिल एइ जन्मलीला 14/3 | प्रह्लाद-समान ताँर गुणेर 10/45 प्रभु कहे,-"माता, मोरे 15/8 | प्रभुर कीर्त्तनीया आदि 10/64 | प्राणवल्लभ-सबार 12/89 प्रभु कहे,-“वेदे कहे 17/159 | प्रभुर कृपाय तँहो 10/158 | प्रातःकाले भक्त सबे 17/246 प्रभु कहे,-"व्याकरण 16/33 | प्रभुर गम्भीर वाक्य 12/54 | प्रातःकाले श्रीवास ताहा 17/40 प्रभु कहेन,-“अतएव 16/51 | प्रभुर गुप्तसेवा कैल 10/92 | प्राते आसि' प्रभुपदे लइल 16/107 प्रभु कहेन,-"कहि, यदि 16/47 | प्रभुर चरण धुँइ बोले 17/219 | प्रेम दिते, कृष्ण दिते 11/59 प्रभु कहेन,-“कहि, शुन 16/53 | प्रभुर चरण धरि' वक्रेश्वर 10/18 | प्रेम-नाम प्रचारिया 13/36 प्रभु कृपा कैल, ताँर 16/107 | प्रभुर चरणे यदि आज्ञा 8/75 | प्रेम-फल-फूल करे 10/79 पद्य सूची | 287

[ प्रेमफल-भर्त्सना

प्रेमफलास्वादे लोक10/88बड़ भाग्यवान् तुमि, बड़17/218बाहिरे भर्त्सन करे करि'14/56
प्रेम-फूल-फले भरि'11/6बड़ हरिदास, आर छोट10/147बाहिरे याञा आनिलेन14/47
प्रेमभक्ति दिया तेंहो17/297बड़ हैले नीलाचले गेला10/156बाहिरे हासिया किछु12/33
प्रेमभक्ति लओयाइल13/38बत्रिंश लक्षण-महापुरुष14/14बिलाइल यारे तार8/21
प्रेमार्णव-मध्ये फिरे11/28बन्धु-बान्धव आसि' दुँहा15/24बिलाय चैतन्यमाली, नाहि9/27
प्रेमावस्था शिखाइला13/39बन्धु-बान्धव-स्थाने स्वप्न14/92बूढ़ा भर्त्ता हवे, आर14/58
प्रेमे नृत्य करे, हैल17/232बलदेव-प्रकाश-परव्योमे13/75बोलाइला कमलाकान्ते12/46
प्रेमे मत्त लोक बिना9/52'बल' 'बल' बोले प्रभु17/239ब्रह्मशाप हैते तार हय17/64
प्रेमेर उदये हय प्रेमेर8/27बलभद्र भट्टाचार्य-भक्ति10/146ब्रह्मानन्द पुरी, आर9/13
प्रेमेर कारण भक्ति करेन8/26बलराम दास-कृष्णप्रेम11/34ब्रह्मा-शिव-शेष याँर17/331
प्रीत्ये करिते चाहे प्रभुरे10/22बलिते ना पारे किछु17/107'ब्राह्मण-पत्नीर भर्त्ता16/65
बसाइला तारे प्रभु आदर16/30ब्राह्मण मारिते चाहे17/255
बसियाछेन गङ्गातीरे विद्यार16/28ब्राह्मण-ब्राह्मणी आनि'14/20
बसियाछेन सुखे प्रभु14/73ब्राह्मण-सज्जन-नारी13/104
बहु जन्म करे यदि8/16
फल-फूल दिया करि'9/44बहु यत्न कैला कृष्ण17/291
फलास्वादे मत्त लोक9/48बहुशास्त्रे बहुवाक्ये चित्ते16/11
फले-फुले बाड़े,-शाखा12/7'बृहत् सहस्रनाम' पड़17/90
फाड़िमु तोमार बुक17/181बाइश घड़ा जल दिने10/144
फाल्गुनपूर्णिमा-सन्ध्याय13/20बाउलिया 'विश्वासे' एथा12/36भङ्गी करि' ज्ञानमार्ग करिल17/67
फिरि' गेल विप्र घरे मने17/61बाटी भरि' दिया बले14/24भक्तगण लञा कैल विविध17/7
बाड़िया पश्चिमदेशे सब10/86भक्तगण लञा कैला13/34
बाड़िया व्यापिल सबे9/33भक्तगणे प्रभु नाम-महिमा17/72
बारमास ताहा प्रभु करेन10/27भक्तिकल्पतरुर तेंहो प्रथम9/10
बालकेर दिव्य ज्योति13/116भक्ति-कल्पतरु रोपिला9/9
बाल्य, पौगण्ड, कैशोर13/18भक्तिर महिमा ताहाँ करिल17/74
बाल्यभाव-छले प्रभु करेन13/23भक्ते कृपा करेन प्रभु10/56
बङ्गवाटी-चैतन्यदास12/85बाल्यभाव प्रकटिया पश्चात्14/36भक्ष्य, भोज्य, उपहार13/115
बड़ शाखा, उपशाखा, तार9/23बाल्यभावे छत्र-तनु हइल14/64भगवान् आचार्य10/136
बड़शाखा एक,-सार्वभौम10/130बाल्यलीलाय आगे प्रभुर14/6भये पलाय पड़ुया, प्रभु17/251
बड़ शाखा-गदाधर पण्डित10/15बाल्यलीला-सूत्र एइ कहिल14/95भर्त्सन-ताड़न कर14/85
बड़ बड़ लोकेर आनिल17/41बाल्य वयस-यावत् हाते13/26भर्त्सना-ताड़ने काके17/27
बाल्यशास्त्रे लोके तोमार16/31

288 | श्रीचैतन्यचरितामृत

भवभूति-मिश्र ] भवभूति, जयदेव आर 16/101 भवानी-पूजार सब सामग्री 17/38 भवानीभर्त्तुः'-शब्द दिले 16/62 भवानी-शब्दे कहे 16/63 भव्यलोक पाठाइया काजी 17/143 भागवताचार्य, आर 12/58 भागवताचार्य, चिरञ्जीव 10/119 भागवताचार्य, ठाकुर 10/113 भागवताचार्य, हरिदास 12/79 भागवती देवानन्द वक्रेश्वर 10/77 भागवते कृष्णलीला वर्णिला 11/55 भागवतेर भक्ति-अर्थ 10/77 भागवते यत भक्तिसिद्धान्तेर 8/37 भागिना, मुइ कुष्ठव्याधिते 17/48 भागिनार क्रोध मामा 17/150 भाग्य मोर, -तुमि-हेन 17/147 भाग्यवन्त दिग्विजयी 16/108 भारतभूमिते हैल मनुष्य 9/41 भारती कहेन, - 'तुमि 17/271 भालमते विचारिले जानि 16/48 “भाल हैल,-विश्वरूप संन्यास 15/14 भासाइल त्रिजगत् कृष्ण 10/161 भासाइल त्रिभुवन प्रेमभक्ति 13/32 भिक्षा कराइया ताँरे कैल 17/269 भितरेर अर्थ केह बुझिते 17/151 भीत देखि' सिंह बले 17/183 भूगर्भ गोसाञि, आर 12/81 भूमिते पड़िला प्रभु 15/16 भूमिते पड़िल, देहे 12/22 भेद जानिवारे करि 12/11 भ्रमिते भ्रमिते प्रभु 17/139 म मङ्गलचण्डी, विषहरि 17/205 मथुरा-गमने प्रभुर 10/146 मदनगोपाले गेलाङ आज्ञा 8/73 मदमत्त-गति बलदेव 17/118 मद्यभाण्ड-पाशे धरि' 17/40 'मधु आन', 'मधु आन' 17/115 मधुपान, रासोत्सव 17/238 मधुर करिया लीला 13/48 मधुर-वचन, मधुर-चेष्टा 8/55 'मध्य'-'अन्त्य'-नामे 13/14 मध्यमूल परमानन्द पुरी 9/16 मध्ये नाचे आचार्य 17/136 मन दुष्ट हइले नहे 12/51 मनुष्य ठेलि' पथ करे 10/142 मनुष्ये रचिते नारे 8/39 मल्लिकार माला दिया 14/67 महाकृपापात्र प्रभुर जगाइ 10/120 महा-गुणवान् तेंह 13/74 महापुरुषेर चिह्न, लग्ने 13/121 महाप्रभु एइ दुइ दिला 11/14 महाप्रभु ताहा याइ' 17/272 महाप्रभुर प्रिय भृत्य 10/91 महाप्रभुर लीला यत बाहिर 10/97 महाभागवत यदुनाथ 11/35 महाभागवत-श्रेष्ठ दत्त 11/41 महा-महा-शाखा छाइल 9/18 महामादक प्रेमफल पेट 9/49 महा-योगपीठ ताँहा 8/50 महाशाखा-मध्ये तेंहो 12/87 महेश-आवेश हैला 17/100 महेश पण्डित-व्रजेर 11/32 महेश पण्डित, श्रीकर 10/111 महोत्सव कर, सब बोलाह 14/18 मागे वा ना मागे केह 9/29 माटि काड़ि' लञा बले 14/26 “माटि खाइते ज्ञानयोग के 14/30 माटि खाइले रोग हय 14/31 माटि-देह, माटि-भक्ष्य 14/29 माटि-पिण्डे धरि यबे 14/32 माटिर विकार अन्न खाइले 14/31 माटिर विकार घटे पानि 14/32 माताके कहिओ कोटि 15/21 माताके मूर्च्छिता देखि' 14/45 माता-पुत्र दुँहार बाड़िल 15/23 माता बले, -“ताइ दिब 15/9 मातिल सकल लोक-हासे 9/49 मातुलेर अपराध भागिना 17/150 मातृ-आज्ञा पाइया प्रभु 14/77 माधव, वासुदेव घोषेर 11/15 माधवीदेवी-शिखि 10/137 माधुर्य राधा-प्रेमरस 17/276 मालाकार कहे, -शुन 9/31 मालाकारेर इच्छा-जले 11/6 मालि-दत्त जल अद्वैत 12/66 माली मनुष्य आमार नाहि 9/44 मालीर इच्छाय शाखा बहुत 10/86 माली हञा वृक्ष हइलाङ 9/45 मिश्र कहे, -“एइ बड़ 14/79 मिश्र कहे, -“देव, सिद्ध 14/86 मिश्र कहे, -“पुत्र केने 14/89 मिश्र कहे, -“बालगोपाल 14/9 मिश्र कहे शचीस्थाने 13/81 पद्य सूची | 289

[ मिश्र-ये

मिश्र जागिया हइला परम 14/91 “मिश्र, तुमि पुत्रेर तत्त्व 14/85 मिश्र बोले,—'किछु हउक् 14/82 मिश्र-वैष्णव, शान्त 13/120 मिश्रेरे कहये किछु सरोष 14/84 मुकुन्द, काशीनाथ, रुद्र 10/106 मुकुन्ददत्त,-एइ तिन 17/273 मुकुन्द-दत्तेरे कैल दण्ड 17/65 मुकुन्दानन्द चक्रवर्ती, प्रेमी 8/69 मुक्ति-श्रेष्ठ करि' कैनु 12/40 मुखे ना निःसरे वाक्य 16/87 मुख्यमुख्यलीला सूत्रे 13/46 मुख्य मुख्य शाखागणेर 9/20 मुञि बड़ दुःखी, मोरे 17/49 मुञि संहारिमु आजि 17/130 मुरारिके कहे प्रभु 17/77 मुरारिगुप्त-मुखे शुनि' 17/69 मुरारि-चैतन्यदासेर 11/20 मूक कवित्व करे 8/5 मूर्ख, नीच, क्षुद्र मुञि 8/83 मूलशाखा-उपशाखा यतेक 9/31 मूलस्कन्धेर शाखा आर 9/26 मृतपुत्र-मुखे कैल 17/229 मृदङ्ग-करताल-शब्दे 17/207 मृदङ्ग-करताल सङ्कीर्त्तन 17/123 मृदङ्ग भाङ्गिया लोके 17/125 मोर कीर्त्तन माना करिस् 17/182 मोर बुके नख दिया 17/181 मोरे आज्ञा करिला सबे 8/72 'मोरे ना मानिले सब 8/10 मोरे निन्दा करे ये 17/264 म्लेच्छ कहे, -हिन्दुरे 17/198

'यत अध्यापक, आर ताँर 17/260 यत उपजिल शाखा के 9/19 यत नर्त्तक, गायन 13/109 यत यत भक्तगण वैसे 17/334 यत यत महान्त कैला 10/5 यथा तथा भक्तगण 17/18 यथार्थ कहिबे, छले ना 17/172 “यदि नैवेद्य ना देह 14/58 यदि पुनः ऐछे नाहि 17/58 यदि वा तार्किक कह 8/14 यदु गाङ्गुलि आर 12/86 यदुनाथ, पुरुषोत्तम, शङ्कर 10/80 यद्यपि एइ श्लोके आछे 16/68 यमुनाकर्षण-लीला 17/117 यवन-ताड़नेओ याँर 10/45 यशोदानन्दन यैछे हैल 14/3 यशोदानन्दन हैला शचीर 17/275 याँर अन्न मागि' काड़ि' 10/38 याँर कृष्णसेवा देखि' 10/107 याँर गृहे महाप्रभुर सदा 10/10 याँर घरे दानकेलि कैल 11/17 याँर घरे देवी-भावे नाचिला 10/13 याँर देहे कृष्ण पूर्वे 10/69 याँर देहे रहे कृष्ण 11/40 याँर नाम लञा प्रभु 10/14 याँर पिता 'नीलाम्बर' 13/60 याँर फुटा-लोहपात्रे प्रभु 10/68 याँर मुखे बाहिराय ऐछे 16/99 याँर सङ्गे नित्यानन्द 11/23 याँर सेवक-रघुनाथ, रूप 8/80 याँर स्मृते सिद्ध हय 8/84

याँ-सबार कीर्त्तने नाचे 10/115 याँ-सबा-स्मरणे पाइ 12/91 याँ-सबा-स्मरणे भवबन्ध 12/90 याँ-सबा-स्मरणे हय 12/91 याँहा ताँहा प्रेमफल 9/36 याँहा ताँहा सर्वलोक करये 13/82 याँहा याय, ताँहा लओयाय 16/8 याँहार अवधि ना पाय 11/60 याँहार कीर्त्तने नाचे चैतन्य 10/40 याँहार दर्शने कृष्णप्रेमभक्ति 11/22 याँहार प्रसादे इय अभीष्ट 11/12 याँहार मिलने प्रभु 131 याँहार श्रवणे नाशे 8/35 याँहार स्मरणे हय सर्वबन्ध 10/29 याँहार हृदये नृत्य करे 11/35 याँहा-सने प्रभु करे नित्य 10/67 याते जानि कृष्णभक्ति 8/36 यादवदास, विजयदास 12/61 यादवाचार्य गोसाञि श्रीरूपेर 8/67 यारे कृपा कैल बाल्ये 10/70 यारे देखे, तारे कहे 13/30 यारे देखे, तारे दिया 11/58 यारे सङ्गे लैया कैल 10/145 या शुनि' दिग्विजयी कैल 16/27 याहाँ ताहाँ प्रभुर निन्दा 17/258 याहार श्रवणे भक्तेर बहे 10/28 याहार श्रवणे शुद्ध कैल 8/42 युगधर्म-कृष्णनाम-प्रेम 17/316 येइ दुइ आसिं कैल 12/81 येइ पेयादा याय, तार 17/190 येइ याँहा ताँहा दान 9/48 येइ येइ अंशो कहे 17/332 ये कहे, से करिब 17/271

290 | श्रीचैतन्यचरितामृत

ये-वर्णिते ] ये किछु करिल इहाँ 16/109 राढ़े याँर जन्म कृष्णदास 11/36 “लग्न गणि' पूर्वे आमि 14/13 ये कीर्त्तन प्रवर्त्ताइल 17/204 रात्र-दिने प्रेमे नृत्य 13/31 लग्न गणि' हर्षमति 13/121 ये कृष्णैरे कराइला 17/292 रात्रिदिने राधाकृष्णेर मानस 10/100 लघु-गुरु-भाव ताँर ना 10/4 ये तोमा' देखिल, तार 17/97 रात्रि-दिवसे कृष्णविरह 13/40 लज्जित हइला प्रभु जानि' 14/44 ये दण्ड पाइल भाग्यवान् 12/41 रात्रे निद्रा नाहि याइ 17/209 लज्जित हइया प्रभु प्रसाद 17/68 ये दण्ड पाइल श्रीशची 12/42 रात्रे श्रीवासेर द्वारे स्थान 17/38 ललाटे लिखिल ताँर 'रामदास' 17/69 येन काँचा-सोना-द्युति 13/104 रात्रे सङ्कीर्त्तन कैल एक 17/34 लागिल ये प्रेमफल 9/26 येबा अवशिष्ट, आगे 10/47 रात्रे स्वप्न देखे,—एक 14/84 लिखित ग्रन्थेर यदि करि 17/311 ये ये पूर्वे निन्दा कैल 9/53 राधा देखि' कृष्ण ताँरे 17/290 लिखियाछेन इँहा जानि' 8/37 ये ये लैल श्रीअच्युतानन्देर 12/73 राधाभाव अङ्गीकार करियाछे 17/276 लुकाइते नारिल, ताहे 17/285 ये व्याख्या करिल, से 16/90 राधार विशुद्ध-भावेर 17/292 लुकाञा लागिला शिशु 14/25 ये से बड़ हउक्, एबे 14/86 रामदास अभिराम—सख्य 10/116 लुकाइया दुइ प्रभुर याँर 10/39 ये हओ, से हओ तुमि 17/114 रामदास, कविदत्त 10/113 लुकाइला दुइ भुज राधार 17/291 यौतुक पाइल यत 13/109 रामदास-मुख्यशाखा, सख्य 11/16 लोकनाथ पण्डित, आर मुरारि 12/64 यौवन-प्रवेशे अङ्गेर अङ्ग 17/5 रामभद्राचार्य, आर ओढ़ लोक-भय देखि' प्रभुर 17/94 यौवन-लीलार सूत्र करि 17/3 रामाइ-नन्दाइ-दोँहे प्रभुर 10/143 “लोक भय पाय,—मोर 17/95 रामानन्द राय, पट्टनायक 10/133 लोक लज्जा हय, धर्म-कीर्त्ति 12/52 रामानन्द वसु, जगन्नाथ 11/48 लोक सब उद्धारिते तोमार 17/49 रामानन्द-सह मोर देह 10/134 लोके ख्याते यँहो सत्थामार 10/21 र रुक्मिण्यादि-रूप प्रभु 17/241 लोकेर निस्तार-हेतु करेन 13/68 रूप-सनातन-सङ्गे याँर 10/105 रक्त-पीतवर्ण,—नाहि अष्ठि 17/83 रक्षा करे नृसिंहरे 12/23 रघुनाथ बाल्ये कैल प्रभुर 10/155 व रघुनाथ भट्टाचार्य-मिश्रेर 10/153 ल रघुनाथ वैद्य, आर 10/126 रघुनाथ वैद्य उपाध्याय 11/22 वंशीवाद्ये गोपीगणेर वने 17/237 'रत्नबाहु' बलि' प्रभु 10/66 लओयाइल सर्वलोके 13/33 वक्रेश्वर पण्डित-प्रभुर बड़ 10/17 राघव-पण्डित-प्रभुर आद्य 10/24 लक्ष्मी चित्ते सुख पाइल 14/63 वनमाली आचार्य देखे 17/119 राघव लइया या'न गुप्त 10/26 लक्ष्मी ताँर अङ्गे दिल 14/67 वनमाली कविचन्द्र, आर 12/63 'राघवेर झालि' बलि' 10/27 'लक्ष्मीरिव' अर्थालङ्कार 16/78 वनमाली पण्डित शाखा 10/73 राजसेवा हय ताँहा 8/52 'लक्ष्मीर समता' अर्थ 16/60 वराह-आवेशे हैला मुरारि 17/19 राढ़देशे जन्मिला ठाकुर 13/61 लक्ष्मीर विवाह कैल शचीर 15/30 वर्णना करेन वैष्णव 13/17 वर्णिते वर्णिते ग्रन्थ हइल 8/46 पद्य सूची | 291

[ वल्लभ-व्रजेन्द्र वल्लभचैतन्यदास 12/82 | 'विरुद्धमति'-कृत नाम 16/62 | वृन्दावनदास इहा चैतन्य 17/330 वल्लभाचार्येर कन्या देखे 15/28 | विरुद्धमति', 'भग्नक्रम' 16/55 | वृन्दावन-दास कैल 8/44 वसन्तकाले रासलीला 17/282 | 'विरुद्धमति'-शब्द शास्त्रे 16/64 | वृन्दावन-दास कैल 8/35 वसन्त, नवनी होड़, गोपाल 11/50 | विरोधाळङ्कार इहार महा 16/80 | वृन्दावनदास-नारायणीर नन्दन 11/54 वस्तुतः सरस्वती अशुद्ध 16/97 | विवाह करिले हैल नवीन 13/27 | वृन्दावनदास-पदे कोटि 8/40 वस्त्र-गुप्त दोला चड़ि' 13/114 | विविध औद्धत्य करे 16/7 | वृन्दावन-दास मुखे वक्ता 8/39 वाणीनाथ बसु आदि यत 10/81 | विश विश शाखा करि' 9/18 | वृन्दावन-दासेर पादपद्म 8/81 वाणीनाथ ब्रह्मचारी-बड़ 12/82 | विशेषे सेवन करे 13/79 | वृन्दावन-मथुरादि यत 10/87 वात्सल्य, दास्य, सख्य 17/296 | 'विश्वम्भर' नाम इहार 14/19 | वृन्दावनवासी भक्तेर 8/49 वाद्यगीत-कोलाहल, सङ्गीत 17/173 | विश्वम्भरेर कुशल हउक् 14/82 | वृन्दावने कल्पद्रुमे सुवर्ण 8/50 वायुव्याधि-छले कैल प्रेम 17/7 | विश्वरूप शुनि' घर छाड़ि' 15/12 | वृन्दावने कैल श्रीमूर्त्ति-पूजार 10/90 वाराणसी-मध्ये प्रभुर भक्त 10/152 | विश्वासेरे कहे,-"तुमि 12/38 | वृन्दावने दुइ भाइर चरण 10/94 वासुदेव-गीते करे प्रभुर 11/19 | विषयीर अन्न खाइले 12/50 | वृष अन्न उपजाय, ताते 17/153 वासुदेव दत्त-प्रभुर भृत्य 10/41 | विषये निमग्न लोक 13/67 | वेदधर्म करि' करे विष्णुर 8/8 वासुदेव दत्तेर तेंहो कृपार 12/57 | विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द 11/50 | वेदधर्मातीत हञा 11/9 विचार करिले कवित्व 16/86 | विष्णुदास, नन्दन 11/43 | वेद-पुराणे आछे हेन 17/160 विचार करिले चित्ते पाबे 8/15 | विष्णु-नैवेद्य खाइल 14/39 | वेदमन्त्रे सिद्ध करे ताहार 17/161 विचार-समय ताँर बुद्धि 16/97 | विष्णुपादोत्पत्ति-'अनुमान' 16/83 | वैयाकरण तुमि, नाहि पड़ 16/50 विचारिया कहे काजी 17/168 | विष्णु पुरी, केशव पुरी 9/14 | वैराग्य-लोक-भये प्रभु ना 10/22 विचारिया गुण-दोष 16/51 | विष्णुर नैवेद्य मागि' 10/71 | वैष्णव खायेन फल,-प्रभुर 17/86 विजय आचार्येर घरे 17/246 | विस्तार देखिया किछु 8/47 | वैष्णव, पण्डित, धनी 13/56 विजय पण्डित, आर पण्डित 12/65 | विस्तारि' कहिब आगे 10/60 | वैष्णवाज्ञा-बले करि 8/83 विद्यापति, जयदेव 13/42 | विस्तारिया वर्णिला ताहा 15/31 | वैष्णवेर आज्ञा पाञा चिन्तित 8/73 विद्या-बले पाइल 16/108 | विस्तारि' वर्णियाछेन 13/47 | वैष्णवेर गुणग्राही, ना देखये 8/62 विद्या-बले सबा जिनि' 16/24 | विस्तारि' वर्णियाछेन 17/138 | "व्याकरण पड़ाह, निमाञि 16/31 विद्यार औद्धत्य काहाँ 17/6 | विस्तारि' वर्णिला 17/330 | व्याकरण-मध्ये, जानि 16/32 विद्यार प्रभाव देखि' चमत्कार 16/9 | विस्तारि' वर्णिला इहा 17/142 | व्याकरणे दुइ शिष्य 10/72 'विधेय' आगे कहि' पाछे 16/57 | विस्तारि वर्णिला इहा दास 17/274 | व्याख्या शुनि' सर्वलोकेर 16/5 विनयभङ्गीते कारो दुःख 16/6 | विस्मिता हइया माता 14/75 | व्याघ्र-गाले चड़ मारे 11/20 विप्र कहे,-"एइ यदि 14/88 | विस्मित हञा दिग्विजयी 16/42 | व्याघ्रनख हेमजड़ि 13/113 विप्र कहे,-"श्लोके नाहि 16/46 | वृक्षर द्वितीय स्कन्ध-आचार्य 12/4 | व्याधि-छले जगदीश 14/39 'विभवति' क्रियर वाक्य 16/66 | वृन्दावन-दास इहा 17/138, 16/26, | व्रजवासी वैष्णवेरे आलिङ्गन 10/101 विरह-सर्प-विषे ताँर 16/21 | 15/32 | व्रजेन्द्रनन्दन बिना अन्यत्र 17/278 292 | श्रीचैतन्यचरितामृत

ब्रजेन्द्र-श्लोकेर ] ब्रजेन्द्रनन्दने कहे 'प्राणनाथ' 17/303 शास्त्रदृष्टे कैल लुप्ततीर्थेर 10/90 शुनिया पड़ुया ताहाँ अर्थवाद 17/72 ब्रजेन्द्रनन्दने माने आपनार 17/277 “शास्त्रेर विचार भाल-मन्द 16/94 शुनिया प्रभुर चित्ते आनन्द 17/235 शिरे धरि वन्दों, नित्य 17/336 शुनिया प्रभुर दण्ड आचार्य 12/37 शिवपत्नीर भर्त्ता'—इहा 16/64 शुनिया प्रभुर मन प्रसन्न 12/48 शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत 11/49 शुनिया प्रभुर वाक्य दिग्विजयी 16/87 श शिवानन्द-सम्बन्धे प्रभुर 10/63 शुनिया पाइला आचार्य 12/17 शिवानन्द सेन—प्रभुर भृत्य 10/54 शुनिया ब्राह्मण गर्वे वर्णिते 16/36 शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास 11/52 शिवानन्देर उपशाखा—ताँर 10/61 शुनिया मुरारि श्लोक कहिते 17/77 शङ्करारण्य-आचार्य-वृक्षेर 10/106 शिशुगण लये पाड़ा-पड़सीर 14/40 शुनिया ये क्रु शङ्खचक्रगदापद्म-शार्ङ्ग 17/13 शिशुगणे मिलि' कैल विविध 14/23 शुनिया सकल लोक विस्मित 14/92 शची आसि' कहे,—“केने 14/74 शिशुद्वारे कैल मोरे एत 16/96 शुनिया सन्तुष्ट हैल पिता 15/15 शची कहे,—“आर एक 14/80 'शिशुद्वारे देवी मोरे करिल 16/95 शुनिलुँ फाँकिते तोमार 16/32 शची कहे,—“ना खाइब 15/10 शिशुर शून्यपदे केने नूपूरेर 14/79 शुनि' शची पुत्रे किछु 14/41 शची कहे,—“मुञि देखों 13/83 शिशुसब शची-स्थाने कैल 14/41 शुनि' शची-मिश्रेर दुःखी 15/13 शचीके प्रेमदान, तबे अद्वैत 17/10 शिष्यगण पड़ाइते करिला 16/4 शुनि' शची-मिश्रेर मने 14/20 शची-जगन्नाथे देखि' देन 14/71 शिष्यगण लज्जा पुनः विद्यार 16/24 शुनि' सब म्लेच्छ आसि' 17/192 शची बले,—“याह, पुत्र 14/77 शिष्य, प्रशिष्य, आर उपशिष्य 9/24 शुनि' सब लोक तबे 16/39 शची-मिश्रेर पूजा लञा 13/118 शिष्येते ना बुझे, आमि 16/33 शुनि' स्तब्ध हैल काजी 17/168 शचीर इङ्गिते सम्बन्ध करिल 15/30 शिष्येर प्रतीत हय 13/29 शुद्ध वात्सल्य मिश्रेर, नाहि 14/90 शत दुइ फल प्रभु शीघ्र 17/82 शिष्येर समान मुञि ना 16/103 शूकर चराय डोम, सेइ 10/83 शत शत पड़ुया आसि 16/9 शुकाइया मरे, तबु जल 17/28 शेष अष्टादश वर्ष 13/37 शत शत शिष्यसङ्गे सदा 16/5 शुक्लाम्वर-ब्रह्मचारी बड़ 10/38 शेष-लीला शुनिते सबार 8/71 शत-श्लोकेर एक श्लोक 16/40 शुन, गौरहरि, एइ प्रश्नेर 17/176 शेषे अवतीर्ण हैला 13/62 शब्द शुनिलेइ हय द्वितीय 16/65 शुनि' क्रु शैशव-चापल्य किछु ना 16/103 शब्दालङ्कारे—तिनपदे आछे 16/73 शुनि' क्रोध कैल सब 17/254 श्याम-अङ्ग पीतवस्त्र 17/15 शयने आमार उपर लाफ 17/180 शुनि' चमकित हैल पिता 14/78 श्यामसुन्दर, शिखिपिच्छ 17/279 शाखार उपरे हैल वृक्ष-दुइ 9/21 शुनि' देखि' सर्वलोक 17/187 श्लोक पड़ि' ताँर भाव 14/68 शाखार उपशाखा, तार 12/77 शुनि' प्रभु क्रोधे कैल कृष्णे 17/250 श्लोकेर अर्थ कैल विप्र 16/45 शाखा-श्रेष्ठ ध्रुवानन्द, श्रीधर 12/79 शुनि' प्रभु 'बल' 'बल' 17/234 शाप शुनि' महाप्रभुर हइल 17/63 शुनि प्रभु 'हरि' बलि' उठिला 17/223 “शापिब तोमारे मुञि 17/62 शुनिब तोमार मुखे शास्त्रेर 16/104 शालग्राम सेवा करे 13/86 शुनिया आविष्ट हैला प्रभु 17/91 शास्त्र-आज्ञाय वध कैले 17/157 शुनिया कहिल प्रभु बहुत 16/37 पद्य सूची | 293

[ श्रवण-षोल श्र श्रवण-मात्रे कण्ठे कैल १५/५ श्रीईश्वरपुरी-रूपे अङ्कुर ९/११ श्रीकृष्णचैतन्य, अद्वैत १७/३३३ श्रीकृष्णचैतन्य-दया करह ८/१५ श्रीकृष्णचैतन्य नवद्वीपे १३/८ श्रीकृष्णचैतन्यलीला १७/३३१ श्रीगदाधरदास-शाखा १०/५३ श्रीगदाधर पण्डित-उपशाखा १२/७८ श्रीगोपाल-नामे आर १२/१९ श्रीगोपालभट्ट-एक शाखा १०/१०५ 'श्रीगोविन्द-देव' नाम ८/५१ श्रीगोविन्द-नाम ताँर १०/१३८ श्रीगौरीदास पण्डिते प्रेमोद्दण्ड ११/२६ श्रीचन्द्रशेखर वैद्य, द्विज १०/११२ श्रीचैतन्य-नित्यानन्द १३/१२४ श्रीचैतन्य-नित्यानन्दे करि' ११/२७ श्रीचैतन्य मालाकार पृथिवीते ९/९ श्रीचैतन्य-माली कैला १७/३२२ श्रीचैतन्येर अति प्रिय १०/७४ श्रीजगदीश पण्डित हय ११/३० श्रीजीव, गोपालभट्ट ९/४ श्रीजीव पण्डित नित्यानन्द ११/४४ श्रीधरेर लौहपात्रे कैल १७/७० श्रीनाथ चक्रवर्ती, आर १२/८३ श्रीनाथ पण्डित-प्रभुर १०/१०७ श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द १०/११० श्रीनित्यानन्द-पद बिना ११/४७ श्रीनित्यानन्द-वृक्षर स्कन्ध ११/५ श्रीनित्यानन्देर तेंहो ११/३६ श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त १०/११० श्रीनृसिंह-उपासक-प्रद्युम्न १०/३५ श्रीनृसिंह तीर्थ, आर ९/१४ श्रीपति, श्रीनिधि-ताँर १०/९ श्रीपुरुषोत्तमदास-ताँहार ११/३८ श्रीमन्त, गोकुलदास ११/४९ श्रीमाधव घोष-मुख्य ११/१८ श्रीमाध्वाचार्य, कमलाकान्त १०/११९ श्रीमान्पण्डित शाखा १०/३७ श्रीमान् सेन प्रभुर सेवक १०/५२ श्रीमुकुन्द-दत्त शाखा १०/४० श्रीमुरारि गुप्त-शाखा १०/४९ श्रीयदुनन्दनाचार्य-अद्वैतेर १२/५६ 'श्रीयुत लक्ष्मी' अर्थे १६/७७ श्रीरघुनाथदास, आर १७/३३५ श्रीराधार दासीमध्ये याँर १०/१३७ श्रीराधार प्रलाप यैछे १३/४१ श्रीरामदास आर, गदाधर ११/१३ श्रीरामदास, माधव, आर १०/११८ श्रीरूप-रघुनाथ-चरणेर एड् ८/८४ श्रीरूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ ९/४ 'श्रीलक्ष्मी'-शब्दे १६/७३ श्रीवत्स पण्डित, ब्रह्मचारी १२/६२ श्रीवल्लभसेन, आर सेन १०/६३ श्रीवास कहेन तबे रास १७/२३९ श्रीवास कहे,-'वंशी १७/२३३ श्रीवास-गृहेते गिया गदा १७/९४ श्रीवास पण्डित आर १०/८ "श्रीवास पण्डितेर स्थाने आछे १७/५७ श्रीवास-पुत्रेरे ताँहा हैल १७/२२८ श्रीवास बलेन,-'ये १७/९६ श्रीवास वर्णन वृन्दावन १७/२३४ श्रीवासादि गदाधरादि यत १७/३३३ श्रीवासादि यत महाप्रभुर १७/३०० श्रीवासे कराइलि तुइ भवानी १७/५२ श्रीवासे कहेन प्रभु करिया १७/९५ श्रीवासेर ब्राह्मणी १३/११० श्रीवासेर वस्त्र सिये दरजी १७/२३१ श्रीवासेरे दुःख दिते नाना १७/३६ श्रीविजयदास-नाम प्रभुर १०/६५ श्रीवीरभद्र गोसाञि-स्कन्ध ११/८ श्रीशची-जगन्नाथ १३/५४ श्री'-शब्दे, 'लक्ष्मी'-शब्दे १६/७६ श्रीशिखि माहिति, आर १०/१३६ श्रीसदाशिव कविराज-बड़ ११/३८ श्रीस्वरूप-श्रीरूप १७/३३५ श्रीहट्ट-निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र १३/५६ श्रीहरि आचार्य, दास-पुरिया १२/८४ श्रीहरिचरण, आर माधव १२/६४ श्रीहर्ष, रघुमिश्र, पण्डित १२/८५ शृङ्ग-वेत्र-गोपवेश, शिरे ११/२१ ष षड्वर्ग, अष्टवर्ग, सर्व १३/९० षष्ठ परिच्छेदे 'अद्वैत १७/३१९ षोड़श वत्सर कैल १०/९३ षोड़शे कहिलुँ 'कैशोर १७/३२७ षोलसाङ्गेर काष्ठ तुलि' ये १०/११६ षोलसाङ्गेर काष्ठ ये तुलि' ११/१६ 294 | श्रीचैतन्यचरितामृत

सङ्कीर्त्तन-सुन्दर ] स सङ्कीर्त्तन करि' वैसे श्रमयुक्त 17/79 सङ्कीर्त्तन बाद यैछे नहे 17/221 संक्षेपे करिये किछु से 10/123 संक्षेपे कहिये, कहा ना 13/53 संक्षेपे कहिल जन्मलीला 14/4 संक्षेपे कहिल महाप्रभुर 10/163 संक्षेपे कहिलाङ एइ 11/60 संक्षेपे कहिलुँ अति, —ना 17/329 संक्षेपे लिखिये सम्यक् 13/51 सङ्गे चलि' आइसे काजी 17/224 सङ्गे नित्यानन्द, चन्द्रशेखर 17/273 संन्यास करह तुमि' 15/18 संन्यास करिया तीर्थ करिवारे 15/12 संन्यास करिया यबे प्रभु 17/55 संन्यासि-बुद्धये मोरे प्रणत 17/265 संन्यासी-बुद्धये मोरे 8/11 “संसार-सुख तोमार हउक 17/63 स-कलङ्क चन्द्रे आर 13/91 सकल पण्डित जिनि' करे 17/6 सकल भरिया आछे प्रेम 10/161 सकल शाखार सेइ स्कन्ध 9/12 सख्य, दास्य, —दुइ भाव 17/299 सगणे सचेले गया कैल 17/74 सप्तम परिच्छेदे 'पञ्चतत्त्वेर' 17/320 सप्तदशे 'यौवनलीला' कहिलुँ 17/327 सप्त मिश्र ताँर पुत्र—सप्त 13/57 सत्यराज आदि—ताँर 10/48 स्थावर-जङ्गम हैल 13/97 सदा नाम लइबे, यथा 17/30 सदाशिव-पण्डित याँर 10/34 सन्ध्याकाले कर सबे नगर 17/133 सन्ध्याते देउटि सबे ज्वाल 17/134 सन्ध्याय गङ्गास्नान करि' 17/120 “सब देश भ्रष्ट कैल एकला 17/255 सबाके खाओयाल आगे 17/84 सबार अध्यक्ष-प्रभुर मर्म 10/124 सबार प्रेम-ज्योत्स्नाय 13/5 सबार सम्मान-कर्त्ता, करेन 8/56 सबारे कहे श्रीवास हासिया 17/41 सबारे निषेधिल, —“इहार 17/73 सबेइ चैतन्यभृत्य, —चैतन्य 10/81 'सबे घरे याह, आमि 17/214 सबे मिलि' नृत्य करे 17/119 सबे मेलि' करे तबे 17/254 समग्र बलिते नारे 'सहस्र 10/163 समस्त भक्तरे दिल इष्ट 17/70 समासे गौण हैल, शब्दार्थ 16/59 सरस्वती याहा बलाय, सेइ 16/94 सरस्वती रात्रे ताँरे उपदेश 16/106 सर्व अङ्ग-सुनिर्माण 13/116 सर्वज्ञ कहे, —“आमि ताहा 17/112 सर्वज्ञ गोसाञि जानि' सबार 17/259 सर्व त्यजि' कैल प्रभुर 10/91 सर्वत्र करेन कृष्णनामेर अ28 सर्वत्र लओयाइल प्रभु 13/27 सर्वप्राणीर उपकार हय 9/45 सर्वभावे आश्रियाछे चैतन्य 12/57 सर्वभावे सेवे नित्यानन्देर 11/41 सर्वलोक शुनिले मन्त्रेर 17/212 सर्वलोके करिबे एइ धारण 14/19 सर्वलोके मत्त कैला आपन 9/52 सर्व वैष्णवगण हरिध्वनि 8/76 सर्वशाखागणेर यैछे फल 17/323 सर्वशाखा-श्रेष्ठ वीरभद्र 11/56 सर्वशास्त्रे कहे कृष्णभक्तिर 13/65 सर्वशास्त्रे सर्व पण्डित पाय 16/6 सर्वस्व दण्डिया तार जाति 17/128 सर्वाङ्ग बेडिल कीटे, काटे 17/46 सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, बहे 17/45 सर्वेन्द्रिय-तृप्ति हय श्रवणे 16/110 सर्वोत्तम हइलेओ तारे 8/12 सवंशे करेन याँरा चैतन्येर 10/11 सवंशे तोमारे आर यवन 17/185 सहजे यवन-शास्त्रे अदृढ़ 17/171 सहस्र दण्डवत् करे, लय 10/99 सहस्र-मुखे याँर गुण 10/41 सहस्र-वदने सेवा ना 8/53 सहस्र-वदने तँहो 13/45 'सहस्र वदने' यार दिते 10/162 सहस्र सेवक सेवा करे 8/53 'साक्षात्', 'आवेश' आर 10/56 साक्षात् ईश्वर करि' प्रभुरे 16/106 साक्षात् ईश्वर तँहो, —नाहिक 16/13 'साक्षाते' सकल भक्ते देखे 10/57 साध्य-साधन श्रेष्ठ ना हय 16/11 सात सात पुत्र हबे—चिरायु 14/55 सार्द्ध सप्त प्रहर करे 10/102 सालङ्कार हैले अर्थ करे 16/86 सावित्री, गौरी, सरस्वती 13/105 साहजिक प्रीति दुँहार 14/64 सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट 10/149 सिंह-राशि, सिंह-लग्न 13/90 सिन्दूर, हरिद्रा, तैल 13/110 सुखी हइया लोक मोर 9/40 सुन्दर शरीर यैछे भूषणे 16/70 सुन्दरानन्द—नित्यानन्देर शाखा 11/23 पद्य सूची | 295

[ सुपठित-हरि सुपठित विद्या कारओ ना 17/257 | सेइ दुइस्कन्धे शाखा यत 9/22 | से-सब गुणेर ताँर 8/57 सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द 10/111 | सेइ देशे विप्र, नाम-मिश्र 16/10 | से-सब सामग्री आगे करिब 10/28 सुवर्णेर कड़ि-बउलि 13/112 | सेइ नन्दसुत-इहाँ 17/295 | से-सब सामग्री यत झालिते 10/26 सुशील, सहिष्णु, शान्त 8/55 | सेइ नामे आमि तोमाय 17/175 | से सम्बन्धे हओ तुमि 17/149 सुस्थ हञा कहे प्रभु अपूर्व 15/17 | सेइ नित्यानन्द-कृष्णचैतन्य 17/296 | सेह महावैष्णव हय 8/38 सूक्ष्म विचारिये यदि आछये 16/84 | सेइ पत्रीर कथा आचार्य 12/30 | सोनार मुषल हल ये 10/73 सूत्र करि' गणे यदि 13/45 | सेइ पापी दुःख भोगे 17/54 | स्कन्धेर उपरे बहु शाखा 9/17 सूत्र करि' ग्रन्थिलेन 13/16 | सेइ पुण्ये हैलाङ आमि 17/111 | स्तनपान करे प्रभु ईषत् 14/35 सूत्र करि' सब लीला 8/45 | सेइ फल खाय, नाचे 9/53 | स्तन पियाइते पुत्रेर चरण 14/11 सूत्रधृत कोन लीला ना 8/47 | सेइ बलदेव-इहँ नित्यानन्द 17/295 | स्थावर हइया धरे 9/32 सूत्ररूपे मुरारिगुप्त 13/15 | सेइ भक्तगणे एबे करिये 10/129 | स्थूल एइ पञ्च दोष 16/84 सूत्र-वृत्ति-टीकाय कृष्णनामेर 13/29 | सेइमत उन्माद-प्रलाप 13/41 | स्फुट करि' कह तुमि 17/177 सूर्यदास सरखेल, ताँर भाइ 11/25 | सेइ मोर प्रिय, अन्य 10/82 | स्फुट नाहि करे दोष-गुणेर 16/26 सृजाइल, जीयाइल, ताँरे 12/68 | सेइ रात्रे एक सिंह महा 17/179 | स्वतःसिद्धज्ञान, तबे शिक्षा 14/88 सेइ अंश कहि, ताँरे 16/27 | सेइ रूप-रघुनाथ प्रभु 10/103 | स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु अत्यन्त 8/32 सेइ अनुसारे लिखि लीला 13/47 | सेइरूपे एइरूपे देखि 17/113 | स्वतन्त्र ईश्वर प्रेम-निगूढ 8/21 सेइ आचार्यगणे मोर कोटी 12/75 | सेइ लिखि, मदनगोपाल 8/79 | स्वप्न देखि' मिश्र आसि' 16/14 सेइ आचार्येर गण 12/73 | सेइ वीरभद्र-गोसाञिर 11/12 | स्वप्ने एक विप्र कहे 16/12 सेइ काले दैवयोगे 13/20 | सेइ व्रजेश्वर-इहँ 17/294 | स्वप्नेर वृत्तान्त सब कैल 16/14 सेइकाले निजालय 13/99 | सेइ व्रजेश्वरी-इहँ शचीदेवी 17/294 | स्वमत कल्पना करे 12/9 सेइ कृष्ण, सेइ गोपी 17/304 | सेइ शास्त्रे कहे,-प्रवृत्ति 17/156 | स्वमाधुर्य-प्रेमानन्दरस 17/317 सेइ कृष्णप्रेमफले जगत् 12/6 | सेइ सब लीलार शुनिते 8/49 | स्वयं भगवान् येइ 17/314 सेइक्षणे गौरकृष्ण 13/94 | सेइ सेइ आचार्येर कृपार 12/74 | स्वरूपेर अन्तर्धाने आइला 10/93 सेइ क्षणे जागि' निमाइ 14/10 | सेइ सेइ रसे कृष्ण 17/301 | स्वर्ग वाद्य-नृत्य करे 13/96 सेइक्षणे धाञा प्रभु गङ्गाते 17/245 | सेइ सेइ स्थाने किछु 13/49 | स्वसङ्ग छाड़ाञा केने पाठान 16/18 सेइ चतुर्भुज-मूर्त्ति चाहेन 17/290 | सेइ स्कन्धे यत प्रेमफल 12/6 | स्वेद-कम्प-पुलकादि 8/27 सेइ चिह्न पाये देखि' मिश्रे 14/11 | सेइ हैते एकादशी करिते 15/10 | सेइ जन याय चैतन्येरे 17/309 | सेइ हैते जिह्वा मोर बले 17/200 | ह सेइ जले जीये शाखा 12/66 | सेतुबन्ध, आर गौड़-व्यापि 13/36 | सेइ जले पुष्ट स्कन्ध 12/5 | से दण्डप्रसाद आर लोके 12/42 | सेइ जले स्कन्धे करे 12/7 | से दिन बहुत नाहि कैलि 17/184 | सेइ तुमि हओ,-हेन 17/215 | से पत्रीते लेखा आछे-एइ 12/31 | सेइ दिन एक आमार 17/188 | सेवार अध्यक्ष-श्रीपण्डित 8/54 | 'हरि' 'कृष्ण' 'नारायण' 17/218 296 | श्रीचैतन्यचरितामृत

हरिदास-हृदय ] हरिदास ठाकुर-शाखार 10/43 | 'हरेर्नाम' श्लोकेर कैल 17/20 | हुङ्कारे आकृष्ट हैला 13/71 हरिदास ठाकुरेर करिल 17/71 | हाड़िके आनिया सब दूर 17/44 | हेनकाले दिग्विजयी ताहाँइ 16/29 हरिदासे लञा सङ्गे 13/99 | हासि' ताहे महाप्रभु पुछेन 17/171 | हेनकाले पाषण्डी हिन्दु 17/203 हरिद्रा, सिन्दूर आर रक्त 17/39 | हासे, कान्दे, पड़े 17/208 | हेनकाले राधा आसि' दिला 17/289 हरिनाम लओयाइला 13/22 | हासे, कान्दे, नाचे, गाय 17/194 | हेन कृपामय चैतन्य ना 8/12 'हरि' बलि' नारीगण 13/96 | हित-उपदेश कैल हइया 17/56 | हेन कृष्णनाम यदि लय 8/29 'हरि' बलि' हिन्दुके 13/95 | हिन्दुके परिहास कैनु से 17/201 | हेन प्रेम श्रीचैतन्य दिला 8/20 'हरि हरये नमः, कृष्ण 17/122 | हिन्दुर ईश्वर बड़ येइ 17/215 | हेन बुझि, जन्मिबेन 13/85 'हरि' 'हरि' करि' हिन्दु 17/195 | हिन्दुर देवतार नाम लह 17/197 | हैते हैते हैल गर्भ त्रयोदश 13/87 'हरि' 'हरि' ध्वनि बड़ 17/193 | हिन्दुर धर्म नष्ट कैल 17/210 | होड़ कृष्णदास-नित्यानन्द 11/47 'हरि' 'हरि'-ध्वनि बिना 17/123 | हिन्दुशास्त्रे 'ईश्वर' नाम 17/212 | हृदयानन्द सेन, आर 12/60 'हरि' 'हरि' बले लोक 13/21 | 'हिन्दु 'हरि' बले, तार 17/196 | पद्य सूची | 297

298 | श्रीचैतन्यचरितामृत

शब्दकोश अ अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके अच्युत—जो च्युत नहीं हो अज—अजन्मा अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली स्तनके जैसी चीज अज्ञ—ज्ञानरहित अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक, जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म हो जाता है अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका उल्लङ्घन अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लङ्घन किया हुआ अतिशय—अत्यधिक अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर कहना अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य अत्युत्तम—अति उत्तम अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात अधिदैव—आराध्य देवता अधिरूढ़—बढ़ा हुआ अधिष्ठान—आधार, आश्रय अनभिज्ञ—न जाननेवाला अनवरत—निरन्तर अनायास—बिना कष्टके अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य अनुक्षण—निरन्तर अनुगत—अनुगामी, अधीन अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना अन्तर्भूत—अन्तर्गत अन्त्य—अन्तका, आखिरी अन्यतम—बहुतोंमें से एक, सर्वश्रेष्ठ अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध, मेल अन्वेषण—खोज, ढूँढना अपकार—अहित अपटुता—अकुशलता अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो अपरिमित—अगणित, अनगिनत अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा अप्राकट्य—अप्रकट होना अप्राकृत—अलौकिक अपारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न भोगा जा रहा हो अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध, प्रसङ्गके विरुद्ध अबाध—बाधारहित अभयत्व—अभयता अभिज्ञ—जाननेवाला अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली शब्द शक्ति अभिधान—शब्दकोष अभिधेय—अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय

[ अभिप्राय-ईशिता श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अभिप्राय—मूल अर्थ, तात्पर्य अभिप्रेत—उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत अभिवृद्धि—अभ्युदय, बढ़ना अभिव्यक्ति—प्रकट करना अभिसन्धि—जोड़, समझौता अभिसार—आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना अभिहित—कहा हुआ अभीष्ट—प्रिय, रुचिकर अभ्यस्त—बार बार अभ्यास किया गया अभ्युदय—उदय अमित—अत्यधिक अरण्य—वन अवगत—जाना हुआ अर्वाचीन—नया, बादमें उत्पन्न हुआ अवतारणा—नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना अवतीर्ण—अवतारके रूपमें प्रकट अवधारण—शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना, निश्चय करना अवयव—अङ्ग, अंश अवरुद्ध—रुका हुआ अवलम्बन—आश्रय लेना, सहारा लेना अवलोकन—देखना अवशिष्ट—बचा हुआ, शेष अवस्थान—रहना, अवस्थिति अविचिन्त्य—अचिन्त्य अविच्छिन्न—अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट अव्यय—अविकारी अव्याकृत—अव्यक्त अशेष—सम्पूर्ण अष्टसिद्धि—आठ प्रकारकी सिद्धियाँ असङ्ग—आसक्तिहीन असङ्गत—प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित असङ्गति—मेलका ना होना असंस्कृत—संस्कारहीन असमोध्र्द्ध—जिससे बड़ा और जिसके बराबर कोई नहीं हो असार—सारहीन असूया—ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना आ आख्यायिका—कहानी आच्छन्न—ढका हुआ आत्मविषयणी—आत्म-सम्बन्धी आत्मसात्—अपने अधिकारमें आत्यन्तिक—असीम आदित्य—सूर्य आधान—स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान रखना आधिदैविक—देवताओंके द्वारा कृत आधिभौतिक—अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक—मानसिक, आत्म-सम्बन्धी आपाततः—अचानक, अन्तमें आप्त—पूर्ण, कुशल आम्नाय—वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश आयुध—अस्त्र आरूढ़—आसीन आरोहण—चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना आर्त्ति—क्लेश, पीड़ा आर्ष—ऋषियोंका आलोचना—गुण-दोष निरूपण आलोच्य—आलोचना योग्य आह्लादित—आनन्दित इ इति—इस प्रकार, समाप्ति इहलोक—यह लोक ई ईक्षण—दृष्टिपात ईशिता—ईश्वरत्व 300 |

शब्दकोश उच्छिष्ट-छन्दविद्या ] उ उच्छिष्ट—खाकर छोड़ा हुआ, परित्यक्त उत्कृष्ट—उन्नत, श्रेष्ठ उद्बुद्ध—जगा या जगाया हुआ, विकसित उद्भासित—व्यक्त, चमकता हुआ उद्यत—तैयार उद्रेक—प्रचुरता, बढ़ती उद्वेग—क्षोभ, चित्तकी अस्थिरता उपक्रम—योजना, आरम्भ, प्रयास उपशम—विराग, विरक्ति उपलक्षित—इशारेसे बताया हुआ उपाङ्ग—छोटा या सहायक अंग उपार्जित—कमाया हुआ उपादान—साधन-सामग्री उपादेय—ग्रहण करने योग्य, उपयोगी उपेयत्व—उपाय-योग्य होनेका भाव उरु—विस्तृत, महान उरुक्रम—विष्णु उरुगाय—उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिसका स्तुतिगान किया गया हो ए एकरस—जो सदा एक रूपमें रहे, एकीभूत—जो मिलकर एक हो गया हो ऐ ऐहिक—सांसारिक औ औत्सुक्य—उत्सुकता औद्धत्य—उद्धतता, अख्खड़पन औपाधिक—उपाधियुक्त क कर्त्तृत्व—कर्ताका धर्म, कार्य कलुषित—गंदा, कलुषयुक्त कल्प—वेदका एक अङ्ग, ब्रह्माका एक दिन कल्पवृक्ष—इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष काम्यकर्म—फलकी कामनासे किया जानेवाला कर्म कैतव—छल, धोखा केवला भक्ति—शुद्धा भक्ति कैङ्कर्य—दासत्व कैवल्य मुक्ति—निर्वाण मुक्ति कौतूहलवश—उत्सुकतावश क्रोड़ीभूत—अन्तर्भूत क्लान्त—थका हुआ, क्षीण क्ष क्षिति—पृथ्वी क्षेत्र—शरीर क्षेत्रज्ञ—शरीरका ज्ञाता, आत्मा तथा परमात्मा क्षोभ—असन्तोष, व्याकुलता ग ग्रथित—गूँथा हुआ ग्रन्थि—गाँठ ग्रास—आहार ग्रीवा—गर्दन घ घ्राण—गन्ध, सूँघनेकी शक्ति च चित्तगुहा—हृदयरूपी कन्दरा चित्-शक्ति—भगवानकी एक प्रकारकी शक्ति चिदालोचना—चित्-वस्तुकी आलोचना चिन्तामल—चिन्तारूपी मल चिन्मयत्व—चिन्मयता चैतन्यत्व—चेतनता चैतन्यनिष्ठ—चित्-वस्तुमें जिसकी निष्ठा है चैतन्यहीन—चेतनारहित छ छन्दविद्या—अठारह विद्याओंमें एक । 301

[ जर्जरित-नैतिक श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत जर्जरित—जो जर्जर हो गया हो तत्त्वज्ञान—तत्त्ववस्तुका ज्ञान तत्त्वतः—यथार्थतः तत्त्वविद्—तत्त्वको जाननेवाला तदीय—भगवत्-सम्बन्धी तनय—पुत्र तन्मय—तल्लीन तादात्म्य—दो वस्तुओंके परस्पर अभिन्न होनेका स्वभाव तारतम्य—दो वस्तुओंके घट-बढ़कर होनेका भाव तिर्यग्—पशु-पक्षी तैलधारावत्—तैलकी भाँति धारावाला त्रिगुणातीत—तीनों गुणोंसे अतीत त्रिवर्ग—धर्म, अर्थ और काम दिक्पाल—दश दिशाओंके रक्षक देवता दुर्ज्ञेय, दुर्बोध—कठिनाईसे जानने योग्य दुर्निगृहीत—कठिनाईसे वशमें लाया हुआ दुर्निवारित—कठिनाईसे निवारण किया हुआ दुरुह—कठिन दुस्त्याज्य—नहीं त्यागने योग्य देदीप्यमान—चकमता-दमकता हुआ देहाध्यास—देहमें मिथ्या अभिमान द्रव्यमययज्ञ—द्रव्य द्वारा किया गया यज्ञ द्विजवर—ब्राह्मणश्रेष्ठ द्वैतभाव—दो होनेका भाव धूसरित—धूलसे भरा हुआ ध्वनित होना—पता चलना नराकृति—मनुष्यके समान आकृति नामाभास—नामका आभास निःशक्तिक—शक्तिरहित निःश्वास—प्राणवायु या साँसका बाहर निकलना निःसृत—निकला हुआ निकृष्ट—तुच्छ निकेतन—घर निक्षेप करना—फेंकना निगृहीत—निग्रह किया हुआ निग्रह—संयम निन्तान्त—अत्यन्त, एकदम निमज्जित—डूबा हुआ, स्नात नियमाग्रह—नियम-पालनमें आलस्य निरञ्जन—निर्दोष, अज्ञानसे रहित निरपेक्ष—किसी औरकी अपेक्षा नहीं निर्गत—बाहर निकला हुआ निर्गुण—सत्त्व, रज और तमोगुणसे अतीत निर्दिष्ट—निर्देशित निर्वाण—मोक्ष निर्विकल्प—विकल्पसे रहित निर्विवाद—बिना विवादका निरुद्ध—विशेषरूपसे रोका हुआ निरूपक—निरूपण करनेवाला निरूपण—किसी विषयको ठीक-ठीक समझा देना निशा—रात्रि निष्काम कर्म—कामनासे रहित कर्म निष्पन्न—जिसकी उत्पत्ति हुई है निसर्गवाद—प्रकृतिवाद (प्रकृति ही जगत्की सृष्टि करनेवाली है, ऐसा मतवाद) निस्तारक—निस्तार करनेवाला निस्त्रैगुण्य—तीनों गुणोंसे अतीत निहत—मारा हुआ नीलमणि—नीलम नैतिक—नीति-सम्बन्धी 302 ।

शब्दकोश नैमित्तिक-प्राकृत ] नैमित्तिक—निमित्तसे उत्पन्न नैरन्तर्य—निरन्तर होनेका भाव नैर्घृण्य—निर्ममता, क्रूरता प पक्षान्तर—दूसरी ओर पन्था—पथ परिज्ञात—अच्छे प्रकारसे ज्ञात परनिष्ठित—दूसरेमें निष्ठावाला परदार—दूसरेकी स्त्री परवर्ती—बादमें पराक्रान्त—शक्तिशाली परिग्रह—ग्रहण पराभक्ति—श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति पराभूत—पराजित परिचर्या—सेवा परिचालक—चलानेवाला परिदृष्ट—दृष्ट परिनिष्ठित—पूर्णतया निपुण परिमित—सीमित परिलक्षित—अच्छी तरह देखाभाला हुआ परिव्राजक—संन्यासी परिवेष्टित—घिरा हुआ पर्यन्त—तक पर्यवसित—समाप्त पाण्डित्य—विद्वता पारत्रिक—परलोक-सम्बन्धी पारलौकिक—परलोक-सम्बन्धी पार्षद—परिकर पाषण्डी—पाखण्डी पूर्वपक्ष—संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न पूर्वराग—मिलनसे पहलेका राग प्रकरण—निर्माण, प्रसङ्ग प्रकृत—यथार्थ प्रकृष्ट—उत्तम प्रक्षिप्त—बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ प्रच्छन्न—ढका हुआ प्रजल्प—इधर-उधरकी बात प्रज्ञा—बुद्धि प्रणयन—रचना, निर्माण प्रणत—शरणागत प्रणतपाल—शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रणति—प्रणाम, शरणागति प्रताड़ित—सताया गया प्रतिपादित—प्रमाणित प्रतिपाद्य—जिसे प्रमाणित किया जाय प्रतिभात—प्रभावयुक्त, ज्ञात प्रतीयमान—जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति हो रही हो प्रत्यगात्मा—जीवात्मा प्रत्यवाय—दोष प्रत्याहार—निरोध, रोकना प्रत्युपकार—भलाईके बदलेमें की हुई भलाई प्रदत्त—दिया हुआ प्रधान—मायाकी एक वृत्ति प्रधानतः—मुख्यरूपसे प्रपत्ति—शरणागति प्रभूत—अत्यधिक प्रभृति—जैसा प्रयोजनीयता—आवश्यकता प्रयोजक—प्रयुक्त करनेवाला प्रयोजकत्व—प्रयोजक होनेका भाव प्रवर—श्रेष्ठ प्रवर्त्तक—किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ करनेवाला प्रवृत्ति—मनका किसी विषयकी ओर झुकाव, प्रभाव प्रशस्त—प्रशंसाके योग्य प्रशान्तात्मा—शुद्ध या शान्त आत्मा प्रशामक—शान्त करनेवाला प्राकृत—प्रकृति-सम्बन्धी । 303