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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

532 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला सार-हृद ] सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्‌के साथ स्फुरण—व्यक्त होना एक ही लोकमें वास करना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, स्थायित्व—स्थिरता वचन और मन) स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला स्वच्छन्द—स्वतन्त्र सुदुराचारी—अति दुराचारी स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित सुधा—अमृत स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न सुरस—रसयुक्त स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह ह सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट हत—मरा हुआ सौम्य—सुन्दर, कोमल हतभागा—भाग्यहीन स्खलित—गिरा हुआ हन्त—मारना स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता हेयता—तुच्छता स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना हृदगत—हृदय-सम्बन्धी