भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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१६४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मायया ह्यनया किं वा मन्त्रशक्त्याथ वा प्रभो।<br>वस्तुशक्त्याथ वा विष्णो ध्यानशक्त्याथ वा पुनः॥ ६५<br><br>त्यक्त्वा मायामिमां तस्माद्योद्धुमर्हसि यत्नतः।हे प्रभो! हे विष्णो! इस मायासे अथवा मन्त्रशक्तिसे अथवा पदार्थशक्तिसे अथवा ध्यानशक्तिसे क्या लाभ? अतएव इस मायाको छोड़कर आप मेरे साथ यत्नपूर्वक युद्ध कीजिये॥ ६५ १/२॥
एवं तस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा माहात्म्यमद्भुतम्॥ ६६<br><br>देवाश्च दुद्रुवुर्भूयो देवं नारायणं च तम्।<br>वारयामास निश्चेष्टं पद्मयोनिर्जगद्गुरुः॥ ६७उन दधीचका यह वचन सुनकर तथा उनका अद्भुत प्रभाव देखकर देवगण व्याकुल होकर पुनः भागने लगे। तदनन्तर जगद्गुरु ब्रह्माजीने उन निश्चेष्ट भगवान् विष्णुको युद्ध करनेसे रोका॥ ६६-६७॥
निशम्य वचनं तस्य ब्रह्मणस्तेन निर्जितः।<br>जगाम भगवान् विष्णुः प्रणिपत्य महामुनिम्॥ ६८इसके बाद उन ब्रह्माजीका वचन सुनकर दधीचसे पराजित हुए भगवान् विष्णु उन महामुनिको प्रणाम करके अपने लोकको चले गये॥ ६८॥
क्षुपो दुःखातुरो भूत्वा सम्पूज्य च मुनीश्वरम्।<br>दधीचमभिवन्द्याशु प्रार्थयामास विह्वलः॥ ६९इधर अत्यन्त दुःखित तथा व्याकुलचित्त राजा क्षुप मुनीश्वर दधीचकी विधिवत् पूजा करके उन्हें बार-बार प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ६९॥
दधीच क्षम्यतां देव मयाज्ञानात्कृतं सखे।<br>विष्णुना हि सुरैर्वापि रुद्रभक्तस्य किं तव॥ ७०हे दधीच! हे देव! मेरे द्वारा अज्ञानवश किये गये अपराधको आप क्षमा करें। हे सखे! आप-सदृश रुद्रभक्तका विष्णु तथा अन्य देवता भला क्या कर सकते हैं?॥ ७०॥
प्रसीद परमेशाने दुर्लभा दुर्जनैर्द्विज।<br>भक्तिर्भक्तिमतां श्रेष्ठ मद्विधैः क्षत्रियाधमैः॥ ७१हे द्विज! आप प्रसन्न हो जाइये। हे भक्तोंमें श्रेष्ठ! मुझ-सदृश दुर्जन तथा अधम क्षत्रियोंके लिये परमेश्वर महादेवकी भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है॥ ७१॥
श्रुत्वानुगृह्य तं विप्रो दधीचस्तपतां वरः।<br>राजानं मुनिशार्दूलः शशाप च सुरोत्तमान्॥ ७२<br><br>रुद्रकोपाग्निना देवाः सदेवेन्द्रा मुनीश्वरैः।<br>ध्वस्ता भवन्तु देवेन विष्णुना च समन्विताः॥ ७३<br><br>प्रजापतेर्मखे पुण्ये दक्षस्य सुमहात्मनः।तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर दधीचने राजा क्षुपकी वाणी सुनकर उसके ऊपर अनुग्रह कर दिया तथा श्रेष्ठ देवताओंको शाप दे दिया कि विष्णुदेव, इन्द्र एवं मुनीश्वरोंसहित सभी देवता महान् आत्मावाले दक्षप्रजापतिके पवित्र यज्ञमें रुद्रकी कोपाग्निमें दग्ध हो जायँ॥ ७२-७३ १/२॥
एवं शप्त्वा क्षुपं प्रेक्ष्य पुनराह द्विजोत्तमः॥ ७४<br><br>देवैश्च पूज्या राजेन्द्र नृपैश्च विविधैर्गणैः।<br>ब्राह्मणा एव राजेन्द्र बलिनः प्रभविष्णवः॥ ७५इस प्रकार देवताओंको शाप देकर द्विजश्रेष्ठ दधीचने क्षुपकी ओर देखते हुए कहा—हे राजेन्द्र! ब्राह्मण सभी देवताओं, राजाओं तथा विविध गणोंके पूज्य हैं। अतः हे नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मण ही सबसे अधिक बलशाली एवं परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न होते हैं॥ ७४-७५॥
इत्युक्त्वा स्वोटजं विप्रः प्रविवेश महाद्युतिः।<br>दधीचमभिवन्द्यैव जगाम स्वं नृपः क्षयम्॥ ७६ऐसा कहकर महातेजस्वी मुनि दधीच अपनी कुटीमें चले गये तथा राजा क्षुप दधीचको प्रणामकर अपने घरको प्रस्थित हुए॥ ७६॥