श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| १६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मायया ह्यनया किं वा मन्त्रशक्त्याथ वा प्रभो।<br>वस्तुशक्त्याथ वा विष्णो ध्यानशक्त्याथ वा पुनः॥ ६५<br><br>त्यक्त्वा मायामिमां तस्माद्योद्धुमर्हसि यत्नतः। | हे प्रभो! हे विष्णो! इस मायासे अथवा मन्त्रशक्तिसे अथवा पदार्थशक्तिसे अथवा ध्यानशक्तिसे क्या लाभ? अतएव इस मायाको छोड़कर आप मेरे साथ यत्नपूर्वक युद्ध कीजिये॥ ६५ १/२॥ |
| एवं तस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा माहात्म्यमद्भुतम्॥ ६६<br><br>देवाश्च दुद्रुवुर्भूयो देवं नारायणं च तम्।<br>वारयामास निश्चेष्टं पद्मयोनिर्जगद्गुरुः॥ ६७ | उन दधीचका यह वचन सुनकर तथा उनका अद्भुत प्रभाव देखकर देवगण व्याकुल होकर पुनः भागने लगे। तदनन्तर जगद्गुरु ब्रह्माजीने उन निश्चेष्ट भगवान् विष्णुको युद्ध करनेसे रोका॥ ६६-६७॥ |
| निशम्य वचनं तस्य ब्रह्मणस्तेन निर्जितः।<br>जगाम भगवान् विष्णुः प्रणिपत्य महामुनिम्॥ ६८ | इसके बाद उन ब्रह्माजीका वचन सुनकर दधीचसे पराजित हुए भगवान् विष्णु उन महामुनिको प्रणाम करके अपने लोकको चले गये॥ ६८॥ |
| क्षुपो दुःखातुरो भूत्वा सम्पूज्य च मुनीश्वरम्।<br>दधीचमभिवन्द्याशु प्रार्थयामास विह्वलः॥ ६९ | इधर अत्यन्त दुःखित तथा व्याकुलचित्त राजा क्षुप मुनीश्वर दधीचकी विधिवत् पूजा करके उन्हें बार-बार प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ६९॥ |
| दधीच क्षम्यतां देव मयाज्ञानात्कृतं सखे।<br>विष्णुना हि सुरैर्वापि रुद्रभक्तस्य किं तव॥ ७० | हे दधीच! हे देव! मेरे द्वारा अज्ञानवश किये गये अपराधको आप क्षमा करें। हे सखे! आप-सदृश रुद्रभक्तका विष्णु तथा अन्य देवता भला क्या कर सकते हैं?॥ ७०॥ |
| प्रसीद परमेशाने दुर्लभा दुर्जनैर्द्विज।<br>भक्तिर्भक्तिमतां श्रेष्ठ मद्विधैः क्षत्रियाधमैः॥ ७१ | हे द्विज! आप प्रसन्न हो जाइये। हे भक्तोंमें श्रेष्ठ! मुझ-सदृश दुर्जन तथा अधम क्षत्रियोंके लिये परमेश्वर महादेवकी भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है॥ ७१॥ |
| श्रुत्वानुगृह्य तं विप्रो दधीचस्तपतां वरः।<br>राजानं मुनिशार्दूलः शशाप च सुरोत्तमान्॥ ७२<br><br>रुद्रकोपाग्निना देवाः सदेवेन्द्रा मुनीश्वरैः।<br>ध्वस्ता भवन्तु देवेन विष्णुना च समन्विताः॥ ७३<br><br>प्रजापतेर्मखे पुण्ये दक्षस्य सुमहात्मनः। | तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर दधीचने राजा क्षुपकी वाणी सुनकर उसके ऊपर अनुग्रह कर दिया तथा श्रेष्ठ देवताओंको शाप दे दिया कि विष्णुदेव, इन्द्र एवं मुनीश्वरोंसहित सभी देवता महान् आत्मावाले दक्षप्रजापतिके पवित्र यज्ञमें रुद्रकी कोपाग्निमें दग्ध हो जायँ॥ ७२-७३ १/२॥ |
| एवं शप्त्वा क्षुपं प्रेक्ष्य पुनराह द्विजोत्तमः॥ ७४<br><br>देवैश्च पूज्या राजेन्द्र नृपैश्च विविधैर्गणैः।<br>ब्राह्मणा एव राजेन्द्र बलिनः प्रभविष्णवः॥ ७५ | इस प्रकार देवताओंको शाप देकर द्विजश्रेष्ठ दधीचने क्षुपकी ओर देखते हुए कहा—हे राजेन्द्र! ब्राह्मण सभी देवताओं, राजाओं तथा विविध गणोंके पूज्य हैं। अतः हे नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मण ही सबसे अधिक बलशाली एवं परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न होते हैं॥ ७४-७५॥ |
| इत्युक्त्वा स्वोटजं विप्रः प्रविवेश महाद्युतिः।<br>दधीचमभिवन्द्यैव जगाम स्वं नृपः क्षयम्॥ ७६ | ऐसा कहकर महातेजस्वी मुनि दधीच अपनी कुटीमें चले गये तथा राजा क्षुप दधीचको प्रणामकर अपने घरको प्रस्थित हुए॥ ७६॥ |
३७- नन्दीके जन्मका वृत्तान्त, ब्रह्मा तथा विष्णुका परस्पर संवाद और शिवद्वारा दोनोंपर अनुग्रह करना
| अध्याय ३७] | नन्दीके जन्मका वृत्तान्त... शिवद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुपर अनुग्रह करना | १६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तदेव तीर्थमभवत्स्थानेश्वरमिति स्मृतम्।<br>स्थानेश्वरमनुप्राप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ७७ | वह युद्धस्थान एक तीर्थ बन गया, जो स्थानेश्वर नामसे जाना जाता है। स्थानेश्वर तीर्थका सेवन करनेसे मनुष्य शिव-सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ७७ ॥ |
| कथितस्तव सङ्क्षेपाद्विवादः क्षुब्दधीचयोः।<br>प्रभावश्च दधीचस्य भवस्य च महामुने॥ ७८ | [नन्दीश्वर बोले—] हे महामुने सनत्कुमार ! यह मैंने आपसे संक्षेपमें क्षुप-दधीचके विवाद और दधीच तथा भगवान् शिवके प्रभावका वर्णन किया है ॥ ७८ ॥ |
| य इदं कीर्तयेद्दिव्यं विवादं क्षुब्दधीचयोः।<br>जित्वापमृत्युं देहान्ते ब्रह्मलोकं प्रयाति सः॥ ७९ | जो मनुष्य क्षुप तथा दधीचके इस दिव्य विवादका पठन करता है, वह अपमृत्युको जीतकर देहका अन्त होनेके अनन्तर ब्रह्मलोकको प्रस्थान करता है ॥ ७९ ॥ |
| य इदं कीर्त्य सङ्ग्रामं प्रविशेत्तस्य सर्वदा।<br>नास्ति मृत्युभयं चैव विजयी च भविष्यति ॥ ८० | जो कोई भी इसका पाठ करके युद्ध-स्थलमें प्रवेश करता है, उसे मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं रहता है और वह संग्राममें सदा विजेता सिद्ध होता है ॥ ८० ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे क्षुपदधीचसंवादो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'क्षुप-दधीच-संवाद' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥
सैंतीसवाँ अध्याय
नन्दीके जन्मका वृत्तान्त, ब्रह्मा तथा विष्णुका परस्पर संवाद और शिवद्वारा दोनोंपर अनुग्रह करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सनत्कुमार उवाच<br>भवान् कथमनुप्राप्तो महादेवमुमापतिम्।<br>श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं वक्तुमर्हसि मे प्रभो॥ १ | सनत्कुमार बोले— [हे नन्दीश्वर !] आपको पार्वतीपति महादेवका सान्निध्य कैसे प्राप्त हुआ? हे प्रभो! मैं इससे सम्बन्धित सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ; आप उसे बतायें ॥ १ ॥ |
| शैलादिरुवाच<br>प्रजाकामः शिलादोऽभूत्पिता मम महामुने।<br>सोऽप्यन्धः सुचिरं कालं तपस्तेपे सुदुश्चरम्॥ २ | नन्दी कहते हैं— हे महामुने ! मेरे पिता शिलादको एक बार संतानकी कामना उत्पन्न हुई और उन्होंने अन्धे होनेपर भी दीर्घकालतक कठोर तपस्या की ॥ २ ॥ |
| तपतस्तस्य तपसा सन्तुष्टो वज्रधृक् प्रभुः।<br>शिलादमाह तुष्टोऽस्मि वरयस्व वरानिति ॥ ३ | तपस्यामें रत उन मेरे पिताके तपसे प्रसन्न होकर वज्रधारी इन्द्रने शिलादसे कहा—मैं तुमपर अति प्रसन्न हूँ; अतएव वर माँगो ॥ ३ ॥ |
| ततः प्रणम्य देवेशं सहस्राक्षं सहामरैः।<br>प्रोवाच मुनिशार्दूल कृताञ्जलिपुटो हरिम्॥ ४ | तब देवताओंसमेत सहस्रनेत्र देवेन्द्रको प्रणाम करके मुनिश्रेष्ठ शिलादने दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा ॥ ४ ॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् देवतारिघ्न सहस्राक्ष वरप्रद।<br>अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रमिच्छामि सुव्रत॥ ५ | शिलाद बोले— हे भगवन् ! हे असुर-दलन ! हे सहस्रनयन ! हे वरप्रद ! हे सुव्रत ! मैं अयोनिज तथा अमर पुत्र चाहता हूँ ॥ ५ ॥ |
| शक्र उवाच<br>पुत्रं दास्यामि विप्रर्षे योनिजं मृत्युसंयुतम्।<br>अन्यथा ते न दास्यामि मृत्युहीना न सन्ति वै॥ ६ | इन्द्र बोले— हे विप्रवर ! मैं तुम्हें योनिज तथा मरणधर्मा पुत्रका वर दे सकता हूँ; क्योंकि मरणहीन तो |
| १६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न दास्यति सुतं तेऽत्र मृत्युहीनमयोनिजम्।<br>पितामहोऽपि भगवान् किमुतान्ये महामुने॥ ७ | कोई भी नहीं है॥ ६॥<br>हे महामुने! अयोनिज तथा मृत्युसे हीन पुत्र तो तुम्हें भगवान् ब्रह्मा भी नहीं दे सकते; अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या?॥ ७॥ |
| सोऽपि देवः स्वयं ब्रह्मा मृत्युहीनो न चेश्वरः।<br>योनिजश्च महातेजाश्चाण्डजः पद्मसम्भवः॥ ८<br><br>महेश्वराङ्गजश्चैव भवान्यास्तनयः प्रभुः।<br>तस्याप्यायुः समाख्यातं परार्धद्वयसम्मितम्॥ ९<br><br>कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै।<br>समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परत्र ये॥ १० | साक्षात् वे परमेश्वर ब्रह्मदेव भी मृत्युहीन नहीं हैं। महान् तेजस्वी ब्रह्मा भी योनिज है; क्योंकि उनकी भी उत्पत्ति अण्ड तथा कमलसे हुई है। वे प्रभु ब्रह्मा महेश्वर एवं भवानीके पुत्र हैं। उनकी भी आयु दो परार्धके बराबर कही गयी है। प्रथम परार्धमें हजारों करोड़ कल्प भी ब्रह्माके दिनके रूपमें व्यतीत हो चुके हैं और द्वितीय परार्धमें उतने ही कल्प शेष हैं॥ ८-१०॥ |
| तस्मादयोनिजे पुत्रे मृत्युहीने प्रयत्नतः।<br>परित्यजाशां विप्रेन्द्र गृहाणात्मसमं सुतम्॥ ११ | अतएव हे विप्रेन्द्र! अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्रकी आशा प्रयत्नपूर्वक छोड़ दीजिये और अपने तुल्य पुत्र ग्रहण कीजिये॥ ११॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पिता मे लोकविश्रुतः।<br>शिलाद इति पुण्यात्मा पुनः प्राह शचीपतिम्॥ १२ | नन्दीश्वर बोले—उनका वह वचन सुनकर शिलाद नामसे लोक-विख्यात मेरे पुण्यात्मा पिताने शचीपति इन्द्रसे पुनः कहा॥ १२॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन्नण्डयोनित्वं पद्मयोनित्वमेव च।<br>महेश्वराङ्गयोनित्वं श्रुतं वै ब्रह्मणो मया॥ १३<br><br>पुरा महेन्द्र दायादाद् गदतश्चास्य पूर्वजात्।<br>नारदाद्वै महाबाहो कथमत्राशु नो वद॥ १४<br><br>दाक्षायणी सा दक्षोऽपि देवः पद्मोद्भवत्मजः।<br>पौत्री कनकगर्भस्य कथं तस्याः सुतो विभुः॥ १५ | शिलाद बोले—हे भगवन्! हे महेन्द्र! मैंने पूर्वकालमें इन ब्रह्माके पूर्वोत्पन्न नारद नामक पुत्रद्वारा ऐसा कहते हुए सुन रखा है कि ये ब्रह्मा अण्ड, कमल और शिवजीके अंगसे उत्पन्न हैं; तो हे महाबाहो! मुझे आप शीघ्र बताइये कि ऐसा कैसे है? दक्षप्रजापति तो पद्मयोनि ब्रह्माजीके पुत्र हैं। इस प्रकार दक्षकी पुत्री हिरण्यगर्भ ब्रह्माकी पौत्री हुई; तो फिर वे प्रभु ब्रह्मा उन दाक्षायणीके पुत्र कैसे हुए?॥ १३-१५॥ |
| शक्र उवाच<br>स्थाने संशयितुं विप्र तव वक्ष्यामि कारणम्।<br>कल्पे तत्पुरुषे वृत्तं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ १६<br><br>ससर्ज सकलं ध्यात्वा ब्रह्माणं परमेश्वरः।<br>जनार्दनो जगन्नाथः कल्पे वै मेघवाहने॥ १७<br><br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु मेघो भूत्वावहद्धरम्।<br>नारायणो महादेवं बहुमानेन सादरम्॥ १८ | इन्द्र बोले—हे विप्र! इस स्थितिमें आपका संदेह करना युक्तिपूर्ण है; किंतु मैं आपको इसका कारण बता रहा हूँ। तत्पुरुष नामक कल्पमें परमेष्ठी शिवकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई और उन परमेश्वरने ध्यान करके कलायुक्त ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। जनार्दन जगत्पति नारायण विष्णुभगवान् मेघवाहन कल्पमें हजार दिव्य वर्षोंतक मेघ बनकर अत्यन्त सम्मान तथा आदरके साथ महादेव शिवके वाहन बने रहे॥ १६-१८॥ |
| दृष्ट्वा भावं महादेवो हरेः स्वात्मनि शङ्करः।<br>प्रददौ तस्य सकलं स्रष्टुं वै ब्रह्मणा सह॥ १९ | महादेव शिवने अपनेमें भगवान् विष्णुकी भक्ति देखकर उन्हें ब्रह्माजीसहित सम्पूर्ण जगत् रचनेकी आज्ञा दी॥ १९॥ |
| अध्याय ३७ ] | नन्दीके जन्मका वृत्तान्त···शिवद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुपर अनुग्रह करना | १६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तदा तं कल्पमाहुर्वै मेघवाहनसंज्ञया।<br>हिरण्यगर्भस्तं दृष्ट्वा तस्य देहोद्भवस्तदा॥ २०<br>जनार्दनसुतः प्राह तपसा प्राप्य शङ्करम्।<br>तव वामाङ्गजो विष्णुर्र्दक्षिणाङ्गभवो ह्यहम्॥ २१ | तभीसे उस कल्पको 'मेघवाहन' नामसे कहा जाता है। उन विष्णुको देखकर उन्हींके देहसे उत्पन्न जनार्दनपुत्र हिरण्यगर्भ ब्रह्माने अपनी तपस्यासे शंकरजीको प्राप्तकर उनसे कहा- ॥ २०^{१}/_२ ॥<br>विष्णु आपके वाम अंगसे उत्पन्न हैं तथा मैं आपके दायें अंगसे उत्पन्न हूँ; फिर भी उन विष्णुने मेरे साथ सम्पूर्ण जगत्की रचना की॥ २१^{१}/_२ ॥ |
| मया सह जगत्सर्वं तथाप्यसृजदच्युतः।<br>जगन्मयोऽवहद्यस्मान्मेघो भूत्वा दिवानिशम्॥ २२<br>भवन्तमवहद्विष्णुर्देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>नारायणादपि विभो भक्तोऽहं तव शङ्कर॥ २३<br>प्रसीद देहि मे सर्वं सर्वात्मत्वं तव प्रभो।<br>तदाथ लब्ध्वा भगवान् भवात्सर्वात्मतां क्षणात्॥ २४ | यद्यपि जगन्मय विष्णुने मेघ बनकर आप देवदेव जगद्गुरु महेश्वरका दिन-रात वहन किया है; फिर भी हे विभो! हे शंकर! मैं उन नारायणसे भी बढ़कर आपका भक्त हूँ। अतएव हे प्रभो! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये और मुझे अपना सर्वात्मत्व प्रदान कीजिये॥ २२-२३^{१}/_२ ॥<br>तत्पश्चात् महादेवजीसे सर्वात्मत्वकी प्राप्ति करके ब्रह्माजीने शीघ्रतापूर्वक क्षीरसागर पहुँचकर वहाँ एकार्णवमें पुरुषोत्तम विष्णुको भीषण अन्धकारमें मानसनिर्मित, स्वर्णरत्न-खचित, दुर्जनोंद्वारा दुष्प्राप्य तथा सनक आदि पुण्यात्माओंद्वारा अगोचर शुभ्र एवं दिव्य भवनमें देखा॥ २४-२६॥ |
| त्वरमाणोऽथ सङ्गम्य ददर्श पुरुषोत्तमम्।<br>एकार्णवालये शुभ्रे त्वन्धकारे सुदारुणे॥ २५<br>हेमरत्नचिते दिव्ये मनसा च विनिर्मिते।<br>दुष्प्राप्ये दुर्जनैः पुण्यैः सनकाद्यैरगोचरे॥ २६<br>जगदावासहृदयं ददर्श पुरुषं त्वजः।<br>अनन्तभोगशय्यायां शायिनं पङ्कजेक्षणम्॥ २७ | |
| शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं चतुर्भुजम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं शशिमण्डलसन्निभम्॥ २८<br>श्रीवत्सलक्षणं देवं प्रसन्नास्यं जनार्दनम्।<br>रमामृदुकराम्भोजस्पर्शरक्तपदाम्बुजम् ॥ २९<br>परमात्मानमीशानं तमसा कालरूपिणम्।<br>रजसा सर्वलोकानां सर्गलीलाप्रवर्तकम्॥ ३०<br>सत्त्वेन सर्वभूतानां स्थापकं परमेश्वरम्।<br>सर्वात्मानं महात्मानं परमात्मानमीश्वरम्॥ ३१<br>क्षीरार्णवेऽमृतमये शायिनं योगनिद्रया।<br>तं दृष्ट्वा प्राह वै ब्रह्मा भगवन्तं जनार्दनम्॥ ३२ | ब्रह्माजीने जगत्को अपने हृदयमें धारण करनेवाले, चारों भुजाओंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले, सभी आभूषणोंसे युक्त, चन्द्र-मण्डलतुल्य आभावाले, अपने वक्षःस्थलपर 'श्री' चिह्न धारण करनेवाले, तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरूप, रजोगुणसे युक्त होनेपर सभी लोकोंकी सृजन-लीलाके प्रवर्तक, सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर सभी प्राणियोंके स्थापक, कमलनयन, प्रसन्नमुख, जनार्दन, परमपुरुष, परमात्मा, ईशान, सर्वात्मा, महात्मा, देवरूप ईश्वर विष्णुको उस अमृतमय क्षीरसागरमें अनन्त शेषनागकी शय्यापर योगनिद्रामें सोये हुए देखा; उस समय उनके रक्त-कमल-सदृश चरणोंको लक्ष्मीजी अपने अरविन्द-तुल्य कोमल हाथोंसे दबा रही थीं॥ २७-३१^{१}/_२ ॥ |
| ग्रसामि त्वां प्रसादेन यथापूर्वं भवानहम्।<br>स्मयमानस्तु भगवान् प्रतिबुध्य पितामहम्॥ ३३ | भगवान् जनार्दनको देखकर ब्रह्माजीने उनसे कहा कि जिस प्रकार पहले आपने मुझे ग्रस लिया था, उसी प्रकार शिवजीकी कृपासे अब मैं आपको ग्रसूँगा॥ ३२^{१}/_२ ॥ |
| उदैक्षत महाबाहुः स्मितमीषच्चकार सः।<br>विवेश चाण्डजं तं तु ग्रस्तस्तेन महात्मना॥ ३४ | भगवान् विष्णुने उठकर विस्मयपूर्ण भावसे ऊपर दृष्टि करके ब्रह्माजीको देखा और उन महाबाहुने थोड़ा |
३८- विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायण-द्वारा सृष्टिका वर्णन
| १६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| ततस्तं चासृजद् ब्रह्मा भ्रुवोर्मध्येन चाच्युतम्।<br>सृष्टस्तेन हरिः प्रेक्ष्य स्थितस्तस्त्याथ सन्निधौ ॥ ३५ | हँसकर ब्रह्माजीके भीतर प्रवेश किया। उन महात्मा ब्रह्माने भी उन्हें ग्रस लिया॥ ३३-३४॥<br>तत्पश्चात् ब्रह्माजीने अपने भ्रूमध्यसे उन विष्णुजीको पुनः उत्पन्न कर दिया और इस प्रकार उनके द्वारा सृजित होकर भगवान् विष्णु उन्हें देखकर उनके पास खड़े हो गये॥ ३५॥ | | एतस्मिन्नन्तरे रुद्रः सर्वदेवभवोद्भवः।<br>विकृतं रूपमास्थाय पुरा दत्तवरस्तयोः॥ ३६<br>आगच्छद्यत्र वै विष्णुर्विश्वात्मा परमेश्वरः।<br>प्रसादममुलं कर्तुं ब्रह्मणश्च हरेः प्रभुः॥ ३७ | इसी बीच पूर्वकालमें उन दोनों [ब्रह्मा, विष्णु]-को वर देनेवाले सभी देवताओं तथा जगत्की उत्पत्ति करनेवाले विश्वात्मा प्रभु परमेश्वर शिव विकृत रूप धारण करके ब्रह्मा एवं विष्णुपर महान् अनुग्रह करनेके लिये जहाँ विष्णुजी थे, वहींपर आ गये॥ ३६-३७॥ | | ततः समेत्य तौ देवौ सर्वदेवभवोद्भवम्।<br>अपश्यतां भवं देवं कालाग्निसदृशं प्रभुम्॥ ३८ | इसके बाद उन दोनों देवोंने शिवजीके पास पहुँचकर कालाग्नितुल्य उन सभी देवताओं तथा जगत्की उत्पत्ति करनेवाले महादेवका दर्शन किया॥ ३८॥ | | तौ तं तुष्टुवतुश्चैव शर्वमुग्रं कपर्दिनम्।<br>प्रणेमतुश्च वरदं बहुमानेन दूरतः॥ ३९ | उन दोनों (ब्रह्मा, विष्णु)-ने दूरसे ही सम्मानपूर्वक उन शर्व (भक्तोंके पापोंका नाश करनेवाले), कपर्दी (जटाजूटधारी), उग्र तथा वर देनेवाले शिवजीको प्रणाम किया और पुनः वे उनकी स्तुति करने लगे॥ ३९॥ | | भवोऽपि भगवान् देवमनुगृह्य पितामहम्।<br>जनार्दनं जगन्नाथस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ४० | जगत्के स्वामी भगवान् शिव पितामह ब्रह्मदेव तथा जनार्दन विष्णुपर अनुग्रह करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ ४०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मणो वरप्रदानं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्माको वरप्रदान' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायणद्वारा सृष्टिका वर्णन
| शैलादिरुवाच<br>गते महेश्वरे देवे तमुद्दिश्य जनार्दनः।<br>प्रणम्य भगवान् प्राह पद्मयोनिमजोद्भवः॥ १ | **नन्दीश्वर बोले—**तदनन्तर महेश्वर महादेवके चले जानेपर ब्रह्माजीसे उत्पन्न भगवान् विष्णु पद्मयोनि पितामहको उद्देश्य करके प्रणामकर उनसे कहने लगे॥ १॥ | | श्रीविष्णुरुवाच<br>परमेशो जगन्नाथः शङ्करस्त्वेष सर्वगः।<br>आवयोरखिलस्येशः शरणं च महेश्वरः॥ २ | **श्रीविष्णु बोले—**सर्वत्र गमनका सामर्थ्य रखनेवाले ये परमेश्वर ईश्वर जगन्नाथ महेश्वर शिव सम्पूर्ण जगत्के तथा हमदोनोंके शरण हैं॥ २॥ | | अहं वामाङ्गजो ब्रह्मन् शङ्करस्य महात्मनः।<br>भवान् भवस्य देवस्य दक्षिणाङ्गभवः स्वयम्॥ ३<br>मामाहुर्ऋषयः प्रेक्ष्य प्रधानं प्रकृतिं तथा।<br>अव्यक्तमजममित्येवं भवन्तं पुरुषस्त्विति॥ ४ | हे ब्रह्मन्! मैं महात्मा शिवके वाम अंगसे जायमान हूँ तथा स्वयं आप महादेव रुद्रके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए हैं। अतएव इस विषयमें सम्यक् विचारकर ऋषियोंने मुझे प्रधान तथा प्रकृति एवं आपको अव्यक्त, अज तथा पुरुष कहा है॥ ३-४॥ |
अध्याय ३८ ] विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायणद्वारा सृष्टिका वर्णन १६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवमाहुर्महादेवमावयोरपि कारणम्।<br>ईशं सर्वस्य जगतः प्रभुमव्ययमीश्वरम्॥ ५ | इस प्रकार अविनाशी ईश्वर महादेवको हम दोनोंका भी कारण तथा सम्पूर्ण जगत्का स्वामी कहा गया है॥ ५॥ |
| सोऽपि तस्यामरेशस्य वचनाद्वारिजोद्भवः।<br>वरेण्यं वरदं रुद्रमस्तुवत्प्रणनाम च॥ ६ | उन देवेश विष्णुका वचन सुनकर उन पद्मयोनि ब्रह्माने भी वर प्रदान करनेवाले पूज्य महादेवको बार-बार प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की॥ ६॥ |
| अथाम्भसा प्लुतां भूमिं समादाय जनार्दनः।<br>पूर्ववत्स्थापयामास वाराहं रूपमास्थितः॥ ७ | इसके अनन्तर वाराहरूप धारणकर जनार्दन विष्णुने जलसे व्याप्त भूमिको लाकर पुनः पूर्वकी भाँति स्थापित किया॥ ७॥ |
| नदीनदसमुद्रांश्च पूर्ववच्चाकरोत्प्रभुः।<br>कृत्वा चोर्वीं प्रयत्नेन निम्नोन्नतविवर्जिताम्॥ ८<br>धरायां सोऽचिनोत्सर्वान् भूधरान् भूधराकृतिः।<br>भूराद्यांश्चतुरो लोकान् कल्पयामास पूर्ववत्॥ ९ | तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने नदियों, नदों तथा समुद्रोंको पहलेकी भाँति कर दिया। पुनः पृथ्वीको ऊँचाई एवं निचाईसे रहितकर भूधरकी आकृतिवाले उन भगवान्ने उस समतल धरापर समस्त पर्वत स्थापित किये, भूलोक आदि चार लोक पूर्वकी भाँति रचे॥ ८-९॥ |
| स्रष्टुं च भगवान् चक्रे मतिं मतिमतां वरः।<br>मुख्यं च तैर्यग्योन्यं च दैविकं मानुषं तथा॥ १०<br>विभुश्चानुग्रहं तत्र कौमारकमदीनधीः।<br>पुरस्तादसृजद्देवः सनन्दं सनकं तथा॥ ११ | पुनः बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ, प्रखर प्रतिभावाले तथा ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् विष्णुने मुख्य सर्ग, तिर्यक् सर्ग (पशुसर्ग), देवसर्ग, मनुष्यसर्ग, अनुग्रहसर्ग एवं कौमारसर्ग रचनेका विचार किया॥ १० १/२॥ |
| सनातनं सतां श्रेष्ठं नैष्कर्म्येण गताः परम्।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्॥ १२<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद्योगविद्यया।<br>सङ्कल्पं चैव धर्मं च ह्यधर्मं भगवान् प्रभुः॥ १३<br>द्वादशैव प्रजास्त्वेता ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। | उन विष्णुने आरम्भमें सनन्द, सनक तथा महात्माओंमें श्रेष्ठ सनातनका सृजन किया, जो निष्काम ज्ञानयोगमें प्रवृत्त होकर ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हुए॥ ११ १/२॥<br>इसके बाद सबके स्वामी भगवान् विष्णुने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ, संकल्प, धर्म तथा अधर्मको योगविद्यासे रचा। अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी ये ही बारह संतानें हैं॥ १२-१३ १/२॥ |
| ऋभुं सनत्कुमारं च ससर्जादौ सनातनः॥ १४<br>तौ चोर्ध्वरेतसौ दिव्यौ चाग्रजौ ब्रह्मवादिनौ।<br>कुमारौ ब्रह्मणस्तुल्यौ सर्वज्ञौ सर्वभाविनौ॥ १५ | शाश्वत विष्णुने आरम्भमें ऋभु तथा सनत्कुमारका सृजन किया। पूर्वमें उत्पन्न वे दोनों कुमार ऊर्ध्वरेता, दिव्य, ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सभी प्रकारके भावोंसे सम्पन्न तथा ब्रह्माजीके ही सदृश थे॥ १४-१५॥ |
| एवं मुख्यादिकान् सृष्ट्वा पद्मयोनिः शिलाशन।<br>युगधर्मानशेषांश्च कल्पयामास विश्वसृक्॥ १६ | हे शिलाद! इस प्रकार मुख्य आदि सर्गोंकी सृष्टि करके विश्वकी रचना करनेवाले पद्मयोनि (विष्णु)-ने समस्त युगधर्मोंको प्रतिष्ठित किया॥ १६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वैष्णवकथनं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वैष्णवकथन' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३८॥
३९- सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन, द्वापरमें वेदसंहिताके विभाजनका एवं कल्पभेदसे विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन
| १७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
उनतालीसवाँ अध्याय
सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन, द्वापरमें वेदसंहिताके विभाजनका एवं कल्पभेदसे विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शैलादिरुवाच<br>श्रुत्वा शक्रेण कथितं पिता मम महामुनिः।<br>पुनः पप्रच्छ देवेशं प्रणम्य रचिताञ्जलिः॥ १ | नन्दीश्वर बोले— [हे सनत्कुमार!] इन्द्रका कथन सुनकर मेरे पिता महामुनि शिलादने दोनों हाथ जोड़कर देवेश इन्द्रको प्रणाम करके उनसे पुनः पूछा॥ १॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् शक्र सर्वज्ञ देवदेवनमस्कृत।<br>शचीपते जगन्नाथ सहस्त्राक्ष महेश्वर॥ २<br>युगधर्मान् कथं चक्रे भगवान् पद्मसम्भवः।<br>वक्तुमर्हसि मे सर्वं साम्प्रतं प्रणताय मे॥ ३ | शिलाद बोले— हे भगवन्! हे शक्र! हे सर्वज्ञ! हे सर्वदेवनमस्कृत! हे शचीपते! हे जगन्नाथ! हे सहस्राक्ष! हे महेश्वर! भगवान् पद्मयोनिने युगधर्म किस प्रकार कल्पित किये? आप इस विषयमें सब कुछ मुझ शरणागतको बतानेकी कृपा करें॥ २-३॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिलादस्य महात्मनः।<br>व्याजहार यथादृष्टं युगधर्मं सुविस्तरम्॥ ४ | शैलादि बोले— [हे सनत्कुमार!] महात्मा शिलादका वह वचन सुनकर इन्द्रने जैसा देखा था, उन युगधर्मोंका विस्तारसे वर्णन करना प्रारम्भ किया॥ ४॥ |
| शक्र उवाच<br>आद्यं कृतयुगं विद्धि ततस्त्रेतायुगं मुने।<br>द्वापरं तिष्यमित्येते चत्वारस्तु समासतः॥ ५ | इन्द्र बोले— हे मुने! आदिमें सत्ययुग, फिर त्रेतायुग, द्वापर तथा कलियुग—ये ही चार युग होते हैं; ऐसा आप संक्षेपमें जान लीजिये॥ ५॥ |
| सत्त्वं कृतं रजस्त्रेता द्वापरं च रजस्तमः।<br>कलिस्तमश्च विज्ञेयं युगवृत्तिर्युगेषु च॥ ६ | सत्ययुगको सत्त्वगुणरूप, त्रेतायुगको रजोगुणरूप, द्वापरयुगको रज-तमगुणरूप और कलियुगको तमोगुणरूप जानना चाहिये। इस प्रकार विभिन्न युगोंमें अलग-अलग युग-वृत्ति होती है॥ ६॥ |
| ध्यानं परं कृतयुगे त्रेतायां यज्ञ उच्यते।<br>भजनं द्वापरे शुद्धं दानमेव कलौ युगे॥ ७ | सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतायुगमें यज्ञ, द्वापरमें भजन तथा कलियुगमें विशुद्ध दानको श्रेष्ठ कहा गया है॥ ७॥ |
| चत्वारि च सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः॥ ८ | वह सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षोंके प्रमाणवाला है। उसकी सन्ध्या चार सौ दिव्य वर्षोंकी होती है तथा उसका सन्ध्यांश भी उसी प्रकार चार सौ दिव्य वर्षोंका होता है॥ ८॥ |
| चत्वारि च सहस्राणि मानुषाणि शिलाशन।<br>आयुः कृतयुगे विद्धि प्रजानामिह सुव्रत॥ ९ | हे शिलाद! हे सुव्रत! इस सत्ययुगमें प्रजाओंकी आयु चार हजार मनुष्य वर्षके बराबर जानिये॥ ९॥ |
| ततः कृतयुगे तस्मिन् सन्ध्यांशे च गते तु वै।<br>पादावशिष्टो भवति युगधर्मस्तु सर्वतः॥ १० | सत्ययुग तथा इसके सन्ध्यांश बीत जानेपर समग्र युग-धर्मका एक चरण घट जाता है। पुनः उत्तम त्रेतायुग प्रवृत्त होता है, जो तीन हजार दिव्य वर्षोंका होता है। |
| चतुर्भागैकहीनं तु त्रेतायुगमनुत्तमम्।<br>कृतार्धं द्वापरं विद्धि तदर्धं तिष्यमुच्यते॥ ११ | सत्ययुगके आधे प्रमाणके बराबर द्वापरको जानिये तथा उसके (द्वापरके) आधेके बराबर कलियुगका प्रमाण |
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन...विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन [१७१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| त्रिंशती द्विशती सन्ध्या तथा चैकशती मुने।<br>सन्ध्यांशकं तथाप्येवं कल्पेष्वेवं युगे युगे॥ १२ | कहा जाता है। हे मुने! उसी तरह त्रेतायुगकी सन्ध्या तीन सौ दिव्य वर्ष, द्वापरकी सन्ध्या दो सौ दिव्य वर्ष तथा कलियुगकी सन्ध्या एक सौ दिव्य वर्षकी होती है। सभीका सन्ध्यांश भी सन्ध्याकालके समान ही जानना चाहिये। प्रत्येक कल्पमें आनेवाले युगोंमें यही स्थिति होती है॥ १०-१२॥ |
| आद्ये कृतयुगे धर्मश्चतुष्पादः सनातनः।<br>त्रेतायुगे त्रिपादस्तु द्विपादो द्वापरे स्थितः॥ १३<br><br>त्रिपादहीनस्तिष्ये तु सत्तामात्रेण धिष्ठितः। | सनातन धर्म आरम्भके सत्ययुगमें चार चरणोंवाला, त्रेतामें तीन चरणोंवाला, द्वापरमें दो चरणोंवाला तथा कलियुगमें मात्र एक चरणवाला होकर अधिष्ठित रहता है॥ १३ १/२॥ |
| कृते तु मिथुनोत्पत्तिः वृत्तिः साक्षाद्रसोल्लसा॥ १४<br><br>प्रजास्तृप्ताः सदा सर्वाः सर्वानन्दाश्च भोगिनः।<br>अधमोत्तमता तासां न विशेषाः प्रजाः शुभाः॥ १५ | सत्ययुगमें स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पत्ति होती है तथा उनकी वृत्ति मधुर रसोंसे सम्पन्न होती है। उस युगमें समस्त प्रजाएँ सभी प्रकारके आनन्दों एवं भोगोंसे पूर्ण तृप्त रहती हैं। उनमें अधमता तथा उत्तमताका कोई भेद नहीं रहता है और सभी प्रजाएँ शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न रहती हैं॥ १४-१५॥ |
| तुल्यमायुः सुखं रूपं तासां तस्मिन् कृते युगे।<br>तासां प्रीतिर्न च द्वन्द्वं न द्वेषो नास्ति च क्लमः॥ १६ | उस सत्ययुगमें वे प्रजाएँ समान आयु, सुख तथा रूपवाली होती हैं। उनमें परस्पर द्वेष, द्वन्द्व एवं अवसाद नहीं रहता है, अपितु वे एक-दूसरेसे प्रेम करती हैं॥ १६॥ |
| पर्वतोदधिवासिन्यो ह्यनिकेताश्रयास्तु ताः।<br>विशोकाः सत्त्वबहुला एकान्तबहुलास्तथा॥ १७ | सत्ययुगमें वे प्रजाएँ घरका आश्रय न लेकर पर्वतों तथा समुद्रोंके सान्निध्यमें निवास करती हैं। सभी लोग शोकरहित, पराक्रमसम्पन्न एवं एकान्तप्रिय होते हैं॥ १७॥ |
| ता वै निष्कामचारिण्यो नित्यं मुदितमानसाः।<br>अप्रवृत्तिः कृतयुगे कर्मणोः शुभपापयोः॥ १८<br><br>वर्णाश्रमव्यवस्था च तदासीन्न च सङ्करः। | कृतयुगमें वे प्रजाएँ निष्काम कर्मोंमें प्रवृत्त रहनेवाली तथा सदा प्रसन्न मनवाली होती हैं। वे कर्मोंके पाप और पुण्यकी भावनासे रहित होती हैं। उस समय वर्णाश्रम-व्यवस्था रहती है, किंतु वर्णसंकर दोष विद्यमान नहीं रहता है॥ १८ १/२॥ |
| रसोल्लासः कालयोगात् त्रेताख्ये नश्यते द्विज॥ १९<br><br>तस्यां सिद्धौ प्रनष्टायामन्या सिद्धिः प्रजायते। | हे द्विज! कालयोगसे त्रेतायुगमें रसोंका प्रादुर्भाव समाप्त होने लगता है। उस युगमें सिद्धिके नष्ट हो जानेपर अन्य सिद्धि उत्पन्न होती है॥ १९ १/२॥ |
| अपां सौक्ष्म्ये प्रतिगते तदा मेघात्मना तु वै॥ २०<br><br>मेघेभ्यः स्तनयित्नुभ्यः प्रवृत्तं वृष्टिसर्जनम्।<br>सकृदेव तया वृष्ट्या संयुक्ते पृथिवीतले॥ २१<br><br>प्रादुरासंस्तदा तासां वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः।<br>सर्ववृत्त्युपभोगस्तु तासां तेभ्यः प्रजायते॥ २२ | जलकी अल्पता हो जानेपर भगवान् मेघात्मा गर्जनयुक्त मेघोंके माध्यमसे जल बरसाते हैं और एक बारमें ही उस वृष्टिसे पृथ्वीतलके संयुक्त हो जानेपर वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं; इस प्रकार वे वृक्ष ही प्रजाओंके |
| १७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| वर्तयन्ति स्म तेभ्यस्तास्त्रेतायुगमुखे प्रजाः।<br>ततः कालेन महता तासामेव विपर्ययात्॥ २३ | गृहरूप बन जाते हैं। उन प्रजाओंकी सम्पूर्ण वृत्ति तथा उपभोग उन्हीं वृक्षोंपर आश्रित रहता है। इस प्रकार त्रेतायुगके आरम्भमें प्रजाएँ जीवनयापन-सम्बन्धी सभी व्यवहार उन्हीं वृक्षोंपर आश्रित होकर करती हैं॥ २०—२२^१/_२॥ | | रागलोभात्मको भावस्तदा ह्याकस्मिकोऽभवत्।<br>विपर्ययेण तासां तु तेन तत्कालभाविना॥ २४ | पश्चात् अधिक समय बीतनेपर उनके [बुद्धि]-विपर्ययसे उन प्रजाओंमें अकस्मात् राग तथा लोभसे युक्त भाव उत्पन्न हो जाते हैं॥ २३^१/_२॥ | | प्रणश्यन्ति ततः सर्वे वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः।<br>ततस्तेषु प्रणष्टेषु विभ्रान्ता मैथुनोद्भवाः॥ २५ | उन प्रजाओंमें उस समय उत्पन्न उस विपर्ययके कारण उनके गृहसंज्ञक सभी वृक्ष नष्ट हो जाते हैं॥ २४^१/_२॥ | | अपि ध्यायन्ति तां सिद्धिं सत्याभिध्यायिनस्तदा।<br>प्रादुर्बभूवुस्तासां तु वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः॥ २६ | तब उन वृक्षोंके नष्ट हो जानेपर मैथुनसे उत्पन्न वे प्रजाएँ भ्रमित हो जाती हैं। इसके बाद सत्यका चिन्तन करनेवाले वे प्रजागण उस सिद्धिका फिरसे ध्यान करते हैं॥ २५^१/_२॥ | | वस्त्राणि ते प्रसूयन्ते फलान्याभरणानि च।<br>तेष्वेव जायते तासां गन्धवर्णरसान्वितम्॥ २७ | इस प्रकार ध्यानके फलस्वरूप उनके गृहसंज्ञक वे वृक्ष फिरसे उत्पन्न हो जाते हैं। वे वृक्ष प्रजाओंके लिये वस्त्र, भूषण तथा नानाविध फल उत्पन्न करते हैं॥ २६^१/_२॥ | | अमाक्षिकं महावीर्यं पुटके पुटके मधु।<br>तेन ता वर्तयन्ति स्म सुखमायुः सदैव हि॥ २८ | उनके लिये उन वृक्षोंके पत्ते-पत्तेमें गन्ध-वर्ण-रससे युक्त, शक्तिवर्धक तथा अमाक्षिक (मक्षिकारहित) मधु पैदा होता है॥ २७^१/_२॥ | | हृष्टपुष्टास्तया सिद्ध्या प्रजा वै विगतज्वराः।<br>ततः कालान्तरेणैव पुनर्लोभावृतास्तु ताः॥ २९ | उसी मधुसे प्रजाएँ सुखपूर्वक सदा जीवनयापन करती हैं और वे उसी सिद्धिसे सन्तापरहित होकर सर्वदा हृष्ट-पुष्ट रहती हैं॥ २८^१/_२॥ | | वृक्षांस्तान् पर्यगृह्णन्ति मधु वा माक्षिकं बलात्।<br>तासां तेनोपचारेण पुनर्लोभकृतेन वै॥ ३० | तत्पश्चात् कालान्तरमें वे प्रजाएँ पुनः लोभके वशीभूत होकर बलपूर्वक उन वृक्षों अथवा माक्षिक मधुका हरण करती हैं॥ २९^१/_२॥ | | प्रणष्टा मधुना सार्धं कल्पवृक्षाः क्वचित्क्वचित्।<br>तस्यामेवाल्पशिष्टायां सिद्ध्यां कालवशात्तदा॥ ३१ | लोभमें पड़कर उनके द्वारा किये गये इस अनाचारपूर्ण कृत्यसे मधुके साथ-साथ कहीं-कहीं वे कल्पवृक्ष भी नष्ट हो जाते हैं॥ ३०^१/_२॥ | | आवर्तनात्तु त्रेतायां द्वन्द्वान्यभ्युत्थितानि वै।<br>शीतवर्षातपैस्तीव्रैस्ततस्ता दुःखिता भृशम्॥ ३२ | पुनः उस त्रेतामें कालयोगसे अवशिष्ट सिद्धियोंमें आवर्तन हो जानेसे द्वन्द्व उत्पन्न होने लगते हैं॥ ३१^१/_२॥ | | द्वन्द्वैः सम्पीज्यमानाश्च चक्रुरावरणानि तु।<br>कृतद्वन्द्वप्रतीघाताः केतनानि गिरौ ततः॥ ३३ | पुनः तीव्र शीत, वर्षा तथा आतपसे प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित हो जाती हैं और इन द्वन्द्वोंसे पीड़ित प्रजाएँ अपने आवरणका उपाय करने लगती हैं॥ ३२^१/_२॥ |
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन...विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७३
| पूर्वं निकामचारास्ता ह्यनिकेता अथावसन्।<br>यथायोगं यथाप्रीति निकेतेष्ववसन् पुनः॥ ३४ | द्वन्द्वोंसे निरन्तर प्रतिहत प्रजाएँ पर्वतोंपर घर बनाने लगती हैं। इसलिये पूर्वमें स्वेच्छाचारितापूर्ण वे प्रजाएँ, जो बिना घरके रहती थीं, पुनः अपने अनुकूल तथा सुविधाजनक घरोंमें रहने लगती हैं॥ ३३-३४॥ |
| कृत्वा द्वन्द्वोपघातांस्तान् वृत्त्युपायमचिन्तयन्।<br>नष्टेषु मधुना सार्धं कल्पवृक्षेषु वै तदा॥ ३५ | मधुके साथ उन कल्पवृक्षोंके भी नष्ट हो जानेपर पुनः उन द्वन्द्वोंके प्रति उपघात करती हुई वे प्रजाएँ जीविकोपार्जनका उपाय सोचने लगती हैं॥ ३५॥ |
| विवादव्याकुलास्ता वै प्रजास्तृष्णाक्षुधार्दिताः।<br>ततः प्रादुर्बभौ तासां सिद्धिस्त्रेतायुगे पुनः॥ ३६ | वे प्रजाएँ पुनः जब विवादसे व्याकुल तथा भूख एवं प्याससे पीड़ित हो जाती हैं, तब त्रेतायुगमें उनमें सिद्धिका प्रादुर्भाव पुनः होता है॥ ३६॥ |
| वार्तायाः साधिकाप्यन्या वृष्टिस्तासां निकामतः।<br>तासां वृष्ट्युदकादीनि ह्यभवन्निम्नगानि तु॥ ३७ | उनके लिये कृषि-कार्यको पूर्णतः सिद्ध करनेवाली दूसरी अन्य वृष्टि होती है। वृष्टिजनित वे जल आदि नदियोंके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं॥ ३७॥ |
| अभवन् वृष्टिसन्तत्या स्रोतस्थानानि निम्नगाः।<br>एवं नद्यः प्रवृत्तास्तु द्वितीये वृष्टिसर्जने॥ ३८ | सतत वृष्टि होनेसे नदियाँ तथा जलके अन्य उद्गमस्थान हो गये। इस प्रकार दूसरे वृष्टि-सर्जनमें नदियोंका प्रादुर्भाव हो गया॥ ३८॥ |
| ये पुनस्तदपां स्तोकाः पतिताः पृथिवीतले।<br>अपां भूमेश्च संयोगादोषध्यस्तास्तदाभवन्॥ ३९<br><br>अथाल्पकृष्टाश्चानुप्ता ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश।<br>ऋतुपुष्पफलाश्चैव वृक्षगुल्माश्च जज्ञिरे॥ ४०<br><br>प्रादुर्भूतानि चैतानि वृक्षजात्यौषधानि च।<br>तेनौषधेन वर्तन्ते प्रजास्त्रेतायुगे तदा॥ ४१ | इस प्रकार पृथवीतलपर जो जल-बिन्दु गिरे; उन जलों तथा भूमिके संयोगसे अल्प-कृष्ट एवं बिना बोये चौदह प्रकारकी वन्य तथा ग्राम्य (वन एवं ग्रामीण क्षेत्रोंमें उगनेवाली) औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं। ऋतुसम्बन्धी विभिन्न पुष्प, फल, वृक्ष एवं पौधे उग गये। इस प्रकार ये विभिन्न जातिके वृक्ष तथा औषध उत्पन्न हो गये और उस त्रेतायुगमें प्रजाएँ उन्हीं औषधियोंसे ही अपना जीवन-निर्वाह करने लगीं॥ ३९—४१॥ |
| ततः पुनरभूत्तासां रागो लोभश्च सर्वशः।<br>अवश्यं भाविनाथेन त्रेतायुगवशेन च॥ ४२<br><br>ततस्ताः पर्यगृह्णन्त नदीक्षेत्राणि पर्वतान्।<br>वृक्षगुल्मौषधीश्चैव प्रसह्य तु यथाबलम्॥ ४३<br><br>विपर्ययेण चौषध्यः प्रनष्टास्ताश्चतुर्दश।<br>मत्वा धरां प्रविष्टास्ता इत्यौषध्यः पितामहः॥ ४४ | इसके बाद उन प्रजाओंमें हर प्रकारसे राग तथा लोभका उदय हुआ और त्रेतायुगके प्रभावसे होनेवाली अवश्यम्भाविताके कारण वे प्रजाएँ नदीक्षेत्रों तथा पर्वतोंका अतिक्रमण करने लगीं और वृक्ष, गुल्मों एवं औषधियोंका बलपूर्वक पुनः हरण करने लगीं। उनके इस विपरीत आचरणसे चौदहों प्रकारकी औषधियाँ विनष्ट हो गयीं॥ ४२-४३ १/२॥ |
| दुदोह गां प्रयत्नेन सर्वभूतहिताय वै।<br>तदाप्रभृति चौषध्यः फालकृष्टास्त्वितस्ततः॥ ४५ | अब वे औषधियाँ पृथ्वीमें समा गयीं—ऐसा मानकर भगवान् विष्णुने राजा पृथुके रूपमें होकर सभी प्राणियोंके कल्याणार्थ पृथ्वीरूप गायका दोहन किया। उसी समयसे हलके फालसे जुती हुई भूमिमें यहाँ-वहाँ |
| १७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| औषधियाँ उत्पन्न होने लगीं ॥ ४४-४५ ॥ | |
|---|---|
| वार्ता कृषिं समायाता वर्तुकामाः प्रयत्नतः ।<br>वार्तावृत्तिः समाख्याता कृषिकामप्रयत्नतः ॥ ४६ | इस तरह अब जीनेकी इच्छा रखनेवाली प्रजाएँ प्रयत्नपूर्वक कृषि कार्य करने लग गयीं। कृषिमें प्रयत्नपूर्वक इच्छा रखनेके कारण इसे 'वार्तावृत्ति' कहा गया ॥ ४६ ॥ |
| अन्यथा जीवितं तासां नास्ति त्रेतायुगात्यये ।<br>हस्तोद्भवा ह्यापश्चैव भवन्ति बहुशस्तदा ॥ ४७ | त्रेतायुगके उस अन्तिम कालमें इस कृषिको छोड़कर आजीविकाका कोई अन्य उपाय नहीं था। उस समय [खनित्र आदिके उपयोग बिना ही] हाथसे ही खोदकर पर्याप्त जल प्राप्त हो जाता था ॥ ४७ ॥ |
| तत्रापि जगृहुः सर्वे चान्योन्यं क्रोधमूर्च्छिताः ।<br>सुतदारधनाद्यांस्तु बलाद्युगबलेन तु ॥ ४८ | उस समय सभी लोग युग-प्रभावके कारण क्रोधके वशीभूत होकर बलपूर्वक एक-दूसरेके पुत्र, स्त्री, धन आदिका हरण कर लेते थे ॥ ४८ ॥ |
| मर्यादायाः प्रतिष्ठार्थं ज्ञात्वा तदखिलं विभुः ।<br>ससर्ज क्षत्रियांस्त्रातुं क्षतात्कमलसम्भवः ॥ ४९ | वह सम्पूर्ण स्थिति देखकर मर्यादाकी प्रतिष्ठा करनेके लिये तथा दुःखसे रक्षा करनेके लिये भगवान् कमलयोनिने क्षत्रियोंकी उत्पत्ति की ॥ ४९ ॥ |
| वर्णाश्रमप्रतिष्ठां च चकार स्वेन तेजसा ।<br>वृत्तेन वृत्तिना वृत्तं विश्वात्मा निर्ममे स्वयम् ॥ ५० | विश्वात्मा भगवान्ने अपने तेजसे वर्णाश्रम-व्यवस्था स्थापित की तथा उन्होंने स्वधर्मानुसार जीविकाद्वारा जीवनका निर्माण (परिपालन) स्वयं किया ॥ ५० ॥ |
| यज्ञप्रवर्तनं चैव त्रेतायामभवत्क्रमात् ।<br>पशुयज्ञं न सेवन्ते केचित्तत्रापि सुव्रताः ॥ ५१ | इसी प्रकार त्रेतायुगमें क्रमसे यज्ञ-अनुष्ठान आदि आरम्भ हुआ। सभीकी व्रतोंमें निष्ठा थी तथा कोई भी मनुष्य पशु-यज्ञ नहीं करते थे ॥ ५१ ॥ |
| बलाद्विष्णुस्तदा यज्ञमकरोत्सर्वदृक् क्रमात् ।<br>द्विजास्तदा प्रशंसन्ति ततस्त्वहिंसकं मुने ॥ ५२ | उस समय व्यापक दृष्टिवाले भगवान् विष्णुने अपने सामर्थ्यसे क्रमपूर्वक यज्ञ सम्पन्न किये। हे मुने! उस समय द्विज लोग हिंसा न करनेवालेकी प्रशंसा करते थे ॥ ५२ ॥ |
| द्वापरेष्वपि वर्तन्ते मतिभेदास्तदा नृणाम् ।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृच्छाद्वार्ता प्रसिध्यति ॥ ५३ | द्वापरमें भी लोगोंमें मन-वचन-कर्मसे बुद्धि-भेद उत्पन्न होते हैं। कष्टपूर्वक कृषिकार्य भी सम्पन्न होते हैं ॥ ५३ ॥ |
| तदा तु सर्वभूतानां कायक्लेशवशात्क्रमात् ।<br>लोभो भृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः ॥ ५४ | उस समय शारीरिक क्लेशवश सभी लोगोंमें लोभ, भृति, वाणिज्य कर्मोंमें विवाद तथा चित्त-कालुष्यके कारण यथार्थ वस्तुओंके प्रति सन्देह उत्पन्न होने लगता है ॥ ५४ ॥ |
| वेदशाखाप्रणयनं धर्माणां सङ्करस्तथा ।<br>वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामद्वेषौ तथैव च ॥ ५५ | उस समय शाखाओंके रूपमें वेदोंका विभाग होता है तथा धर्मोंके संकर अर्थात् अन्य धर्मकी प्रवृत्ति होने लगती है। उस द्वापरमें ब्राह्मण आदि वर्णों एवं |
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन⋯विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| द्वापरे तु प्रवर्तन्ते रागो लोभो मदस्तथा।<br>वेदो व्यासैश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥ ५६<br><br>एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते।<br>सङ्क्षयादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेषु सः ॥ ५७ | ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका लगभग विनाश हो जाता है। लोगोंमें वासना, द्वेष, राग, लोभ तथा मद प्रवृत्त हो जाते हैं। द्वापर आदि कालोंमें व्यासोंके द्वारा एक वेद चार भागोंमें विभक्त किया जाता है। ऋक् आदि चार पादोंसे युक्त एक वेद-संहिताका इस भूलोकमें त्रेता आदि कालोंमें अध्ययन किया जाता है; वही वेद द्वापर आदि कालोंमें आयुसंख्याके कारण विभाजित कर दिया जाता है॥ ५५-५७॥ |
| ऋषिपुत्रैः पुनर्भेदा भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः।<br>मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥ ५८<br><br>संहिता ऋग्यजुःसाम्नां संहन्यन्ते मनीषिभिः।<br>सामान्या वैकृताश्चैव दृष्टिभिस्तैः पृथक्पृथक् ॥ ५९ | इसके आगे ऋषिपुत्रोंके द्वारा अपनी दृष्टिसे विभाजन पुनः किया जाता है। दृष्टिविभ्रम (अलग-अलग विचार रखनेवाले) मनीषियोंने समानरूपसे विभाजित की गयी ऋक्, यजुः तथा साम नामक संहिताओंको स्वर-वर्णोंके भेदसे मन्त्र और ब्राह्मणभागके स्वरूपमें पुनः अलग-अलग विभाजित किया॥ ५८-५९॥ |
| ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मन्त्रप्रवचनानि च।<br>अन्ये तु प्रस्थितास्तान् वै केचित्तान् प्रत्यवस्थिताः ॥ ६० | इस प्रकार मनीषियोंने ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र तथा मीमांसा-न्यायके सूत्रोंकी रचना की। कुछ मनीषी इतने विभाजनको पर्याप्त मानकर इसीपर स्थिरमति हो गये, किंतु अन्य मनीषी इस विभाजनको न्यून मानकर इसके विस्तारमें प्रवृत्त हुए॥ ६०॥ |
| इतिहासपुराणानि भिद्यन्ते कालगौरवात्।<br>ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा ॥ ६१<br><br>भविष्यं नारदीयं च मार्कण्डेयमतः परम्।<br>आग्नेयं ब्रह्मवैवर्तं लैङ्गं वाराहमेव च ॥ ६२<br><br>वामनाख्यं ततः कूर्मं मात्स्यं गारुडमेव च।<br>स्कान्दं तथा च ब्रह्माण्डं तेषां भेदः प्रकथ्यते ॥ ६३ | अनेक कल्पोंके भेदसे इतिहास, पुराण आदिके भी विशिष्ट भेद होते हैं। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिङ्गपुराण, वाराहपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण—ये उन पुराणोंके भेद कहे जाते हैं। इनमें ग्यारहवाँ पवित्र लिङ्गपुराण द्वापरमें विभक्त किया गया है॥ ६१—६३ १/२ ॥ |
| लैङ्गमेकादशविधं प्रभिन्नं द्वापरे शुभम्।<br>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः ॥ ६४<br><br>यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती।<br>पाराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ ॥ ६५<br><br>शातातपो वसिष्ठश्च एवमाद्यैः सहस्रशः। | मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वसिष्ठ आदि बहुत-से मुनि धर्मशास्त्रोंका विस्तार करनेवाले हैं॥ ६४—६५ १/२ ॥ |
| अवृष्टिर्मरणं चैव तथा व्याध्याद्युपद्रवाः ॥ ६६<br><br>वाङ्मनःकर्मजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते ततः।<br>निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ॥ ६७ | अवृष्टि, अकालमरण, रोग, विघ्न एवं मन-वचन-कर्मजनित दुःखोंसे निर्वेद उत्पन्न होता है। निर्वेदसे उन प्रजाओंके मनमें दुःखोंसे छूटनेका विचार |
४०- कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति
| १७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद्दोषदर्शनम्।<br>दोषाणां दर्शनाच्चैव द्वापरे ज्ञानसम्भवः ॥ ६८ | पैदा होता है। उस विचारसे वैराग्य तथा वैराग्यसे सांसारिक क्रियाकलापोंमें दोष दिखायी देने लगते हैं और उन दोषोंके दर्शनसे द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न हो जाता है॥ ६६—६८॥ | | एषा रजस्तमोयुक्ता वृत्तिर्वै द्वापरे स्मृता।<br>आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते ॥ ६९<br>द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे॥ ७० | द्वापरमें रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त इस प्रकारकी वृत्ति कही गयी है। आदि सत्ययुगमें एकमात्र धर्म ही सर्वत्र रहता है, वह त्रेतामें प्रेरणासे प्रवृत्त होता है वह धर्म द्वापरमें व्याकुल होकर स्थित रहता है तथा फिर कलियुगमें नष्ट हो जाता है॥ ६९-७०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे 'चतुर्युगधर्माणां वर्णनं' नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'चतुर्युगधर्मवर्णन' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥
चालीसावाँ अध्याय
कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति
| शक्र उवाच | इन्द्र बोले— |
|---|---|
| तिष्ये मायामसूयां च वधं चैव तपस्विनाम्।<br>साधयन्ति नरास्तत्र तमसा व्याकुलेन्द्रियाः ॥ १ | [हे शिलाद!] कलियुगमें तमोगुणसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले मनुष्य माया रचेंगे, दूसरोंका दोष देखेंगे तथा तपस्वियोंका वध करेंगे॥ १॥ |
| कलौ प्रमादको रोगः सततं क्षुद्भयानि च।<br>अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः ॥ २ | कलियुगमें प्रमाद, रोग, निरन्तर क्षुधाका भय, अनावृष्टिरूप घोर भय तथा देशोंका विपर्यय (विनाश)—ये सब होंगे॥ २॥ |
| न प्रामाण्यं श्रुतेरस्ति नृणां चाधर्मसेवनम्।<br>अधार्मिकास्त्वनाचारा महाकोपाल्पचेतसः ॥ ३ | लोग वेदोंकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करेंगे तथा अधर्मका आचरण करेंगे। मनुष्य धर्मच्युत होकर अनाचारमें रत रहेंगे और महान् क्रोधी तथा मन्द बुद्धिवाले होंगे॥ ३॥ |
| अनृतं ब्रुवते लुब्धास्तिष्ये जाताश्च दुष्प्रजाः।<br>दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमैः॥ ४<br>विप्राणां कर्मदोषेण प्रजानां जायते भयम्।<br>नाधीयन्ते तदा वेदान्न यजन्ति द्विजातयः ॥ ५ | कलियुगमें प्रजाएँ मिथ्या भाषण करेंगी, लोभ-परायण होंगी तथा मलिन आचार-विचारवाली होंगी। ब्राह्मणोंके दूषित यज्ञ, दूषित पठन, दूषित आचार एवं दूषित शास्त्रोंके सेवनरूपी कर्मदोषसे प्रजाओंमें भय उत्पन्न होगा। द्विजातिगण न तो वेदोंका अध्ययन करेंगे और न तो यज्ञ-अनुष्ठान करेंगे॥ ४-५॥ |
| उत्सीदन्ति नराश्चैव क्षत्रियाश्च विशः क्रमात्।<br>शूद्राणां मन्त्रयोगेन सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह ॥ ६<br>भवतीह कलौ तस्मिन् शयनासनभोजनैः।<br>राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति ते ॥ ७ | क्षत्रिय, वैश्य आदि सभी मनुष्य क्रमशः विनष्ट हो जायँगे। कलियुगमें ब्राह्मण लोग शूद्रोंको मन्त्रोपदेश देंगे तथा उनके साथ शयन, आसन, भोजन आदिका व्यवहार |
अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास...पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| करके उनसे सम्बन्ध बनायेंगे। राजा लोग शूद्रवत् आचरण करते हुए ब्राह्मणोंको सन्ताप देंगे॥ ६-७॥ | |
| भ्रूणहत्या वीरहत्या प्रजायन्ते प्रजासु वै।<br>शूद्राश्च ब्राह्मणाचाराः शूद्राचाराश्च ब्राह्मणाः॥ ८ | प्रजाओंमें भ्रूणहत्या तथा वीरोंकी हत्याकी प्रवृत्ति व्याप्त रहेगी। शूद्र लोग ब्राह्मणोंका आचरण करेंगे एवं ब्राह्मण शूद्रोंका आचरण करेंगे॥ ८॥ |
| राजवृत्तिस्थिताश्चौराश्चौराचाराश्च पार्थिवाः।<br>एकपत्न्यो न शिष्यन्ति वर्धिष्यन्त्यभिसारिकाः॥ ९ | चोर लोग राजाओंके तुल्य व्यवहार करेंगे और राजा लोग चोरों-जैसा व्यवहार करेंगे। स्त्रियाँ पातिव्रत्य धर्मका पालन नहीं करेंगी और व्यभिचारिणी स्त्रियोंका बाहुल्य होगा॥ ९॥ |
| वर्णाश्रमप्रतिष्ठा नो जायते नृषु सर्वतः।<br>तदा स्वल्पफला भूमिः क्वचिच्चापि महाफला॥ १० | मनुष्योंमें वर्ण तथा आश्रमसम्बन्धी समस्त व्यवहार समाप्त हो जायगा। उस समय पृथ्वी कहीं कम और कहीं अधिक फल देनेवाली होगी॥ १०॥ |
| अरक्षितारो हर्तारः पार्थिवाश्च शिलाशन।<br>शूद्रा वै ज्ञानिनः सर्वे ब्राह्मणैरभिवन्दिताः॥ ११ | हे शिलाद! राजागण प्रजाओंके रक्षक न होकर उनके विनाशक हो जायेंगे। सभी शूद्र ज्ञानी बनकर ब्राह्मणोंसे वन्दित होंगे॥ ११॥ |
| अक्षत्रियाश्च राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः।<br>आसनस्था द्विजान् दृष्ट्वा न चलन्त्यल्पबुद्धयः॥ १२<br><br>ताडयन्ति द्विजेन्द्रांश्च शूद्रा वै स्वल्पबुद्धयः।<br>आस्ये निधाय वै हस्तं कर्णं शूद्रस्य वै द्विजाः॥ १३<br><br>नीचस्येव तदा वाक्यं वदन्ति विनयेन तम्। | क्षत्रियसे इतर वर्णवाले राजा होंगे, ब्राह्मण आजीविकाके लिये शूद्रोंपर निर्भर रहेंगे और अल्प बुद्धिवाले वे शूद्र ब्राह्मणोंको देखकर अपने आसनसे नहीं उठेंगे। स्वल्प बुद्धिवाले शूद्र श्रेष्ठ द्विजोंको भी दण्डित (अपमानित) करेंगे। द्विज अपने मुखपर हाथ रखकर शूद्रके कानमें विनयपूर्वक नीच व्यक्तिके समान वाक्य बोलेंगे॥ १२-१३ १/२ ॥ |
| उच्चासनस्थान् शूद्रांश्च द्विजमध्ये द्विजर्षभ॥ १४<br><br>ज्ञात्वा न हिंसते राजा कलौ कालवशेन तु।<br>पुष्पैश्च वासितैश्चैव तथान्यैर्मङ्गलैः शुभैः॥ १५<br><br>शूद्रानभ्यर्चयन्त्यल्पश्रुतभाग्यबलान्विताः।<br>न प्रेक्षन्ते गर्विताश्च शूद्रा द्विजवरान् द्विज॥ १६ | हे द्विजश्रेष्ठ! कलियुगमें कालके वशमें होकर राजा ब्राह्मणोंके बीच उच्च आसनपर बैठे हुए शूद्रको देखकर उसे दण्डित नहीं करेंगे। वे पुष्पों, सुगन्धित पदार्थों तथा अन्य मंगल-द्रव्योंसे शूद्रोंकी पूजा करेंगे। हे द्विज! अल्प शास्त्र-ज्ञान, खोटे भाग्य एवं बलसे युक्त शूद्र लोग गर्वित होकर श्रेष्ठसे श्रेष्ठ द्विजोंकी ओर देखनातक पसन्द नहीं करेंगे॥ १४-१६॥ |
| सेवावसरमालोक्य द्वारे तिष्ठन्ति वै द्विजाः।<br>वाहनस्थान् समावृत्य शूद्रान् शूद्रोपजीविनः॥ १७<br><br>सेवन्ते ब्राह्मणास्तत्र स्तुवन्ति स्तुतिभिः कलौ।<br>तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः॥ १८ | अपनी आजीविकाके लिये शूद्रोंपर आश्रित रहनेवाले ब्राह्मण सेवाका अवसर देखकर वाहनोंपर स्थित शूद्रोंको घेरकर उनके द्वारपर खड़े होकर उनकी सेवा करेंगे। कलियुगमें ब्राह्मण अनेकविध स्तुतियोंसे शूद्रोंका स्तवन करेंगे। उस समय उत्तम विप्रगण अपने तपों तथा यज्ञोंके फलका विक्रय करेंगे॥ १७-१८॥ |
| १७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यतयश्च भविष्यन्ति बहवोऽस्मिन् कलौ युगे।<br>पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं युगान्ते समुपस्थिते॥ १९ | उस कलियुगमें बहुत लोग संन्यासीका रूप धारण कर लेंगे। उस युगान्तके उपस्थित होनेपर पुरुष तो कम होंगे, किंतु स्त्रियाँ अधिक होंगी। कलियुगमें ब्राह्मण वेद-विद्या तथा वैदिक कर्मोंकी निन्दा करेंगे॥ १९½॥ |
| निन्दन्ति वेदविद्यां च द्विजाः कर्माणि वै कलौ।<br>कलौ देवो महादेवः शङ्करो नीललोहितः॥ २० | तब उस कलियुगमें नीललोहित महादेव शिव धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये अपनी विकृत आकृति अर्थात् उच्छिन्नभिन्न लिङ्गस्वरूपवाले होकर प्रकट होंगे॥ २०½॥ |
| प्रकाशते प्रतिष्ठार्थं धर्मस्य विकृताकृतिः।<br>ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शङ्करम्॥ २१ | उस समय जो विप्रगण जिस किसी भी तरहसे उन विकृत वेषवाले शिवकी आराधना करेंगे, वे कलियुगके दोषोंपर विजय प्राप्तकर परमपदको प्राप्त होंगे॥ २१½॥ |
| कलिदोषान् विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्।<br>श्वापदप्रबलत्वं च गवां चैव परिक्षयः॥ २२ | उस कलियुगके अन्तमें हिंसक पशुओंकी प्रबलता तथा गायोंका ह्रास होगा और उत्तम साधुओंका अभाव हो जायगा॥ २२½॥ |
| साधूनां विनिवृत्तिश्च वेद्या तस्मिन् युगक्षये।<br>तदा सूक्ष्मो महोदर्को दुर्लभो दानमूलवान्॥ २३ | उस समय दानके मूलवाला सूक्ष्म ऐश्वर्यका रूप भी दुर्लभ हो जायगा, ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रमोंकी शिथिलता हो जानेपर धर्म विनष्ट हो जायगा॥ २३½॥ |
| चातुराश्रमशैथिल्ये धर्मः प्रतिचलिष्यति।<br>अरक्षितारो हर्तारो बलिभागस्य पार्थिवाः॥ २४ | उस युगान्तमें राजा लोग प्रजाजनोंकी रक्षा न करके मात्र अपनी रक्षामें तत्पर रहेंगे और बलिभाग [कर]-के हर्ता बन जायँगे॥ २४½॥ |
| युगान्तेषु भविष्यन्ति स्वरक्षणपरायणाः।<br>अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः॥ २५<br><br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति कलौ युगे।<br>चित्रवर्षी तदा देवो यदा प्राहुर्युगक्षयम्॥ २६ | कलियुगमें समस्त प्राणी अन्न तथा कन्याओंका विक्रय करनेवाले एवं ब्राह्मण वेद बेचनेवाले होंगे और स्त्रियाँ व्यभिचारपरायण हो जायँगी। जब युगक्षय होता है, उस समय वर्षाके देवता इन्द्र कहीं-कहींपर वृष्टि करनेवाले कहे जाते हैं॥ २५-२६॥ |
| सर्वे वणिग्जनाश्चापि भविष्यन्त्यधमे युगे।<br>कुशीलचर्याः पाखण्डैर्वृथारूपैः समावृताः॥ २७ | उस अधम कलियुगमें सभी वणिक् जन भी कुत्सित आचरणवाले, दम्भ करनेवाले तथा पाखण्डी अर्थात् अवैदिक मार्गोंपर चलनेवाले होंगे॥ २७॥ |
| बहुयाजनको लोको भविष्यति परस्परम्।<br>नाव्याहृतक्रूरवाक्यो नार्जवी नानसूयकः॥ २८<br><br>न कृते प्रतिकर्ता च युगक्षीणे भविष्यति।<br>निन्दकाश्चैव पतिता युगान्तस्य च लक्षणम्॥ २९ | कलियुगमें सभी लोग ग्रामयाजक (पात्र-अपात्रका विचार किये बिना सबका यज्ञ आदि करानेवाले) हो जायँगे। कोई भी मृदु वचन बोलनेवाला, सरल स्वभाववाला, ईर्ष्यारहित तथा प्रत्युपकारी अर्थात् अपने लिये किये गये उपकारको माननेवाला नहीं होगा और सभी लोग निन्दक एवं पतित हो जायँगे। यह सब युगान्त कलियुगका लक्षण है॥ २८-२९॥ |
अध्याय ४०] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास...पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नृपशून्या वसुमती न च धान्यधनावृता।<br>मण्डलानि भविष्यन्ति देशेषु नगरेषु च॥ ३० | पृथ्वी राजाओंसे शून्य हो जायगी तथा धन-धान्यसे परिपूर्ण नहीं रहेगी। देशों और नगरोंमें बहुत-से स्थान जनशून्य हो जायँगे॥ ३०॥ |
| अल्पोदका चाल्पफला भविष्यति वसुन्धरा।<br>गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः सम्भविष्यन्त्यशासनाः॥ ३१ | पृथ्वी अल्प जलवाली तथा कम फल देनेवाली होगी। रक्षक ही भक्षक बन जायँगे एवं लोग स्वेच्छाचारी हो जायँगे॥ ३१॥ |
| हर्तारः परवित्तानां परदारप्रधर्षकाः।<br>कामात्मानो दुरात्मानो ह्यधमाः साहसप्रियाः॥ ३२<br><br>प्रनष्टचेष्टनाः पुंसो मुक्तकेशाश्च शूलिनः।<br>जनाः षोडशवर्षाश्च प्रजायन्ते युगक्षये॥ ३३ | युगान्त कलियुगमें सभी लोग दूसरोंके धनका हरण करनेवाले, परस्त्रीगमन करनेवाले, कामी, दुरात्मा, अधम, दुस्साहसी, उद्योगरहित, लज्जारहित, रोगी तथा सोलह वर्षकी परम आयुवाले होंगे॥ ३२-३३॥ |
| शुक्लदन्ताजिनाक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः।<br>शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते॥ ३४ | कलियुगके उपस्थित होनेपर शूद्रगण [निर्लज्जता-पूर्वक] दाँत दिखाते हुए गेरुआ वस्त्र तथा रुद्राक्ष धारणकर एवं मुण्डित सिरवाले होकर यतियोंके धर्मका आचरण करेंगे॥ ३४॥ |
| सस्यचौरा भविष्यन्ति दृढचैलाभिलाषिणः।<br>चौराश्चोरस्वहर्तारो हर्तुर्हर्ता तथापरः॥ ३५<br><br>योग्यकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते।<br>कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान्॥ ३६ | कलियुगमें लोग धान्यका हरण करनेवाले तथा अत्यन्त दुष्ट लोगोंके संगकी अभिलाषा करनेवाले होंगे। चोर चोरोंका धन चुरायेंगे और उनके भी धनको कोई दूसरा हरण कर ले जायगा। मनुष्यके विधिसम्मत कर्मसे विरत होकर निष्क्रिय होनेपर कीट, मूषक तथा सर्प मनुष्योंको पीड़ित करेंगे॥ ३५-३६॥ |
| सुभिक्षं क्षेममारोग्यं सामर्थ्यं दुर्लभं तदा।<br>कौशिकीं प्रतिपत्स्यन्ते देशान् क्षुद्भयपीडिताः॥ ३७<br><br>दुःखेनाभिप्लुतानां च परमायुः शतं तदा। | उस समय सुभिक्ष, कल्याण, नीरोगता, सामर्थ्य आदि दुर्लभ हो जायँगे। लोग क्षुधापीड़ित होकर अपने देशसे आकर कौशिकी नदीके तटपर बसेंगे। लोग दुःखित होकर सौ वर्षकी पूर्ण आयु व्यतीत करेंगे॥ ३७ १/२॥ |
| दृश्यन्ते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगेऽखिलाः॥ ३८<br><br>उत्सीदन्ति तदा यज्ञा केवलाधर्मपीडिताः। | कलियुगमें सभी वेदोंका प्रचार-प्रसार कहीं दिखायी देगा और कहीं नहीं। समस्त यज्ञ अधर्मसे पीड़ित होकर विनष्ट हो जायँगे॥ ३८ १/२॥ |
| काषायिणोऽप्यनिर्ग्रन्थाः कापालीबहुलास्त्विह॥ ३९<br><br>वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणः परे।<br>वर्णाश्रमाणां ये चान्ये पाषण्डाः परिपन्थिनः॥ ४०<br><br>उत्पद्यन्ते तदा ते वै सम्प्राप्ते तु कलौ युगे। | संन्यासी शास्त्रज्ञानसे रहित होंगे तथा कापालिक बहुत-से होंगे। कुछ लोग वेद बेचेंगे, तो अन्य लोग तीर्थोंका विक्रय करेंगे। अन्य पाखण्डी लोग वर्णाश्रमधर्मके प्रतिकूल आचरण करेंगे। कलियुगके उपस्थित होनेपर इस प्रकारके लोग उत्पन्न होंगे॥ ३९-४० १/२॥ |
| अधीयन्ते तदा वेदान् शूद्रा धर्मार्थकोविदाः॥ ४१<br><br>यजन्ते चाश्वमेधेन राजानः शूद्रयोनयः।<br>स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम्॥ ४२ | धर्म तथा अर्थके पण्डित बनकर शूद्रलोग वेदोंका अध्ययन करेंगे एवं शूद्र जातिके राजा अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेंगे। उस समय सभी प्राणी स्त्रियों, बालकों |
| १८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथा गायोंका वध करके परस्पर नानाविध उपद्रव उत्पन्न करेंगे॥ ४१-४२^१/_२॥ | |
| उपद्रवांस्तथान्योऽन्यं साधयन्ति तदा प्रजाः।<br>दुःखप्रभूतमल्पायुर्देहोत्साहः सरोगता॥ ४३<br><br>अधर्माभिनिवेशित्वात्तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्।<br>प्रजासु ब्रह्महत्यादि तदा वै सम्प्रवर्तते॥ ४४ | उस समय अपार दुःख, अल्प आयु, शारीरिक कष्ट तथा व्याधियोंसे लोग पीड़ित होंगे। ऐसा कहा गया है कि कलियुगमें अधर्मके प्रति अत्यन्त आसक्ति होनेके कारण लोगोंका आचरण तमोगुणप्रधान होगा। उस समय प्रजाओंमें ब्रह्महत्या आदि महापापकर्म करनेकी विशेष तत्परता होगी॥ ४३-४४॥ |
| तस्मादायुर्बलं रूपं कलिं प्राप्य प्रहीयते।<br>तदा त्वल्पेन कालेन सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः॥ ४५ | अतएव कलियुगको प्राप्तकर प्रजाओंकी आयु, बल, रूप आदिका क्षय होगा। उस समय अल्पकालके धर्माचरणसे ही मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होंगे॥ ४५॥ |
| धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते द्विजसत्तमाः।<br>श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं ये चरन्त्यनसूयकाः॥ ४६ | उस कलियुगमें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वेषरहित होकर वेदों तथा स्मृतियोंमें प्रतिपादित धर्मोंका आचरण करेंगे, वे धन्य होंगे॥ ४६॥ |
| त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः।<br>यथाक्लेशं चरन् प्राज्ञस्तदह्ना प्राप्नुते कलौ॥ ४७ | त्रेतामें वर्षभर तथा द्वापरमें मासभर धर्माचरण करनेसे जिस फलका प्राप्त होना बताया गया है, ज्ञानवान् व्यक्ति कलियुगमें वही फल यथाशक्ति एक दिन धर्माचरण करके प्राप्त कर लेता है॥ ४७॥ |
| एषा कलियुगावस्था संध्यांशं तु निबोध मे।<br>युगे युगे च हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादांस्तु सिद्धयः॥ ४८ | यह कलियुगकी दशाका वर्णन किया गया है। अब आप उसका सन्ध्यांश मुझसे जान लीजिये। युग-युगमें सिद्धियोंके तीन पादोंका ह्रास होता है॥ ४८॥ |
| युगस्वभावाः सन्ध्यास्तु तिष्ठन्तीह तु पादशः।<br>सन्ध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादशस्ते प्रतिष्ठिताः॥ ४९ | युगके स्वभाववाली सन्ध्याएँ यहाँ पादसे न्यून होकर रहती हैं। इस प्रकार सन्ध्याके स्वभाव अपने अंशोंमें अर्थात् सन्ध्यांशोंमें एक चतुर्थांशसे न्यून होकर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ ४९॥ |
| एवं सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके।<br>तेषां शास्ता ह्यसाधूनां भूतानां निधनोत्थितः॥ ५० | इस प्रकार युगान्तमें सन्ध्यांशकालके उपस्थित होनेपर दुष्ट प्राणियोंके संहारके लिये उनका एक महान् शासक आविर्भूत होगा॥ ५०॥ |
| गोत्रेऽस्मिन् वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमितिरुच्यते।<br>मानवस्य तु सोऽंशेन पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ५१ | पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें जो प्रमिति नामसे विख्यात रहे हैं, वे मनुपुत्रके अंशसे इस कलियुगके समाप्तिकालमें चन्द्रमाके गोत्रमें सोमशर्मा नामक ब्राह्मणके रूपमें उत्पन्न होंगे॥ ५१॥ |
| समाः सविंशतिः पूर्णा पर्यटन् वै वसुन्धराम्।<br>अनुकर्षन् स वै सेनां सवाजिरथकुञ्जराम्॥ ५२<br><br>प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>स तदा तैः परिवृतो म्लेच्छान् हन्ति सहस्रशः॥ ५३ | शस्त्रधारी ब्राह्मणोंसे निरन्तर परिवृत वे हाथी, घोड़े तथा रथसे युक्त विशाल सेना साथमें लेकर पूरे बीस वर्षतक पृथ्वीपर घूम-घूमकर सैकड़ों और हजारों बार म्लेच्छोंका वध करेंगे॥ ५२-५३॥ |
अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स हत्वा सर्वशश्चैव राज्ञस्तान् शूद्रयोनिजान्।<br>पाखण्डांस्तु ततः सर्वान्निःशेषं कृतवान् प्रभुः॥ ५४ | परम ऐश्वर्यसम्पन्न वे ब्राह्मणपुत्र शूद्रयोनिमें उत्पन्न उन सभी पाखण्डी राजाओंको मारकर पृथ्वीको उनसे पूर्णतः विहीन कर देंगे॥ ५४॥ |
| नात्यर्थं धार्मिका ये च तान् सर्वान् हन्ति सर्वतः।<br>वर्णव्यत्यासजाताश्च ये च ताननुजीविनः॥ ५५ | अधर्मका आचरण करनेवाले, वर्णव्यवस्थाके प्रतिकूल चलनेवाले तथा इनके जो अनुजीवी हैं, उन सभीको वे मार डालेंगे॥ ५५॥ |
| प्रवृत्तचक्रो बलवान् म्लेच्छानामन्तकृत् तु।<br>अधृष्यः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम्॥ ५६ | सभी प्राणियोंके लिये अजेय, म्लेच्छोंके संहारक, अत्यन्त बलशाली तथा प्रवृत्त-आज्ञामण्डलवाले वे समग्र भूमण्डलपर विचरण करेंगे॥ ५६॥ |
| मानवस्य तु सोऽशेन देवस्येह विजज्ञिवान्।<br>पूर्वजन्मनि विष्णोस्तु प्रमितिर्नाम वीर्यवान्॥ ५७<br><br>गोत्रतो वै चन्द्रमसः पूर्णे कलियुगे प्रभुः।<br>द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रान्तो विंशतिः समाः॥ ५८<br><br>विनिघ्नन् सर्वभूतानि शतशोऽथ सहस्रशः।<br>कृत्वा बीजावशेषां तु पृथिवीं क्रूरकर्मणः॥ ५९<br><br>परस्परनिमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु।<br>स साधयित्वा वृषलान् प्रायस्तानधार्मिकान्॥ ६०<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्थितिं प्राप्तः सहानुगः।<br>ततो व्यतीते काले तु सामात्यः सह सैनिकः॥ ६१ | पूर्वजन्ममें वीर्यवान् प्रमिति नामवाले वे इस कलिमें मनुपुत्र विष्णुदेवके अंशसे सोम-गोत्रमें कलियुगे पूर्ण होनेपर उत्पन्न होंगे। बीस वर्षतक पराक्रम प्रदर्शित करनेवाले वे सैकड़ों-हजारों विधर्मी प्राणियोंको नष्ट करते हुए पृथ्वीको क्रूरकर्मा जनोंसे शून्यप्राय-सा करके आकस्मिक तथा पारस्परिक समुत्पादित कोपके द्वारा उन अधार्मिक वृषलप्राय जनोंको मारकर बत्तीसवें वर्षके उदित होते ही मन्त्रियों, सहचरों तथा सैनिकोंसहित गंगा-यमुनाके मध्य स्वयंको संस्थापित कर लेंगे॥ ५७–६१॥ |
| उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् म्लेच्छांश्चैव सहस्रशः।<br>तत्र सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके॥ ६२<br><br>स्थितास्त्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित्।<br>अप्रग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु कृत्स्नशः॥ ६३ | धर्मच्युत सभी पार्थिवों तथा हजारों म्लेच्छोंको नष्ट करके उस कलियुगमें सन्ध्यांशके समुपस्थित होनेपर यत्र-तत्र थोड़ी ही प्रजाएँ बची रहेंगी। वे आत्मनियन्त्रण खोकर तथा पूर्ण रूपसे लोभके वशीभूत होकर एक-दूसरेसे कृत्रिम नम्रता प्रदर्शित करती हुई उन्हें विश्वासमें लेकर उनकी हिंसा कर डालेंगी॥ ६२–६३ १/२॥ |
| उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रणिपत्य परस्परम्।<br>अराजके युगवशात्संशये समुपस्थिते॥ ६४<br><br>प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयार्दिताः।<br>व्याकुलाश्च परिभ्रान्तास्त्यक्त्वा दारान् गृहाणि च॥ ६५ | युगके प्रभावके कारण अराजकताकी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे सभी प्रजाएँ परस्पर भयसे ग्रस्त होकर व्याकुल तथा भ्रमित हो जायेंगी। लोग अत्यन्त दुःखित एवं करुणाशून्य होकर अपनी पत्नियों तथा घरोंको छोड़कर अपने प्राणोंकी भी परवाह न करनेवाले होंगे॥ ६४–६५ १/२॥ |
| स्वान् प्राणाननपेक्षन्तो निष्कारुण्याः सुदुःखिताः।<br>नष्टे श्रौते स्मार्तधर्मे परस्परहतास्तदा॥ ६६ | श्रौत तथा स्मार्तधर्मके नष्ट हो जानेपर सभी प्रजाएँ मर्यादाहीन, अत्यन्त क्रूर, स्नेहरहित तथा निर्लज्ज होकर एक-दूसरेकी हिंसा करानेमें तत्पर रहेंगी॥ ६६ १/२॥ |
| निर्मर्यादा निराक्रान्ता निःस्नेहा निरपत्रपाः।<br>नष्टे धर्मे प्रतिहताः ह्रस्वकाः पञ्चविंशकाः॥ ६७ | धर्मके नष्ट हो जानेपर पतनको प्राप्त हुए लोग लघु आकारवाले तथा पच्चीस वर्षकी आयुवाले होंगे। |
| १८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हित्वा पुत्रांश्च दारांश्च विवादव्याकुलेन्द्रियाः।<br>अनावृष्टिहताश्चैव वार्त्तामुत्सृज्य दूरतः॥ ६८ | आपसी कलहसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले लोग अपनी पत्नियों एवं पुत्रोंका त्यागतक कर देंगे॥ ६७ १/२ ॥ |
| प्रत्यन्तानुपसेवन्ते हित्वा जनपदान् स्वकान्।<br>सरित्सागरकूपांस्ते सेवन्ते पर्वतांस्तथा॥ ६९ | वृष्टि न होनेके कारण दुःखित प्रजाएँ कृषिकर्मका पूर्ण रूपसे त्याग करके अपने-अपने देशोंको छोड़कर म्लेच्छ देशों, नदी, समुद्र, कुएँ, पर्वत आदि स्थानोंपर शरण लेंगी॥ ६८-६९॥ |
| मधुमांसैर्मूलफलैर्वर्तयन्ति सुदुःखिताः।<br>चीरपत्राजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ७० | प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित होकर मधु, मांस, कन्दमूल तथा फलोंपर जीवन-निर्वाह करेंगी। वे परिग्रहरहित एवं निष्क्रिय होकर वृक्षोंकी छाल तथा उनके पत्ते वस्त्ररूपमें धारण करेंगी॥ ७०॥ |
| वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः सङ्कटं घोरमास्थिताः।<br>एवं कष्टमनुप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्तदा॥ ७१ | वर्ण तथा आश्रमव्यवस्थासे भ्रष्ट हुए लोग घोर कष्टमें पड़ जायँगे और इस प्रकार भीषण दुःख आ जानेके कारण थोड़ी ही प्रजा बच पायेगी॥ ७१॥ |
| जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमानसाः।<br>विचारणा तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणा॥ ७२ | बुढ़ापा, रोग तथा क्षुधासे पीड़ित लोगोंके मनमें उस दुःखसे निर्वेद उत्पन्न होगा। पुनः उस निर्वेदसे साम्यावस्थावाली विचारणा, विचारणासे साम्यावस्थात्मक बोध |
| साम्यावस्थात्मको बोधः सम्बोधाद्धर्मशीलता।<br>अरूपशमयुक्तास्तु कलिशिष्टा हि वै स्वयम्॥ ७३ | और अन्तमें उस बोधसे धर्माचरणके प्रति प्रवृत्ति जाग्रत् होगी। कलियुगकी बची हुई वे प्रजाएँ स्वयं शक्ति-सामर्थ्यके अभावमें शान्तियुक्त हो जायँगी॥ ७२-७३॥ |
| अहोरात्रात्तदा तासां युगं तु परिवर्तते।<br>चित्तसम्मोहनं कृत्वा तासां वै सुप्तमत्तवत्॥ ७४ | इसके बाद सुप्त तथा मत्तकी भाँति उन प्रजाओंका चित्त-सम्मोहन करके एक दिन-रातमें ही कलियुग परिवर्तित हो जायगा और इस प्रकार कालधर्मके अनुसार कलियुगको दबाकर सत्ययुग प्रवृत्त हो जायगा॥ ७४ १/२ ॥ |
| भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्तत।<br>प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै॥ ७५ | तदनन्तर उस सत्ययुगके प्रवृत्त होनेपर कलियुगकी बची हुई प्रजाओंमें सत्ययुगके आचार-विचार उत्पन्न होंगे॥ ७५ १/२ ॥ |
| उत्पन्नाः कलिशिष्टास्तु प्रजाः कार्तयुगास्तदा।<br>तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विचरन्ति च॥ ७६ | इस लोकमें उस समय जो सप्तसिद्ध¹ लोग रहते हैं, वे अदृश्य रूपमें सप्तर्षियों²के साथ व्यवस्थित होकर विचरण करते हैं॥ ७६ १/२ ॥ |
| सप्तसप्तर्षिभिश्चैव तत्र ते तु व्यवस्थिताः।<br>ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थं ये स्मृता इह॥ ७७ | जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बीजके लिये कहे गये हैं, वे सब कलियुगमें उत्पन्न होनेवालोंके साथ उस समय विशेषता-रहित होकर रहते थे॥ ७७ १/२ ॥ |
| कलिजैः सह ते सर्वे निर्विशेषास्तदाभवन्।<br>तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयन्तीत्तरेऽपि च॥ ७८ | वर्णाश्रमके आचारवाला जो श्रौत तथा स्मार्त दो |
¹ १. मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध—ये सात सप्तसिद्ध कहे गये हैं। (लिङ्गपुराण पू० ८२।५१)
² २. कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, वसिष्ठ तथा जमदग्नि—ये सप्तर्षि कहे गये हैं।
| अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति | १८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतं स्मार्तं द्विधा तु यम्।<br>ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्धन्ते वै प्रजाः कृते ॥ ७९ | प्रकारका धर्म होता है; उस धर्मको उन लोगोंके लिये सप्तर्षि एवं सप्तसिद्ध लोग उपदेश करते हैं। इस प्रकार उन लोगोंके कर्मनिष्ठ हो जानेपर कृतयुगमें प्रजाएँ बढ़ने लगती हैं॥ ७८-७९॥ |
| श्रौतस्मार्तकृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते।<br>केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह युगक्षये ॥ ८० | उन सप्तर्षियोंके द्वारा श्रौत-स्मार्तसम्बन्धी धर्मोंका उपदेश करनेसे कुछ लोग युगके क्षयके समय इस पृथ्वीलोकमें धर्मकी व्यवस्थाके लिये रह जाते हैं॥ ८०॥ |
| मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति मुनयस्तु वै।<br>यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह ततः क्षितौ ॥ ८१<br>वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु सम्भवः।<br>तथा कार्त्तयुगानां तु कलिजेष्विह सम्भवः ॥ ८२ | वे मुनिगण मन्वन्तरोंके अधिकारोंमें स्थित रहते हैं। जिस प्रकार इस पृथ्वीपर दावानलसे वनोंके तृण आदिके जल जानेपर बादमें प्रथम वृष्टिसे उनके मूलोंमें पुनः अंकुरण होता है; उसी प्रकार कलियुगमें उत्पन्न हुए लोगोंसे ही कृतयुगके प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है॥ ८१-८२॥ |
| एवं युगाद्युगस्येह सन्तानं तु परस्परम्।<br>वर्तते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वन्तरक्षयः ॥ ८३ | इस प्रकार अव्यवच्छिन्न रूपसे इस लोकमें मन्वन्तरके क्षयतक एक युगके कुछ संतान दूसरे युगमें विद्यमान रहते हैं॥ ८३॥ |
| सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादान् क्रमेण तु॥ ८४ | प्रत्येक चतुर्युगीमें सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ तथा काम—ये सभी क्रमसे तीन-तीन पादोंके ह्रासको प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रत्येक युगके अन्ततक इनके एक-एक पादका ह्रास होता जाता है॥ ८४॥ |
| ससन्ध्यांशेषु हीयन्ते युगानां धर्मसिद्धयः।<br>इत्येषा प्रतिसिद्धिवैं कीर्त्तितैषा क्रमेण तु॥ ८५ | इसी प्रकार युगके सन्ध्यांशमें प्रत्येक युगकी धर्म सिद्धियोंका भी ह्रास होता है। इस तरह मैंने क्रमसे प्रत्येक सिद्धिका वर्णन कर दिया॥ ८५॥ |
| चतुर्युगानां सर्वेषामनेनैव तु साधनम्।<br>एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता॥ ८६ | इसी प्रकार सभी चारों युगोंकी स्थिति बनती है। चारों युगोंकी एक आवृत्तिका जो एक हजार गुना है; वही ब्रह्माजीका एक दिन कहा गया है और उतनी ही बड़ी उनकी एक रात कही जाती है॥ ८६ १/२॥ |
| ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता।<br>अनार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात्॥ ८७ | ज्यों-ज्यों युगका क्षय होता है, प्राणियोंमें जड़ता-भाव तथा स्वभावकी सरलताका अभाव बढ़ता जाता है। यही सभी युगोंका लक्षण कहा गया है॥ ८७ १/२॥ |
| एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम्।<br>एषां चतुर्युगाणां च गुणिता ह्येकसप्ततिः॥ ८८<br>क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरन्तरमुच्यते।<br>चतुर्युगे यथैकस्मिन् भवतीह यदा तु यत्॥ ८९ | क्रमसे एक चतुर्युगका इकहत्तर (७१ ६/१४) बार आवर्तन एक मन्वन्तर कहा जाता है। जो व्यवहार इस चतुर्युगमें घटित होता है, वही क्रमशः दूसरे चतुर्युगोंमें भी होता है॥ ८८-८९ १/२॥ |
| तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वै यथाक्रमम्।<br>सर्गे सर्गे यथा भेदा उत्पद्यन्ते तथैव तु॥ ९०<br>पञ्चविंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकास्तथा।<br>तथा कल्पा युगैः सार्धं भवन्ति सह लक्षणैः॥ ९१ | प्रत्येक सर्गमें पचीस प्रकारके भेदोंवाले जो तत्त्व होते |