भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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३२६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| अधर्मस्तमसो जज्ञे हिंसाशोकादजायत।<br>ततस्तस्मिन् समुद्भूते मिथुने दारुणात्मिके ॥ २६५<br>गतासुर्भगवानासीत्प्रीतिश्चैनमशिश्रियत् ।<br>स्वां तनुं स ततो ब्रह्मा तामपोहत भास्वराम् ॥ २६६<br>द्विधा कृत्वा स्वकं देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ।<br>अर्धेन नारी सा तस्य शतरूपा व्यजायत ॥ २६७<br>प्रकृतिं भूतधात्रीं तां कामाद्वै सृष्टवान् प्रभुः।<br>सा दिवं पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्यधिष्ठिता ॥ २६८<br>ब्रह्मणः सा तनुः पूर्वा दिवमावृत्य तिष्ठति।<br>या त्वर्धात्सृजतो नारी शतरूपा व्यजायत ॥ २६९<br><br>सा देवी नियुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम्।<br>भर्तारं दीप्तयशसं पुरुषं प्रत्यपद्यत ॥ २७० | हुआ वह तम ही दो रूपोंमें उत्पन्न हुआ ॥ २६४॥<br>तमसे अधर्म उत्पन्न हुआ और शोकसे हिंसा उत्पन्न हुई। तब भयानक रूपवाले उस मिथुन (अधर्म और हिंसा)-के प्रादुर्भूत होनेपर भगवान् [ब्रह्मा] प्राणहीन हो गये और प्रीतिने इनकी सेवा की। इसके बाद ब्रह्माने अपने उस दीप्त शरीरको अपोहित कर लिया। अपने देहको दो भागोंमें करके वे आधे शरीरसे पुरुष हो गये और उनके आधे शरीरसे नारी शतरूपा उत्पन्न हुई। ब्रह्माने प्राणियोंकी धात्री उस प्रकृतिको कामनापूर्वक उत्पन्न किया था; वे अपनी महिमासे स्वर्ग तथा पृथिवीको व्याप्त करके अधिष्ठित हैं। ब्रह्माका वह पूर्व शरीर स्वर्गको आवृत करके स्थित है। सृजन करनेवाले ब्रह्माके आधे शरीरसे जो नारी शतरूपा उत्पन्न हुई थीं, उन्होंने नियुत (दस लाख) वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप करके दीप्त यशवाले पुरुषको पतिरूपमें प्राप्त किया ॥ २६५-२७० ॥ | | स वै स्वायम्भुवः पूर्वं पुरुषो मनुरुच्यते।<br>तस्यैकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ २७१<br>लेभे स पुरुषः पत्नीं शतरूपामयौनिजाम्।<br>तया सार्धं स रमते तस्मात्सा रतिरुच्यते ॥ २७२<br>प्रथमः सम्प्रयोगोऽत्मा कल्पादौ समपद्यत ।<br>विराजमसृजद् ब्रह्मा सोऽभवत्पुरुषो विराट् ॥ २७३<br>सम्राट् च शतरूपा वै वैराजः स मनुः स्मृतः।<br>स वैराजः प्रजासर्गं ससर्ज पुरुषो मनुः ॥ २७४<br>वैराजात्पुरुषाद्वीराच्छतरूपा व्यजायत।<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ पुत्रौ द्वौ लोकसम्मतौ ॥ २७५<br>कन्ये द्वे च महाभागे याभ्यां जाता इमाः प्रजाः।<br>देवी नाम तथाकूतिः प्रसूतिश्चैव ते उभे ॥ २७६ | वे पूर्वपुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं। उनका इकहत्तर चतुर्युगी मन्वन्तर कहा जाता है। उस पुरुषने अयोन निजा शतरूपाको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। वे उनके साथ रमण करते हैं, अतः वे 'रति' कही जाती हैं। कल्पके आदिमें [यह] पहला परस्पर संयोग हुआ। ब्रह्माने विराट्को उत्पन्न किया था; वे पुरुष ही विराट् थे। शतरूपा और वे वैराज (विराट्पुत्र) मनुको सम्राट् कहा गया है। उन वैराज पुरुष मनुने प्रजासर्गका सृजन किया। शतरूपाने वीर वैराज पुरुषसे प्रियव्रत तथा उत्तानपाद [नामक] दो लोकमान्य पुत्रोंको उत्पन्न किया। उन्होंने दो महाभाग्यशालिनी कन्याओंको भी उत्पन्न किया, जिनसे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दोनों देवी आकूति तथा प्रसूति नामवाली थीं ॥ २७१-२७६ ॥ | | स्वायम्भुवः प्रसूतिं तु दक्षाय प्रददौ प्रभुः।<br>प्राणो दक्ष इति ज्ञेयः सङ्कल्पो मनुरुच्यते ॥ २७७<br>रुचेः प्रजापतेः सोऽथ आकूतिं प्रत्यपादयत्।<br>आकृत्यां मिथुनं जज्ञे मानसस्य रुचेः शुभम् ॥ २७८ | प्रभु स्वायम्भुव मनुने प्रसूतिको दक्षको अर्पित कर दिया। दक्षको प्राण जानना चाहिये और मनुको संकल्प कहा जाता है। उन्होंने आकूतिको रुचिप्रजापतिको दिया। ब्रह्माके मानसपुत्र रुचिकी मिथुन (जुड़वाँ) सन्तानें |