श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| अधर्मस्तमसो जज्ञे हिंसाशोकादजायत।<br>ततस्तस्मिन् समुद्भूते मिथुने दारुणात्मिके ॥ २६५<br>गतासुर्भगवानासीत्प्रीतिश्चैनमशिश्रियत् ।<br>स्वां तनुं स ततो ब्रह्मा तामपोहत भास्वराम् ॥ २६६<br>द्विधा कृत्वा स्वकं देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ।<br>अर्धेन नारी सा तस्य शतरूपा व्यजायत ॥ २६७<br>प्रकृतिं भूतधात्रीं तां कामाद्वै सृष्टवान् प्रभुः।<br>सा दिवं पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्यधिष्ठिता ॥ २६८<br>ब्रह्मणः सा तनुः पूर्वा दिवमावृत्य तिष्ठति।<br>या त्वर्धात्सृजतो नारी शतरूपा व्यजायत ॥ २६९<br><br>सा देवी नियुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम्।<br>भर्तारं दीप्तयशसं पुरुषं प्रत्यपद्यत ॥ २७० | हुआ वह तम ही दो रूपोंमें उत्पन्न हुआ ॥ २६४॥<br>तमसे अधर्म उत्पन्न हुआ और शोकसे हिंसा उत्पन्न हुई। तब भयानक रूपवाले उस मिथुन (अधर्म और हिंसा)-के प्रादुर्भूत होनेपर भगवान् [ब्रह्मा] प्राणहीन हो गये और प्रीतिने इनकी सेवा की। इसके बाद ब्रह्माने अपने उस दीप्त शरीरको अपोहित कर लिया। अपने देहको दो भागोंमें करके वे आधे शरीरसे पुरुष हो गये और उनके आधे शरीरसे नारी शतरूपा उत्पन्न हुई। ब्रह्माने प्राणियोंकी धात्री उस प्रकृतिको कामनापूर्वक उत्पन्न किया था; वे अपनी महिमासे स्वर्ग तथा पृथिवीको व्याप्त करके अधिष्ठित हैं। ब्रह्माका वह पूर्व शरीर स्वर्गको आवृत करके स्थित है। सृजन करनेवाले ब्रह्माके आधे शरीरसे जो नारी शतरूपा उत्पन्न हुई थीं, उन्होंने नियुत (दस लाख) वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप करके दीप्त यशवाले पुरुषको पतिरूपमें प्राप्त किया ॥ २६५-२७० ॥ | | स वै स्वायम्भुवः पूर्वं पुरुषो मनुरुच्यते।<br>तस्यैकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ २७१<br>लेभे स पुरुषः पत्नीं शतरूपामयौनिजाम्।<br>तया सार्धं स रमते तस्मात्सा रतिरुच्यते ॥ २७२<br>प्रथमः सम्प्रयोगोऽत्मा कल्पादौ समपद्यत ।<br>विराजमसृजद् ब्रह्मा सोऽभवत्पुरुषो विराट् ॥ २७३<br>सम्राट् च शतरूपा वै वैराजः स मनुः स्मृतः।<br>स वैराजः प्रजासर्गं ससर्ज पुरुषो मनुः ॥ २७४<br>वैराजात्पुरुषाद्वीराच्छतरूपा व्यजायत।<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ पुत्रौ द्वौ लोकसम्मतौ ॥ २७५<br>कन्ये द्वे च महाभागे याभ्यां जाता इमाः प्रजाः।<br>देवी नाम तथाकूतिः प्रसूतिश्चैव ते उभे ॥ २७६ | वे पूर्वपुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं। उनका इकहत्तर चतुर्युगी मन्वन्तर कहा जाता है। उस पुरुषने अयोन निजा शतरूपाको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। वे उनके साथ रमण करते हैं, अतः वे 'रति' कही जाती हैं। कल्पके आदिमें [यह] पहला परस्पर संयोग हुआ। ब्रह्माने विराट्को उत्पन्न किया था; वे पुरुष ही विराट् थे। शतरूपा और वे वैराज (विराट्पुत्र) मनुको सम्राट् कहा गया है। उन वैराज पुरुष मनुने प्रजासर्गका सृजन किया। शतरूपाने वीर वैराज पुरुषसे प्रियव्रत तथा उत्तानपाद [नामक] दो लोकमान्य पुत्रोंको उत्पन्न किया। उन्होंने दो महाभाग्यशालिनी कन्याओंको भी उत्पन्न किया, जिनसे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दोनों देवी आकूति तथा प्रसूति नामवाली थीं ॥ २७१-२७६ ॥ | | स्वायम्भुवः प्रसूतिं तु दक्षाय प्रददौ प्रभुः।<br>प्राणो दक्ष इति ज्ञेयः सङ्कल्पो मनुरुच्यते ॥ २७७<br>रुचेः प्रजापतेः सोऽथ आकूतिं प्रत्यपादयत्।<br>आकृत्यां मिथुनं जज्ञे मानसस्य रुचेः शुभम् ॥ २७८ | प्रभु स्वायम्भुव मनुने प्रसूतिको दक्षको अर्पित कर दिया। दक्षको प्राण जानना चाहिये और मनुको संकल्प कहा जाता है। उन्होंने आकूतिको रुचिप्रजापतिको दिया। ब्रह्माके मानसपुत्र रुचिकी मिथुन (जुड़वाँ) सन्तानें |
| अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव | ३२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यज्ञश्च दक्षिणा चैव यमलौ सम्बभूवतुः।<br>यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे॥ २७९<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>एतस्य पुत्रा यज्ञस्य तस्माद्यामाश्च ते स्मृताः॥ २८०<br>अजितश्चैव शुक्रश्च गणौ द्वौ ब्रह्मणा कृतौ।<br>यामाः पूर्वं प्रजाता ये तेऽभवंस्तु दिवौकसः॥ २८१ | आकूतिसे उत्पन्न हुईं। यज्ञ तथा दक्षिणा—ये जुड़वाँ सन्तानें हुईं। दक्षिणासे यज्ञके बारह पुत्रोंने जन्म लिया। वे देवगण, स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ‘याम’—इस नामसे प्रसिद्ध हुए; वे इस यज्ञके पुत्र थे, इसलिये वे ‘याम’ कहे गये हैं। ब्रह्माने अजित तथा शुक्र—इन दो गणोंको उत्पन्न किया था। पूर्वमें जो ‘याम’ उत्पन्न हुए थे, वे देवता हुए॥ २७७–२८१॥ |
| स्वायम्भुवसुतायां तु प्रसूत्यां लोकमातरः।<br>तस्यां कन्याश्चतुर्विंशद्दक्षस्त्वजनयत्प्रभुः॥ २८२<br>सर्वास्ताश्च महाभागाः सर्वाः कमललोचनाः।<br>भोगवत्यश्च ताः सर्वाः सर्वास्ता योगमातरः॥ २८३<br>सर्वाश्च ब्रह्मवादिन्यः सर्वा विश्वस्य मातरः।<br>श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा॥ २८४<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदश।<br>पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः॥ २८५<br>दाराण्येतानि वै तस्य विहितानि स्वयम्भुवा।<br>ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥ २८६<br>सती ख्यात्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।<br>सन्नतिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा॥ २८७<br>तास्तथा प्रत्यपद्यन्त पुनरन्ये महर्षयः।<br>रुद्रो भृगुर्मरीचिश्च अङ्गिराः पुलहः क्रतुः॥ २८८<br>पुलस्त्योऽत्रिवसिष्ठश्च पितरोऽग्निस्तथैव च। | प्रभु दक्षने स्वायम्भुव [मनु]-की पुत्री उस प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं; वे लोकमाताएँ हुईं। वे सभी महाभाग्यशालिनी, कमलके समान नेत्रवाली, भोगवती, योगमाताएँ, ब्रह्मवादिनी तथा विश्वकी माताएँ थीं। उनमें जो श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि एवं कीर्ति—तेरह [पुत्रियाँ] थीं, उन दक्षकन्याओंको प्रभु धर्मने पत्नीके रूपमें ग्रहण कर लिया। स्वायम्भुवने इन सबको उन धर्मकी पत्नी बनाया। उन सभीसे कनिष्ठ जो शिष्ट तथा सुन्दर नेत्रोंवाली ग्यारह [कन्याएँ] थीं, वे सती, ख्याति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा एवं स्वधा [नामवाली] थीं। उन्हें अन्य महर्षियोंने प्राप्त किया; वे रुद्र, भृगु, मरीचि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य, अत्रि, वसिष्ठ, पितर तथा अग्नि थे॥ २८२–२८८ १/२॥ |
| सतीं भवाय प्रायच्छत् ख्यातिं च भृगवे ततः॥ २८९<br>मरीचये च सम्भूतिं स्मृतिमङ्गिरसे ददौ।<br>प्रीतिं चैव पुलस्त्याय क्षमां वै पुलहाय च॥ २९०<br>क्रतवे सन्नतिं नाम अनसूयां तथात्रये।<br>ऊर्जां ददौ वसिष्ठाय स्वाहामप्यग्नये ददौ॥ २९१<br>स्वधां चैव पितृभ्यस्तु तास्वपत्यानि बोधत।<br>एताः सर्वा महाभागाः प्रजास्वनुसृताः स्थिताः॥ २९२<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु यावदाभूतसम्प्लवम्। | उन्होंने सतीको भव (रुद्र)-को तथा ख्यातिको भृगुको दे दिया। इसके बाद उन्होंने सम्भूतिको मरीचिको और स्मृतिको अंगिराको प्रदान कर दिया। उन्होंने प्रीतिको पुलस्त्यको, क्षमाको पुलहको, सन्नतिको क्रतुको, अनसूयाको अत्रिको तथा ऊर्जाको वसिष्ठको अर्पित कर दिया और स्वाहाको अग्निको तथा स्वधाको पितरोंको सौंप दिया। अब उनसे उत्पन्न सन्तानोंको जान लीजिये॥ २८९–२९१ १/२॥ |
| श्रद्धा कामं विजज्ञे वै दर्पो लक्ष्मीसुतः स्मृतः॥ २९३<br>धृत्यास्तु नियमः पुत्रस्तुष्ट्याः सन्तोष एव च।<br>पुष्ट्या लोभः सुतश्चापि मेधापुत्रः श्रुतस्तथा॥ २९४<br>क्रियायामभवत्पुत्रो दण्डः समय एव च।<br>बुद्ध्यां बोधः सुतस्तद्वत्प्रमादोऽप्युपजायत॥ २९५ | ये समस्त महाभाग्यवती कन्याएँ सभी मन्वन्तरोंमें प्रलयपर्यन्त प्रजाओंके सृजनमें लगी रहती थीं। श्रद्धाने कामको उत्पन्न किया। दर्प लक्ष्मीका पुत्र कहा गया है। धृतिका पुत्र नियम, तुष्टिका पुत्र सन्तोष, पुष्टिका पुत्र लोभ तथा मेधाका पुत्र श्रुत है। क्रियासे दण्ड तथा समय |
| ३२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| लज्जायां विनयः पुत्रो व्यवसायो वसोः सुतः।<br>क्षेमः शान्तिसुतश्चापि सुखं सिद्धेर्व्यजायत॥ २९६<br><br>यशः कीर्तिसुतश्चापि इत्येते धर्मसूनवः।<br>कामस्य हर्षः पुत्रो वै देव्यां प्रीत्यां व्यजायत॥ २९७ | [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए। बुद्धिसे बोध तथा प्रमाद [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए। लज्जासे विनय नामक पुत्र हुआ। वसुका पुत्र व्यवसाय तथा शान्तिका पुत्र क्षेम है। सिद्धिसे सुख [नामक पुत्र] उत्पन्न हुआ। कीर्तिका पुत्र यश है। ये सब धर्मके पुत्र हैं। कामका पुत्र हर्ष देवी प्रीतिसे उत्पन्न हुआ। धर्मका यह सुतोदर्क सर्ग बता दिया गया॥ २९२—२९७१/२॥ |
| इत्येष वै सुतोदर्कः सर्गो धर्मस्य कीर्तितः।<br>जज्ञे हिंसा त्वधर्माद्वै निकृतिं चानृतं सुतम्॥ २९८<br><br>निकृत्यां तु द्वयं जज्ञे भयं नरक एव च।<br>माया च वेदना चापि मिथुनद्वयमेतयोः॥ २९९<br><br>भूयो जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम्।<br>वेदनायाः सुतश्चापि दुःखं जज्ञे च रौरवः॥ ३००<br><br>मृत्योर्व्याधिजराशोकक्रोधासूयाश्च जज्ञिरे।<br>दुःखोत्तराः सुता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः॥ ३०१<br><br>नैषां भार्यास्तु पुत्राश्च सर्वे ह्येते परिग्रहाः।<br>इत्येष तामसः सर्गो जज्ञे धर्मनियामकः॥ ३०२ | हिंसाने अधर्मसे निकृति [नामकी कन्या] तथा अनृत पुत्रको उत्पन्न किया। निकृतिसे भय तथा नरक [दो पुत्र] उत्पन्न हुए और इनकी [पत्नियां] माया तथा वेदना जुड़वाँ कन्याएँ हुईं। इसके बाद मायाने प्राणियोंका हरण करनेवाले मृत्युको जन्म दिया और वेदनासे रौरवके द्वारा पुत्ररूपमें 'दुःख' उत्पन्न हुआ। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, क्रोध तथा असूया उत्पन्न हुए। उत्तरोत्तर दुःख देनेवाले ये सभी पुत्र अधर्मके लक्षणोंसे युक्त थे। इन सबको भार्याएँ तथा पुत्र नहीं थे; ये सभी परिग्रह स्वभाववाले थे। इस प्रकार यह धर्मनियामक तामस सर्ग उत्पन्न हुआ॥ २९८—३०२॥ |
| प्रजाः सृजेति व्यादिष्टो ब्रह्मणा नीललोहितः।<br>सोऽभिध्याय सतीं भार्यां निर्ममे ह्यात्मसम्भवान्॥ ३०३ | ब्रह्माने नीललोहित शिवसे कहा था—‘प्रजाओंका सृजन कीजिये।' तब उन्होंने [अपनी] भार्या सतीका ध्यान करके पुत्रोंका सृजन किया। उन्होंने न अधिक, न कम, अपने ही समान तथा व्याघ्रचर्म धारण किये हुए |
| नाधिकान च हीनांस्तान् मानसानात्मनः समान्।<br>सहस्रं हि सहस्राणां सोऽसृजत्कृत्तिवाससः॥ ३०४ | हजारों-हजार मानसपुत्रों [रुद्रगणों]-को उत्पन्न किया। |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुल्यानेवात्मनः सर्वान् रूपतेजोबलश्रुतैः।<br>पिङ्गलान् सनिषङ्गांश्च सकपर्दान् सलोहितान्॥ ३०५<br>विशिष्टान् हरिकेशांश्च दृष्टिघ्नांश्च कपालिनः।<br>महारूपान् विरूपांश्च विश्वरूपान् स्वरूपिणः॥ ३०६<br>रथिनश्चर्मिणश्चैव वर्मिणश्च वरूथिनः।<br>सहस्रशतबाहूंश्च दिव्यान् भौमान्तरिक्षगान्॥ ३०७<br>स्थूलशीर्षानष्टदंष्ट्रान्द्विजिव्हांस्तांस्त्रिलोचनान्।<br>अन्नादान् पिशिताशांश्च आज्यपान् सोमपानपि॥ ३०८<br>मीढुषोऽतिकपालांश्च शितिकण्ठोध्वंरेतसः।<br>हव्यादाञ्छ्रुतधर्मांश्च धर्मिणो ह्यथ बर्हिणः॥ ३०९<br>आसीनान् धावतश्चैव पञ्चभूतान् सहस्रशः।<br>अध्यापिनोऽध्यायिनश्च जपतो युञ्जतस्तथा॥ ३१०<br>धूमवन्तो ज्वलन्तश्च नदीमन्तोऽतिदीप्तिनः।<br>वृद्धान् बुद्धिमन्तश्चैव ब्रह्मिष्ठाञ्शुभदर्शनान्॥ ३११<br>नीलग्रीवान्सहस्राक्षान्सर्वांश्चाथ क्षमाकरान्।<br>अदृश्यान् सर्वभूतानां महायोगान् महौजसः॥ ३१२<br>भ्रमन्तोऽभिद्रवन्तश्च प्लवन्तश्च सहस्रशः।<br>अयातयामानसृजद्रुद्रानेतान् सुरोत्तमान्॥ ३१३ | उन्होंने रूप-तेज-बल-ज्ञानमें अपने ही सदृश, पिंगलवर्णवाले, निषंगयुक्त, जटाजूटधारी, लोहितवर्णवाले, विशिष्ट, हरित केशवाले, देखनेमात्रसे नाश करनेवाले, कपालधारी, विशाल रूपवाले, विकृत रूपवाले, विश्वरूप, स्वरूपवान्, रथारूढ़, ढाल-कवच-वरूथ धारण किये हुए, लाखों भुजाओंवाले, स्वर्ग-पृथ्वी-अन्तरिक्षमें गमन करनेवाले, स्थूल सिरवाले, आठ दाढ़ोंवाले, दो जीभोंवाले, तीन नेत्रोंवाले, अन्न खानेवाले, मांस भक्षण करनेवाले, घृत पीनेवाले, सोमपान करनेवाले, सुन्दर, बड़े-बड़े कपालवाले, नीले कण्ठवाले, ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी), हव्य खानेवाले, वेदपरायण, धार्मिक, मोरपंखसे सुशोभित, कुछ बैठे हुए, कुछ दौड़ते हुए, पाँच भूतोंवाले, कुछ अध्यापन करनेवाले, कुछ अध्ययन करनेवाले, कुछ जप करते हुए, कुछ योगाभ्यास करते हुए, कुछ धूमयुक्त, कुछ दीप्तिमान्, गंगाको धारण किये हुए, अत्यन्त कान्तिमान्, वृद्ध, बुद्धिसम्पन्न, ब्रह्मिष्ठ, शुभ दर्शनवाले, नीलग्रीवा (कण्ठ)-वाले, हजार नेत्रोंवाले, क्षमाकी निधि, सभी प्राणियोंसे अदृश्य, महान् योगवाले, महातेजस्वी, भ्रमण करते हुए, इधर-उधर भागते हुए, कूदते हुए तथा अयातयाम—इन हजारों-हजार उत्तम रुद्रदेवताओंको उत्पन्न किया॥ ३०३-३१३॥ |
| ब्रह्मा दृष्ट्वाऽब्रवीदेनं मास्त्राक्षीरीदृशीः प्रजाः।<br>स्रष्टव्या नात्मनस्तुल्याः प्रजा देव नमोऽस्तु ते॥ ३१४<br>अन्याः सृज त्वं भद्रं ते प्रजा वै मृत्युसंयुताः।<br>नारप्स्यन्ते हि कर्माणि प्रजा विगतमृत्युवः॥ ३१५ | इन्हें देखकर ब्रह्माजीने इन [नीललोहित]-से कहा—‘ऐसी प्रजाओंका सृजन मत कीजिये; अपने सदृश प्रजाओंकी सृष्टि आपको नहीं करनी चाहिये। हे देव! आपको नमस्कार है। आपका कल्याण हो। आप मृत्युयुक्त अन्य प्रजाओंका सृजन कीजिये; क्योंकि मृत्युरहित प्रजाएँ कार्योंका आरम्भ नहीं करेंगी’॥ ३१४-३१५॥ |
| एवमुक्तोऽब्रवीदेनं नाहं मृत्युजरान्विताः।<br>प्रजाः स्रक्ष्यामि भद्रं ते स्थितोऽहं त्वं सृज प्रजाः॥ ३१६<br>एते ये वै मया सृष्टा विरूपा नीललोहिताः।<br>सहस्त्राणां सहस्रं तु आत्मनो निःसृताः प्रजाः॥ ३१७<br>एते देवा भविष्यन्ति रुद्रा नाम महाबलाः।<br>पृथिव्यामन्तरिक्षे च दिक्षु चैव परिश्रिताः॥ ३१८<br>शतरुद्राः समात्मानो भविष्यन्तीति याज्ञिकाः।<br>यज्ञभाजो भविष्यन्ति सर्वदेवगणैः सह॥ ३१९ | ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे गये रुद्रने उनसे कहा—मैं मृत्यु तथा जरासे युक्त प्रजाओंका सृजन नहीं करूँगा। आपका कल्याण हो। अब मैं [शान्त होकर] बैठता हूँ और आप ही सृजन कीजिये। जिन हजारों-हजार विरूप नीललोहित रुद्रोंको मैंने सृजित किया है, वे मेरी आत्मासे निकली हुई प्रजाएँ हैं। ये रुद्र नामवाले महाबली देवता होंगे। ये पृथ्वी, आकाश तथा सभी दिशाओंमें व्याप्त रहेंगे। इनमें समान आत्मावाले सौ रुद्र याज्ञिक होंगे; वे सभी देवताओंके साथ |
३३० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मन्वन्तरेषु ये देवा भविष्यन्तीह भेदतः।<br>सार्धं तैरिज्यमानास्ते स्थास्यन्तीहायुगक्षयात्॥ ३२० | यज्ञभाग ग्रहण करनेवाले होंगे। सभी मन्वन्तरोंमें जो देवता भेदपूर्वक यहाँपर होंगे, उनके साथ पूजित होते हुए वे सभी रुद्र युगक्षयपर्यन्त यहाँ स्थित रहेंगे॥ ३१६—३२०॥ |
| एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा महादेवेन धीमता।<br>प्रत्युवाच नमस्कृत्य हृष्यमाणः प्रजापतिः॥ ३२१<br><br>एवं भवतु भद्रं ते यथा ते व्याहृतं विभो।<br>ब्रह्मणा समनुज्ञाते तथा सर्वमभूत्किल॥ ३२२ | बुद्धिमान् महादेवजीके द्वारा इस प्रकार कहे गये प्रजापति ब्रह्माजी प्रसन्न होकर प्रणाम करके उनसे बोले—'हे विभो! आपने जैसा कहा है, वैसा ही हो; आपका कल्याण हो।' ब्रह्माके ऐसा कहनेके बाद सब कुछ उसी प्रकारसे हुआ॥ ३२१-३२२॥ |
| ततः प्रभृति देवेशो न चासूत वै प्रजाः।<br>ऊर्ध्वरेताः स्थितः स्थाणुर्यावदाभूतसम्प्लवम्॥ ३२३<br><br>यस्मादुक्तः स्थितोऽस्मीति तस्मात्स्थाणुरिति स्मृतः।<br>एष देवो महादेवः पुरुषोऽर्कसमद्युतिः॥ ३२४<br><br>अर्धनारीनरवपुस्तेजसा ज्वलनोपमः।<br>स्वेच्छ्यासौ द्विधाभूतः पृथक् स्त्री पुरुषः पृथक्॥ ३२५<br><br>स एवैकादशार्धेन स्थितोऽसौ परमेश्वरः।<br>तत्र या सा महाभागा शङ्करस्यार्धकायिनी॥ ३२६<br><br>प्रागुक्ता तु महादेवी स्त्री सैवेह सती ह्यभूत्।<br>हिताय जगतां देवी दक्षेणाराधिता पुरा॥ ३२७<br><br>कार्यार्थं दक्षिणं तस्याः शुक्लं वामं तथासितम्।<br>आत्मानं विभजस्वेति प्रोक्ता देवेन शम्भुना॥ ३२८<br><br>सा तथोक्ता द्विधाभूता शुक्ला कृष्णा च वै द्विजाः।<br>तस्या नामानि वक्ष्यामि शृण्वन्तु च समाहिताः॥ ३२९ | उसी समयसे देवताओंके स्वामी शिवने प्रजाओंका सृजन नहीं किया और वे प्रलयपर्यन्त स्थाणुवत् स्थित रहे तथा ब्रह्मचारी बने रहे। चूँकि उन्होंने कहा था कि 'मैं स्थित हूँ'—इसलिये वे 'स्थाणु' कहे गये। ये भगवान् महादेव पुरुषस्वरूप, सूर्यके समान तेजवाले, अपने तेजसे अग्निके समान प्रतीत होनेवाले तथा आधा भाग नर और आधा भाग नारीके शरीरवाले हैं। वे अपनी इच्छासे दो भागोंमें अलग-अलग स्त्री तथा पुरुषरूपमें विभक्त हुए। वे परमेश्वर आधे भागसे ग्यारह रूपोंमें स्थित हैं। उसमें जो शंकरकी अर्धांगिनी महाभागा महादेवी कही गयी हैं; वे ही भगवती पूर्वकालमें दक्षके द्वारा आराधित होकर जगत्के हितके लिये सतीके रूपमें आविर्भूत हुई थीं। सृष्टिकार्यके लिये उनका दाहिना भाग श्वेत तथा बायाँ भाग कृष्ण था। जब भगवान् शम्भुने उनसे कहा कि अपनेको विभक्त करो, तब हे द्विजो! उनके ऐसा कहनेपर वे शुक्ल तथा कृष्ण दो रूपोंमें विभक्त हो गयीं। अब मैं उनके नाम बताऊँगा; आपलोग एकाग्रचित्त होकर सुनिये॥ ३२३—३२९॥ |
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप··· सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वाहा स्वधा महाविद्या मेधा लक्ष्मीः सरस्वती।<br>सती दाक्षायणी विद्या इच्छा शक्तिः क्रियात्मिका॥ ३३०<br>अपर्णा चैकपर्णा च तथा चैवैकपाटला।<br>उमा हैमवती चैव कल्याणी चैकमातृका॥ ३३१<br>ख्यातिः प्रज्ञा महाभागा लोके गौरिति विश्रुता।<br>गणाम्बिका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी॥ ३३२<br>एकरूपमथैतस्याः पृथग्देहविभावनात्।<br>सावित्री वरदा पुण्या पावनी लोकविश्रुता॥ ३३३<br>आज्ञा आवेशनी कृष्णा तामसी सात्त्विकी शिवा।<br>प्रकृतिर्विकृता रौद्री दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी॥ ३३४<br>कालरात्रिर्महामाया रेवती भूतनायिका।<br>द्वापरान्तविभागे च नामानीमानि सुव्रताः॥ ३३५<br>गौतमी कौशिकी चार्या चण्डी कात्यायनी सती।<br>कुमारी यादवी देवी वरदा कृष्णपिङ्गला॥ ३३६<br>बर्हिध्वजा शूलधरा परमा ब्रह्मचारिणी।<br>महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी दृषद्वत्येकशूलधृक्॥ ३३७<br>अपराजिता बहुभुजा प्रगल्भा सिंहवाहिनी।<br>शुम्भादिदैत्यहन्त्री च महामहिषमर्दिनी॥ ३३८<br>अमोघा विन्ध्यनिलया विक्रान्ता गणनायिका।<br>देव्या नामविकाराणि इत्येतानि यथाक्रमम्॥ ३३९<br>भद्रकाल्या मयोक्तानि सम्यक्फलप्रदानि च।<br>ये पठन्ति नरास्तेषां विद्यते न च पातकम्॥ ३४०<br>अरण्ये पर्वते वापि पुरे वाप्यथवा गृहे।<br>रक्षामेतां प्रयुञ्जीत जले वाथ स्थलेऽपि वा॥ ३४१<br>व्याघ्रकुम्भीनचोरेभ्यो भयस्थाने विशेषतः।<br>आपत्स्वपि च सर्वासु देव्या नामानि कीर्तयेत्॥ ३४२<br>आर्यकग्रहभूतैश्च पूतनामातृभिस्तथा।<br>अभ्यर्दितानां बालानां रक्षामेतां प्रयोजयेत्॥ ३४३ | स्वाहा, स्वधा, महाविद्या, मेधा, लक्ष्मी, सरस्वती, सती, दाक्षायणी, विद्या, इच्छा, शक्ति, क्रियात्मिका, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, उमा, हैमवती, कल्याणी, एकमात्रुका, ख्याति, प्रज्ञा, महाभागा, लोकप्रसिद्ध गौरी, गणाम्बिका, महादेवी, नन्दिनी तथा जातवेदसी—ये नाम हैं। पृथक् देह धारण करनेसे पहले इनका एक ही रूप था। सावित्री, वरदा, पुण्या, पावनी, लोकविश्रुता, आज्ञा, आवेशनी, कृष्णा, तामसी, सात्त्विकी, शिवा, प्रकृति, विकृता, रौद्री, दुर्गा, भद्रा, प्रमाथिनी, कालरात्रि, महामाया, रेवती, भूतनायिका—हे सुव्रतो! द्वापरयुगके अन्तमें ये उनके नाम हुए। इसी प्रकार गौतमी, कौशिकी, आर्या, चण्डी, कात्यायनी, सती, कुमारी, यादवी, देवी, वरदा, कृष्णपिंगला, बर्हिध्वजा, शूलधरा, परमा, ब्रह्मचारिणी, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, दृषद्वती, एकशूलधृक्, अपराजिता, बहुभुजा, प्रगल्भा, सिंहवाहिनी, शुम्भादिदैत्यहन्त्री, महामहिषमर्दिनी, अमोघा, विन्ध्यनिलया, विक्रान्ता, गणनायिका—मैंने देवी भद्रकालीके इन नामविकारोंको यथाक्रम बता दिया, जो सम्यक् फल प्रदान करनेवाले हैं। जो लोग इनका पाठ करते हैं, उनका पाप शेष नहीं रह जाता है। जंगलमें, पर्वतपर, नगरमें, घरमें, जल अथवा स्थल कहीं भी रक्षाके लिये इनका प्रयोग करना चाहिये। विशेष रूपसे बाघ, हाथी तथा चोरोंसे भयके स्थानमें और सभी प्रकारकी विपत्तियोंमें देवीके नामोंको पढ़ना चाहिये। बुरे ग्रहों, भूतों, पूतना तथा मातृगणोंसे पीड़ित शिशुओंकी रक्षाके लिये इन नामोंका प्रयोग करना चाहिये॥ ३३०—३४३॥ |
| महादेवी कले द्वे तु प्रज्ञा श्रीश्च प्रकीर्तिते।<br>आभ्यां देवीसहस्त्राणि यैर्व्याप्तमखिलं जगत्॥ ३४४<br>अनया देवदेवोऽसौ सत्या रुद्रो महेश्वरः।<br>आतिष्ठत्सर्वलोकानां हिताय परमेश्वरः॥ ३४५<br>रुद्रः पशुपतिश्चासीत्पुरा दग्धं पुरत्रयम्।<br>देवाश्च पशवः सर्वे बभूवुस्तस्य तेजसा॥ ३४६<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि आदिसर्गक्रमं शुभम्।<br>स याति ब्रह्मणो लोकं श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ ३४७ | 'प्रज्ञा' तथा 'श्री'—ये महादेवीकी दो कलाएँ कही गयी हैं। इन दोनोंसे हजारों देवियाँ उत्पन्न हुई हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। देवदेव महेश्वर परमेश्वर रुद्र सभी लोकोंके हितके लिये इन सतीके साथ [सर्वदा] विद्यमान रहते हैं। रुद्र पशुपति हैं। इन्होंने ही पूर्वकालमें त्रिपुरको दग्ध किया था। उन्हींके तेजसे सभी देवता पशु [जीव] हुए। जो [व्यक्ति] आदिसृष्टिके शुभ क्रमको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा उत्तम द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है॥ ३४४—३४७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सृष्टिबिस्तारो नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सृष्टिविस्तार' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७०॥
७१- तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त एवं तपस्याद्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरोंकी प्राप्ति, त्रिपुरासुरके विनाशके लिये देवताओंका उद्योग तथा भगवान् शंकरका उनपर अनुग्रह
| ३३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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इकहत्तरवाँ अध्याय
तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त एवं तपस्याद्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरोंकी प्राप्ति, त्रिपुरासुरके विनाशके लिये देवताओंका उद्योग तथा भगवान् शंकरका उनपर अनुग्रह
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] आपने संक्षेपमें |
|---|---|
| समासाद्विस्तराच्चैव सर्गः प्रोक्तस्त्वया शुभः।<br>कथं पशुपतिश्चासीत्पुरं दग्धुं महेश्वरः॥ १ | तथा विस्तारसे शुभ सर्गका निरूपण कर दिया। पशुपति महेश्वरने पुरको कैसे दग्ध किया और ब्रह्मासहित सभी |
| कथं च पशवश्चासन् देवाः सब्रह्मकाः प्रभोः।<br>मयस्य तपसा पूर्वं सुदुर्गं निर्मितं पुरम्॥ २ | देवता प्रभुके पशु कैसे हो गये? मयकी तपस्याके द्वारा पूर्वकालमें उत्तम दुर्गमय पुर निर्मित किया गया था। |
| हैमं च रजतं दिव्यमयस्मयमनुत्तमम्।<br>सुदुर्गं देवदेवेन दग्धमित्येव नः श्रुतम्॥ ३ | हमने सुना है कि देवदेव [शिव]-ने सोने, चाँदी तथा लोहेसे निर्मित दिव्य, उत्तम तथा सुन्दर दुर्गको जला |
| कथं ददाह भगवान् भगनेत्रनिपातनः।<br>एकेनेषुनिपातेन दिव्येनापि तदा कथम्॥ ४ | दिया था। भगके नेत्रका नाश करनेवाले भगवान् शिवने केवल एक बाणके प्रक्षेपसे उसे कैसे जला दिया और |
| विष्णुनोत्पादितैर्भूतैर्न दग्धं तत्पुरत्रयम्।<br>पुरस्य सम्भवः सर्वो वरलाभः पुरा श्रुतः॥ ५ | विष्णुके द्वारा उत्पन्न किये गये भूतगण उन तीनों पुरोंको क्यों नहीं जला सके? हमलोगोंने [उस] पुरकी उत्पत्ति |
| इदानीं दहनं सर्वं वक्तुमर्हसि सुव्रत।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः॥ ६ | तथा सम्पूर्ण वरप्राप्तिके विषयमें पहले ही सुन लिया है; अब हे सुव्रत! [पुरके] दहनके विषयमें पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा कीजिये॥ १—५ १/२॥ |
| यथा श्रुतं तथा प्राह व्यासाद्विश्वार्थसूचकात्। | तब उनका वचन सुनकर पौराणिकोंमें उत्तम सूतजीने समस्त अर्थोंके सूचक व्यासजीसे [इस विषयमें] जैसा सुना था, उसे बताया॥ ६ १/२॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] इस त्रिलोकीके |
| त्रैलोक्यस्यास्य शापाद्वि मनोवाक्कायसम्भवात्॥ ७ | मन-वाणी-शरीरजन्य शापके कारण स्कन्द (कार्तिकेय)- |
| निहते तारके दैत्ये तारपुत्रे सबान्धवे।<br>स्कन्देन वा प्रयत्नेन तस्य पुत्रा महाबलाः॥ ८ | के द्वारा प्रयत्नपूर्वक बान्धवोंसहित तारपुत्र दैत्य तारकके मार दिये जानेपर उसके महाबली पुत्रों विद्युन्माली, |
| विद्युन्माली तारकाक्षः कमलाक्षश्च वीर्यवान्।<br>तपस्तेपुर्महात्मानो महाबलपराक्रमाः॥ ९ | तारकाक्ष तथा पराक्रमी कमलाक्षने तप किया। महान् बल तथा पराक्रमवाले वे महात्मा कठोर तपमें लीन |
| तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः।<br>तपसा कर्शयामासुर्देहान् स्वान् दानवोत्त्माः॥ १० | होकर परम नियममें स्थित थे। उन श्रेष्ठ दानवोंने तपस्याके द्वारा अपने शरीरोंको दुर्बल बना दिया। तब |
| तेषां पितामहः प्रीतो वरदः प्रददौ वरम्। | उनपर प्रसन्न होकर वरदाता ब्रह्माजीने उन्हें वर प्रदान किया॥ ७—१० १/२॥ |
| दैत्या ऊचुः | दैत्य बोले— 'सभी प्राणियोंसे सर्वदा हम सभीका |
| अवध्यत्वं च सर्वेषां सर्वभूतेषु सर्वदा॥ ११ | अवध्यत्व हो'—उन सभीने एक साथ सभी लोकोंके |
| सहिता वरयामासुः सर्वलोकपितामहम्।<br>तानब्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरव्ययः॥ १२ | पितामहसे यह वर माँगा। तब लोकोंके स्वामी अव्यय |
| अध्याय ७१ ] | तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त | ३३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नास्ति सर्वामरत्वं वै निवर्तध्वमतोऽसुराः।<br>अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते॥ १३ | देव ब्रह्माने उनसे कहा—'हे असुरो! सभीको अमरत्व नहीं हुआ करता, अतः इसे छोड़ो और दूसरा वर माँगो, जो तुमलोगोंको अच्छा लगता हो'॥ ११—१३॥ |
| ततस्ते सहिता दैत्याः सम्प्रधार्य परस्परम्।<br>ब्रह्माणमब्रुवन् दैत्याः प्रणिपत्य जगद्गुरुम्॥ १४<br><br>वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम्।<br>विचरिष्याम लोकेश त्वत्प्रसादाज्जगद्गुरो॥ १५<br><br>तथा वर्षसहस्रेषु समेष्यामः परस्परम्।<br>एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ॥ १६<br><br>समागतानि चैतानि यो हन्याद्भगवंस्तदा।<br>एकेनैवेषुणा देवः स नो मृत्युर्भविष्यति॥ १७ | तदनन्तर उन दैत्योंने मिलकर आपसमें विचार करके जगद्गुरु ब्रह्माको प्रणाम करके कहा—हे लोकेश! हे जगद्गुरो! तीन पुर स्थापित करके हमलोग आपकी कृपासे इस पृथ्वीपर विचरण करें। हमलोग एक हजार वर्षमें आपसमें मिलें और हे अनघ! ये तीनों पुर एकीभावको प्राप्त हों। हे भगवन्! जो इन इकट्ठे हुए पुरोंको एक ही बाणसे नष्ट कर दे, वह देव हमलोगोंका मृत्युस्वरूप हो॥ १४—१७॥ |
| एवमस्त्विति तान् देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद्दिवम्।<br>ततो मयः स्वतपसा चक्रे वीरः पुराण्यथ॥ १८<br><br>काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम्।<br>आयसं चाभवद्भूमौ पुरं तेषां महात्मनाम्॥ १९<br><br>एकैकं योजनशतं विस्तारायामतः समम्।<br>काञ्चनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राजतम्॥ २०<br><br>विद्युन्मालेश्चायसं वै त्रिविधं दुर्गमुत्तमम्।<br>मयश्च बलवांस्तत्र दैत्यदानवपूजितः॥ २१<br><br>हैरण्ये राजते चैव कृष्णायासमये तथा।<br>आलयं चात्मनः कृत्वा तत्रास्ते बलवांस्तदा॥ २२ | 'ऐसा ही हो'—उनसे यह कहकर ब्रह्मदेव स्वर्गलोक चले गये। इसके बाद वीर [दानव] मयने अपनी तपस्याके द्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया। उन महात्माओंका सुवर्णमय पुर स्वर्गमें, रजत (चाँदी)-मय पुर अन्तरिक्षमें तथा लौहमय पुर पृथ्वीपर था। उनमेंसे प्रत्येक पुर लम्बाई तथा चौड़ाईमें एक सौ योजनवाला और एक समान था। सोनेका पुर तारकाक्षका, चाँदीका पुर कमलाक्षका और लोहेका पुर विद्युन्मालीका था; तीनों प्रकारके दुर्ग उत्तम थे। बलशाली मय दैत्यों तथा दानवोंसे पूजित था; वह बलवान् मय वहाँ स्वर्णमय, रजतमय एवं काले लौहमय पुरमें अपना भवन बनाकर |
| ३३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| रहा करता था॥ १८–२२॥ | |
| एवं बभूवुर्दैत्यानामतिदुर्गाणि सुव्रताः।<br>पुराणि त्रीणि विप्रेन्द्रास्त्रैलोक्यमिव चापरम्॥ २३<br>पुरत्रये तदा जाते सर्वे दैत्या जगत्त्रये।<br>पुरत्रयं प्रविश्यैव बभूवुस्ते बलाधिकाः॥ २४ | हे सुव्रतो! हे विप्रेन्द्रो! इस प्रकार दैत्योंके सुदृढ़ किलोंसे युक्त वे तीनों पुर दूसरे त्रिलोकीके समान थे। तब तीनों पुरोंके [निर्मित] हो जानेपर वे सभी दैत्य उन तीनों पुरोंमें प्रवेश करके तीनों लोकोंमें अत्यधिक बलशाली हो गये॥ २३-२४॥ |
| कल्पद्रुमसमाकीर्णं गजवाजिसमाकुलम्।<br>नानाप्रासादसङ्कीर्णं मणिजालैः समावृतम्॥ २५<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैर्विश्वतोमुखैः।<br>पद्मरागमयैः शुभ्रैः शोभितं चन्द्रसन्निभैः॥ २६<br>प्रासादैर्गोपुरैर्दिव्यैः कैलासशिखरोपमैः।<br>शोभितं त्रिपुरं तेषां पृथक्पृथगनुत्तमैः॥ २७<br>दिव्यस्त्रीभिः सुसम्पूर्णं गन्धर्वैः सिद्धचारणैः।<br>रुद्रालयैः प्रतिगृहं साग्निहोत्रैर्द्विजोत्तमाः॥ २८ | उनके तीनों पुर कल्पवृक्षोंसे भरे हुए, हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण, अनेक भवनोंसे सुशोभित, मणियोंके जालोंसे घिरे हुए, सभी ओर द्वारोंवाले, सूर्यमण्डलसदृश विमानोंसे युक्त, पद्मरागमय चन्द्रसदृश उज्ज्वल महलोंसे सुशोभित और कैलासशिखरके समान दिव्य तथा अत्युत्तम फाटकोंसे पृथक्-पृथक् मण्डित थे। हे श्रेष्ठ द्विजो! वे पुर दिव्य स्त्रियों, गन्धर्वों, सिद्धों एवं चारणोंसे भरे हुए थे। प्रत्येक घरमें रुद्रालय थे और अग्निहोत्र होता था। |
| वापीकूपतडागैश्च दीर्घिकाभिस्तु सर्वतः।<br>मत्तमातङ्गयूथैश्च तुरङ्गैश्च सुशोभनैः॥ २९<br>रथैश्च विविधाकारैर्विचित्रैर्विश्वतोमुखैः।<br>सभाप्रपादिभिश्चैव क्रीडास्थानैः पृथक् पृथक्॥ ३०<br>वेदाध्ययनशालाभिर्विविधाभिः समन्ततः।<br>अधृष्यं मनसाप्यन्यैर्मयस्यैव च मायया॥ ३१ | वे पुर सभी ओर बावलियों, कुओं, तालाबों और बड़ी-बड़ी झीलोंसे युक्त थे; मत्त हाथियोंके झुण्डों, अति सुन्दर घोड़ों, चारों ओर मुखवाले अनेक प्रकारके अद्भुत रथों, सभाभवनों, पानीय (जल)-की शालाओं तथा क्रीड़ास्थलोंसे पृथक्-पृथक् समन्वित थे। वे पुर चारों ओर अनेकविध वेदाध्ययनशालाओंसे युक्त थे और मय [दानव]-की मायासे अन्य लोगोंद्वारा मनसे भी अलंघ्य थे। |
| पतिव्रताभिः सर्वत्र सेवितं मुनिपुङ्गवाः।<br>कृत्वापि सुमहत्पापमपापैः शङ्करार्चनात्॥ ३२<br>दैत्येश्वरैर्महाभागैः सदारैः ससुतैर्द्विजाः।<br>श्रौतस्मार्तार्थधर्मज्ञैस्तद्धर्मनिरतैः सदा॥ ३३<br>महादेवेतरं त्यक्त्वा देवं तस्यार्चनं स्थितैः।<br>व्यूढोरस्कैर्वृषस्कन्धैः सर्वायुधधरैः सदा॥ ३४<br>सर्वदा क्षुधितैश्चैव दावाग्निसदृशेक्षणैः।<br>प्रशान्तैः कुपितैश्चैव कुब्जैर्वामनकैस्तथा॥ ३५<br>नीलोत्पलदलप्रख्यैर्नीलकुञ्चितमूर्धजैः।<br>नीलाद्रिमेरुसङ्काशैर्नीरदोपमनिःस्वनैः।<br>मयेन रक्षितैः सर्वैः शिक्षितैर्युद्धलालसैः॥ ३६ | हे मुनिश्रेष्ठो! वे पुर सर्वत्र पतिव्रता स्त्रियोंके द्वारा सेवित थे। हे द्विजो! वे पुर बड़े-बड़े पाप करके भी शंकरजीकी पूजाके कारण पापरहित, श्रौत-स्मार्त धर्मोंके ज्ञाता तथा अपने धर्मके प्रति परायण भार्यासहित महाभाग्यशाली दैत्योंसे सदा समन्वित थे; महादेवके अतिरिक्त अन्य देवताको छोड़कर उन [शिव]-के अर्चनमें स्थित, चौड़ी छातीवाले, बैलके समान कंधेवाले, सर्वदा समस्त आयुध धारण करनेवाले, सदा उपवास करनेवाले, दावानलके समान नेत्रोंवाले, उनमें कुछ शान्त तथा कुछ कुपित, कुबड़े, बौने, नील कमलदलकी आभाके सदृश, काले एवं घुँघराले बालोंवाले, नीलपर्वत तथा मेरुके समान प्रतीत होनेवाले, मेघके समान गर्जन करनेवाले, मयके द्वारा रक्षित तथा शिक्षित और युद्धकी तीव्र इच्छावाले दैत्योंसे परिपूर्ण थे। इस प्रकार वे पुर |
| अथ समररतैः सदासमन्ता-<br>च्छिवपदपूजनया सुलब्धवीर्यैः। |
अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रविमरुदमरेन्द्रसन्निकाशैः<br>सुरमथनैः सुदृढैः सुसेवितं तत् ॥ ३७ | सदा युद्धपरायण, भलीभाँति शिवके चरणोंकी पूजाके द्वारा प्राप्त पराक्रमवाले, सूर्य-वायु-इन्द्रसदृश, देवताओंका दमन करनेवाले तथा अत्यन्त दृढ़ दैत्योंसे सेवित थे॥ २५-३७॥ |
| सेन्द्रा देवा द्विजश्रेष्ठा द्रुमा दावाग्निना यथा।<br>पुरत्रयाग्निना दग्धा ह्यभवन् दैत्यवैभवात् ॥ ३८ | हे द्विजश्रेष्ठो! दैत्योंके वैभवके कारण तीनों पुरोंकी अग्निसे इन्द्रसहित देवतागण उसी प्रकार दग्ध हो गये, जैसे दावाग्निसे वृक्ष दग्ध हो जाते हैं॥ ३८॥ |
| अथैवं ते तदा दग्धा देवा देवेश्वरं हरिम्।<br>अभिवन्द्य तदा प्राहुस्तमप्रतिमवर्चसम् ॥ ३९ | इस प्रकार उन दग्ध देवताओंने अतुलनीय तेजवाले देवेश्वर विष्णुको प्रणाम करके उनको [यह सब] बताया॥ ३९॥ |
| सोऽपि नारायणः श्रीमान् चिन्तयामास चेतसा।<br>किं कार्यं देवकार्येषु भगवानिति स प्रभुः ॥ ४०<br><br>तदा सस्मार वै यज्ञं यज्ञमूर्तिर्जनार्दनः।<br>यज्वा यज्ञभुगीशानो यज्वनां फलदः प्रभुः ॥ ४१ | तब उन श्रीमान् प्रभु भगवान् नारायणने मनमें सोचा कि देवताओंके कार्यके विषयमें क्या किया जाना चाहिये। इसके बाद यज्ञभोक्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले तथा यज्ञमूर्ति प्रभु जनार्दनने यज्ञदेवका स्मरण किया॥ ४०-४१॥ |
| ततो यज्ञः स्मृतस्तेन देवकार्यार्थसिद्धये।<br>देवं ते पुरुषं चैव प्रणेमुस्तुष्टुवुस्तदा ॥ ४२<br><br>भगवानपि तं दृष्ट्वा यज्ञं प्राह सनातनम्।<br>सनातनस्तदा सेन्द्रान् देवानालोक्य चाच्युतः ॥ ४३ | तदनन्तर देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये उनके द्वारा स्मरण किये गये यज्ञदेव उपस्थित हुए। तब उन देवताओंने यज्ञदेवको प्रणाम किया और उनकी स्तुति की। इसके बाद सनातन यज्ञको देखकर पुनः इन्द्रसहित देवताओंकी ओर देखकर सनातन भगवान् अच्युत (विष्णु) उनसे कहने लगे॥ ४२-४३॥ |
| श्रीविष्णुरुवाच<br>अनेनोपसदा देवा यजध्वं परमेश्वरम्।<br>पुरत्रयविनाशाय जगत्त्रयविभूतये ॥ ४४ | श्रीविष्णु बोले—हे देवताओ! तीनों पुरोंके विनाशके लिये तथा तीनों लोकोंकी समृद्धिके लिये इन [उपस्थित] उपसद नामक यज्ञके द्वारा परमेश्वरका यजन कीजिये॥ ४४॥ |
| सूत उवाच<br>अथ तस्य वचः श्रुत्वा देवदेवस्य धीमतः।<br>सिंहनादं महत्कृत्वा यज्ञेशं तुष्टुवुः सुराः ॥ ४५ | सूतजी बोले—उन बुद्धिमान् देवदेवका वचन सुनकर महान् सिंहनाद करके देवतागण [उन] यज्ञेशकी स्तुति करने लगे॥ ४५॥ |
| ततः सञ्चिन्त्य भगवान् स्वयमेव जनार्दनः।<br>पुनः प्राह स सर्वांस्तांस्त्रिदशांस्त्रिदशेश्वरः ॥ ४६<br><br>हत्वा दग्ध्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा।<br>यजेद्यदि महादेवमपापो नात्र संशयः ॥ ४७ | इसके बाद स्वयं विचार करके देवताओंके स्वामी वे भगवान् जनार्दन पुनः सभी देवताओंसे बोले—प्राणियोंको मारकर तथा जलाकर और अन्यायपूर्वक भोग-विलास करके भी यदि कोई महादेवकी पूजा करे, तो वह पापरहित हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ४६-४७॥ |
| अपापा नैव हन्तव्याः पापा एव न संशयः।<br>हन्तव्याः सर्वयत्नेन कथं वध्याः सुरोत्तमाः ॥ ४८ | 'निष्पाप लोगोंकी हत्या नहीं की जानी चाहिये; केवल पापियोंकी ही हत्या पूर्णप्रयत्नसे की जानी |
| ३३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| असुरा दुर्मदाः पापा अपि देवैर्महाबलैः।<br>तस्मान्न वध्या रुद्रस्य प्रभावात्परमेष्ठिनः॥ ४९<br><br>कोऽहं ब्रह्माथवा देवा दैत्या देवारिसूंदनाः।<br>मुनयश्च महात्मानः प्रसादेन विना प्रभोः॥ ५० | चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रेष्ठ देवताओ! पापी होते हुए भी दुर्मद असुर महाबली देवताओंके द्वारा वध्य कैसे हो सकते हैं? क्योंकि परमेष्ठी रुद्रके प्रभावके कारण वे वध्य नहीं हैं। हे देवताओ! प्रभु [शिव]-की कृपाके बिना मैं कौन हूँ, ब्रह्मा कौन हैं, दैत्य कौन हैं, देवशत्रुओंके विनाशक कौन हैं और महात्मा मुनिगण कौन हैं?॥ ४८-५०॥ | | यः सप्तविंशको नित्यः परात्परतरः प्रभुः।<br>विश्वामरेश्वरो वन्द्यो विश्वाधारो महेश्वरः॥ ५१<br><br>स एव सर्वदेवेशः सर्वेषामपि शङ्करः।<br>लीलया देवदैत्येन्द्रविभागमकरोद्धरः॥ ५२ | जो सत्ताईस तत्त्वोंसे युक्त, शाश्वत, महान्से भी महत्तर, प्रभुतासम्पन्न, सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, वन्दनीय, विश्वके आधार, महेश्वर, सर्वदेवेश तथा सबके स्वामी हैं; उन हर शंकरने ही [अपनी] लीलासे देवताओं एवं दैत्योंका विभाजन किया है॥ ५१-५२॥ | | तस्यांशमेकं सम्पूज्य देवा देवत्वमागताः।<br>ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो ह्यहं विष्णुत्वमेव च॥ ५३<br><br>तमपूज्य जगत्यस्मिन् कः पुमान् सिद्धिमिच्छति।<br>तस्मात्तेनैव हन्तव्या लिङ्गार्चनविधेर्बलात्॥ ५४<br><br>धर्मनिष्ठाश्च ते सर्वे श्रौतस्मार्तविधौ स्थिताः।<br>तथापि यजमानेन रौद्रेणोपसदा प्रभुम्।<br>रुद्रमिष्ट्वा यथान्यायं जेष्यामो दैत्यसत्तमान्॥ ५५<br><br>सतारकाक्षेण मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं स्फटिकाभमेकम्।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ५६ | उनके एक अंश (लिङ्गरूप)-की पूजा करके देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है, ब्रह्माने ब्रह्मत्व प्राप्त किया है और मुझ विष्णुने विष्णुत्व प्राप्त किया है। उनकी पूजा किये बिना इस जगत्में कौन व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है? अतः लिङ्गार्चनविधिके प्रभावसे उन्हींके द्वारा वे दैत्य हन्तव्य हैं। यद्यपि वे सभी [दैत्य] धर्मनिष्ठ हैं तथा श्रौत-स्मार्तविधानमें स्थित हैं, फिर भी उपसद नामक रुद्रयज्ञसे यजमानके द्वारा विधिपूर्वक प्रभु रुद्रका यजन करके हमलोग महादैत्योंको जीत सकेंगे। एकमात्र त्रिनेत्र भगवान् [शिव]-को छोड़कर तारकाक्षसहित [दानव] मयके द्वारा सुरक्षित, स्वस्थ, गुप्त तथा स्फटिकके समान आभावाले तीनों पुरोंको नष्ट करनेमें भला कौन समर्थ है?॥ ५३-५६॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा हरिश्चेष्ट्वा यज्ञेनोपसदा प्रभुम्।<br>उपविष्टो ददर्शाथ भूतसङ्घान् सहस्रशः॥ ५७<br><br>शूलशक्तिगदाहस्तान् टङ्कोपलशिलायुधान्।<br>नानाप्रहरणोपेतान्नानावेषधरांस्तदा ॥ ५८<br><br>कालाग्निरुद्रसङ्काशान् कालरुद्रोपमांस्तदा।<br>प्राह देवो हरिः साक्षात्प्रणिपत्य स्थितान् प्रभुः॥ ५९ | सूतजी बोले— इस प्रकार उपसद [नामक] यज्ञके द्वारा प्रभु [शिव]-का यजन करके बैठे हुए विष्णुने हजारों भूतसमुदायोंको देखा। तब शूल-शक्ति-गदासे युक्त हाथोंवाले, टंक-उपल-शिलाको आयुधके रूपमें धारण किये हुए, अनेक प्रकारके प्रहारयोग्य अस्त्रोंसे समन्वित, अनेक वेषोंको धारण किये हुए, कालाग्नि रुद्रके समान प्रतीत होनेवाले तथा कालरुद्रके सदृश उन उपस्थित भूतोंको प्रणाम करके साक्षात् प्रभु विष्णुदेव कहने लगे॥ ५७-५९॥ |
अध्याय ७१] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३३७
| विष्णुरुवाच | विष्णु बोले— |
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| दग्ध्वा भित्त्वा च भुक्त्वा च गत्वा दैत्यपुरत्रयम्।<br>पुनर्यथागतं वीरा गन्तुमर्हथ भूतले॥ ६० | हे वीरो! उस [त्रिपुर] दैत्यके तीनों पुरोंमें जाकर सभीको जलाकर, छिन्न-भिन्न करके और उनका भक्षण करके पुनः आपलोग जैसे आये हैं, वैसे ही भूतलपर चले जायँ॥ ६०॥ |
| ततः प्रणम्य देवेशं भूतसङ्घाः पुरत्रयम्।<br>प्रविश्य नष्टास्ते सर्वे शलभा इव पावकम्॥ ६१ | तत्पश्चात् देवेशको प्रणाम करके तीनों पुरोंमें प्रवेश करके वे भूतगण उसी तरह नष्ट हो गये, जैसे अग्निमें प्रवेश करके शलभ (पतिंगे) नष्ट हो जाते हैं॥ ६१॥ |
| ततस्तु नष्टास्ते सर्वे भूता देवेशवराज्ञया।<br>ननृतुर्मुदुशुश्चैव जगुर्दैत्याः सहस्त्रशः॥ ६२<br>तुष्टुवुर्देवदेवेशं परमात्मानमीश्वरम्।<br>ततः पराजिता देवा ध्वस्तवीर्याः क्षणेन तु॥ ६३<br>सेन्द्राः सङ्गम्य देवेशमुपेन्द्रं धिष्ठिता भयात्।<br>तान् दृष्ट्वा चिन्तयामास भगवान् पुरुषोत्तमः॥ ६४<br>किं कृत्यमिति सन्तप्तः सन्तप्तान् सेन्द्रकान् क्षणम्।<br>कथं तु तेषां दैत्यानां बलं हत्वा प्रयत्नतः॥ ६५<br>देवकार्यं करिष्यामि प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>पापं विचारतो नास्ति धर्मिष्ठानां न संशयः॥ ६६<br>तस्माद्दैत्या न वध्यास्ते भूतैश्चोपसदोद्भवैः।<br>पापं नुदति धर्मेण धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ ६७<br>धर्मादैश्वर्यमित्येषा श्रुतिरेषा सनातनी।<br>दैत्याश्चैते हि धर्मिष्ठाः सर्वे त्रिपुरवासिनः॥ ६८<br>तस्मादवध्यतां प्राप्ता नान्यथा द्विजपुङ्गवाः।<br>कृत्वापि सुमहत्पापं रुद्रमभ्यर्चयन्ति ये॥ ६९<br>मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा।<br>पूजया भोगसम्पत्तिरवश्यं जायते द्विजाः॥ ७०<br>तस्मात्ते भोगिनो दैत्या लिङ्गार्चनपरायणाः।<br>तस्मात्कृत्वा धर्मविघ्नमहं देवाः स्वमायया॥ ७१<br>दैत्यानां देवकार्यार्थं जेष्येऽहं त्रिपुरं क्षणात्। | तब देवेश्वरकी आज्ञासे उन सभी भूतोंके नष्ट हो जानेपर हजारों दैत्य आनन्द मनाने लगे, नाचने-गाने लगे और देवेश परमात्मा ईश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ६२ १/२॥<br><br>तदनन्तर क्षणभरमें पराजित तथा नष्ट पराक्रमवाले इन्द्रसहित देवतागण देवेश विष्णुके पास पहुँचकर भयपूर्वक खड़े हो गये। तब इन्द्रसहित उन सन्तप्त देवताओंको देखकर भगवान् पुरुषोत्तम उस समय दुःखी होकर सोचने लगे—क्या किया जाना चाहिये? प्रयत्नपूर्वक उन दैत्योंका बल नष्ट करके मैं कैसे देवताओंका कार्य करूँगा? विचारपूर्वक देखा जाय, तो शिवकी कृपासे उन धर्मनिष्ठ दैत्योंमें पाप नहीं है, अतः वे दैत्य उपसद [नामक] यज्ञसे उत्पन्न भूतोंके द्वारा वध्य नहीं हैं। धर्मसे ही पाप नष्ट होता है; सब कुछ धर्ममें ही प्रतिष्ठित है। धर्मसे ऐश्वर्य प्राप्त होता है—यह सनातनी श्रुति है। [सूतजीने कहा—] हे द्विजश्रेष्ठो! तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे सभी दैत्य धर्मनिष्ठ थे, अर्थात् अनुष्ठानमें तत्पर थे। अतः वे अवध्यताको प्राप्त हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है। बहुत बड़ा पाप करके भी जो लोग रुद्रका अर्चन करते हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; जैसे जलसे कमल मुक्त रहता है। हे द्विजो! शिवकी पूजासे भोगसम्पदा अवश्य प्राप्त होती है; वे दैत्य लिङ्ग-पूजामें परायण हैं, अतः वे भोगोंसे युक्त हैं। [विष्णुने कहा—] हे देवताओ! इसलिये मैं देवताओंके कार्यके लिये अपनी मायासे दैत्योंके धर्म (अनुष्ठान)-में विघ्न डालकर क्षणभरमें तीनों पुरोंको जीत लूँगा॥ ६३—७१ १/२॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| विचार्यैवं ततस्तेषां भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>कर्तुं व्यवसितश्चाभूद्धर्मविघ्नं सुरारिणाम्॥ ७२<br>असृजच्च महातेजाः पुरुषं चात्मसम्भवम्।<br>मायी मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः॥ ७३ | ऐसा विचार करके भगवान् पुरुषोत्तम उन देवशत्रुओं (दैत्यों)-के धर्ममें विघ्न उत्पन्न करनेके लिये प्रवृत्त हुए। महातेजस्वी मायावी अच्युतने उनके धर्मविघ्नके |
| ३३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| शास्त्रं च शास्ता सर्वेषामकरोत्कामरूपधृक्।<br>सर्वसम्मोहनं मायी दृष्टप्रत्ययसंयुतम्॥ ७४<br><br>एतत्त्वाङ्गभवायैव पुरुषायोपदिश्य तु।<br>मायी मायामयं शास्त्रं ग्रन्थषोडशलक्षकम्॥ ७५<br><br>श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम्।<br>इहैव स्वर्गनरकं प्रत्ययं नान्यथा पुनः॥ ७६<br><br>तच्छास्त्रमुपदिश्यैव पुरुषायच्युतः स्वयं।<br>पुरत्रयविनाशाय प्राहैनं पुरुषं हरिः॥ ७७<br><br>गन्तुमर्हसि नाशाय भो तूर्णं पुरवासिनाम्।<br>धर्मास्तथा प्रणश्यन्तु श्रौतस्मार्ता न संशयः॥ ७८ | लिये अपने शरीरसे मायामय पुरुषका सृजन किया। सबके शासक तथा स्वेच्छासे रूप धारण करनेवाले मायापति [विष्णु]-ने देखनेमात्रसे विश्वास उत्पन्न करनेवाले भावसे युक्त अतएव सबको मोहित करनेवाले शास्त्रका निर्माण किया। षोडशलक्षक अर्थात् अत्यन्त विस्तृत श्रुति-स्मृतिसे विरुद्ध तथा वर्णाश्रम-धर्मोंसे रहित इस मायामय शास्त्रका उपदेश अपने शरीरसे उत्पन्न पुरुषको करना चाहिए और स्वर्ग-नरक यहींपर है, ऐसा विश्वास करना चाहिये, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं—इसे प्रतिपादित करनेवाले उस शास्त्रको उस पुरुषको स्वयं पढ़ाकर मायामय अच्युत विष्णुने तीनों पुरोंके विनाशहेतु उस पुरुषसे कहा—[हे पुरुष!] त्रिपुरवासियोंके नाशके लिये तुम शीघ्र जाओ और ऐसा प्रयत्न करो, जिससे [वहाँके] श्रौत-स्मार्त धर्म नष्ट हो जायें; इसमें संशय नहीं है॥ ७२—७८॥ |
| ततः प्रणम्य तं मायी मायाशास्त्रविशारदः।<br>प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं मुनिर्मायां तदाकरोत्॥ ७९ | तत्पश्चात् उन्हें प्रणाम करके मायाशास्त्रविशारद मायावी मुनिने उन पुरोंमें शीघ्र प्रवेश करके माया रची॥ ७९॥ |
| मायया तस्य ते दैत्याः पुरत्रयनिवासिनः।<br>श्रौतं स्मार्तं च सन्त्यज्य तस्य शिष्यास्तदाभवन्॥ ८०<br><br>तत्यजुश्च महादेवं शङ्करं परमेश्वरम्।<br>नारदोऽपि तदा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः॥ ८१ | तब तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे दैत्य उसकी मायाके कारण श्रौत-स्मार्त धर्मोंका त्याग करके उसके शिष्य हो गये और उन्होंने महादेव परमेश्वर शंकरको छोड़ दिया॥ ८०१/२॥ |
| प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः।<br>मुनिः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च संवृतः सर्वतः स्वयम्॥ ८२<br><br>स्त्रीधर्मं चाकरोस्त्रीणां दुश्चारफलसिद्धिदम्।<br>चक्रुस्ताः सर्वदा लब्ध्वा सद्य एव फलं स्त्रियः॥ ८३<br><br>जनासक्ता बभूवुस्ता विनिन्द्य पतिदेवताः।<br>अद्यापि गौरवात्तस्य नारदस्य कलौ मुनेः॥ ८४ | तत्पश्चात् मायामय प्रभुके आदेशसे [अपने] शिष्यों-प्रशिष्योंसे चारों ओरसे घिरे हुए मायावी नारदमुनि भी उस पुरमें प्रवेश करके उस मायावी [पुरुष]-से स्वयं दीक्षित हुए। उन्होंने स्त्रियोंको दुराचार फलकी सिद्धि देनेवाले स्त्रीधर्मका उपदेश दिया। उन स्त्रियोंने उसका सदा पालन किया और शीघ्र ही उसका फल प्राप्तकर वे अपने पतिदेवोंकी अवहेलना करके अन्य लोगोंमें आसक्त हो गयीं। उन नारदमुनिके गुरुत्वके कारण आज भी कलियुगमें अधम स्त्रियाँ पतियोंका त्याग करके व्यभिचार करती हैं॥ ८१—८४१/२॥ |
| नार्यश्चरन्ति सन्त्यज्य भर्तॄन् स्वैरं वृथाधमाः।<br>स्त्रीणां माता पिता बन्धुः सखा मित्रं च बान्धवः॥ ८५<br><br>भर्ता एव न सन्देहस्तथाप्यासहमायया।<br>कृत्वापि सुमहत्पापं या भर्तुः प्रेमसंयुता॥ ८६ | पति ही स्त्रियोंका माता-पिता, बन्धु, सखा, मित्र तथा बान्धव होता है; इसमें सन्देह नहीं है। फिर भी विष्णुकी असह मायाके कारण उन स्त्रियोंने वैसा किया। बड़ा-से-बड़ा पाप करके भी जो [स्त्री] पतिके प्रति |
अध्याय ७९ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त [ ३३९
| प्राप्नुयात्परमं स्वर्गं नरकं च विपर्ययात्।<br>पुरैका मुनिशार्दूलाः सर्वधर्मान् सदा पतिम् ॥ ८७<br><br>सन्त्यज्यापूजयन् साध्व्यो देवानन्याञ्जगद्गुरून्।<br>ताः स्वर्गलोकमासाद्य मोदन्ते विगतज्वराः ॥ ८८<br><br>नरकं च जगामान्या तस्माद्भर्त्ता परा गतिः।<br>तथापि भर्तॄन् स्वांस्त्यक्त्वा बभूवुः स्वैरवृत्तयः ॥ ८९<br><br>मायया देवदेवस्य विष्णोस्तस्याज्ञया प्रभोः।<br>अलक्ष्मीश्च स्वयं तस्य नियोगात्त्रिपुरं गता ॥ ९०<br><br>या लक्ष्मीस्तपसा तेषां लब्धा देवेश्वरादजात्।<br>बहिर्गता परित्यज्य नियोगाद् ब्रह्मणः प्रभोः ॥ ९१<br><br>बुद्धिमोहं तथाभूतं विष्णुमायाविनिर्मितम्।<br>तेषां दत्त्वा क्षणं देवस्तासां मायी च नारदः ॥ ९२<br><br>सुखासीनौ ह्यसम्भ्रान्तौ धर्मविघ्नार्थमव्ययौ।<br>एवं नष्टे तदा धर्मे श्रौतस्मार्ते सुशोभने ॥ ९३<br><br>पाषण्डे ख्यापिते तेन विष्णुना विश्वयोनिना।<br>त्यक्ते महेश्वरे दैत्यैस्त्यक्ते लिङ्गार्चने तथा ॥ ९४<br><br>स्त्रीधर्मे निखिले नष्टे दुराचारे व्यवस्थिते।<br>कृतार्थ इव देवेशो देवैः सार्धमुमापतिम् ॥ ९५<br><br>तपसा प्राप्य सर्वज्ञं तुष्टाव पुरुषोत्तमः। | प्रेमयुक्त रहती है, वह परम स्वर्ग प्राप्त करती है और इससे विपरीत आचरणसे नरक प्राप्त करती है। हे मुनिश्रेष्ठो! पूर्वकालमें स्त्रियाँ सभी धर्मों, अन्य देवताओं तथा जगद्गुरुओंको त्यागकर सर्वदा पतिकी पूजा करती थीं; वे स्वर्गलोक प्राप्त करके निश्चिन्त होकर आनन्द मनाती थीं, [इसके विपरीत] अन्य स्त्रियाँ नरक जाती थीं। अतः पति ही [स्त्रियोंके लिये] परम गति है। तथापि देवदेव प्रभु विष्णुकी आज्ञासे तथा उनकी मायाके कारण वे [त्रिपुरवासिनी स्त्रियाँ] अपने पतियोंका त्याग करके व्यभिचारिणी हो गयीं॥ ८५—८९ १/२ ॥<br><br>उन [विष्णु]-की आज्ञासे अलक्ष्मी तीनों पुरोंमें चली गयीं और जो लक्ष्मी उन [दैत्यों]-की तपस्याके द्वारा देवेश्वर ब्रह्मासे उन्हें प्राप्त थीं, वे [उन्हीं] प्रभु ब्रह्माके आदेशसे [त्रिपुरको] छोड़कर बाहर चली गयीं। इस प्रकार धर्मविघ्नके लिये उन दैत्योंको उस प्रकारका विष्णुमाया-निर्मित बुद्धिमोह देकर भगवान् [पुरुष] और उन स्त्रियोंको विपरीत आचरणका उपदेश देकर मायावी नारद—ये दोनों अव्यय देव निराकुल होकर सुखपूर्वक बैठ गये॥ ९०—९२ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार परम उत्तम श्रौत-स्मार्त धर्मके नष्ट हो जानेपर, विश्वकर्ता उन विष्णुके द्वारा [वहाँ] पाखण्ड स्थापित कर दिये जानेपर, दैत्योंके द्वारा महेश्वरका त्याग कर दिये जानेपर तथा लिङ्गपूजाका परित्याग कर दिये जानेपर, सम्पूर्ण स्त्रीधर्मके नष्ट हो जानेपर और दुराचार स्थापित हो जानेपर देवेश [विष्णु] कृतार्थ हो गये और वे पुरुषोत्तम सभी देवताओंके साथ तपस्याद्वारा सर्वज्ञ उमापतिको प्राप्त करके उनकी स्तुति करने लगे॥ ९३—९५ १/२ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>महेश्वराय देवाय नमस्ते परमात्मने ॥ ९६<br><br>नारायणाय शर्वाय ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे।<br>शाश्वताय ह्यनन्ताय अव्यक्ताय च ते नमः ॥ ९७ | श्रीभगवान् बोले— आप महेश्वर, देव, परमात्माको नमस्कार है। आप नारायण, शर्व, ब्रह्म, ब्रह्मरूप, शाश्वत, अनन्त तथा अव्यक्तको नमस्कार है॥ ९६-९७॥ |
| सूत उवाच<br>एवं स्तुत्वा महादेवं दण्डवत्प्रणिपत्य च।<br>जजाप रुद्रं भगवान् कोटिवारं जले स्थितः ॥ ९८<br><br>देवाश्च सर्वे ते देवं तुष्टुवुः परमेश्वरम्।<br>सेन्द्राः साध्याः सयमाः सरुद्राः समरुद्गणाः ॥ ९९ | सूतजी बोले— इस प्रकार भगवान् [विष्णु]-ने महादेवकी स्तुति करके दण्डवत् प्रणाम करके जलमें स्थित होकर एक करोड़ बार रुद्रमन्त्रका जप किया। इसके बाद वे सभी देवता इन्द्र, साध्यगण, यम, रुद्रगण |
| ३४० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| देवा ऊचुः | तथा मरुद्गणोंके साथ देव परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ९८-९९॥ | | नमः सर्वात्मने तुभ्यं शङ्करायार्तिहारिणे।<br>रुद्राय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे॥ १००<br><br>गतिर्नः सर्वदास्माभिर्वन्द्यो देवारिमर्दनः।<br>त्वमादिस्त्वमनन्तश्च अनन्तश्चाक्षयः प्रभुः॥ १०१<br><br>प्रकृतिः पुरुषः साक्षात्स्रष्टा हर्ता जगद्गुरो।<br>त्राता नेता जगत्यस्मिन् द्विजानां द्विजवत्सल॥ १०२<br><br>वरदो वाङ्मयो वाच्यो वाच्यवाचकवर्जितः।<br>याज्यो मुक्त्यर्थमीशानो योगिभिर्योगविभ्रमैः॥ १०३<br><br>हृत्पुण्डरीकसुषिरे योगिनां संस्थितः सदा।<br>वदन्ति सूरयः सन्तं परं ब्रह्मस्वरूपिणम्॥ १०४<br><br>भवन्तं तत्त्वमित्यार्यास्तेजोराशिं परात्परम्।<br>परमात्मानमित्याहुरस्मिञ्जगति तद्विभो॥ १०५<br><br>दृष्टं श्रुतं स्थितं सर्वं जायमानं जगद्गुरो।<br>अणोरल्पतरं प्राहुर्महतोऽपि महत्तरम्॥ १०६<br><br>सर्वतः पाणिपादं त्वां सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि॥ १०७ | देवता बोले— आप सर्वात्मा, शंकर, दुःखनाशक, रुद्र, नीलरुद्र, कद्रुद्र (प्रशस्त रुद्र) तथा प्रचेताको नमस्कार है। आप हमलोगोंकी गति हैं। दैत्योंका संहार करनेवाले आप हमलोगोंद्वारा सर्वदा वन्द्य हैं। आप आदि तथा अन्तरहित हैं; आप अनन्त (शेषरूप), अविनाशी एवं प्रभुतासम्पन्न हैं। हे जगद्गुरो! आप प्रकृति, पुरुष, साक्षात् स्रष्टा, रक्षक तथा संहारक हैं। हे द्विजवत्सल! आप इस जगत्में द्विजोंके नेता हैं। आप वरदाता, वाणीमय, वाच्य, वाच्य-वाचकसे रहित ईशान हैं; आप मुक्तिके लिये योगपरायण योगियोंके द्वारा पूज्य हैं। आप योगियोंके हृदयरूपी कमलके छिद्रमें सदा स्थित हैं। विद्वान्लोग आपको सर्वत्र विद्यमान्, श्रेष्ठ तथा ब्रह्मस्वरूप कहते हैं। हे विभो! ऋषिगण आपको इस जगत्में तत्त्वरूप, तेजोराशि, परात्पर एवं परमात्मा कहते हैं। हे जगद्गुरो! आप दृष्ट, श्रुत, स्थित तथा जायमान सब कुछ हैं। लोग आपको अणुसे भी अल्पतर, महान्से भी महत्तर, सभी ओर हाथ-पैरवाला, सभी ओर नेत्र-सिर-मुखवाला तथा सभी ओर कानवाला कहते हैं। आप संसारमें सभीको आच्छादित करके स्थित हैं॥ १००-१०७॥ | | महादेमनिर्देश्यं सर्वज्ञं त्वामनामयम्।<br>विश्वरूपं विरूपाक्षं सदाशिवमनामयम्॥ १०८<br><br>कोटिभास्करसङ्काशं कोटिशीतांशुसन्निभम्।<br>कोटिकालाग्निसङ्काशं षड्विंशकमनीश्वरम्॥ १०९<br><br>प्रवर्तकं जगत्यस्मिन् प्रकृतेः प्रपितामहम्।<br>वदन्ति वरदं देवं सर्वावासं स्वयम्भुवम्॥ ११०<br><br>श्रुतयः श्रुतिसारं त्वां श्रुतिसारविदो जनाः॥ १११ | लोग आपको महादेव, अनिर्देश्य, सर्वज्ञ, अनामय, विश्वरूप, विरूपाक्ष, सदाशिव, निर्विकार, करोड़ों सूर्योंके समान [तेजस्वी], करोड़ों चन्द्रमासदृश [प्रकाशमान], करोड़ों कालाग्निके समान [प्रज्वलित], छब्बीस तत्त्वोंसे युक्त, अनीश्वर, इस जगत्में प्रकृतिके प्रवर्तक, प्रपितामह, सबके आवास-स्वरूप तथा स्वयम्भू (स्वयं उत्पन्न होनेवाला) एवं वर देनेवाला देव कहते हैं; श्रुतियाँ तथा श्रुति-तत्त्वोंको जाननेवाले लोग आपको वेदोंका सार कहते हैं॥ १०८-१११॥ | | अदृष्टमस्माभिरनेकमूर्ते<br>विना कृतं यद्भवताथ लोके।<br>त्वमेव दैत्यान् सुरभूतसङ्घान्<br>देवान्नरान् स्थावरजङ्गमांश्च॥ ११२ | हे अनेक रूपोंवाले [प्रभो]! हमलोगोंने संसारमें ऐसा कुछ भी नहीं देखा है, जो आपके बिना [किसी अन्यके द्वारा] रचित हो; आपने ही दैत्यों, सुरोंके भूतसमुदायों, देवताओं, मनुष्यों, स्थावर-जंगम आदिको उत्पन्न किया है॥ ११२॥ | | पाहि नान्या गतिः शम्भो विनिहत्यासुरोत्तमान्।<br>मायया मोहिताः सर्वे भवतः परमेश्वर॥ ११३ | हे शम्भो! हमलोगोंकी कोई अन्य गति नहीं है; |
अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३४१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यथा तरङ्गा लहरीसमूहा<br>युध्यन्ति चान्योन्यमपांनिधौ च।<br>जलाशयादेव जडीकृताश्च<br>सुरासुरास्तद्वदजस्य सर्वम्॥ ११४॥<br><br>सूत उवाच<br>य इदं प्रातरुत्थाय शुचिर्भूत्वा जपेन्नरः।<br>शृणुयाद्वा स्तवं पुण्यं सर्वकाममवाप्नुयात्॥ ११५॥<br>स्तुतस्त्वेवं सुरैर्विष्णोर्जपेन च महेश्वरः।<br>सोमः सोमामथालिङ्ग्य नन्दिदत्तकरः स्मयन्॥ ११६॥<br>प्राह गम्भीरया वाचा देवानावलोक्य शङ्करः।<br>ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं सुरेश्वराः॥ ११७॥<br>विष्णोर्मायाबलं चैव नारदस्य च धीमतः।<br>तेषामधर्मनिष्ठानां दैत्यानां देवसत्तमाः॥ ११८॥<br>पुरत्रयविनाशं च करिष्येऽहं सुरोत्तमाः।<br><br>सूत उवाच<br>अथ सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समागताः॥ ११९॥<br>श्रुत्वा प्रभोस्तदा वाक्यं प्रणेमुस्तुष्टुवुश्च ते।<br>अप्येतदन्तरं देवी देवमालोक्य विस्मिता॥ १२०॥<br>लीलाम्बुजेन चाहत्य कलमाह वृषध्वजम्।<br><br>देव्युवाच<br>क्रीडमानं विभो पश्य षण्मुखं रविसन्निभम्॥ १२१॥<br>पुत्रं पुत्रवतां श्रेष्ठ भूषितं भूषणैः शुभैः।<br>मुकुटैः कटकैश्चैव कुण्डलैर्वलयैः शुभैः॥ १२२॥<br>नूपुरैश्छन्नवारैश्च तथा ह्युदरबन्धनैः।<br>किङ्किणीभिरनेकाभिर्हैमैरश्वत्थपत्रकैः॥ १२३॥<br>कल्पद्रुमजैः पुष्पैः शोभितैरलकैः शुभैः।<br>हारैर्वारीजरागादिमणिचित्रैस्तथाङ्गदैः॥ १२४॥<br>मुक्ताफलमयैर्हारैः पूर्णचन्द्रसमप्रभैः।<br>तिलकैश्च महादेव पश्य पुत्रं सुशोभनम्॥ १२५॥<br>अङ्कितं कुङ्कुमाद्यैश्च वृत्तं भसितनिर्मितम्।<br>वक्त्रवृन्दं च पश्येश वृन्दं कामलकं यथा॥ १२६॥ | महादैत्योंका संहार करके आप [हमारी] रक्षा कीजिये। हे परमेश्वर! सभीलोग आपकी मायासे मोहित हैं॥ ११३॥<br><br>जिस प्रकार तरंगें तथा लहरें समुद्रमें परस्पर टकराती हैं और जलाश्रयसे ही जड़ीभूत होकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ब्रह्माकी सृष्टिके देवता-असुर सभी कोई आपसमें टकराते हैं और अन्तमें जड़ीभूत होकर आपमें ही विलीन हो जाते हैं॥ ११४॥<br><br>**सूतजी बोले—**जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध होकर इस पवित्र स्तुतिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ ११५॥<br><br>इस प्रकार देवताओंके द्वारा स्तुति किये जाने तथा विष्णुके जपसे प्रसन्न हुए महेश्वर शंकरने उमाका आलिङ्गन करके नन्दीके ऊपर हाथ रखकर देवताओंकी ओर देखकर गम्भीर वाणीमें मुसकराते हुए कहा—'हे सुरेश्वरो! अब मैंने इस देवकार्यको और विष्णु तथा बुद्धिमान् नारदके मायाबलको जान लिया है। हे श्रेष्ठ देवताओ! मैं अधर्ममें निष्ठा रखनेवाले उन दैत्योंके तीनों पुरोंका विनाश [अवश्य] करूँगा'॥ ११६—११८ १/२॥<br><br>**सूतजी बोले—**इसके बाद [वहाँ] आये हुए वे इन्द्र-ब्रह्मा-विष्णुसहित देवताओंने प्रभुका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की। इसके अनन्तर शिवकी ओर देखकर विस्मित देवी भी अपने लीला-कमलसे शिवजीको मारकर (स्पर्शकर) यह वचन कहने लगीं॥ ११९-१२० १/२॥<br><br>**देवी बोलीं—**हे विभो! हे पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ! उत्तम आभूषणोंसे सुशोभित तथा सूर्यके समान प्रतीत होनेवाले [अपने] इस खेलते हुए श्रेष्ठ पुत्र षडाननको देखिये। हे महादेव! मुकुटों, कटकों, कुण्डलों, सुन्दर कँगनों, नूपुरों, छन्नवारों, करधनियों, अनेक किंकिणियों, सुवर्णमय पीपलके पत्तों, कल्पद्रुमके पुष्पोंसे शोभित सुन्दर अलकों, पद्मराग आदि मणियोंसे चमत्कृत हारों तथा बाजूबन्दों, पूर्णचन्द्रमाके समान प्रभावाले मुक्ताफलमय हारों और तिलकोंसे मण्डित परम सुन्दर पुत्रको देखिये। हे ईश! कुंकुम आदिसे अंकित तथा भस्मनिर्मित |
| ३४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| नेत्राणि च विभो पश्य शुभानि त्वं शुभानि च।<br>अञ्जनानि विचित्राणि मङ्गलार्थं च मातृभिः॥ १२७<br><br>गङ्गादिभिः कृत्तिकाद्यैः स्वाहया च विशेषतः।<br>इत्येवं लोकमातुश्च वाग्भिः सम्बोधितः शिवः॥ १२८ | वृत्ताकार तिलकसे युक्त इसके कमलसमूह-सदृश मुखोंको देखिये। हे विभो! आप इसके अत्यन्त सुन्दर नेत्रोंको देखिये, गंगा आदि, कृत्तिका आदि तथा विशेष रूपसे स्वाहा माताओंके द्वारा मंगलके लिये लगाये गये भव्य तथा विचित्र काजलोंको देखिये॥ १२१-१२७१/२॥ | | न ययौ तृप्तिमीशानः पिबन् स्कन्दाननामृतम्।<br>न सस्मार च तान् देवान् दैत्यशस्त्रनिपीडितान्॥ १२९<br><br>स्कन्दमालिङ्ग्य चाघ्राय नृत्य पुत्रेत्युवाच ह।<br>सोऽपि लीलालसो बालो ननर्तातिहरः प्रभुः॥ १३०<br><br>सहैव ननृतुश्चान्ये सह तेन गणेश्वराः।<br>त्रैलोक्यमखिलं तत्र ननर्तेशाज्ञया क्षणम्॥ १३१<br><br>नागाश्च ननृतुः सर्वे देवाः सेन्द्रपुरोगमाः।<br>तुष्टुवुर्गणपाः स्कन्दं मुमोदाम्बा च मातरः॥ १३२<br><br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।<br>नृत्यामृतं तदा पीत्वा पार्वतीपरमेश्वरौ।<br>अवापतुस्तदा तृप्तिं नन्दिना च गणेश्वराः॥ १३३ | इस प्रकार जगज्जननी [उमा]-के वचनोंसे सम्बोधित किये गये ईशान शिव कार्तिकेयके मुखामृतका पान करते हुए तृप्त नहीं हुए। उन्हें दैत्योंके शस्त्रोंसे पीड़ित उन देवताओंका स्मरण नहीं रहा। उन्होंने स्कन्दका आलिङ्गन करके उसका सिर सूँघकर कहा—'हे पुत्र! नृत्य करो।' तब कष्ट दूर करनेवाले बालकरूप प्रभु [स्कन्द] भी लीला करते हुए नाचने लगे। सभी गणेश्वर भी उनके साथ नृत्य करने लगे और क्षणभरमें शिवकी आज्ञासे सम्पूर्ण त्रिलोकी वहाँ नृत्य करने लगा। नाग और इन्द्रसहित सभी देवता भी नाचने लगे। गणेश्वरोंने स्कन्दकी स्तुति की। [उस समय] पार्वती तथा [अन्य] माताएँ आनन्दित हुईं। गन्धर्व तथा किन्नर पुष्पवृष्टि करने लगे एवं गाने लगे। तब [उस] नृत्यरूपी अमृतका पान करके पार्वती तथा परमेश्वर तृप्त हो गये और नन्दीसहित गणेश्वर भी तृप्त हुए॥ १२८-१३३॥ | | ततः स नन्दी सह षण्मुखेन<br>तथा च सार्धं गिरिराजपुत्र्या।<br>विवेश दिव्यं भवनं भवोऽपि<br>यथाम्बुदोऽन्याम्बुदमम्बुदाभः॥ १३४ | तदनन्तर सूर्यके समान कान्तिवाले शिवजीने भी नन्दी, षडानन (स्कन्द) तथा गिरिराजपुत्री [पार्वती]-के साथ दिव्य भवनमें प्रवेश किया, जैसे मेघ अन्य मेघमें प्रवेश करता है॥ १३४॥ | | द्वारस्य पार्श्वे ते तस्थुर्देवा देवस्य धीमतः।<br>तुष्टुवुश्च महादेवं किञ्चिदुद्विग्नचेतसः॥ १३५<br><br>किन्तु किन्विति चान्योन्यं प्रेक्ष्य चैतत्समाकुलाः।<br>पापा वयमिति ह्यान्ये अभाग्याश्चेति चापरे॥ १३६<br><br>भाग्यवन्तश्च दैत्येन्द्रा इति चान्ये सुरेश्वराः।<br>पूजाफलमिमं तेषामित्यन्ये नेति चापरे॥ १३७ | वे देवता उन बुद्धिमान् शिवके द्वारके पास खड़े हो गये और कुछ-कुछ व्याकुलचित्त होकर महादेवकी स्तुति करने लगे। वे व्याकुल होकर एक-दूसरेकी ओर देखकर कहने लगे—'यह क्या, यह क्या; हमलोग पापी हैं' अन्य दूसरोंने कहा—'हम अभागे हैं' अन्य सुरेश्वरोंने कहा—'ये महादैत्य भाग्यशाली हैं।' कुछने कहा—'यह उनकी पूजाका फल है' और कुछने कहा—'ऐसा नहीं है'॥ १३५-१३७॥ | | एतस्मिन्नन्तरे तेषां श्रुत्वा शब्दाननेकशः।<br>कुम्भोदरो महातेजा दण्डेनाताडयत्सुरान्॥ १३८<br><br>दुद्रुवुस्ते भयाविष्टा देवा हाहेतिवादिनः।<br>अपतन् मुनयश्चान्ये देवाश्च धरणीतले॥ १३९ | इसी बीच उनके अनेक शब्दोंको सुनकर महातेजस्वी कुम्भोदर [नामक शिवगण] दण्डसे देवताओंको पीटने लगा। तब वे देवता भयभीत होकर 'हा-हा' कहते हुए |
| अध्याय ७१ ] | तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त | ३४३ |
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| अहो विधेर्बलं चेति मुनयः कश्यपादयाः।<br>दृष्ट्वापि देवदेवेशं देवानां चासुरद्विषाम्॥ १४०<br><br>अभाग्यान्न समाप्तं तु कार्यमित्यपरे द्विजाः।<br>प्रोचुर्नमः शिवायेति पूज्य चाल्पतरं हृदि॥ १४१<br><br>ततः कपर्दी नन्दीशो महादेवप्रियो मुनिः।<br>शूली माली तथा हाली कुण्डली वलयी गदी॥ १४२<br><br>वृषमारुह्य सुश्वेतं ययौ तस्याज्ञया तदा।<br>ततो वै नन्दिनं दृष्ट्वा गणः कुम्भोदरोऽपि सः॥ १४३<br><br>प्रणम्य नन्दिनं मूर्ध्ना सह तेन त्वरन् ययौ।<br>नन्दी भाति महातेजा वृषपृष्ठे वृषध्वजः॥ १४४<br><br>सगणो गणसेनानीर्मेघपृष्ठे यथा भवः।<br>दशयोजनविस्तीर्णं मुक्ताजालैरलङ्कृतम्॥ १४५<br><br>सितातपत्रं शैलादेराकाशमिव भाति तत्।<br>तत्रान्तर्बद्धमाला सा मुक्ताफलमयी शुभा॥ १४६<br><br>गङ्गाकाशान्निपतिता भाति मूर्ध्नि विभोर्यथा।<br>अथ दृष्ट्वा गणाध्यक्षं देवदुन्दुभयः शुभाः॥ १४७<br><br>नियोगाद्वज्रिणः सर्वे विनेदुर्मुनिपुङ्गवाः।<br>तुष्टुवुश्च गणेशानं वाग्भिरिष्टप्रदं शुभम्॥ १४८<br><br>यथा देवा भवं दृष्ट्वा प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>नियोगाद्वज्रिणो मूर्ध्नि पुष्पवर्षं च खेचराः॥ १४९<br><br>ववृषुश्च सुगन्धाढ्यं नन्दिनो गगनोदितम्।<br>वृष्ट्या तुष्टस्तदा रेजे तुष्ट्या पुष्ट्या यथार्थया॥ १५०<br><br>नन्दी भवश्चान्द्रया तु स्नातया गन्धवारिणा।<br>पुष्पैर्नानाविधैस्तत्र भाति पृष्ठं वृषस्य तत्॥ १५१<br><br>सङ्कीर्णं तु दिवः पृष्ठं नक्षत्रैरिव सुव्रताः।<br>कुसुमैः संवृतो नन्दी वृषपृष्ठे रराज सः॥ १५२ | भागने लगे; कुछ मुनि तथा देवता पृथ्वीतलपर गिर पड़े॥ १३८-१३९॥<br>कश्यप आदि मुनियोंने कहा—'विधिकी बल कैसा अद्भुत है!' हे द्विजो! अन्य लोगोंने कहा—'देव-देवेशका दर्शन करके भी असुरशत्रु देवताओंके अभाग्यसे ही कार्य पूर्ण नहीं हो सका। इसके बाद वे सब हृदयमें थोड़ा अर्चन करके 'शिवको नमस्कार है'—ऐसा कहने लगे॥ १४०-१४१॥<br>तत्पश्चात् जटाजूट धारण किये, [हाथमें] त्रिशूल लिये, माला पहने हुए, हाला धारण किये हुए, कुण्डल धारण किये हुए, कंगन पहने हुए तथा गदा धारण किये हुए महादेवप्रिय मुनि नन्दीश सुन्दर श्वेत बैलपर चढ़कर उन [शिव]—की आज्ञासे वहाँ जाने लगे। तब नन्दीको देखकर कुम्भोदर [नामक] वह गण भी नन्दीको प्रणाम करके शीघ्रता करते हुए उनके साथ चल दिया। गणसहित वे महातेजस्वी वृषध्वज गणोंके सेनापति नन्दी बैलकी पीठपर उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, मानो मेघस्वरूप विष्णुके पृष्ठपर शिवजी विराजमान हों। नन्दीश्वरका दस योजन विस्तृत तथा मुक्ताजालोंसे अलंकृत श्वेत छत्र आकाशकी भाँति प्रतीत हो रहा था। उस छत्रमें भीतरसे बँधी हुई मुक्ताफलोंकी वह श्वेत माला ऐसी लग रही थी, मानो शिवजीके सिरपर आकाशसे गंगा गिर रही हों॥ १४२–१४६१/२॥<br>हे मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर गणाध्यक्ष [नन्दी]-को देखकर इन्द्रकी आज्ञासे दिव्य देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं; सभी लोग वाणीद्वारा वांछित फल प्रदान करनेवाले शुभ गणेश्वरकी स्तुति करने लगे, जैसे शिवको देखकर देवतालोग प्रसन्नतासे रोमांचित होकर उनकी स्तुति करते हैं॥ १४७-१४८१/२॥<br>आकाशचारियोंने इन्द्रकी आज्ञासे नन्दीके सिरपर आकाशसे सुगन्धमय पुष्पवृष्टि की। तुष्टि-पुष्टिसे युक्त यथार्थ वृष्टिसे प्रसन्न होकर नन्दी उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे शिवजी गन्धजलसे अभिसिंचित चन्द्रलेखासे शोभा प्राप्त करते हैं। हे सुव्रतो! वृषभका पृष्ठ अनेक प्रकारके पुष्पोंसे ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो आकाशपृष्ठ |
| ३४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| दिवः पृष्ठे यथा चन्द्रो नक्षत्रैरिव सुव्रताः।<br>तं दृष्ट्वा नन्दिनं देवाः सेन्द्रोपेन्द्रास्तथाविधम् ॥ १५३<br><br>तुष्टुवुर्गणपेशानं देवदेवमिवापरम्।<br><br>देवा ऊचुः<br>नमस्ते रुद्रभक्ताय रुद्रजाप्यरताय च ॥ १५४<br><br>रुद्रभक्तार्तिनाशाय रौद्रकर्मरताय ते।<br>कूष्माण्डगणनाथाय योगिनां पतये नमः ॥ १५५<br><br>सर्वदाय शरण्याय सर्वज्ञायार्तिहारिणे।<br>वेदानां पतये चैव वेदवेद्याय ते नमः ॥ १५६<br><br>वज्रिणे वज्रदंष्ट्राय वज्रिवज्रनिवारिणे।<br>वज्रालङ्कृतदेहाय वज्रिणाराधिताय ते ॥ १५७<br><br>रक्ताय रक्तनेत्राय रक्ताम्बरधराय ते।<br>रक्तानां भवपादाब्जे रुद्रलोकप्रदायिने ॥ १५८<br><br>नमः सेनाधिपतये रुद्राणां पतये नमः।<br>भूतानां भुवनेशानां पतये पापहारिणे ॥ १५९<br><br>रुद्राय रुद्रपतये रौद्रपापहराय ते।<br>नमः शिवाय सौम्याय रुद्रभक्ताय ते नमः ॥ १६० | तारोंसे भर गया हो। हे सुव्रतो! पुष्पोंसे ढँके हुए नन्दी बैलकी पीठपर उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे आकाशपृष्ठपर [विराजमान] चन्द्रमा तारोंसे आच्छादित होकर सुशोभित होते हैं॥ १४९-१५२१/२॥<br>उस प्रकारकी शोभावाले उन नन्दीको देखकर इन्द्र तथा विष्णुसहित देवता साक्षात् महादेवजीकी भाँति प्रतीत होनेवाले गणाधिपोंके स्वामी नन्दीकी स्तुति करने लगे॥ १५३१/२॥<br><br>देवता बोले—आप रुद्रभक्त तथा रुद्रजपपरायणको नमस्कार है। रुद्रभक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले, रौद्रकर्ममें संलग्न, कूष्माण्डगणोंके स्वामी तथा योगियोंके पति आप [नन्दी]-को नमस्कार है। सब कुछ प्रदान करनेवाले, शरण देनेवाले, सब कुछ जाननेवाले, कष्ट दूर करनेवाले, वेदोंके पति तथा वेदोंसे जाननेयोग्य आप [नन्दी]-को नमस्कार है। वज्रधारी, वज्रतुल्य दंष्ट्रावाले, इन्द्रके वज्रका निवारण करनेवाले, वज्रसे अलंकृत देहवाले तथा इन्द्रके द्वारा आराधित आप [नन्दी]-को नमस्कार है। रक्त वर्णवाले, रक्त नेत्रवाले, रक्त वस्त्र धारण करनेवाले तथा शिवके चरणकमलमें अनुरागयुक्त लोगोंको रुद्रलोक प्रदान करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। सेनाके अधिपति, रुद्रोंके पति, भूतों तथा भुवनेशोंके पति और पापोंका हरण करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। रुद्र, रुद्रपति, रौद्र पापोंका हरण करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। शिवस्वरूप, सौम्य [स्वभाववाले] तथा रुद्रभक्त आप [नन्दी]-को नमस्कार है॥ १५४-१६०॥ | | सूत उवाच<br>ततः प्रीतो गणाध्यक्षः प्राह देवांश्छिलात्मजः।<br>रथं च सारथिं शम्भोः कार्मुकं शरमुत्तमम् ॥ १६१<br><br>कर्तुमर्हथ यत्नेन नष्टं मत्वा पुरत्रयम्।<br>अथ ते ब्रह्मणा सार्धं तथा वै विश्वकर्मणा ॥ १६२<br><br>रथं चक्रुः सुसंरब्धा देवदेवस्य धीमतः ॥ १६३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तदनन्तर प्रसन्न हुए शिलादपुत्र गणेश्वर [नन्दी]-ने देवताओंसे कहा—'अब तीनों पुरोंको नष्ट मानकर आपलोग शम्भुके लिये रथ, सारथि, धनुष तथा उत्तम बाण प्रयत्नपूर्वक तैयार कराइये।' इसके बाद उन देवताओंने अतिशीघ्रतासे युक्त होकर ब्रह्माके साथ विश्वकर्माके द्वारा बुद्धिमान् देवदेव [शिव]-का रथ बनवाया॥ १६१-१६३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पुरदाहे नन्दिकेश्वरवाक्यं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पुरदाहप्रसंगमें नन्दिकेश्वरवाक्य' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥
७२- त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण तथा भगवान् महेश्वरका उस रथपर आरूढ़ हो त्रिपुरासुरको दग्ध करना एवं ब्रह्माद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति | ३४५
बहत्तरवाँ अध्याय
त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण तथा भगवान् महेश्वरका उस रथपर आरूढ़ हो त्रिपुरासुरको दग्ध करना एवं ब्रह्माद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
| सूत उवाच | |
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| अथ रुद्रस्य देवस्य निर्मितो विश्वकर्मणा।<br>सर्वलोकमयो दिव्यो रथो यत्नेन सादरम्॥ १<br><br>सर्वभूतमयश्चैव सर्वदेवनमस्कृतः।<br>सर्वदेवमयश्चैव सौवर्णः सर्वसम्मतः॥ २<br><br>रथाङ्गं दक्षिणं सूर्यो वामाङ्गं सोम एव च।<br>दक्षिणं द्वादशारं हि षोडशारं तथोत्तरम्॥ ३<br><br>अरेषु तेषु विप्रेन्द्राश्चादित्या द्वादशैव तु।<br>शशिनः षोडशारेषु कला वामस्य सुव्रताः॥ ४<br><br>ऋक्षाणि च तदा तस्य वामस्यैव तु भूषणम्।<br>नेम्यः षडृतवश्चैव तयोर्वे विप्रपुङ्गवाः॥ ५<br><br>पुष्करं चान्तरिक्षं वै रथनीडश्च मन्दरः।<br>अस्ताद्रिरुदयाद्रिश्च उभौ तौ कूबरौ स्मृतौ॥ ६<br><br>अधिष्ठानं महामेरुराश्रयाः केसराचलाः।<br>वेगः संवत्सरस्तस्य अयने चक्रसङ्गमौ॥ ७<br><br>मुहूर्ता बन्धुरास्तस्य शम्याश्चैव कलाः स्मृताः।<br>तस्य काष्ठाः स्मृता घोणा चाक्षदण्डाः क्षणाश्च वै॥ ८<br><br>निमेषाश्चानुकर्षश्च ईषा चास्य लवाः स्मृताः। | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] विश्वकर्माने प्रयत्नके साथ आदरपूर्वक भगवान् रुद्रका रथ बनाया; वह सर्वलोकमय, दिव्य, सर्वभूतमय, सभी देवताओंसे नमस्कृत, सभी देवताओंसे युक्त, सुवर्णमय तथा सबके अनुकूल था। उसका दाहिना चक्र सूर्य एवं बायाँ चक्र चन्द्रमा थे। दाहिना चक्र बारह अरोंवाला तथा बायाँ चक्र सोलह अरोंवाला था। हे विप्रेन्द्रो! हे सुव्रतो! [दाहिने चक्रके] उन अरोंमें बारह आदित्य थे और बायें चक्रके सोलह अरोंमें चन्द्रमाकी [सोलह] कलाएँ थीं। हे मुनिश्रेष्ठो! नक्षत्रगण उस बाएँ चक्रके भूषण थे और छः ऋतुएँ उन दोनों चक्रोंकी नेमियाँ थीं। आकाश इसकी छत थी और मन्दर पर्वत रथका सारथि-स्थान था। अस्ताचल तथा उदयाचल उसके दोनों स्तम्भ कहे गये हैं। महामेरु [पर्वत] उसका अधिष्ठान [मुख्य स्थान] था और केसरपर्वत मेरुको आश्रय देनेवाले थे। संवत्सर उसका वेग था और दोनों अयन (उत्तरायण, दक्षिणायन) उसके चक्रसंगम (अक्षके प्रान्तभाग) थे। मुहूर्त उस रथके बंधुर [तल्पभाग] और कलाएँ उसकी शम्या (वर्तुलपट्टिकाएँ) कही गयी हैं। काष्ठाएँ उसकी नासिका तथा क्षण उसके अक्षदण्ड (चक्रोंका आधारदण्ड) कहे गये हैं। निमेष इस रथके अनुकर्ष (नीचेका तल) तथा लव (निमेषसे भी छोटा समय) इसकी ईषा (दोनों अक्षोंको जोड़नेवाला काष्ठ) कहे गये हैं॥ १—८ ½॥ |
| द्यौर्वरूथं रथस्यास्य स्वर्गमोक्षावुभौ ध्वजौ॥ ९<br><br>धर्मो विरागो दण्डोऽस्य यज्ञा दण्डाश्रयाः स्मृताः।<br>दक्षिणाः सन्ध्यतस्तस्य लोहाः पञ्चाशदग्नयः॥ १०<br><br>युगान्तकोटी तौ तस्य धर्मकामावुभौ स्मृतौ।<br>ईषादण्डस्तथाव्यक्तं बुद्धिस्तस्यैव नड्वलः॥ ११ | अन्तरिक्ष इस रथका वरूथ (कवच) था और स्वर्ग तथा मोक्ष इस रथके दोनों ध्वज थे। धर्म तथा विराग इसके दण्ड थे; यज्ञ इस दण्डको आश्रय (सहारा) देनेवाले कहे गये हैं। दक्षिणाएँ उस रथकी सन्थियाँ थीं और पचासों अग्नियाँ इसकी कीलें थीं। धर्म तथा काम—ये दोनों उसके जुओंके सिरे कहे गये हैं। अव्यक्त [तत्त्व] उसका ईषादण्ड था तथा बुद्धि इसका |