भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 329
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव३२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यज्ञश्च दक्षिणा चैव यमलौ सम्बभूवतुः।<br>यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे॥ २७९<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>एतस्य पुत्रा यज्ञस्य तस्माद्यामाश्च ते स्मृताः॥ २८०<br>अजितश्चैव शुक्रश्च गणौ द्वौ ब्रह्मणा कृतौ।<br>यामाः पूर्वं प्रजाता ये तेऽभवंस्तु दिवौकसः॥ २८१आकूतिसे उत्पन्न हुईं। यज्ञ तथा दक्षिणा—ये जुड़वाँ सन्तानें हुईं। दक्षिणासे यज्ञके बारह पुत्रोंने जन्म लिया। वे देवगण, स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ‘याम’—इस नामसे प्रसिद्ध हुए; वे इस यज्ञके पुत्र थे, इसलिये वे ‘याम’ कहे गये हैं। ब्रह्माने अजित तथा शुक्र—इन दो गणोंको उत्पन्न किया था। पूर्वमें जो ‘याम’ उत्पन्न हुए थे, वे देवता हुए॥ २७७–२८१॥
स्वायम्भुवसुतायां तु प्रसूत्यां लोकमातरः।<br>तस्यां कन्याश्चतुर्विंशद्दक्षस्त्वजनयत्प्रभुः॥ २८२<br>सर्वास्ताश्च महाभागाः सर्वाः कमललोचनाः।<br>भोगवत्यश्च ताः सर्वाः सर्वास्ता योगमातरः॥ २८३<br>सर्वाश्च ब्रह्मवादिन्यः सर्वा विश्वस्य मातरः।<br>श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा॥ २८४<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदश।<br>पत्‍न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः॥ २८५<br>दाराण्येतानि वै तस्य विहितानि स्वयम्भुवा।<br>ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥ २८६<br>सती ख्यात्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।<br>सन्नतिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा॥ २८७<br>तास्तथा प्रत्यपद्यन्त पुनरन्ये महर्षयः।<br>रुद्रो भृगुर्मरीचिश्च अङ्गिराः पुलहः क्रतुः॥ २८८<br>पुलस्त्योऽत्रिवसिष्ठश्च पितरोऽग्निस्तथैव च।प्रभु दक्षने स्वायम्भुव [मनु]-की पुत्री उस प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं; वे लोकमाताएँ हुईं। वे सभी महाभाग्यशालिनी, कमलके समान नेत्रवाली, भोगवती, योगमाताएँ, ब्रह्मवादिनी तथा विश्वकी माताएँ थीं। उनमें जो श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि एवं कीर्ति—तेरह [पुत्रियाँ] थीं, उन दक्षकन्याओंको प्रभु धर्मने पत्नीके रूपमें ग्रहण कर लिया। स्वायम्भुवने इन सबको उन धर्मकी पत्नी बनाया। उन सभीसे कनिष्ठ जो शिष्ट तथा सुन्दर नेत्रोंवाली ग्यारह [कन्याएँ] थीं, वे सती, ख्याति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा एवं स्वधा [नामवाली] थीं। उन्हें अन्य महर्षियोंने प्राप्त किया; वे रुद्र, भृगु, मरीचि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य, अत्रि, वसिष्ठ, पितर तथा अग्नि थे॥ २८२–२८८ १/२॥
सतीं भवाय प्रायच्छत् ख्यातिं च भृगवे ततः॥ २८९<br>मरीचये च सम्भूतिं स्मृतिमङ्गिरसे ददौ।<br>प्रीतिं चैव पुलस्त्याय क्षमां वै पुलहाय च॥ २९०<br>क्रतवे सन्नतिं नाम अनसूयां तथात्रये।<br>ऊर्जां ददौ वसिष्ठाय स्वाहामप्यग्नये ददौ॥ २९१<br>स्वधां चैव पितृभ्यस्तु तास्वपत्यानि बोधत।<br>एताः सर्वा महाभागाः प्रजास्वनुसृताः स्थिताः॥ २९२<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु यावदाभूतसम्प्लवम्।उन्होंने सतीको भव (रुद्र)-को तथा ख्यातिको भृगुको दे दिया। इसके बाद उन्होंने सम्भूतिको मरीचिको और स्मृतिको अंगिराको प्रदान कर दिया। उन्होंने प्रीतिको पुलस्त्यको, क्षमाको पुलहको, सन्नतिको क्रतुको, अनसूयाको अत्रिको तथा ऊर्जाको वसिष्ठको अर्पित कर दिया और स्वाहाको अग्निको तथा स्वधाको पितरोंको सौंप दिया। अब उनसे उत्पन्न सन्तानोंको जान लीजिये॥ २८९–२९१ १/२॥
श्रद्धा कामं विजज्ञे वै दर्पो लक्ष्मीसुतः स्मृतः॥ २९३<br>धृत्यास्तु नियमः पुत्रस्तुष्ट्याः सन्तोष एव च।<br>पुष्ट्या लोभः सुतश्चापि मेधापुत्रः श्रुतस्तथा॥ २९४<br>क्रियायामभवत्पुत्रो दण्डः समय एव च।<br>बुद्ध्यां बोधः सुतस्तद्वत्प्रमादोऽप्युपजायत॥ २९५ये समस्त महाभाग्यवती कन्याएँ सभी मन्वन्तरोंमें प्रलयपर्यन्त प्रजाओंके सृजनमें लगी रहती थीं। श्रद्धाने कामको उत्पन्न किया। दर्प लक्ष्मीका पुत्र कहा गया है। धृतिका पुत्र नियम, तुष्टिका पुत्र सन्तोष, पुष्टिका पुत्र लोभ तथा मेधाका पुत्र श्रुत है। क्रियासे दण्ड तथा समय