श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तुल्यानेवात्मनः सर्वान् रूपतेजोबलश्रुतैः।<br>पिङ्गलान् सनिषङ्गांश्च सकपर्दान् सलोहितान्॥ ३०५<br>विशिष्टान् हरिकेशांश्च दृष्टिघ्नांश्च कपालिनः।<br>महारूपान् विरूपांश्च विश्वरूपान् स्वरूपिणः॥ ३०६<br>रथिनश्चर्मिणश्चैव वर्मिणश्च वरूथिनः।<br>सहस्रशतबाहूंश्च दिव्यान् भौमान्तरिक्षगान्॥ ३०७<br>स्थूलशीर्षानष्टदंष्ट्रान्द्विजिव्हांस्तांस्त्रिलोचनान्।<br>अन्नादान् पिशिताशांश्च आज्यपान् सोमपानपि॥ ३०८<br>मीढुषोऽतिकपालांश्च शितिकण्ठोध्वंरेतसः।<br>हव्यादाञ्छ्रुतधर्मांश्च धर्मिणो ह्यथ बर्हिणः॥ ३०९<br>आसीनान् धावतश्चैव पञ्चभूतान् सहस्रशः।<br>अध्यापिनोऽध्यायिनश्च जपतो युञ्जतस्तथा॥ ३१०<br>धूमवन्तो ज्वलन्तश्च नदीमन्तोऽतिदीप्तिनः।<br>वृद्धान् बुद्धिमन्तश्चैव ब्रह्मिष्ठाञ्शुभदर्शनान्॥ ३११<br>नीलग्रीवान्सहस्राक्षान्सर्वांश्चाथ क्षमाकरान्।<br>अदृश्यान् सर्वभूतानां महायोगान् महौजसः॥ ३१२<br>भ्रमन्तोऽभिद्रवन्तश्च प्लवन्तश्च सहस्रशः।<br>अयातयामानसृजद्रुद्रानेतान् सुरोत्तमान्॥ ३१३ | उन्होंने रूप-तेज-बल-ज्ञानमें अपने ही सदृश, पिंगलवर्णवाले, निषंगयुक्त, जटाजूटधारी, लोहितवर्णवाले, विशिष्ट, हरित केशवाले, देखनेमात्रसे नाश करनेवाले, कपालधारी, विशाल रूपवाले, विकृत रूपवाले, विश्वरूप, स्वरूपवान्, रथारूढ़, ढाल-कवच-वरूथ धारण किये हुए, लाखों भुजाओंवाले, स्वर्ग-पृथ्वी-अन्तरिक्षमें गमन करनेवाले, स्थूल सिरवाले, आठ दाढ़ोंवाले, दो जीभोंवाले, तीन नेत्रोंवाले, अन्न खानेवाले, मांस भक्षण करनेवाले, घृत पीनेवाले, सोमपान करनेवाले, सुन्दर, बड़े-बड़े कपालवाले, नीले कण्ठवाले, ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी), हव्य खानेवाले, वेदपरायण, धार्मिक, मोरपंखसे सुशोभित, कुछ बैठे हुए, कुछ दौड़ते हुए, पाँच भूतोंवाले, कुछ अध्यापन करनेवाले, कुछ अध्ययन करनेवाले, कुछ जप करते हुए, कुछ योगाभ्यास करते हुए, कुछ धूमयुक्त, कुछ दीप्तिमान्, गंगाको धारण किये हुए, अत्यन्त कान्तिमान्, वृद्ध, बुद्धिसम्पन्न, ब्रह्मिष्ठ, शुभ दर्शनवाले, नीलग्रीवा (कण्ठ)-वाले, हजार नेत्रोंवाले, क्षमाकी निधि, सभी प्राणियोंसे अदृश्य, महान् योगवाले, महातेजस्वी, भ्रमण करते हुए, इधर-उधर भागते हुए, कूदते हुए तथा अयातयाम—इन हजारों-हजार उत्तम रुद्रदेवताओंको उत्पन्न किया॥ ३०३-३१३॥ |
| ब्रह्मा दृष्ट्वाऽब्रवीदेनं मास्त्राक्षीरीदृशीः प्रजाः।<br>स्रष्टव्या नात्मनस्तुल्याः प्रजा देव नमोऽस्तु ते॥ ३१४<br>अन्याः सृज त्वं भद्रं ते प्रजा वै मृत्युसंयुताः।<br>नारप्स्यन्ते हि कर्माणि प्रजा विगतमृत्युवः॥ ३१५ | इन्हें देखकर ब्रह्माजीने इन [नीललोहित]-से कहा—‘ऐसी प्रजाओंका सृजन मत कीजिये; अपने सदृश प्रजाओंकी सृष्टि आपको नहीं करनी चाहिये। हे देव! आपको नमस्कार है। आपका कल्याण हो। आप मृत्युयुक्त अन्य प्रजाओंका सृजन कीजिये; क्योंकि मृत्युरहित प्रजाएँ कार्योंका आरम्भ नहीं करेंगी’॥ ३१४-३१५॥ |
| एवमुक्तोऽब्रवीदेनं नाहं मृत्युजरान्विताः।<br>प्रजाः स्रक्ष्यामि भद्रं ते स्थितोऽहं त्वं सृज प्रजाः॥ ३१६<br>एते ये वै मया सृष्टा विरूपा नीललोहिताः।<br>सहस्त्राणां सहस्रं तु आत्मनो निःसृताः प्रजाः॥ ३१७<br>एते देवा भविष्यन्ति रुद्रा नाम महाबलाः।<br>पृथिव्यामन्तरिक्षे च दिक्षु चैव परिश्रिताः॥ ३१८<br>शतरुद्राः समात्मानो भविष्यन्तीति याज्ञिकाः।<br>यज्ञभाजो भविष्यन्ति सर्वदेवगणैः सह॥ ३१९ | ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे गये रुद्रने उनसे कहा—मैं मृत्यु तथा जरासे युक्त प्रजाओंका सृजन नहीं करूँगा। आपका कल्याण हो। अब मैं [शान्त होकर] बैठता हूँ और आप ही सृजन कीजिये। जिन हजारों-हजार विरूप नीललोहित रुद्रोंको मैंने सृजित किया है, वे मेरी आत्मासे निकली हुई प्रजाएँ हैं। ये रुद्र नामवाले महाबली देवता होंगे। ये पृथ्वी, आकाश तथा सभी दिशाओंमें व्याप्त रहेंगे। इनमें समान आत्मावाले सौ रुद्र याज्ञिक होंगे; वे सभी देवताओंके साथ |