भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 639, कुल 956 में से

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पृष्ठ 639

५९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मठके ग्रंथमें स्पष्ट वर्णन है, कि उस समय ईसा हिंदुस्थानमें आया था और वहाँ उसे बौद्ध धर्मका ज्ञान प्राप्त हुआ । यह ग्रंथ निकोलस नोटोव्हिश नामके एक रूसीके हाथ लग गया था और उसने फ्रेंच भाषामें इसका अनुवाद सन १८९४ ईसवीमें प्रकाशित किया है । बहुतेरे ईसाई पंडित कहते हैं, कि नोटोव्हिशका अनुवाद सच भलेही हो; - परंतु मूल ग्रंथका प्रणेता कोई लफंगा है, जिसने यह बनावटी ग्रंथ गढ़ ढाला है । हमाराभी कोई विशेष आग्रह नहीं है, कि उक्त ग्रंथको ये पंडित लोग सत्यही मान लें। नोटोव्हिशको मिला हुआ ग्रंथ सत्य हो या प्रक्षिप्त, परंतु हमने केवल ऐतिहासिक दृष्टिसे जो विवेचन ऊपर किया है, उससे यह बात स्पष्टतया विदित हो जायगी, कि यदि ईसाको नहीं, तो कम-से-कम उसके भक्तोंको तो कि जिन्होंने नई बाइबलमें उसका चरित्र लिखा है, बौद्ध धर्मका ज्ञान होना असंभव नहीं था; और यदि यह बात असंभव नहीं है; तो ईसा और बुद्धके चरित्र तथा उपदेशमें जो विलक्षण समता पाई जाती है, उसकी केवल स्वतंत्र रीतिसे उत्पत्ति माननाभी युक्तिसंगत नहीं जँचता ।* सारांश यह है, कि मीमांसकोंका केवल कर्म-मार्ग, जनक आदिका ज्ञानयुक्त कर्मयोग ( नैष्कर्म्य ), उपनिषत्कारों तथा सांख्योंकी ज्ञाननिष्ठा और संन्यास, चित्त-निरोध- रूपी पातंजलयोग, एवं पांचरात्र वा भागवत धर्म अर्थात् भक्ति, ये सभी धार्मिक अंग और तत्त्व मूलमें प्राचीन वैदिक धर्मकेही हैं। इनमेंसे ब्रह्मज्ञान, कर्म और भक्तिको छोड़ कर, चित्त-निरोधरूपी योग तथा कर्म-संन्यास, इन्हीं दोनों तत्त्वोंके आधारपर बुद्धने पहले पहल अपने संन्यास-प्रधान धर्मका उपदेश चारों वर्णोंको किया था । परंतु आगे चलकर उसीमें भक्ति तथा निष्काम कर्मको मिलाकर बुद्धके अनुयायियोंने उसके धर्मका चारों ओर प्रसार किया । अशोकके समय बौद्ध धर्मका इस प्रकार प्रचार हो जानेके पश्चात् शुद्ध कर्म-प्रधान यहूदी धर्ममें संन्यास-मार्गके तत्त्वोंका प्रवेश होना आरंभ हुआ; और अंतमें उसीमें भक्तिको मिलाकर ईसाने अपना धर्म प्रवृत्त किया है। इतिहाससे निष्पन्न होनेवाली इस परंपरापर दृष्टि देनेसे, डॉक्टर लारिन- सरका यह कथन तो असत्य सिद्ध होताही है, कि गीतामें ईसाई धर्मसे कुछ बातें ली गई हैं ; किंतु इसके विपरीत, यह बात अधिक संभवही नहीं, बल्कि विश्वास करने योग्यभी है, कि आत्मौपम्य-दृष्टि, संन्यास, निर्वैरत्व या भक्तिके जो तत्त्व नई बाइबलमें पाये जाते हैं, वे ईसाई धर्ममेंही बौद्ध धर्मसे - अर्थात् परंपरासे वैदिक धर्मसे - लिये गये होंगे; और यह पूर्णतया सिद्ध हो जाता है, कि इसके लिये हिंदुओंको दूसरोंका मुँह ताकनेकी कभी आवश्यकता थीही नहीं । * बाबू रमेशचंद्र दत्तकाभी यही मत है, उन्होंने उसका विस्तारपूर्वक विवेचन अपने ग्रंथमें किया है । Ramesh Chander Dutt's History of Civilization in Ancient India, Vol. II. Chap. XX, pp. 328–340.

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