भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 638

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५९३ साफ़ साफ़ लिखा है, कि ईसाके समयमें हिंदूस्थानका एक यति लालसमुद्रके किनारे और एलेक्जेंड्रियाके आसपासके प्रदेशोंमें प्रतिवर्ष आया करता था। तात्पर्य इस, विषयमें अब कोई शंका नहीं रह गई है, कि ईसासे दो-तीन सौ वर्ष पहलेही यहूदियोंके देशमें बौद्ध यतियोंका प्रवेश होने लगा था; और जब यह संबंध सिद्ध हो गया, तब यह बात सहजही निष्पन्न हो जाती है, कि यहूदी लोगोंमें पहले संन्यास-प्रधान एसी पंथका और फिर आगे चलकर संन्यासयुक्त भक्ति-प्रधान ईसाई धर्मका प्रादुर्भाव होनेके लिये बौद्ध धर्मही विशेष कारणभूत हुआ होगा। अंग्रेजी ग्रंथकार लिलीनेभी यही अनुमान किया है; और इसकी पुष्टिमें फ्रेंच पंडित एमिल् बुर्नुफ और रोस्नीके † इसी प्रकारके मतोंका उसने अपने ग्रंथोंमें हवाला दिया है; एवं, जर्मन देशके लिपज़िकके तत्त्वज्ञानशास्त्राध्यापक प्रोफेसर मेडनने इस विषयके अपने ग्रंथमेभी उक्त मतहीका प्रतिपादन किया है। जर्मन प्रोफेसर श्रडरने अपने एक निबंधमे कहा है, कि ईसाई तथा बौद्ध धर्म सर्वथा एक-से नहीं हैं; यद्यपि उन दोनोंकी कुछ बातोंमें समता हो, तथापि अन्य बातोंमें वैषम्यभी थोड़ा नहीं है; और इसी कारण बौद्ध धर्मसे ईसाई धर्मका उत्पन्न होना नहीं माना जा सकता। परंतु यह कथन विषयसे बाहरका है, इसलिये इसमें कुछभी जान नहीं है। यह कोईभी नहीं कहता, कि ईसाई तथा बौद्ध धर्म सर्वथा एक-सेही हैं। क्योंकि यदि ऐसा होता, तो ये दोनों धर्म पृथक् पृथक् न माने गये होते। मुख्य प्रश्न तो यह है, कि जब मूलमें यहूदी धर्म केवल कर्ममय है, तब उसमें सुधारके रूपमे संन्यासयुक्त भक्ति-मार्गके प्रतिपादक ईसाई धर्मकी उत्पत्ति होनेके लिये कारण क्या हुआ होगा ? और ईसाकी अपेक्षा बौद्ध धर्म सचमुचही प्राचीन है; उसके इतिहासपर ध्यान देनेसे यह कथन ऐतिहासिक दृष्टिसेभी संभव नहीं प्रतीत होता, कि संन्यास-प्रधान भक्ति और नीतिके तत्त्वोंको ईसाने स्वतंत्र रीतिसे ढूँढ़ निकाला हो। बाइबलमें इस बातका कहींभी वर्णन नहीं मिलता, कि ईसा अपनी आयुके बारहवें वर्षसे लेकर तीस वर्षकी आयुतक क्या करता था और कहाँ था ? यह प्रकट है, कि उसने अपना यह समय ज्ञानार्जन, धर्मचिंतन और प्रवासमें बिताया होगा। अतएव विश्वासपूर्वक कौन कह सकता है, कि आयुके इस भागमें उसका बौद्ध भिक्षुओंसे प्रत्यक्ष या पर्यायमे कुछभी संबंध हुआही न होगा ? क्योंकि, इस समय बौद्ध यतियोंका दौर-दौरा यूनानतक हो चुका था। नेपालके एक बौद्ध पधारे थे। महावंशके अंग्रेजी अनुवादक अलसंदा शब्दसे मिस्र देशके एलेक्जेंड्रिया शहरको नही लेते। वे इस शब्दसे यहाँ उस अलसंदा नामक गांवकोही विवक्षित बतलाते हैं, कि जिसे सिकंदरने काबुलमें बसाया था; परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि इस छोटे-से गाँवको किसीनेभी यवनोंका नगर न कहा होता। इसके सिवा ऊपर बतलाये हुए अशोकके शिलालेखहीमें यवनोंके राज्योम बौद्ध भिक्षुओंके भेजे जानेका स्पष्ट उल्लेख है। † See Lillie's Buddha and Buddhism, pp. 158 ff. गी. र. ३८