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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५९३ साफ़ साफ़ लिखा है, कि ईसाके समयमें हिंदूस्थानका एक यति लालसमुद्रके किनारे और एलेक्जेंड्रियाके आसपासके प्रदेशोंमें प्रतिवर्ष आया करता था। तात्पर्य इस, विषयमें अब कोई शंका नहीं रह गई है, कि ईसासे दो-तीन सौ वर्ष पहलेही यहूदियोंके देशमें बौद्ध यतियोंका प्रवेश होने लगा था; और जब यह संबंध सिद्ध हो गया, तब यह बात सहजही निष्पन्न हो जाती है, कि यहूदी लोगोंमें पहले संन्यास-प्रधान एसी पंथका और फिर आगे चलकर संन्यासयुक्त भक्ति-प्रधान ईसाई धर्मका प्रादुर्भाव होनेके लिये बौद्ध धर्मही विशेष कारणभूत हुआ होगा। अंग्रेजी ग्रंथकार लिलीनेभी यही अनुमान किया है; और इसकी पुष्टिमें फ्रेंच पंडित एमिल् बुर्नुफ और रोस्नीके † इसी प्रकारके मतोंका उसने अपने ग्रंथोंमें हवाला दिया है; एवं, जर्मन देशके लिपज़िकके तत्त्वज्ञानशास्त्राध्यापक प्रोफेसर मेडनने इस विषयके अपने ग्रंथमेभी उक्त मतहीका प्रतिपादन किया है। जर्मन प्रोफेसर श्रडरने अपने एक निबंधमे कहा है, कि ईसाई तथा बौद्ध धर्म सर्वथा एक-से नहीं हैं; यद्यपि उन दोनोंकी कुछ बातोंमें समता हो, तथापि अन्य बातोंमें वैषम्यभी थोड़ा नहीं है; और इसी कारण बौद्ध धर्मसे ईसाई धर्मका उत्पन्न होना नहीं माना जा सकता। परंतु यह कथन विषयसे बाहरका है, इसलिये इसमें कुछभी जान नहीं है। यह कोईभी नहीं कहता, कि ईसाई तथा बौद्ध धर्म सर्वथा एक-सेही हैं। क्योंकि यदि ऐसा होता, तो ये दोनों धर्म पृथक् पृथक् न माने गये होते। मुख्य प्रश्न तो यह है, कि जब मूलमें यहूदी धर्म केवल कर्ममय है, तब उसमें सुधारके रूपमे संन्यासयुक्त भक्ति-मार्गके प्रतिपादक ईसाई धर्मकी उत्पत्ति होनेके लिये कारण क्या हुआ होगा ? और ईसाकी अपेक्षा बौद्ध धर्म सचमुचही प्राचीन है; उसके इतिहासपर ध्यान देनेसे यह कथन ऐतिहासिक दृष्टिसेभी संभव नहीं प्रतीत होता, कि संन्यास-प्रधान भक्ति और नीतिके तत्त्वोंको ईसाने स्वतंत्र रीतिसे ढूँढ़ निकाला हो। बाइबलमें इस बातका कहींभी वर्णन नहीं मिलता, कि ईसा अपनी आयुके बारहवें वर्षसे लेकर तीस वर्षकी आयुतक क्या करता था और कहाँ था ? यह प्रकट है, कि उसने अपना यह समय ज्ञानार्जन, धर्मचिंतन और प्रवासमें बिताया होगा। अतएव विश्वासपूर्वक कौन कह सकता है, कि आयुके इस भागमें उसका बौद्ध भिक्षुओंसे प्रत्यक्ष या पर्यायमे कुछभी संबंध हुआही न होगा ? क्योंकि, इस समय बौद्ध यतियोंका दौर-दौरा यूनानतक हो चुका था। नेपालके एक बौद्ध पधारे थे। महावंशके अंग्रेजी अनुवादक अलसंदा शब्दसे मिस्र देशके एलेक्जेंड्रिया शहरको नही लेते। वे इस शब्दसे यहाँ उस अलसंदा नामक गांवकोही विवक्षित बतलाते हैं, कि जिसे सिकंदरने काबुलमें बसाया था; परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि इस छोटे-से गाँवको किसीनेभी यवनोंका नगर न कहा होता। इसके सिवा ऊपर बतलाये हुए अशोकके शिलालेखहीमें यवनोंके राज्योम बौद्ध भिक्षुओंके भेजे जानेका स्पष्ट उल्लेख है। † See Lillie's Buddha and Buddhism, pp. 158 ff. गी. र. ३८

५९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मठके ग्रंथमें स्पष्ट वर्णन है, कि उस समय ईसा हिंदुस्थानमें आया था और वहाँ उसे बौद्ध धर्मका ज्ञान प्राप्त हुआ । यह ग्रंथ निकोलस नोटोव्हिश नामके एक रूसीके हाथ लग गया था और उसने फ्रेंच भाषामें इसका अनुवाद सन १८९४ ईसवीमें प्रकाशित किया है । बहुतेरे ईसाई पंडित कहते हैं, कि नोटोव्हिशका अनुवाद सच भलेही हो; - परंतु मूल ग्रंथका प्रणेता कोई लफंगा है, जिसने यह बनावटी ग्रंथ गढ़ ढाला है । हमाराभी कोई विशेष आग्रह नहीं है, कि उक्त ग्रंथको ये पंडित लोग सत्यही मान लें। नोटोव्हिशको मिला हुआ ग्रंथ सत्य हो या प्रक्षिप्त, परंतु हमने केवल ऐतिहासिक दृष्टिसे जो विवेचन ऊपर किया है, उससे यह बात स्पष्टतया विदित हो जायगी, कि यदि ईसाको नहीं, तो कम-से-कम उसके भक्तोंको तो कि जिन्होंने नई बाइबलमें उसका चरित्र लिखा है, बौद्ध धर्मका ज्ञान होना असंभव नहीं था; और यदि यह बात असंभव नहीं है; तो ईसा और बुद्धके चरित्र तथा उपदेशमें जो विलक्षण समता पाई जाती है, उसकी केवल स्वतंत्र रीतिसे उत्पत्ति माननाभी युक्तिसंगत नहीं जँचता ।* सारांश यह है, कि मीमांसकोंका केवल कर्म-मार्ग, जनक आदिका ज्ञानयुक्त कर्मयोग ( नैष्कर्म्य ), उपनिषत्कारों तथा सांख्योंकी ज्ञाननिष्ठा और संन्यास, चित्त-निरोध- रूपी पातंजलयोग, एवं पांचरात्र वा भागवत धर्म अर्थात् भक्ति, ये सभी धार्मिक अंग और तत्त्व मूलमें प्राचीन वैदिक धर्मकेही हैं। इनमेंसे ब्रह्मज्ञान, कर्म और भक्तिको छोड़ कर, चित्त-निरोधरूपी योग तथा कर्म-संन्यास, इन्हीं दोनों तत्त्वोंके आधारपर बुद्धने पहले पहल अपने संन्यास-प्रधान धर्मका उपदेश चारों वर्णोंको किया था । परंतु आगे चलकर उसीमें भक्ति तथा निष्काम कर्मको मिलाकर बुद्धके अनुयायियोंने उसके धर्मका चारों ओर प्रसार किया । अशोकके समय बौद्ध धर्मका इस प्रकार प्रचार हो जानेके पश्चात् शुद्ध कर्म-प्रधान यहूदी धर्ममें संन्यास-मार्गके तत्त्वोंका प्रवेश होना आरंभ हुआ; और अंतमें उसीमें भक्तिको मिलाकर ईसाने अपना धर्म प्रवृत्त किया है। इतिहाससे निष्पन्न होनेवाली इस परंपरापर दृष्टि देनेसे, डॉक्टर लारिन- सरका यह कथन तो असत्य सिद्ध होताही है, कि गीतामें ईसाई धर्मसे कुछ बातें ली गई हैं ; किंतु इसके विपरीत, यह बात अधिक संभवही नहीं, बल्कि विश्वास करने योग्यभी है, कि आत्मौपम्य-दृष्टि, संन्यास, निर्वैरत्व या भक्तिके जो तत्त्व नई बाइबलमें पाये जाते हैं, वे ईसाई धर्ममेंही बौद्ध धर्मसे - अर्थात् परंपरासे वैदिक धर्मसे - लिये गये होंगे; और यह पूर्णतया सिद्ध हो जाता है, कि इसके लिये हिंदुओंको दूसरोंका मुँह ताकनेकी कभी आवश्यकता थीही नहीं । * बाबू रमेशचंद्र दत्तकाभी यही मत है, उन्होंने उसका विस्तारपूर्वक विवेचन अपने ग्रंथमें किया है । Ramesh Chander Dutt's History of Civilization in Ancient India, Vol. II. Chap. XX, pp. 328–340.

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५९५ इस प्रकार, इस प्रकरणके आरंभमें दिये हुए सात प्रश्नोंका विवेचन हो चुका। अब इन्हींके साथ महत्त्वके कुछ ऐसे प्रश्न उत्पन्न होते हैं, कि हिंदुस्थानमें जो भक्तिपंथ आजकल प्रचलित हैं, उनपर भगवद्गीताका क्या परिणाम हुआ है ? परंतु इन प्रश्नोंको गीता-ग्रंथसंबंधी कहनेकी अपेक्षा यही कहना ठीक है, कि ये हिंदु धर्मके अर्वाचीन इतिहाससे संबंध रखते हैं, इसलिये, और विशेषतः यह परिशिष्ट- प्रकरण थोड़ा थोड़ा करनेपरभी हमारे अंदाजसे अधिक बढ़ गया है, इसीलिये, अब यहींपर गीताकी बहिरंग परीक्षा समाप्त की जाती है।

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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य गीताके मूल श्लोक, हिंदी अनुवाद और टिप्पणियाँ

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उपोद्घात ज्ञानसे और श्रद्धासे - उसमेंभी विशेषतः भक्तिके सुलभ राजमार्गसे जितनी हो सके उतनी समबुद्धि करके लोकसंग्रहके निमित्त स्वधर्मानुसार अपने अपने कर्म निष्कामबुद्धिसे मरणपर्यंत करते रहनाही प्रत्येक मनुष्यका परम कर्तव्य है; उसीमें उसका सांसारिक और पारलौकिक परम कल्याण है; तथा उसे मोक्षकी प्राप्तिके लिये कर्म छोड़ बैठनेकी अथवा और कोईभी दूसरा अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं है - समस्त गीताशास्त्रका यही फलितार्थ है, जो गीतारहस्यमें प्रकरणशः विस्तारपूर्वक प्रतिपादित हो चुका है। इसी प्रकार चौदहवें प्रकरणमें यहभी दिखला चुके हैं, कि उल्लिखित उद्देश्यसे गीताके अठारह अध्यायोंका मेल कैसे अच्छा और सरल मिल जाता है; एवं इस कर्मयोग-प्रधान गीता-धर्ममें अन्यान्य मोक्ष-साधनोंके कौन-कौन-से भाग किस प्रकार आये हैं। इतना कह चुकनेपर, वस्तुतः इससे अधिक काम नहीं रह जाता, कि गीताके श्लोकोंका हमारे मतानुसार क्रमशः हिंदी भाषामें सरल अर्थ बतला दिया जावे। किंतु गीतारहस्यके सामान्य विवेचनमें यह बतलाते न बनता था, कि गीताके प्रत्येक अध्यायके विषय-विभाग कैसे किये गये हैं ? अथवा टीकाकारोंने अपने संप्रदायकी सिद्धिके लिये गीताके कुछ विशेष श्लोकोंके पदोंकी किस प्रकार खींचातानी की है, अतः इन दोनों बातोंका विचार करके और जहाँका तहाँ पूर्वापर संदर्भ दिखला देनेके लियेभी अनुवादके साथ साथ आलोचनाके ढंगपर कुछ टिप्पणियोंके देनेकी आवश्यकता हुई। फिरभी जिन विषयोंका गीतारहस्यमें विस्तृत वर्णन हो चुका है, उनका केवल दिग्दर्शन करा दिया है; और गीतारहस्यके जिस प्रकरणमें उस विषयका विचार किया गया है, उसका सिर्फ हवाला दे दिया है। ये टिप्पणियाँ मूल ग्रंथसे अलग पहचान ली जा सकें, इसके लिये उन्हें ऐसे [ ] चौकोन कोष्ठकोंके भीतर रखा गया है और उनके पीछे टूटी हुई खड़ी रेखाएँभी लगा दी गयी हैं। श्लोकोंका अनुवाद, जहाँतक बना पड़ा है, शब्दशः किया गया है; और कितनेही स्थलोंपर तो मूलकेही शब्द रख दिये गये हैं; एवं 'अर्थात्, याने 'से जोड़कर उनका अर्थ खोल दिया है; और छोटी-मोटी टिप्पणियोंका काम अनुवादसेही निकाल लिया गया है। इतना करनेपरभी संस्कृतकी और हिंदीकी भाषाप्रणाली भिन्न भिन्न है, इस कारण, मूल संस्कृत श्लोकका पूर्ण अर्थ व्यक्त करनेके लिये हिंदीमें कुछ अधिक शब्दोंका प्रयोग अवश्य करना पड़ता है; और अनेक स्थलोंपर मूलके शब्दको अनुवादमें प्रमाणार्थ लेना पड़ता है। इन शब्दोंपर ध्यान जमनेके लिये ऐसे ( ) गोलाकार कोष्ठकमें ये शब्द रखे गये हैं। संस्कृत ग्रंथोंमें श्लोकका आँकड़ा श्लोकके अंतमें रहता है; परंतु अनुवादमें हमने उसे आरंभमें रखा है। अतः किसी श्लोकका अनुवाद देखना हो,

६०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तो अनुवाद उस अंकके आगेका वाक्य पढ़ना चाहिये। अनुवादकी रचना प्रायः ऐसी की गई है, कि टिप्पणी छोड़कर निरा अनुवादही पढ़ने जायें, तो अर्थमें कहींभी कोई व्यतिक्रम न पड़े। इसी प्रकार जहाँ मूलमें एकही वाक्य एकसे अधिक श्लोकोंमें पूरा हुआ है, वहाँ उतनेही श्लोकोंके अनुवादमें वह अर्थ पूर्ण किया गया है। अतएव कुछ श्लोकोंका अनुवाद मिलाकरही पढ़ना चाहिये। ऐसे श्लोक जहाँ जहाँ हैं, वहाँ वहाँ श्लोकके अनुवादमें पूर्णविराम चिन्ह ( । ) नहीं लगाया गया है। फिरभी यह स्मरण रहे, कि अनुवाद अंतमें अनुवादही है। हमने अपने अनुवादमें गीताके सरल, खुले और प्रधान अर्थको ले आनेका प्रयत्न किया है सही; परंतु संस्कृत शब्दोंमें और विशेषतः भगवानकी प्रेमयुक्त, रसीली, व्यापक और प्रतिक्षणमें नई रुचि देनेवाली वाणीमें, लक्षणासे अनेक व्यंग्यार्थ उत्पन्न करनेकी जो सामर्थ्य है, उसे ज़राभी न घटा-बढ़ाकर दूसरे शब्दोंमें ज्यों-का-त्यों अनुवादमें छलका देना असंभव है; अर्थात् संस्कृत जाननेवाला पुरुष अनेक अवसरोंपर लक्षणासे गीताके श्लोकोंका जैसे उपयोग करेगा, वैसे गीताका निरा अनुवाद पढ़नेवाले पुरुष नहीं कर सकेंगे। अधिक क्या कहें? संभव है, कि वे गोताभी खा जायें। अतएव सब लोगोंसे हमारी आग्रहपूर्वक विनती है, कि मूल गीता-ग्रंथका अध्ययन संस्कृतमेंही अवश्य कीजिये; और अनुवादके साथही साथ मूल श्लोक रखनेका प्रयोजनभी यही है। गीताके प्रत्येक अध्यायके विषयका सुविधासे ज्ञान होनेके लिये इन सब विषयोंकी — अध्यायोंके क्रमसे प्रत्येक श्लोककी — अनुक्रमणिकाभी पहले अलग दे दी है। यह अनुक्रमणिका वेदान्त-सूत्रोंकी अधिकरण-मालाके ढंगकी है। प्रत्येक श्लोक पृथक् पृथक् न पढ़कर, अनुक्रमणिकाके इस सिलसिलेसे गीताके श्लोक एकत्र पढ़नेपर गीताके तात्पर्यके संबंधमें जो भ्रम फैला है, वह कई अंशोंमें दूर हो सकता है। क्योंकि, सांप्रदायिक टीकाकारोंने गीताके श्लोकोंकी खींचातानी कर अपने संप्रदायकी सिद्धिके लिये कुछ श्लोकोंके जो निराले अर्थ कर डाले हैं, वे प्रायः इस पूर्वापर संदर्भकी ओर दुर्लक्ष करकेही किये गये हैं। उदाहरणार्थ, गीता ३. १९; ६.३; १८. २ देखिये। इस दृष्टिसे देखें तो यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि गीताका वह अनुवाद और गीतारहस्य, दोनों परस्पर एक दूसरेकी पूर्ति करते हैं; और जिसे हमारा वक्तव्य पूर्णतया समझ लेना हो, उसे इन दोनों भागोंका अवलोकन करना चाहिये। भगवद्गीता ग्रंथको कंठस्थ कर लेनेकी रीति प्रचलित है, इसलिये उसमें महत्त्वके पाठभेद कहींभी नहीं पाये जाते हैं। फिरभी यह बतलाना आवश्यक है, कि वर्तमानकालमें गीतापर उपलब्ध होनेवाले भाष्योंमें जो सबमे प्राचीन भाष्य है, उसी शांकरभाष्यके मूल पाठोंको हमने प्रमाण माना है।

गीताके अध्यायोंकी श्लोकशः विषयानुक्रमणिका [ टिप्पणी :- इस अनुक्रमणिकामें गीताके अध्यायोंके, विषयोंके, श्लोकोंके क्रमसे जो विभाग किये गये गये हैं, वे मूल संस्कृत श्लोकोंके पहले §§ इस चिन्हसे दिखलाये गये हैं; और अनुवादमें ऐसे श्लोकोंसे अलग परिच्छेद शुरू किया गया है । ] पहला अध्याय – अर्जुनविषादयोग १ संजयसे धृतराष्ट्रका प्रश्न । २-११ दुर्योधनका द्रोणाचार्यसे दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन करना । १२-१९ युद्धके आरंभमें परस्पर सलामीके लिये शंख- ध्वनि । २०-२७ अर्जुनका रथ आगे ले जाकर सैन्यनिरीक्षण । २८-३७ दोनों सेनाओमें अपनेही बांधव हैं, उनको मारनेसे कुलक्षय होगा, यह सोचकर अर्जुनको विषाद हुआ । ३८-४४ कुलक्षय प्रभृति पातकोंका परिणाम । ४५-४७ युद्ध न करनेका अर्जुनका निश्चय और धनुर्बाणत्याग । दूसरा अध्याय – सांख्ययोग १-३ श्रीकृष्णका उत्तेजन । ४-१० अर्जुनका उत्तर, कर्तव्यमूढता और धर्म- निर्णयार्थ श्रीकृष्णके शरणापन्न होना । ११-१३ आत्माका अशोच्यत्व । १४, १५ देह और सुखदुःखकी अनित्यता । १६-२५ सदसद्विवेक और आत्माके नित्यादि स्वरूपकथनसे उसके अशोच्यत्वका समर्थन । २६, २७ आत्माके अनित्यत्व पक्षको उत्तर । २८ सांख्यशास्त्रानुसार व्यक्त भूतोंका अनित्यत्व और अशोच्यत्व । २९, ३० लोगोंको आत्मा दुर्ज्ञेय है सही; परंतु तू सत्य ज्ञानको प्राप्तकर, शोक करना छोड़ दे । ३१-३८ क्षात्रधर्मके अनुसार युद्ध करनेकी आवश्यकता । ३९ सांख्य- मार्गानुसार विषय-प्रतिपादनकी समाप्ति और कर्मयोगके प्रतिपादनका आरंभ । ४० कर्मयोगका स्वल्प आचरणभी क्षेमकारक है । ४१ व्यवसायात्मिका बुद्धिकी स्थिरता । ४२-४४ कर्मकांडके अनुयायी मीमांसकोंकी अस्थिर बुद्धिका वर्णन । ४५, ४६ स्थिर और योगस्थ बुद्धिसे कर्म करनेके विषयमें उपदेश । ४७ कर्मयोगकी चतुःसूत्री । ४८-५० कर्मयोगका लक्षण और कर्मकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिकी श्रेष्ठता । ५१-५३ कर्मयोगसे मोक्षप्राप्ति, ५४-७० अर्जुनके पूछनेपर, कर्मयोगी स्थितप्रज्ञके लक्षण; और उसीमें प्रसंगानुसार विषयासक्तिसे काम आदिकी उत्पत्तिका क्रम । ७१, ७२ ब्राह्मी स्थिति ।

६०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

तीसरा अध्याय – कर्मयोग

१, २ अर्जुनका यह प्रश्न, कि कर्मोंको छोड़ देना चाहिये या करते रहना चाहिये; सच क्या है ? ३-८ यद्यपि सांख्य (कर्म-संन्यास) और कर्मयोग, दो निष्ठाएँ हैं, तोभी कर्म किसीके नहीं छूटते, इसलिये कर्मयोगकी श्रेष्ठता सिद्ध करके अर्जुनको उसीके आचरण करनेका निश्चित उपदेश। ९-१६ मीमांसकोंके यज्ञार्थ कर्मकोभी आसक्ति छोड़कर करनेका उपदेश, यज्ञचक्रका अनादित्व और जगत्के धारणार्थ उसकी आवश्यकता । १७-१९ ज्ञानी पुरुषमें स्वार्थ नहीं होता, इसीलिये प्राप्त कर्मोंको वह निःस्वार्थ अर्थात् निष्काम-बुद्धिसे किया करे; क्योंकि कर्म किसीकेभी नहीं छूटते। २०-२४ जनक आदिका उदाहरण; लोकसंग्रहका महत्त्व और स्वयं भगवान्का दृष्टान्त । २५-२९ ज्ञानी और अज्ञानीके कर्मोंमें भेद, एवं यह आवश्यकता कि ज्ञानी मनुष्य निष्काम कर्म करके अज्ञानीको सदाचरणका आदर्श दिखलावे । ३० ज्ञानी पुरुषके समान परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे युद्ध करनेका अर्जुनको उपदेश । ३१, ३२ भगवानके इस उपदेशके अनुसार श्रद्धापूर्वक बर्ताव करने अथवा न करनेका फल। ३३, ३४ प्रकृतिकी प्रबलता और इंद्रियनिग्रह। ३५ निष्काम कर्मभी स्वधर्मकाही करे; उसमें यदि मृत्यु हो जाय, तो कोई परवाह नहीं । ३६-४१ कामही मनुष्यको उसकी इच्छाके विरुद्ध पाप करनेके लिये उकसाता है; इंद्रियसंयमसे उसका नाश । ४२, ४३ इंद्रियोंकी श्रेष्ठताका क्रम और आत्मज्ञानपूर्वक उनका नियमन ।

चौथा अध्याय – ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

१-३ कर्मयोगकी संप्रदाय-परंपरा -। ४-८ जन्मरहित परमेश्वर मायासे दिव्य जन्म अर्थात् अवतार कब और किस लिये लेता है - इसका वर्णन । ९, १०, इस दिव्य जन्मका और कर्मका तत्त्व जान लेनेसे पुनर्जन्म छूटकर भगवत्प्राप्ति । ११, १२ अन्य रीतिसे भजे तो वैसा फल; उदाहरणार्थ, इस लोकके फल पानेके लिये देवताओंकी उपासना। १३-१५ भगवानके चातुर्वर्ण्य आदि निर्लेप कर्म, उनके तत्त्वको जान लेनेसे कर्मबंधका नाश और वैसे कर्म करनेके लिये उपदेश । १६-२३ कर्म, अकर्म और विकर्मका भेद; अकर्मही निःसंग कर्म है। वही सच्चा कर्म है; और उसीसे कर्मबंधका नाश होता है । २४-३३ अनेक प्रकारके लाक्षणिक यज्ञोंका वर्णन; और ब्रह्म-बुद्धिसे किये हुए यज्ञकी अर्थात् ज्ञानयज्ञकी श्रेष्ठता । ३४-३७ ज्ञातासे ज्ञानोपदेश, ज्ञानसे आत्मौपम्य-दृष्टि और पापपुण्यका नाश । ३८-४० ज्ञान प्राप्तिके उपाय - बुद्धि (- योग) और श्रद्धा । इसके अभावमें नाश । ४१, ४२ (कर्म-) योग और ज्ञानका पृथक् उपयोग बतलाकर दोनोंके आश्रयमे युद्ध करनेके लिये उपदेश ।

विषयानुक्रमणिका ६०३ पाँचवाँ अध्याय - संन्यासयोग १, २ यह स्पष्ट प्रश्न, कि संन्यास श्रेष्ठ है या कर्मयोग ? इसपर भगवानका यह निश्चित उत्तर कि मोक्षप्रद तो दोनों हैं, पर उनमेंसे कर्मयोगही श्रेष्ठ है। ३-६ संकल्पोंको छोड़ देनेसे कर्मयोगी नित्य-संन्यासीही होता है; और बिना कर्मके संन्यासभी सिद्ध नहीं होता। इसलिये तत्त्वतः दोनों एकही हैं। ७-१३ मन सदैव संन्यस्त रहता है, और कर्म केवल इंद्रियाँ किया करती हैं, इसलिये कर्मयोगी सदा अलिप्त, शांत और मुक्त रहता है। १४, १५ सच्चा कर्तृत्व और भोक्तृत्व प्रकृतिका है, परंतु अज्ञानसे आत्माका अथवा परमेश्वरका समझा जाता है। १६, १७ इस अज्ञानके नाशसे पुनर्जन्मसे छुटकारा। १८-२३ ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाले सम- दर्शित्वका, स्थिर बुद्धिका और सुखदुःखकी क्षमताका वर्णन। २४-२८ सर्वभूत- हितार्थ कर्म करते रहनेपर भी कर्मयोगी इसी लोकमें सदैव ब्रह्मभूत, समाधिस्थ और मुक्त है। २९ ( कर्तृत्व अपने ऊपर न लेकर ) परमेश्वरको यज्ञ-तपका भोक्ता और सब भूतोंका मित्र जान लेनेका फल। छठा अध्याय - ध्यानयोग १, २ फलाशा छोड़कर कर्तव्य करनेवालाही सच्चा संन्यासी और योगी है। संन्यासीका अर्थ निरग्नि और अक्रिय नहीं है। ३, ४ कर्मयोगीकी साधनावस्थामें और सिद्धावस्थामें शम एवं कर्मके कार्य-कारणका बदल जाना तथा योगारूढ़का लक्षण। ५, ६ योगको सिद्ध करनेके लिये आत्माकी स्वतंत्रता। ७-९ जितात्म योगयुक्तोंमेंभी सम-बुद्धिकी श्रेष्ठता। १०-१७ योगसाधनके लिये आवश्यक आसन और आहारविहारका वर्णन। १८-२३ योगीके और योगसमाधिके आत्यंतिक सुखका वर्णन। २४-२६ मनको धीरे धीरे समाधिस्थ, शांत और आत्मनिष्ठ कैसे करना चाहिये ? २७, २८ योगीही ब्रह्मभूत और अत्यंत सुखी है। २९-३२ प्राणि- मात्रमें योगीकी आत्मौपम्य-बुद्धि। ३३-३६ अभ्यास और वैराग्यसे चंचल मनका निग्रह। ३७-४५ अर्जुनके प्रश्न करनेपर इस विषयका वर्णन, कि योगभ्रष्टको अथवा जिज्ञासुकोभी जन्मजन्मांतरमें उत्तम फल मिलनेसे अंतमें पूर्ण सिद्धि कैसे मिलती है ? ४६, ४७ तपस्वी, ज्ञानी और निरे कर्मीकी अपेक्षा कर्मयोगी - और उनमेंभी भक्तिमान् कर्मयोगी - श्रेष्ठ है। अतएव अर्जुनको (कर्म-) योगी होनेके विषयमें उपदेश। सातवाँ अध्याय - ज्ञान-विज्ञानयोग १-३ कर्मयोगकी सिद्धिके लिये ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका आरंभ। सिद्धिके लिये प्रयत्न करनेवालोंका कम मिलना। ४-७ क्षराक्षरविचार। भगवानकी

६०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अष्टधा अपरा और जीवरूपी परा प्रकृति उससे आगे सारा विस्तार । ८-१२ विस्तारके सात्त्विक आदि सब भागोंमें गुंथे हुए परमेश्वरस्वरूपका दिग्दर्शन । १३ - १५ परमेश्वरकी यही गुणमयी और दुस्तर माया है; और उसीके शरणागत होनेपर मायासे उद्धार होता है । १६-१९ भक्त चतुर्विध हैं; उनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है । अनेक जन्मोंसे ज्ञानकी पूर्णता और भगवत्प्राप्तिरूप नित्य फल । २०-२३ अनित्य काम्य-फलोंके निमित्त देवताओंकी उपासना; परंतु उसमेंभी उनकी श्रद्धाका फल भगवानही देते हैं । २४-२८ भगवानका सत्य-स्वरूप अव्यक्त है; परंतु मायाके कारण और द्वंद्वमोहके कारण वह दुर्ज्ञेय है । मायामोहके नाशसे स्वरूपका ज्ञान । २९, ३० ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, और अधिभूत, अधिदेव, अधियज्ञ सब एक परमेश्वरही है – यह जान लेनेसे अंततक ज्ञानसिद्धि हो जाती है । आठवाँ अध्याय – अक्षर-ब्रह्मयोग १-४ अर्जुनके प्रश्न करनेपर ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदेव, अधि- यज्ञ और अधिदेहकी व्याख्याएँ । उन सबमें एकही ईश्वर है । ५-८ अंतकालमें भगवत्स्मरणसे मुक्ति । परंतु जो मनमें नित्य रहता है, वही अंतकालमेंभी रहता है; अतएव सदैव भगवानका स्मरण करने और युद्ध करनेके लिये उपदेश । ९-१३ अंतकालमें परमेश्वरका अर्थात् ॐकारका समाधिपूर्वक ध्यान और उसका फल १४-१६ भगवानका नित्य चिंतन करनेसे पुनर्जन्म-नाश । ब्रह्मलोकादि गतियाँ नित्य नहीं हैं । १७-१९ ब्रह्माका दिन-रात, दिनके आरंभमें अव्यक्तसे सृष्टिकी उत्पत्ति और रात्रिके आरंभमें उसीमें लय । २०-२२ इस अव्यक्तसेभी परेका अव्यक्त और अक्षर पुरुष । भक्तिसे उनका ज्ञान और उसकी प्राप्तिसे पुनर्जन्मका नाश । २३-२६ देवयान और पितृयाणमार्ग; पहला पुनर्जन्मनाशक है और दूसरा इसके विपरीत है । २७, २८ इन मार्गोंके तत्त्वको जाननेवाले योगीको अत्युत्तम फल मिलता है; अतः तदनुसार सदा व्यवहार करनेका उपदेश । नौवाँ अध्याय – राजविद्या-राजगुह्ययोग १-३ ज्ञान-विज्ञानयुक्त भक्ति-मार्ग मोक्षप्रद होनेपरभी प्रत्यक्ष और सुलभ है । अतएव राजमार्ग है । ४-६ परमेश्वरकी अपार योगसामर्थ्य । प्राणिमात्रमें रहकरभी उनमें नहीं है; और प्राणिमात्रभी उसमें रहकर नहीं है । ७-१० माया- त्मक प्रकृतिके द्वारा सृष्टिकी उत्पत्ति और संहार, भूतोंकी उत्पत्ति और लय । इतना करनेपरभी वह निष्काम है, अतएव अलिप्त है । ११, १२ इसे विना पहचाने, मोहमें फँसकर, मनुष्यदेहधारी परमेश्वरकी अवज्ञा करनेवाले मूर्ख और आसुरी है । १३- १५ ज्ञानयज्ञके द्वारा अनेक प्रकारसे उपासना करनेवाले दैवी हैं । १६-१९ ईश्वर सर्वत्र है, वही जगत्का माँ-बाप है, स्वामी है, पोषक है और भले-बुरेका कर्ता है ।

विषयानुक्रमणिका ६०५ २०-२२ श्रौत यज्ञायाग आदिका दीर्घ उद्योग यद्यपि स्वर्गप्रद है, तोभी वह फल अनित्य है। योगक्षेमके लिये यदि आवश्यक समझें तो वह भक्तिसेभी साध्य है। २३-२५ अन्यान्य देवताओंकी भक्ति पर्यायसे परमेश्वरकीही होती है, परंतु जैसी भावना होगी और जैसा देवता होगा, फलभी वैसाही मिलेगा। २६ भक्ति हो, तो परमेश्वर फूलकी पंखुरीसेभी संतुष्ट हो जाता है। २७, २८ सब कर्मोंको ईश्वरार्पण करनेका उपदेश। उसीके द्वारा कर्मबंधसे छुटकारा और मोक्ष। २९-३३ परमेश्वर सबको एक-सा है। दुराचारी हो या पापयोनि, स्त्री हो, या वैश्य या शूद्र निःसीम भक्त होनेपर सबको एकही गति मिलती है। ३४ यही मार्ग अंगीकार करनेके लिये अर्जुनको उपदेश। दसवाँ अध्याय – विभूतियोग १-३ यह जान लेनेसे पापका नाश होता है, कि अजन्मा परमेश्वर देवताओं और ऋषियोंसेभी पूर्वका है। ४-६ ईश्वरी विभूति और योग। ईश्वरसेही बुद्धि आदि भावोंकी, सप्तर्षियोंकी और मनुकी, एवं परंपरासे सबकी, उत्पत्ति। ७-११ इसे जाननेवाले भगवद्भक्तोंको ज्ञान-प्राप्ति; परंतु उन्हेंभी बुद्धि-सिद्धि भगवानही देते हैं। १२-१८ अपनी विभूति और योग बतलानेके लिये भगवानसे अर्जुनकी प्रार्थना। १९-४० भगवानकी अनंत विभूतियोंमेंसे मुख्य मुख्य विभूतियोंका वर्णन। ४१, ४२ जो कुछ विभूतिमत्, श्रीमत् और ऊर्जित है, वह सब परमेश्वरी तेज है; परंतु अंशसे है। ग्यारहवाँ अध्याय – विश्वरूप-दर्शनयोग १-४ पूर्व अध्यायमें बतलाये हुए अपने ईश्वरी रूपको दिखलानेके लिये भगवानसे प्रार्थना। ५-८ इस आश्चर्यकारक और दिव्य रूपको देखनेके लिये अर्जुनको दिव्य-दृष्टि-ज्ञान। ९-१४ विश्वरूपका संजयकृत वर्णन। १५-३१ विस्मय और भयसे नम्र होकर अर्जुनकृत विश्वरूप-स्तुति और यह प्रार्थना, कि प्रसन्न होकर बतलाइये, कि “आप कौन हैं?” ३२-३४ पहले यह बतलाकर, कि “मै काल हूँ” फिर अर्जुनको उत्साहजनक ऐसा उपदेश, कि पूर्वसेही इस कालके-द्वारा ग्रसे- हुए वीरोंको तुम निमित्त बनकर मारो। ३५-४६ अर्जुनकृत स्तुति, क्षमा, प्रार्थना और पहलेका सौम्य रूप दिखलानेके लिये विनय। ४७-५१ बिना अनन्य-भक्तिके विश्वरूपका दर्शन मिलना दुर्लभ है। फिर पूर्व स्वरूप-धारण। ५२-५४ बिना भक्तिके विश्वरूपका दर्शन देवताओंकोभी नहीं हो सकता। ५५ अतः भक्तिसे निस्संग और निर्वैर होकर परमेश्वरार्पण-बुद्धिके द्वारा कर्म करनेके विषयमें अर्जुनको सर्वार्थ-सारभूत अंतिम उपदेश। बारहवाँ अध्याय – भक्तियोग १ पिछले अध्यायके अंतिम सारभूत उपदेशपर अर्जुनका प्रश्न – व्यक्तो- पासना श्रेष्ठ है या अव्यक्तोपासना ? २-८ दोनोंमें गति एकही है; परंतु अव्यक्तो-

६०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

पासना क्लेशकारक है; और व्यक्तोपासना सुलभ एवं शीघ्र-फलप्रद है। अतः निष्काम कर्मपूर्वक व्यक्तोपासना करनेके विषयमें उपदेश। ९-१२ भगवानमें चित्तको स्थिर करनेके अभ्यास, ज्ञान-ध्यान इत्यादि उपाय और उनमें कर्मफलत्यागकी श्रेष्ठता। १३-१९ भक्तिमान् पुरुषकी स्थितिका वर्णन और भगवत्प्रियता। २० इस धर्मका आचरण करनेवाले श्रद्धालु भक्त भगवान्को अत्यंत प्रिय हैं। तेरहवाँ अध्याय - क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोग १, २ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञकी व्याख्याएँ। उनका ज्ञानही परमेश्वरका ज्ञान है। ३, ४ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार उपनिषदोंका और ब्रह्मसूत्रोंका है। ५, ६ क्षेत्र-स्वरूप- लक्षण। ७-११ ज्ञानका स्वरूप-लक्षण। तद्विरुद्ध अज्ञान। १२-१७ ज्ञेयके स्वरूपका लक्षण। १८ इस सबको जान लेनेका फल। १९-२१ प्रकृति-पुरुष-विवेक। करने- धरनेवाली प्रकृति है, पुरुष अकर्ता किंतु भोक्ता, द्रष्टा इत्यादि है। २२, २३ पुरुषही देहमें परमात्मा है। इस प्रकृति-पुरुष-ज्ञानसे पुनर्जन्म नष्ट होता है। २४, २५ आत्मज्ञानके मार्ग - ध्यान, सांख्ययोग, कर्मयोग और श्रद्धापूर्वक श्रवणसे भक्ति। २६-२८ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगसे स्थावर-जंगम सृष्टि; उसमें जो अविनाशी है, वही परमेश्वर है। अपने प्रयत्नसे उसकी प्राप्ति। २९, ३० करने-धरनेवाली प्रकृति है; और आत्मा अकर्ता है; सब प्राणिमात्र एकमें हैं; और एकसे सब प्राणिमात्र होते हैं। यह जान लेनेसे ब्रह्म-प्राप्ति। ३१-३३ आत्मा अनादि और निर्गुण है, अतएव यद्यपि वह क्षेत्रका प्रकाशक है, तथापि निर्लेप है। ३४ क्षेत्र- क्षेत्रज्ञके भेदको जान लेनेसे परम सिद्धि। चौदहवाँ अध्याय - गुणत्रयविभागयोग १, २ ज्ञान-विज्ञानान्तर्गत प्राणिवैचित्र्यका गुणभेदसे विचार। वहभी मोक्षप्रद है। ३, ४ प्राणिमात्रका पिता परमेश्वर है; और उसके अधीनस्थ प्रकृति माता है। ५-९ प्राणिमात्रपर सत्त्व, रज और तमके होनेवाले परिणाम। १०-१३ एक एक गुण अलग नहीं रह सकता। किन्ही दोको दबाकर तीसरेकी वृद्धि; और प्रत्येककी वृद्धिके लक्षण। १४-१८ गुण-प्रवृद्धिके अनुसार कर्मके फल और मरनेपर प्राप्त होनेवाली गति। १९, २० त्रिगुणातीत हो जानेसे मोक्ष-प्राप्ति। २१-२५ अर्जुनके प्रश्न करनेपर त्रिगुणातीतके लक्षणका और आचारका वर्णन। एकान्त-भक्तिसे त्रिगुणातीत अवस्थाकी सिद्धि, और फिर सब मोक्षके, धर्मके, एवं सुखके अंतिम स्थान परमेश्वरकी प्राप्ति। पंद्रहवाँ अध्याय - पुरुषोत्तमयोग १, २ अश्वत्थरूपी ब्रह्मवृक्षके वेदोक्त और सांख्योक्त वर्णनका मेल। ३-६ असंगसे इसको काट डालनाही उससे परेके अव्यक्त पदकी प्राप्तिका मार्ग है। अव्यय

विषयानुक्रमणिका ६०७ पदवर्णन । ७-११ जीव और लिंगशरीरका स्वरूप एवं संबंध । ज्ञानीके लिये गोचर है । १२-१५ परमेश्वरकी सर्वव्यापकता । १६-१८ क्षराक्षरलक्षण । उससे परे पुरुषोत्तम । १९,२० इस गुह्य पुरुषोत्तम-ज्ञानसे सर्वज्ञता और कृतकृत्यता । सोलहवाँ अध्याय - दैवासुरसम्पद्विभागयोग १-३ दैवी संपत्तिके छब्बीस गुण । ४ आसुरी संपत्तिके लक्षण । ५ दैवी संपत्ति मोक्षप्रद और आसुरी बंधनकारक है । ६-२० आसुरी लोगोंका विस्तृत वर्णन, उनको जन्म जन्ममें अधोगति मिलती है । २१, २२ नरकके त्रिविध द्वार - काम, क्रोध और लोभ । इनसे बचनेमें कल्याण है । २३, २४ शास्त्रानुसार कार्या- कार्यका निर्णय और आचरण करनेके विषयमें उपदेश । सत्रहवाँ अध्याय - श्रद्धात्रयविभागयोग १-४ अर्जुनके पूछनेपर प्रकृति-स्वभावानुरूप सात्त्विक आदि विविध श्रद्धाका वर्णन । जैसी श्रद्धा वैसा पुरुष । ५, ६ इनसे भिन्न आसुर । ७-१० सात्त्विक, राजस और तामस आहार । ११-१३ विविध यज्ञ । १४-१६ तपके तीन भेद - शारीर, वाचिक और मानस । १७-१९ इनमें सात्त्विक आदि भेदोंसे प्रत्येक विविध है । २०-२२ सात्त्विक आदि विविध दान । २३ ॐ तत्सत् ब्रह्मनिर्देश । २४-२७ इनमें 'ॐ' से आरंभसूचक, 'तत्' से निष्काम और 'सत्' से प्रशस्त कर्मका समावेश होता है । २८ शेष, अर्थात् असत् इहलोक और परलोकमें निष्फल है । अठारहवाँ अध्याय - मोक्ष-संन्यासयोग १, २ अर्जुनके पूछनेपर संन्यास और त्यागकी कर्मयोग-मार्गान्तर्गत व्याख्याएँ । ३-६ कर्मका त्याज्य-अत्याज्यविषयक निर्णय ; यज्ञयाग आदि कर्मोंकोभी अन्यान्य कर्मोंके समान निःसंग-बुद्धिसे करनाही चाहिये । ७-९ कर्मत्यागके तीन भेद- सात्त्विक, राजस और तामस, फलाशा छोड़कर कर्तव्य-कर्म करनाही सात्त्विक त्याग है । १०, ११ कर्मफलत्यागी ही सात्त्विक त्यागी है । क्योंकि कर्म तो किसीसेभी छूटही नहीं सकता । १२ कर्मका त्रिविध फल सात्त्विक त्यागी पुरुषको बंधक नहीं होता । १३-१५ कोईभी कर्म होनेके पाँच कारण हैं, केवल मनुष्यही कारण नहीं है । १६, १७ अतएव यह अहंकार-बुद्धि कि मैं करता हूँ छूट जानेसे कर्म करनेपरभी अलिप्त रहता है । १८, १९ कर्मचोदना और कर्मसंग्रहका सांख्यो- क्त लक्षण और उनके तीन भेद । २०-२२ सात्त्विक आदि गुण-भेदसे ज्ञानके तीन भेद । ' अविभक्तं विभक्तेषु ' यह सात्त्विक ज्ञान है । २३-२५ कर्मकी विविधता । फलाशारहित कर्म सात्त्विक है । २६-२८ कर्ताके तीन भेद । निस्संग कर्ता सात्त्विक है । २९-३२ बुद्धिके तीन भेद । ३३-३५ धृतिके तीन भेद । ३६-३९ सुखके

६०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तीन भेद। आत्मबुद्धिप्रसादज सात्त्विक सुख है। ४० गुणभेदसे सारे जगत्‌के तीन भेद। ४१-४४ गुणभेदसे चातुर्वर्ण्यकी उपपत्ति; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके स्वभावजन्य कर्म। ४५, ४६ चातुर्वर्ण्य-विहित स्वकर्माचरणसेही अंतिम सिद्धि। ४७-४९ परधर्मका आचरण भयावह है, स्वकर्म सदोष होनेपरभी अत्याज्य है, सारे कर्म स्वधर्मके अनुसार, निस्संग-बुद्धिके द्वारा करनेसेही नैष्कर्म्य-सिद्धि मिलती है। ५०-५६ इसका निरूपण कि सारे कर्म करते रहनेभी यह सिद्धि किस प्रकार मिलती है? ५७, ५८ इसी मार्गको स्वीकार करनेके विषयमें अर्जुनको उपदेश। ५९-६३ प्रकृति-धर्मके सामने अहंकारकी एक नहीं चलती। ईश्वरकीही शरणमें जाना चाहिये। अर्जुनको यह उपदेश, कि इस गुह्यको समझकर फिर जो दिलमें आवे, सो कर। ६४-६६ भगवानका यह अंतिम आश्वासन, कि सब धर्म छोड़कर 'मेरी शरणमें आ,' सब पापोंसे 'मैं तुझे मुक्तकर दूंगा।' ६७-६९ कर्मयोग-मार्गकी परंपराको आगे प्रचलित रखनेका श्रेय। ७०, ७१ उसका फलमाहात्म्य। ७२, ७३ कर्तव्यमोह नष्ट होकर अर्जुनकी युद्ध करनेके लिये तैयारी। ७४-७८ धृतराष्ट्रको यह कथा सुना चुकनेपर संजयकृत उपसंहार।

श्रीमद्भगवद्गीता प्रथमोऽध्यायः । धृतराष्ट्र उवाच । धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥ पहला अध्याय । [ भारतीय युद्धके आरंभमें श्रीकृष्णने अर्जुनको जिस गीताका उपदेश किया है, उसका आगे लोगोंमें प्रचार कैसे हुआ; इसकी परंपरा वर्तमान महाभारत ग्रंथमेंही इस प्रकार दी गई है :- युद्धमें आरंभ होनेसे प्रथम व्यासजीने धृतराष्ट्रसे जाकर कहा, कि " यदि तुम्हारी इच्छा युद्ध देखनेकी हो, तो मैं तुम्हें दृष्टि देता हूँ । " इसपर धृतराष्ट्रने कहा, कि ' मैं अपने कुलका क्षय नहीं देखना चाहता । " तब एकही स्थानपर बैठे बैठे, सब बातोंका प्रत्यक्ष ज्ञान हो जानेके लिये संजय नामक सूतको व्यासजीने दिव्य-दृष्टि दे दी । इस संजयके द्वारा युद्धके अविकल वृत्तान्त धृतराष्ट्रको अवगत करा देनेका प्रबंध करके व्यासजी चले गये ( मभा. भीष्म. २ ) । जब आगे युद्धमें भीष्म आहत हुए और उक्त प्रबंधके अनुसार, वह समा- चार सुनानेके लिये पहले संजय धृतराष्ट्रके पास गया, तब भीष्मके बारेमें शोक करते हुए धृतराष्ट्रने संजयको आज्ञा दी, कि युद्धकी सारी बातोंका वर्णन करो । तदनुसार संजयने पहले दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन किया; और फिर धृतराष्ट्रके पूछनेपर गीता बतलाना आरंभ किया है । आगे चलकर यह सब वार्ता व्यासजीने अपने शिष्योंको, बादमें उन शिष्योंमेंसे वैशंपायनने जनमेजयको और अंतमें सौतीने शौनकको सुनाई । महाभारतकी सभी छपी हुई प्रतियोंमें भीष्मपर्वके २५ वें अध्यायसे ४२ वें अध्यायतक यही गीता कही गई है । इस परंपराके अनुसार :- ] धृतराष्ट्रने पूछा - ( १ ) हे संजय ! कुरुक्षेत्रकी पुण्यभूमिमें एकत्रित मेरे और पांडुके युद्धेच्छुक पुत्रोंने क्या किया ? | [ हस्तिनापुरके चहूँ ओरका मैदान कुरुक्षेत्र है । वर्तमान दिल्ली शहर | इसी मैदानपर बसा हुआ है । महाभारतमें यह कथा है, कि कौरव-पांडवोंका गी. र. ३९

६१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संजय उवाच । § § दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥ पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ ३ ॥ अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ ४ ॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥ ५ ॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥ । पूर्वज कुरु नामका राजा इस मैदानको हलसे बड़े कष्टपूर्वक जोता करता था, । अतएव उसको क्षेत्र ( या खेत ) कहते हैं। जब इंद्रने कुरुको यह वरदान दिया, । कि इस क्षेत्रमें जो लोग तप करते करते या युद्धमें मर जावेंगे, उन्हें स्वर्गकी । प्राप्ति होगी; तब उसने इस क्षेत्रमें हल चलाना छोड़ दिया ( मभा. शल्य. । ५३ ) । इंद्रके इस वरदानके कारणही यह क्षेत्र धर्मक्षेत्र या पुण्यक्षेत्र कहलाने । लगा । इस मैदानके विषयमें यह कथा प्रचलित है, कि यहींपर परशुरामने । एकीस बार सारी पृथ्वीको निःक्षत्रिय करके पितृतर्पण किया था; और अर्वाचीन । कालमेंभी इसी क्षेत्रपर बड़ी बड़ी लड़ाइयाँ हो चुकी हैं । ] संजयने कहा - ( २ ) उस समय पांडवोंकी सेनाको व्यूह रचकर ( खड़ी ) देख, राजा दुर्योधन ( द्रोण ) आचार्यके पास गया; और उनसे कहा लगा, कि - । [ महाभारत ( मभा. भी. १९. ४-७; मनु. ७. १९१ ) के उन अध्यायोंमें, । कि जो गीतासे पहले लिखे गये हैं, यह वर्णन है, कि जब कौरवोंकी सेनाका । भीष्मद्वारा रचा हुआ व्यूह पांडवोंने देखा; और जब उनको अपनी सेना । कौरवोंकी सेनासे कम दीख पड़ी, तब उन्होंने युद्धविद्याके अनुसार वज्र नामक । व्यूह रचकर अपनी सेना खड़ी की । युद्धमें प्रतिदिन ये व्यूह बदला करते थे । ] ( ३ ) हे आचार्य ! पांडुपुत्रोंकी इस बड़ी सेनाको देखिये, कि जिसकी व्यूहरचना तुम्हारे बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्रने ( धृष्टद्युम्न ) की है। ( ४ ) इसमें शूर, महाधनुर्धर, और युद्धमें भीम तथा अर्जुनसरीखे युयुधान ( सात्यकि ) , विराट और महारथी द्रुपद, ( ५ ) धृष्टकेतु, चेकितान और वीर्यवान् काशिराज, पुरुजित् कुंतिभोज, और नरश्रेष्ठ शैब्य, ( ६ ) इसी प्रकार पराक्रमी युधामन्यु और वीर्यशाली उत्तमौजा

पहला अध्याय ६११ अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ एवं सुभद्राका पुत्र (अभिमन्यु) तथा द्रौपदीके (पांच) पुत्र-ये सभी महारथी हैं। | [ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओके साथ अकेले युद्ध करनेवालेको महारथी | कहते हैं। दोनों ओरकी सेनाओंमें जो रथी, महारथी अथवा अतिरथी थे, उनका | वर्णन उद्योगपर्वके (१६४ से १७१ तक) आठ अध्यायोंमें किया गया है। वहाँ | बतला दिया है, कि धृष्टकेतु शिशुपालका बेटा था। इसी प्रकार पुरुजित् | कुंतिभोज, ये दो भिन्न भिन्न पुरुषोंके नाम नहीं है। जिस कुंतिभोज राजाको | कुंती गोद दी गई थी, पुरुजित् उसका औरस पुत्र था, और कुंतिभोज उसके | कुलका नाम है; एवं यह वर्णन पाया जाता है, कि वह धर्म, भीष्म और | अर्जुनका मामा था। ( मभा. उ. १७१. २ ) । युधामन्यु और उत्तमौजा, दोनों | पांचाल्य थे; और चेकितान एक यादव था। युधामन्यु और उत्तमौजा, युद्धमें, | दोनों अर्जुनके चक्र-रक्षक थे। शैव्य शिबी देशका राजा था। ] ( ७ ) हे द्विजश्रेष्ठ ! अब हमारी ओर, सेनाके जो मुख्य मुख्य नायक हैं, उनके नामभी मैं आपको सुनाता हूँ; ध्यान देकर सुनिये। ( ८ ) आप और भीष्म, कर्ण और रणजित् कृप, अश्वत्थामा और ( दुर्योधनके सौ भाइयोंमेंसे एक ) विकर्ण, तथा सोमदत्तका पुत्र ( भूरिश्रवा ), ( ९ ) एवं इनके सिवा बहुतेरे अन्यान्य शूर मेरे लिये प्राण देनेको तैयार हैं; और सभी नाना प्रकारके शस्त्र चलानेमें निपुण तथा युद्धमें प्रवीण हैं। ( १० ) इस प्रकार हमारी यह सेना - जिसकी रक्षा स्वयं भीष्म कर रहे हैं - अपर्याप्त अर्थात् अपरिमित या अमर्यादित है; किंतु उनकी ( पांडवों ) वह सेना - जिसकी रक्षा भीम कर रहा है - पर्याप्त अर्थात् परिमित या मर्यादित है। | [ इस श्लोकमें 'पर्याप्त' और 'अपर्याप्त' शब्दोंके अर्थके विषयमें मतभेद | है। 'पर्याप्त'का सामान्य अर्थ 'बस' या 'काफ़ी' होता है, इसलिये कुछ लोग यह | अर्थ बतलाते हैं, कि "पांडवोंकी सेना काफ़ी है; और हमारी काफ़ी नहीं है।" | परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। पहले उद्योगपर्वमें, धृतराष्ट्रसे अपनी सेनाका वर्णन | करते समय उक्त मुख्य मुख्य सेनापतियोंके नाम बतलाकर दुर्योधनने कहा है'

६१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ कि “मेरी सेना बड़ी और गुणवान् है, इसलिये जीत मेरीही होगी” ( उ. ५४. ६०-७० ) । इसी प्रकार आगे चलकर भीष्मपर्वमें, जिस समय द्रोणाचार्यके पास दुर्योधन फिरसे सेनाका वर्णन कर रहा था, उस समयभी, गीताके उपर्युक्त श्लोकोंके समानही श्लोक उसने अपने मुंहसे ज्यों-के-त्यों कहे है ( भीष्म ५१. ४-६ ) । और तीसरी बात यह है, कि सब सैनिकोंको प्रोत्साहित करनेके लियेही हर्षपूर्वक यह वर्णन किया गया है । इन सब बातोंका विचार करनेसे इस स्थानपर ‘अपर्याप्त’ शब्दका ‘अमर्यादित, अपार या अगणित’ के सिवा और कोई अर्थही हो नहीं सकता । ‘पर्याप्त’ शब्दका धात्वर्थ ‘चहुँ ओर (परि-)वेष्टन करने- योग्य’ ( आप् = प्राप्तना ) है । परंतु ‘अमुक कामके लिये पर्याप्त’ या ‘अमुक मनुष्यके लिये पर्याप्त’ इस प्रकार पर्याप्त शब्दके पीछे चतुर्थी अर्थके दूसरे शब्द जोड़कर प्रयोग करनेसे ‘पर्याप्त’ शब्दका यह अर्थ हो जाता है – ‘उस कामके लिये या मनुष्यके लिये भरपूर अथवा समर्थ ।’ और यदि ‘पर्याप्त’के पीछे कोई दूसरा शब्द न रखा जावे, तो केवल ‘पर्याप्त’ शब्दका अर्थ होता है ‘भरपूर, परिमित या जिसकी गिनती की जा सकती है।’ प्रस्तुत श्लोकमें ‘पर्याप्त’ शब्दके पीछे दूसरा शब्द नहीं है, इसलिये यहाँपर उसका उपर्युक्त दूसरा अर्थ (परिमित या मर्यादित) विवक्षित है; और महाभारतके अतिरिक्त अन्यत्रभी ऐसे प्रयोग किये जानेके उदाहरण ब्रह्मानंदगिरिकृत टीकामें दिये गये है। कुछ लोगोंने यह उपपत्ति बतलाई है, कि दुर्योधन भयसे अपनी सेनाको ‘अपर्याप्त’ अर्थात् ‘अधूरा’ कहता है; परंतु यह ठीक नहीं है। क्योंकि, दुर्योधनके डर जानेका वर्णन कहींभी नहीं मिलता, किंतु इसके विपरीत यह वर्णन पाया जाता है, कि दुर्योधनकी बड़ी भारी सेनाको देखकर पांडवोंने वज्र नामक व्यूह रचा; और कौरवोंकी अपार सेनाको देख युधिष्ठिरको बहुत खेद हुआ था (महा. भीष्म. १९. ५; २१. १) । पांडवोंकी सेनाका सेनापति धृष्टद्युम्न था, परंतु “भीम रक्षा कर रहा है” कहनेका कारण यह है, कि पहले दिन पांडवोंने वज्र नामका जो व्यूह रचाथा, उसकी रक्षाके लिये इस व्यूहके अग्रभागमे भीमही नियुक्त किया गया था; अतएव सेनारक्षककी दृष्टिसे दुर्योधनको वही सामने दिखाई दे रहा था ( महा. भीष्म. १९. ४-११, ३३, ३४) ; और इसी अर्थमें इन दोनों सेनाओके विषयमें महाभारतके गीताके पहलेके अध्यायोंमें ‘भीमनेत्र’ और ‘भीष्मनेत्र’ कहा गया है (महा. भी. २०.१)।] ( ११ ) (तो अब) नियुक्तिके अनुसार सब अयनोंमें अर्थात् सेनाके भिन्न भिन्न प्रवेशद्वारोंमे रहकर तुम सबको मिल करके भीष्मकीही सभी ओरसे रक्षा करनी चाहिये ।