सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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दशावताराः २५
| केशं नैवः केशवः ॥ १६९ ॥ तिर्यक्कण्ठविलोलमौलि- | विकसन. स्तैब्धाकर्षणदृष्टिहर्षणमहामन्त्रः कुरङ्गीदृशाम् । |
|---|---|
| तरलोत्तंसस्य वशोश्चरद्गीतस्थानकृतावधानललनालक्षैर्न | हृप्यद्दानवदूयमानदिविषद्दुर्वारदुःखापदा भ्रश कसरिपोर्य्यपो- |
| सलक्षिता । ^२समुग्ध मधुसूदनस्य मधुरे राधामुखेन्दौ | हयतु वोऽश्रेयांसि वशीरखः ॥ १७९ ॥ मौलौ केकिशिखण्डिनी |
| ^३मृदुस्पन्द पल्लविताश्चिरं ददतु वः क्षेमं कटाक्षोर्मयः | मधुरिमाधाराधरे वशिनी पीनासे वनमालिनी हृदि लसत्का- |
| ॥ १७० ॥ वृष्टिव्याकुलगोकुलार्तनरसादुद्धृत्य गोवर्धनं | रुण्यकल्लोलिनी । श्रोण्या पीतदुकूलिनी चरणयोर्व्यत्यस्तविन्यासिनी |
| बिभ्रद्बह्वलवल्लभाभिरधिकानन्दाच्चिरं चुम्बितः । कंदर्पेण | लीला काचन मोहिनी विजयते बृन्दावनत्रासिनी |
| तदर्पिताधरतटीमन्दूरमुद्राङ्कितो बाहुर्गोपनतोन्नतो मुवता | ॥ १८० ॥ मालाबर्हमनोज्ञकुन्तलभरा वन्यप्रसूनोक्षिता शैले- |
| श्रेयांसि कसद्विषः ॥ १७१ ॥ राधासुग्धमुखारविन्दमधुपश्चै- | यागुरसकचित्रितलका शश्वन्मनोहारिणीम् । लीलावेणुरवा- |
| लोक्यमौलिक्थलीनेपथ्योचितनीलरत्नमवनीभारावतारक्षमः । | मृतैकरसिका लावण्यलक्ष्मीमयी बाला वालतमालनीलवपुष |
| स्वच्छन्दव्रजसुन्दरीजनमनस्तोषप्रदोध्पन्निरं कमध्वसनवूमकेतु- | वन्दे परा देवताम् ॥ १८१ ॥ असालम्बितवामकुण्डल- |
| रवतु त्वा देवकीनन्दनः ॥ १७२ ॥ किं विश्राम्यसि कृष्ण | धर मन्दोन्नतश्रूलत किञ्चित्कुञ्चितकोमलाधरपुट साचिप्र- |
| भोगिभवने भौण्डीरभूमिरुहि भ्रातर्यासि न दृष्टिगोचरमितः | सारीक्षणम् । आलोलाङ्गुलिपल्लवैर्मुरलिकामारपूरयन्त मुदा |
| सानन्दनन्दास्पदम् । राधाया वचनं तदध्वगमुखान्छन्दान्तिके | मूले कल्पतरोस्त्रिभङ्गललित ध्याये जगन्मोहनम् ॥ १८२ ॥ |
| ^११गोपतो गोविन्दस्य जयन्ति सायमतिथिप्राशस्त्यगर्भा | कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रे |
| गिरः ॥ १७३ ॥ सान्द्रानन्दपुरदरादिदिविषद्बृन्दैरमन्दादरा- | नवमौक्तिक करवले वेणु करे कङ्कणम् । सर्वाङ्गे |
| दानम्रैर्मुुकुटेन्द्रनीलमणिभिः ^१२सदर्शितॆन्दीवरम्। स्वच्छन्द | हरिचन्दन सुविमल कण्ठे च मुक्तावली बिभ्र- |
| मकरन्दसुन्दरगलन्मन्दाकिनीमेदुरं श्रीगोविन्दपदारविन्द- | त्स्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः ॥ १८३ ॥ कालि- |
| मधुमस्कै^१३न्दाय वन्दामहे ॥ १७४ ॥ प्रातर्नीलैर्निचोल- | न्दीपुलिनोदरेषु मुसली यावद्गतः क्रीडितु तावत्कैर्भुरिकापयः |
| मच्युतमुरःसवीतपीतांशुकं राधायाश्चकितं विलोक्य हसति | पिव हरे वर्धिष्यते ते शिखा । इत्थ वालतया प्रतारणपराः |
| स्वैरं सखीमण्डले । व्रीडाचञ्चलमञ्चल नयनयोराधाय राधा- | श्रुत्वा यशोदागिर. पायाद्वः स्वशिखा स्पृशन्प्रमुदित. क्षीरे- |
| नने स्वादुस्मेरमुखोऽयमस्तु जगदानन्दाय नन्दात्मजः | ऽर्धपीते हरिः ॥ १८४ ॥ आनन्देन यशोदया समदन |
| ॥ १७५ ॥ प्रीति वस्तुतुता हरिः कुवल्यापीडेन सार्थं रणे | गोपाङ्गनाभिश्चिर साशङ्क बलविद्विषा सकुसुम सिद्धैः |
| राधापीनपयोधरखरणकृत्कुम्मेन समेदवान् । ^१७पत्रे बिभ्यति | पृथिव्याकुलम् । सेर्ये गोपकुमारकैः सकरुण पौरैः सुरैः |
| मीलति क्षणमपि क्षिप्र तदालोकनाद्यामोहेन जित जित | सस्मित यो दृष्टः स पुनातु वो मध्रिपु प्रोत्क्षिप्तगोवर्धन. |
| जितमभूद्यौलोलकोलाहलः ॥ १७६ ॥ त्वामप्राप्य मयि स्वय- | ॥ १८५ ॥ राधामोहनमन्दिर जिगमिषोश्चन्द्रावलीमन्दि- |
| वरपरा क्षीरोदतीरोदरे शङ्के सुन्दरि कालकूटमपिबन्मूढो | राद्राधे क्षेममिति प्रियस्य वचन श्रुत्वाह चन्द्रावली । क्षेम |
| मृडानीपतिः । इत्थं पूर्वकथाभिरन्यमनसो विक्षिप्य वासोञ्चल | कस तत. प्रिय. प्रकुपित. कंस. क्व दृष्टस्त्वया राधा क्वेति |
| राधायाः स्तनकोरकोप रिसन्नेत्रो हरिः पातु वः ॥ १७७ ॥ | तयो. प्रसन्नमनसोर्हासोद्गमः पातु वः ॥ १८६ ॥ दृष्टः कापि |
| वामासस्थलचुम्बिकुण्डलरुचा जातोत्तरीयच्छवि वशीगीति- | स केगवो व्रजवधूमादाय काचिद्गत. सर्व्व एव हि वञ्चिताः |
| भवत्रिभङ्गवपुष भ्रूलासलीलापरम् । किचित्सस्तशिखण्ड- | खलु वय सोऽन्वेषणीयो यदि । द्वे द्वे गच्छत इत्युदीर्घ |
| शेखरमतिस्निग्धा लिनीलालकं राधादिप्रमदाशतावृतमह वन्दे | सहसा राधा गृहीत्वा करे गोपीवेषधरो निकुञ्जभवन |
| किशोराकृतिम् ॥ १७८ ॥ अन्तर्मोहनमौलिरुँदैनवलन्मन्दार- | प्राप्तो हरिः पातु वः ॥ १८७ ॥ कि युक्त बत मामनन्यम- |
| नस वक्ष.स्थलस्थायिनी भक्तामप्यवधूय कर्तुमधुना कान्तास- | |
| हस्रं तव । इत्युक्त्वा फणभृत्फणामणिगता स्वामेब मत्वा तनु | |
| निद्रानिच्छेदकर हरेरवतु वो लक्ष्म्या विलक्षस्मितम् ॥ १८८ ॥ | |
| स्वप्रासादितदर्शनाम नुनयन्त्राणेश्वरीमादरादसेऽस्मिन्पतिवैरपा- | |
| ङ्कवलितैर्यह्नोथितोऽप्यश्रुभिः । प्रत्याय्यस्त्वमतो मया ननु हरे | |
| कोऽय क्रमन्त्यत्ययः पातु त्वा व्रजयोषितित्यभिहित लज्जाकर |
| १ तरुण २ अव्यक्तम् ३ किञ्चिश्चलन यथा स्यात्तथा ४ रक्ष- | १ अनिच्छोरित्यर्थे २ गौरीतीर्थे, धत्तूरजलं वा |
| णम् ५ अनुराग ६ नीलत्वादधरपानकर्तृत्वाच्च ७ अलकार | |
| ८ रात्रिमुखे हि नार्थस्तुष्वन्तीति भाव ९ भोगी सर्प तस्य भवने, | |
| पक्षे,-भोगिनः शृङ्गारिणो विलासगृहे १० भाण्डीरनाम्नि वटवृक्ष | |
| ११ सगोपन कुर्वत १२ सदर्शित इन्दीवरस्य नीलोत्पलस्य अम्रो | |
| यत्र १३ नाशाय १४ वस्त्रम् १५ परिधानाकृतम् १६ कटाक्ष | |
| १७ वाहने १८ मृते सति १९ चञ्चल २० साधु साध्विति | |
| शिर कम्पनम् २१ गुम्फितम् | |
| ४ सु. र भा |