सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| १० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | |
|---|---|---|
| आः पात्री स्याम २८०।८७ | आगच्छदुत्सवो (वृ श ८५) १६९।७१० | आत्माधीनशरीराणा (शा.प.६१५) ७५।७ |
| आः सर्वत २४८।९३ | आगच्छन्सूचितो (शा प ३५२७) ३०८।२ | आत्मानमम्भो (चातका.५) २२५।१५७ |
| आकण्ठदृष्टशिरसा(सूक्ति १०४ ६ १४०।६ | आगच्छागच्छ सजं १२३।४१ | आत्मान प्रथ (का नी १ २३) १४५।११८ |
| आकर्णपलित (शा प.३९८६) ३६०।९ | आगतं (का नी १० ३१) ३८४।२९२ | आत्मार्थं जीवलोके ७४।६ |
| आकर्ण्य सरोजा (कुव १५) ३१२।१३ | आगता पाण्डवा (शा.प ५३४) १९३।१ | आत्मैव तात (नैषध.७ ६५) २६१।१३० |
| आकर्णितानि रसि ३४३।१०१ | आगतानगण (शिशु १० २०) ३१५।२३ | आत्मोदय प (शिशु २ ३०) १४६।१८२ |
| आकर्ण्य गर्जि (शा.प सा ६०) २३५।१५४ | आगत्य प्रणिपात (सु २०८३) ३११।१७ | आदरेण यथा ३७५।२३३ |
| आकर्ण्य भूपाल १३५।११ | आगत्य सप्रति (का प्र ५ १२५) ३२७।७ | आदर्शाय शशा ११६।५९ |
| आकर्ण्य स्मर (शा.प.३८६५) ३४१।६० | आगमरूपविचारिण्यधि ४३।२ | आदातु सकृदीक्षिते (कुव ४२) २७६।५४ |
| आकर्ण्यङ्घ्रिफल २४१।१२३ | आगमिष्यन्ति ते भा (सु.२६६३) ७५।३ | आदानपानलेपै. कश्चि २५१।२३ |
| आकर्षैश्चिव गा (सु २४१९) २०७।१२ | आगुञ्जद्भिरिकुज (उत्तर ५ ६) १३१।१२० | आदानस्य प्रदा (हि ३.०५) १६१।३५४ |
| आकल्पं सुरजिन्मुखे १५।३४ | आग्नेयास्त्रप्रवीणप्र ११६।६९ | आदाय चापम (का.प्र.९ ३८३) ४।२४ |
| आकस्मिकस्मित ३५९।८१ | आघूर्णितं पक्ष्म (नैषध.७.२०) २५९।८२ | आदाय प्रतिपक्ष १०९।२२८ |
| आकार. कम (शा प ८१३) २२२।३२ | आघ्रातं कमलं प्रिये २७३।२ | आदाय बकुलग (सा द १०.३) ३२५।६ |
| आकार कारणं (वृ श ३८) १६ ८।६८८ | आघ्रातं परिलीढ (कुव १३५) २१७।५८ | आदाय मासमखि (सु.९८१) ३६२।२२ |
| आकारमात्रविज्ञानं (सु ५११) ७०।५ | आघ्रायाघ्राय ग (सु २४२२) २०७।१६ | आदाय वारि (औचित्य.२०) २,१६।१७ |
| प्रकारेण शशी (सु.२३८६) ३५३।५३ | आचक्ष्महे तव (शा प १०६६) २१५।६ | आदायादाय सु ११८।१०२ |
| प्रकारेणैव चतुरा १५८।२३३ | आचरति दुर्ज (सा.द.७ २७) ५८।१६५ | आदायामृतपूर्णे ३०२।१११ |
| प्रकारैरिति (हि २ ५०) १४७।२२६ | आचान्तकान्तिरु १६८।६६६ | आदावञ्जनपु (का.प्र.७.२००) २९१।९३ |
| आकाश प्रसर १९८।१९३ | आचुम्ब्य बिम्बाधर ३४।७५ | आदावेव गजेन्द्र १२७।१९ |
| आकाशमुत्पततु (भर्तृ.सं.११७) ९२।७३ | आच्छन्ने क्षितितेज ३४२।६६ | आदिकवी चतुरास्यौ ३६।४८ |
| आकाशवापीसित (शा ३६२८) २९९।१३ | आच्छादयसि किं मुग्धे २२८।३ | आदित्यचन्द्रा(भा १ ९८ ११) १७४।८८६ |
| आकाशात्पतितं २६०।१२१ | आजन्मकल्पतरु २२३।८४ | आदित्यस्य गताग (सु ३३२७) ३६९।८० |
| प्रकाशे नटनं ३१।७९ | आजन्मब्रह्मचारी (हनु १ ३२) ३६१।४८ | आदित्याः किं दर्शैते (सु ५३) २०।५९ |
| प्राकिंचन्यादतिपरि ९८।५ | आजन्मसिद्धं कौटि ५४।२१ | आदिमध्यानिधनेषु (सु २५७) ४९।१५९ |
| प्राकृष्य पाणि (का.प्र.४.३७) ३६४।४३ | आजन्मस्थितयो(शा.प.११२२) २१९।११ | आदिमध्यान्तरहित १४।२ |
| पाकुलश्वलपत (किरात ९ ८) २९४।२७ | आजन्मानुगतेऽप्य ६४।६ | आदीर्घेण (भर्तृ १ ८६) ३८४।२८० |
| पाकृष्टे कवचोद १२०।१४३ | आजौ त्वदाजिरा १२६।२७ | आहतकुपितभवानी ४।२६ |
| पाकृष्टे युधि (हनु.१४ ३५) १२१।१५९ | आज्ञा कीर्ति (भर्तृ २.४०) १५२।३९४ | आहता नख (किरात ९ ४९) ३१६।१३ |
| पाक्रम्याजेरग्रिमस्क १२९।६० | आज्ञाभङ्गकरा (हि.२.१०७) १४७।२०६ | आहृष्टप्रस्रवत्रिष्थ (अमर ७६) ३५९।८६ |
| पाक्रम्यैकाम (शिशु.१८.५१) १३०।८४ | आज्ञाभङ्गो नरे (हि.२.६०) १५८।२४९ | आदौ गृहीतपाणि. १८६।८ |
| पाक्रान्तपूर्वा रम १२९।५० | आज्ञामात्रफ (विक्रम.१३३) १५७।१९६ | आदौ धर्मे प्रमाणं विवि ४३।५ |
| पाक्रान्तं मरणे (भर्तृ.३.३३) ३७२।१८३ | आतन्वद्भि (शिशु १८.७४) १३०।१०३ | आदौ न वा (पञ्च.१.२७६) १७६।९५० |
| पाक्रान्तासु वसुध ९९।१९ | आतपे धृतिमत्ता (किरात.९ ३०) २९६।३ | आदौ (पञ्च १ १७७) ३८४।२८१ |
| पाक्रान्ते शैश २६७।३२३ | आताम्रतामपनया (रत्ना ३ १४)३०६।२४ | आदौ प्रेम कषायिता १२।२७ |
| पाक्रोशितोऽपि सु ५०।२०५ | आताम्राभा (शिशु १८ ४२) १३०।७९ | आदौ लज्जयति कृतं (सु ३९१) ५८।१६८ |
| पाक्षिपन्सर (सा.द.६.१७५) ३१२।१९ | आताम्रे नयने स्फुर २३१।४३ | आदौ वेश्मा पुनदर्दी ३६४।१० |
| पाक्षिपति कर्णम ३१२।२५ | आत्ते सीम (का.प्र १० ५७०) १३३।४३ | आदौ हालाहलहुत (कुव.९२) २८४।२८ |
| पाक्षेपवचन तस्स १४२।१३ | आत्मभाग्य (मृच्छ. ३ २७) ३८५।३३० | आद्य कोपस्तदनु २८९।५३ |
| पाखुः कैलासशैलं (सु २५७२) ६२।२८३ | आत्मनश्च परेषां (हि.३.८) १४७।२२३ | आद्येन हीना जल १८५।३६ |
| पाख्याता नम्रव ३१।३४ | आत्मनो मुखदोषेण (पञ्च ४ ४८) ८६।१ | आधाय कोमलक २७३।१२ |
| पाख्याते हसित पिता १६।१० | आत्मन्यस्य (नैषध १२.८३) ११०।२४४ | आधाराय धरा (सु.५३७) ७१।४१ |
| पाख्यायिकासु (शा.प.४०३६) ३६४।२२ | आत्मबुद्धिः सुखा १५५।९४ | आधिव्याधिश (भर्तृ ३ ३४) २८७।१८४ |
| पागच्छतामपूर्णा २१।९१ |