सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः । ३१
| जीयादम्बुवितनयावर(कुव १२१) १४।१३ | झ | तद्वितथमवा (शिशु ११.३३) ३०९।२ |
| जीयासु शकुलाकृते (शाप ८१) १७।७ | झगिति जग (प्र राघव १ ११) ११९।१२५ | तदाखण्डलाशा २५१।८० |
| जीर्णमन्त्रं प्रशं (मा ५ १०५०) १६२।८१० | झञ्झानिलोऽपि ३२५।१३ | तदा तदङ्गस्य (शाप ३३७९) २७०।२९ |
| जीर्णा तरि सरि २८६।४१ | झग्झर्णितकङ्कण १३१।११३ | तदात्वप्रोन्मीलन्म २५५।३२ |
| जीर्णेऽप्युत्कटकालकूट (हनु ९ ३६) ६।७८ | ट | तदात्वज्ञाताना (शा प.३८३४) ३३६।२२ |
| जीर्णोऽपि क्रमही २२९।६ | टिड्डाण्डद्वयसङ्क्रुद्धोऽसि ७२।१ | तदा मुग्धं वक्रं २७९।७६ |
| जीवञ्जीवयति हि यो ७०।२५ | ढ | तदा रम्या (किरात.११ २८) १६०।३७१ |
| जीवति (शाप ३७५५) ३६०।१९ | ढक्कामाहत्य मद ३५१।२४ | तदीयजघनाभोग २६८।३८४ |
| जीवनग्रहणे नम्रा (कुव २५) ५५।५१ | त | तदीयत्रिवलीमार्ग २६७।३३० |
| जीवन्त मृत (वृचा १३ ९) ३९२।६६७ | त वन्दे पद्मद्मद्मान (शाप ८५) १६।१ | तदेवाजिह्माक्ष (शाप ३५३८) ३१०।१५ |
| जीवन्तोऽपि (पच १२८९) १५५।१२३ | त एव पदविन्यासास्ता २०।६ | तदेवास्य पर मित्र यत्र ८८।९ |
| जीवन्त्यर्थक्षये ६६।३१ | त एवामी वाणान्तदपि ०३।९३ | तदोजसस्तद्यशस (नैषध १.१४) १३९।४ |
| जीवन्नेव (शाप ३१६७) ३६०।१४ | तक्षकस्य विषं (वानी १७८) ५४।३८ | तद्वृह यत्र वमति १६६।५७४ |
| जीवन्नपि न तत्कर्तुं ५६।११० | तटमुपगतं पद्मे ३४८।१९९ | तद्दिव्यमव्यय वाम ३।३ |
| जीवाकृतिं स चक्रे १३९।१२४ | तटस्थै ख्यापिता (वृश ६२) १६८।६९६ | तद्भोजन (वृ चा १५८) ३८७।३८६ |
| जीवामीति (शाप ३४४२) २८७।७ | तटिनि चिराय विचा २१८।१ | तद्गेदोऽन्तरक्षत २९५।६५ |
| जीवितं तदपि १७१।८१० | तडिन्मालालोलं (शातिश ६२) २६८।८७ | तद्व प्रमाष्टुं विपद प्र ११।१४ |
| जीवित इव कण्ठगते ४।२९ | तल्लेखेखा नेय (प्रराघव १३५) २७३।१६ | तद्वक्ता सदसि ब्रवीतु ८६।१५ |
| जीवेति प्रब्रुव (पच १५४) १४८।२६१ | तत कुमुद (भा द्रोण ८४०८) २९९।१ | तद्वक्त्र नेत्रपद्मं २६९।४२१ |
| जीवेन तुलितं प्रेम २७५।२ | तत कोकवधू (शाप ३७३३) ३२७।१ | तद्वक्तं यदि(बालरामा २ १७८) २७१।५१ |
| जुम्भाबर्जरडिम्ब (मालती ९ १६) १४०।४ | तत परामर्शविरुद्ध ३६५।२ | तद्वकाभिमुख (अमरु ११) ३०९।१२ |
| जुम्भा निष्ठीवन १५०।३२९ | ततश्चामिज्ञाय (अमरू ५२) ३५७।५४ | तद्विच्छेदकृशस्य २८२।१४२ |
| जुम्भारम्भप्रवित (वेणी २ ८) ३२४।४४ | ततोऽरुणपरि (वाल्मीकि) ३२३।१ | तद्वियोगसमुत्थेन २७७।७ |
| जुम्भाविस्तृतवक्त्रपङ्कज १७।१० | तत्कार्क त्वयि २२८।२०८ | तनुता तनुता नीता २०५।३ |
| जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण २।२५ | तत्कालारभटीविजृम्भण ६।७३ | तनुत्यजा वर्मभृ (रघु ७ ४८) १२८।३१ |
| ज्ञातं ज्ञाति (शाप ३६१६) ३६३।५४ | तर्किं कामपि (गीत ७ १४ १) ३५८।७५ | तनुत्राण तनुत्राण (दश ४ २८) १२७।१ |
| ज्ञाता मैत्री सहज ३५३।४० | तर्किं काव्यमनल्पपीत ३२।४ | तनुह्हाणि (शिशु ६.४५) ३४४।३३ |
| ज्ञातिभिर्विन्ध्यते (गुणारत्नावली १२) २९।५ | तर्किं स्मरसि न २२५।१२६ | तनुग्ना इव ककुभ २९७।४ |
| ज्ञातु वपु परि ३७९।८५ | तत्कुचौ चरत २९४।२६१ | तनुस्पर्शादस्या २५४।३८ |
| ज्ञानं सतां (भर्तृ ३८३) ३८६।३८५ | तत्कृत यन्न (शाप १२४९) १२२।१७८ | तनोतु ते यस्य फणी १९६।९ |
| ज्ञानविद्याविहीनस्य ३९।१२ | तत्तद्दिग्जैत्रयात्रोद्धुर १२६।२० | तन्त्रावाप (शिशु २ ८८) १४७।११० |
| ज्ञानाब्धिश्चिरचण ४२।४ | तत्तद्ददत्यपि (शाप ३५३६) ३५७।४७ | तन्त्रातुन्दिलशोण ३२२।३० |
| ज्याकृष्टिबद्वखटका (अमरु १) ११।१९ | तत्तस्या कमनीय २५६।५३ | तन्नास्ति (शाप ३६९४) ३२०।१२ |
| ज्याघात का(प राघव ३ १०) ११४।२७ | तत्तादृक्तृणपुलकोप १४।१८ | तन्नितम्बस्य (शाप ३३५२) २६८।३७१ |
| ज्यायासम (मा १३ २६१०, १६०।३३९ | तत्तेजस्तरपेर्निदाघ २७१।१४९ | तन्मङ्गलं ३८५।३१५ |
| ज्योति शास्त्रमहोदधौ ४४।६ | तत्त्वं किमपि (रसगङ्गाधर) ३२।१६ | तन्मूलं गुरुताया (शाप ३२०) ७५।१३ |
| ज्योतिस्तमोहरमलोचन ३।१० | तत्र मित्र न (हि १ १०६) १६७।६३१ | तन्वङ्गया (शाप ३३४०) २६४।२४८ |
| ज्योत्स्नाचय पय (साद ७८) २९९।७ | तत्पादनखरखाना २६९।४२० | तन्वङ्गया गुरु (अमरू.९६) २७६।५० |
| ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणध (कुव ५४) २९६।६ | तथा न पूर्वं (किरात ८ ४१) ३३८।८४ | तन्वन्ती तिमिरद्युति ११६।६१ |
| ज्योत्स्ना (काप्र १०४७२) २९१।९४ | तथा पौरस्त्याया ३०१।८२ | तन्वि त्वद्वदन(प्र राघव ७ ६५) ३१३।७८ |
| ज्योत्स्नी श्यामलि २८०।९९ | तयारिभिर्न व्यथते ५९।२२२ | तन्वी चारुपयोधरा १८६।१४ |
| ज्योत्स्नेव (काप्र १०४११) २५१।१८४ | तथ्य पथ्य सहेतु ८५।१७ | तन्वीमुज्झित (शाप १२७२) १३२।३० |
| ज्वलति चलिते १७०।७४८ | तदङ्गमपि नाम २८०।८८ | तन्वी शरत्त्रिपथ (अमरु १३५) २७१।३८ |
| ज्वलतु (मालती २२) २८४।२४ | तदपकृत विधि ४८।१९६ | तन्वी श्यामा २७१।४९ |
| ज्वलितं न (किरात २२०) ८०।३२ | तन्वी सा यदि २८०।९६ |