सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ३९ | |
|---|---|---|
| धन्या केयं स्थिता (मुद्रा १ १) ८।१०५ | धान्याना (हि ३ ५५) १४८।२३५ | धैर्यमाधाय लज्जा ३०४।२ |
| धन्याना गिरि (भर्तृ ३ १५) ३७४।२२० | धारयित्वा त्वया(भोज २३४) १०२।४६ | धैर्यमुलबण (शिशु १० ६८) ३१८।११ |
| धन्या सा गृह २८०।९४ | धाराधरस्त्वद (भोज २२५) १२५।७ | धैर्यलावण्य १०३।५४ |
| धन्यासि या (काव्यप्र ४ १७) ३२८।१० | धारावीश (भोज २०२) ११७।८९ | ध्माता भालत २११।४३ |
| धन्यास्ता (शा प ३७४८) ३२८।२० | धाराधौतं (शा प ३८८१) ३४२।७९ | ध्माता भालत २९५।६७ |
| धन्यास्ते कवयो ३४।५८ | धारेश त्वत्प्रतापेन(भोज १७३) ११०।८० | ध्यानव्याज (शा.प १३१) २६।२०५ |
| धन्यास्ते ये (गरुड पू अ ११५) ६६।२९ | धार्मिक (काम नी १ ११) १४२।३ | ध्यानशस्त्र १६०।३३० |
| धन्योऽय मणि २१७।५० | धार्ष्टर्यलङ्घित (किरात ० ७२) ३१६।६४ | ध्रियते याव (शिशु २ ३५) १५१।३६२ |
| धन्वन्तरिक्षपण ३७।३७ | धावन्त (शा प ६१००) ३६९।१८ | ध्रुवं ध्वसो (प्रब ८२) ३६२।३३ |
| धम्मिल्लं परि (शा प ३१७४) ३२८।५ | धावन्तमनु १२३।२ | ध्वजपट ३३२।५५ |
| धम्मिले नव (सा द ४ ९) १९४।१३ | धावित्वा सुस (शा प ४१५९) ३७५।२२२ | ध्वनिरिति २१८।७८ |
| धम्मिल्लो भंग (सूक्ति ७८ १५) ३२०।५१ | धिक् चेष्टितानि (शा.प ९९६) २३७।४८ | ध्वस्त काव्यो (शा.प ३९९९)३६३।४१ |
| धरणिधर ११५।५१ | धिक् तस्य मूर्ख (शा प ३३२३)२६२।१८६ | ध्वान्तोघे ३०२।१०२ |
| धराध्र तव १३२।२७ | धिक्त्वा रे (शा प १९४) १००।३२ | न |
| धर्म पालय ११२।२७० | धिग्गृहं (स्काद वै अ २०) १५६।१३५ | न कठोर न (काव्या. २ ३२४) २५०।३ |
| धर्मे प्रसङ्गादपि ३७५।२४० | धिग्जीवि (स्काद काशी अ १) १७३।८७१ | न कदाचित्सता (सु ३०५) ४७।८३ |
| धर्मे प्रत्न (गरुड पू अ ११५)२८०।४८८ | धिग्धिन्ता (शाति ४ १०) ३७१।१९२ | न करोति १९४।२४ |
| धर्म प्रागेव (नवरत्न ४) १५३।४२२ | धिग्स्वैतां ६५।१४ | न कर्मणा ल (भा १२.७३६)१९२।४६० |
| धर्म एव प्लवो (भा ३ ११८३)३९४।६९० | धिग्वारिंदं (शा प ८६५) २२६।१६१ | न कश्चि (शा प १३७६) १४६।१६० |
| धर्मशास्त्रार्थं (शा प १३४३) १४२।१६ | धीर वारि (अमरु १२) ३४३।९४ | न कश्चि (बृहस्पति नी ११४) १६१।३४६ |
| धर्महन्त्यर्जिते १६६।५८८ | धीरध्वनिमिर (भामिनी अ ५९) २९२।१८ | न कश्चिदपि (शा प. ६४७) १५४।४० |
| धर्मात्मा (र गो २ ११४ १८)३९४।६९४ | धीराणा १६७।६४९ | न कस्यचित्कश्चि (हि.२ ४६) १७२।८३५ |
| धर्माख्याने श्म (वृ चा १४.६)३९४।६८६ | धुनोति चांसि (काव्यप्र.१०.३०) ९३।९२ | न काकारि ३७४।२१२ |
| धर्मार्थं प्रभ (र ३ ९ ३०) ३९४।६७७ | धुनोतु ध्वान्तं २५७।२५ | न का निशि (नैषध १ ३०) २५३।९ |
| धर्मार्थौपजवनो (का.नी १ १४)३८७।३८७ | धुन्वन्त्यमूनि ३३३।८२ | न कामभोगा ३४९।५१ |
| धर्मारम्भेऽप्य ५७।१४१ | धुन्वानाश्चन्द ३२६।३३ | न कार्येषु न ३५०।११ |
| धर्मार्थ यस्य (भा ३ ९५) १६२।४६२ | धूम पयो (सु ४४३) ६०।२४४ | न काल (शा प १३२०) १६०।३३४ |
| धर्मार्थकामत (हि २ १७९) १६४।४९४ | धूमव्याकुल १२।३२ | न कालस्य न (शा प ३९८८) ३६०।११ |
| धर्मार्थकाम (ब्रह्म अ १२०) १५९।२५५ | धूमाङ्गाढमली (राजत ४ ११) ३९३।६४९ | न कालस्य (र ४ २७ ७) ३९३।६५३ |
| धर्मार्थकाममोक्षेषु ३०।११ | धूमायन्ते व्य (भा ५ १३१९)२९३।१६६२ | न किंचित्(काम नी.११ ४७) ३९२।६४६ |
| धर्मार्थकामहीनस्य (सु २१६७) ६६।२४ | धूमायिता (भामिनी अ ९९) २४८।८२ | न कुर्या २३२।७८ |
| धर्मार्थो यत्र न १६७।६११ | धूर्त स्त्री वा (हि ३ १३१) १४८।२४२ | न कुर्यादभि (शा.प १५२६) १५५।८० |
| धर्मे तत्परता (वृ चा १२ १५) ५३।२६२ | धूर्तधोरण १२५।१४ | न कुल वृत्त (भा ५ ११३४) ३९४।६७१ |
| धर्मो यशो नयो २९।७ | धूलिधूसरसर्वाङ्गो (शा.प ५७५) ८९।७ | न कुले वापि २४४।२१८ |
| धवलकुसुमभाख १२२।७ | धूलीधारामिरन्धास्त १३३।४७ | न केनापि श्रुतं ३६।३४ |
| धवलयति समग्र ५१।२१९ | धूलीधूसर (काव्याल ७.३२) २०८।३५ | न केवलं मनुष्येषु (शा प ४४४) ९०।३ |
| धवलान्यात (पच.१.४३) १४८।२५३ | धूलीभिर्दिवमन्ध (नैषध १२.९९)१२४।९ | न कोकिला (शा प ८९२) २२९।२२७ |
| धवलीकरोति २६३।२०९ | धृततुषार (शिशु ६ ६०) ३४६।२१ | नक्र. खस्थान (पञ्च.३ ४४) ८६।१ |
| धातस्तात (भर्तृ स ५४५) ६१।२६५ | धृतधनुषि (शा.प ३९६५) ३६०।१३ | न क्रीडासु ३७२।६२ |
| धातु परीक्षा १६०।३३२ | धृतबिस (किरात. १० २४) ३४०।२६ | न क्रोध ६।६८ |
| धातु (काव्यप्र. १० ३९) २८९।५४ | धृत्वा पदस्खलन (भामिनी क ५)३६२।२९ | न क्रोधयालु १६६।६०५ |
| धातुवादेषु १५५।१०३ | धृष्ट कि ३०७।६४ | न क्वचिच्च ८०।१६ |
| धातुश्चतुर्मुखीकण्ठ ३।१ | धैर्य यस्य (शान्तिश ४ ९) ३७०।१०३ | न क्वापि १८२।३२ |
| धान्याकनागर (शा प ४०३३) ३६४।४१ | धैर्य हि कार्यं (पच / २२५) ३८३।२६० | नक्षत्रक्षिति ३२२।१३ |