सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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४० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या | पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या | पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| नक्षत्रभू | १०४।९८ | न दानेन न (गरुड पू अ.१०९) | ३४९।३९ | न पश्यति च | १५९।२८२ |
| नक्षत्रभूषण चन्द्रो (चाणक्य ८) | १६१।३४२ | न दानं शु (वृ चा १७ १०) | ३९३।६५५ | न पाणि (सूक्ति ६६ १०) | ३४८।१६ |
| नक्षत्राणि बहूनि | २११।४२ | न दिष्टमप्य (म ६ ७८) | ३९३।६५७ | न पिता ना (र २ २७ ६) | ३८१।१८६१ |
| न क्षुधा पीड्यते (पच १.९९) | १४४।९२ | नदीकूले च ये (वृ चा २ १५) | १६२।४२० | नपुंसकमिति ज्ञात्वा (कुव ९०) | २७७।३ |
| नखक्षतमुर स्थले | ३२८।१५ | नदीजलक्लेशवनिारि (बालभारत) | १९०।६४ | न पुत्रत्वेन पूज्यन्ते (शा प १४८६) | ८१।४ |
| न खनति खुरै (शा प ९७०) | ८२।४४ | नदीतीरेषु ये वृ (वृ चा २ १५) | १७७।६४४ | न पुत्रात्परमो | १६०।३३८ |
| न गजाना (शा.प १३६३) | १४३।६३ | नदीना च कुला (चाणक्य २७) | १६५।५४० | न पुत्रात्त (शा प.१५२४) | १५४।७७ |
| न गर्जनै नरै (शा प १६१०) | १४३।५४ | नदीना (गरुड वृ अ १०८) | १५४।७९ | न प्रसाद (किरात.९ २५) | ३००।४२ |
| न गणस्याग्रतो (शा प १४६४) | १५३।३३ | न दुर्जन (वृ चा ११ ६) | ५९।२२४ | न प्रीति पवने | २८६।३१ |
| न गम्यो (भर्तृ स १२६) | २५०।१८ | न दुर्जनानामिह | ४९।१८० | न बरीभरीति | ३५७।४६ |
| न गुणा क्वापि | ४६।६९ | न दूतीसचारो न | २८०।८२ | न ब्रह्मविद्या न च (प्र.राघव १ २३) | ३१।२७ |
| न गृहं गृहमित्याहु (पच ३ १४६) | ३५०।६ | नदेभ्योऽपि (पूर्वचातका ७) | २११।११ | न ब्रूते परुषा गि (सा द ३ ९७) | ३५८।६८ |
| न गृह्णाति ग्रास (शा प ९२६) | २३२।७५ | न देवकन्यका (काव्या २ ३२५) | २५३।२ | न भयान्यभाष्य (मा १३ २२१९) | ३४९।४४ |
| न च गन्ध (शा प १०१०) | २३९।८९ | न देवसेवया याति | ९।१२८ | न भवति (भर्तृ सं ५५९) | ४७।१०७ |
| न च मेडव (शिशु ९ ५६) | २८७।२ | न देवाय (गरुड पू आ अ १०९) | ५५।५७ | न भवति मलयस्य | २०९।६५ |
| न च रात्रौ (मा ५ १४३७) | ३८१।१६३ | न देवे देवत्व (भर्तृ स ५५५) | ९९।१३ | नभसि जलद (अमरु १०३) | ३४३।१०३ |
| न च विद्यासमो (चाणक्य ७५) | १६२।४०६ | न देयो विद्यते | १६६।५९६ | नभसि निरव (भोज.२०८) | २१३।५१ |
| न च शत्रुर (मा १२ २१०८) | ३८१।१६६ | न देव न पित्र्य च | ४४।३ | नभसि विरलतारा | ३२४।३५ |
| न चाभिमानी | ३८०।११२ | न दवमिति सञ्चिन्त्य (शा प ४५४) | ८२।४ | न भिक्षा दुर्भिक्षे | ६७।५८ |
| न चाराधि राधा | ३७४।२११ | नद्यो नीचगता (शा.प ८१४) | २२२।३३ | न भिक्षा दुष्प्रा (भर्तृ ३ ९७) | ३८६।३५५ |
| न चिर मम तापाय (कुव ७५) | ३३०।३ | न द्वारि द्विरदावली | २३७।३६ | न भूतपूर्वो न च केन | ९२।५४ |
| न चोरहार्यं न च (प्र भ ८) | ३०।१३ | न द्विषन्ति न (शा प १४२३) | १५३।४ | नभोदिगन्तप्रतिघोष | १२८।४६ |
| न जल्प दशनत्विषा | २९४।१८ | न द्रव्याणामविज्ञाय | १६७।६२२ | नभोन्दीव्य (शिशु.१७ ६५) | १२७।१३ |
| न जातु (वायु ९३.९५) | १६६।६०९ | न धर्मशास्त्र पठतीति (हि १ १७) | ८४।१६ | नभोभूषा पूषा (प्र.म १५) | १७७।९९१ |
| न जाने समुख (अमरु ६४) | २७३।१ | न धातोर्विज्ञानं न च | ४४।८ | नभोलताकुञ्जुमुपा | २९९।१५ |
| न जिघ्रत्याघ्रातं स्पृशति | ४३।५ | न ध्यात पदं (शा प ४१५२) | ३७४।२१८ | नभोवन नक्तमसौ | ३२३।६ |
| न जीमूतच्छेद स | २५७।२४ | न ध्वानं कुरुषे (शा प ९६७) | २३५।१४८ | न भ्रूणा स्फुरणं न | २२९।२३२ |
| न ज्ञातुं नाप्यनु (प्र.राघव ५.२) | १५८।२३४ | न नटा न विटा (भर्तृ स १६५) | ८०।३० | नम खलेभ्य क (सु ३२६) | ५९।२२० |
| नटोऽपि दयाद्रणकोऽपि | ४४।७ | न नरस्य नरो दासो (हि ३ ७८) | ६४।७ | नम शिवाय नि शेष (सु १६) | ४।९ |
| न तच्छत्त्रेर्न (पंच १ १३५) | १४६।१४७ | न निर्यायान्ति (सु ४८६) | ७२।५१ | नम सर्वविदे तस्मै | ३६।५५ |
| न तज्जल यन्न (भट्टि २ १९) | ३३१।३५ | न र्नातमुपनासिकं | २७६।३७ | नम स्तवन्नचिच्छक्ति (सु २१) | १।७ |
| न तथा तप्य (भाग ११ २३) | ३८४।३०१ | ननु नीलाञ्चल | २६२।१७० | न मणेरितोऽधिका | २४७।६४ |
| न तथा बाध्यते (पच २ ९५) | ६६।२२ | ननु सदिशोऽति (शिशु.९ ६१) | २८७।३ | न मध्यव्यसनी (शा प १५०७) | १५४।६४ |
| न तथेच्छन्त्य (सु ३६९) | ५६।१०० | नन्दनजन्मा मधुप | २२२।५७ | न मया गोर (काव्या ३ १०८) | १९५।४७ |
| न तथोत्थाप्यते (हि ३ ४२) | १४८।२२९ | नन्दनरेन्द्राधिषणे (शा प ३८१) | ७२।३८ | न मया रचित | २३७।३२ |
| न तद्युक्तं न (शा.प ४७५) | १५५।१९३ | नन्दन्ति म (शा प ४१२४) | ३७२।१६७ | नमस्कुर्म कूर्म नमद | १८।१८ |
| नतध्रुवो लोचन | २५५।८९ | नन्दयति कस्य न (सु.१७४१) | ३४०।१० | नमस्तस्मै गणेशाय | २।४ |
| न तस्यादिनं | १८५।१७ | नन्वाश्रय (सु ४४१) | २४८।६९ | नमस्तस्मै वराहाय (सु ७) | १८।२३ |
| न तादृक्कर्पूरे (शा प १०१६) | २४०।१९९ | न पक्षकृत्तिर्न सपक्षक | १२४।३ | नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्र (सूक्ति १ १) | ३।१ |
| न तिर्यगवलोकितं | २६१।४८ | न पङ्करालेप (सूक्ति १ ३५) | १८।२९ | नमस्तुभ्यं देवासुरसुकु (सूक्ति १.५) | ५।४९ |
| न तृणाडु (नैषध १२ ४९) | १०९।१६३ | न पण्डिता साह (दशरू ४ २६) | ३९।२२ | नमस्त्रिभुवनोत्पत्तिस्थिति (सु ५) | १।४१ |
| न तेजस्तेजस्वी (सूक्ति १० ९) | ७९।२० | न पर फलति हि (सु ४१८) | ५८।१८९ | नमश्छिमूर्तये तुभ्यं | १४।१ |
| न दन्तुरमुर स्थलं | २५६।३६ | न परस्यापराधे (हि २ १०३) | १६४।४८८ | नमस्यामो देवाञ्जतु (भर्तृ २ ९२) | ९३।८८ |
| न दातुं नोपभोक्तु च (भोज ७०) | ७१।११ | न पर्वताग्रे नलिनी (मृच्छ ४ १७) | ३५५।६ | न मातरि न (गरुड पू अ ११४) | ८८।१३ |