भारतकोश
सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

Subhashita Ratna Bhandagara

पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा

स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 516 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 471

४० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां


पद्यांश / सन्दर्भपृष्ठ।सङ्ख्यापद्यांश / सन्दर्भपृष्ठ।सङ्ख्यापद्यांश / सन्दर्भपृष्ठ।सङ्ख्या
नक्षत्रभू१०४।९८न दानेन न (गरुड पू अ.१०९)३४९।३९न पश्यति च१५९।२८२
नक्षत्रभूषण चन्द्रो (चाणक्य ८)१६१।३४२न दानं शु (वृ चा १७ १०)३९३।६५५न पाणि (सूक्ति ६६ १०)३४८।१६
नक्षत्राणि बहूनि२११।४२न दिष्टमप्य (म ६ ७८)३९३।६५७न पिता ना (र २ २७ ६)३८१।१८६१
न क्षुधा पीड्यते (पच १.९९)१४४।९२नदीकूले च ये (वृ चा २ १५)१६२।४२०नपुंसकमिति ज्ञात्वा (कुव ९०)२७७।३
नखक्षतमुर स्थले३२८।१५नदीजलक्लेशवनिारि (बालभारत)१९०।६४न पुत्रत्वेन पूज्यन्ते (शा प १४८६)८१।४
न खनति खुरै (शा प ९७०)८२।४४नदीतीरेषु ये वृ (वृ चा २ १५)१७७।६४४न पुत्रात्परमो१६०।३३८
न गजाना (शा.प १३६३)१४३।६३नदीना च कुला (चाणक्य २७)१६५।५४०न पुत्रात्त (शा प.१५२४)१५४।७७
न गर्जनै नरै (शा प १६१०)१४३।५४नदीना (गरुड वृ अ १०८)१५४।७९न प्रसाद (किरात.९ २५)३००।४२
न गणस्याग्रतो (शा प १४६४)१५३।३३न दुर्जन (वृ चा ११ ६)५९।२२४न प्रीति पवने२८६।३१
न गम्यो (भर्तृ स १२६)२५०।१८न दुर्जनानामिह४९।१८०न बरीभरीति३५७।४६
न गुणा क्वापि४६।६९न दूतीसचारो न२८०।८२न ब्रह्मविद्या न च (प्र.राघव १ २३)३१।२७
न गृहं गृहमित्याहु (पच ३ १४६)३५०।६नदेभ्योऽपि (पूर्वचातका ७)२११।११न ब्रूते परुषा गि (सा द ३ ९७)३५८।६८
न गृह्णाति ग्रास (शा प ९२६)२३२।७५न देवकन्यका (काव्या २ ३२५)२५३।२न भयान्यभाष्य (मा १३ २२१९)३४९।४४
न च गन्ध (शा प १०१०)२३९।८९न देवसेवया याति९।१२८न भवति (भर्तृ सं ५५९)४७।१०७
न च मेडव (शिशु ९ ५६)२८७।२न देवाय (गरुड पू आ अ १०९)५५।५७न भवति मलयस्य२०९।६५
न च रात्रौ (मा ५ १४३७)३८१।१६३न देवे देवत्व (भर्तृ स ५५५)९९।१३नभसि जलद (अमरु १०३)३४३।१०३
न च विद्यासमो (चाणक्य ७५)१६२।४०६न देयो विद्यते१६६।५९६नभसि निरव (भोज.२०८)२१३।५१
न च शत्रुर (मा १२ २१०८)३८१।१६६न देव न पित्र्य च४४।३नभसि विरलतारा३२४।३५
न चाभिमानी३८०।११२न दवमिति सञ्चिन्त्य (शा प ४५४)८२।४न भिक्षा दुर्भिक्षे६७।५८
न चाराधि राधा३७४।२११नद्यो नीचगता (शा.प ८१४)२२२।३३न भिक्षा दुष्प्रा (भर्तृ ३ ९७)३८६।३५५
न चिर मम तापाय (कुव ७५)३३०।३न द्वारि द्विरदावली२३७।३६न भूतपूर्वो न च केन९२।५४
न चोरहार्यं न च (प्र भ ८)३०।१३न द्विषन्ति न (शा प १४२३)१५३।४नभोदिगन्तप्रतिघोष१२८।४६
न जल्प दशनत्विषा२९४।१८न द्रव्याणामविज्ञाय१६७।६२२नभोन्दीव्य (शिशु.१७ ६५)१२७।१३
न जातु (वायु ९३.९५)१६६।६०९न धर्मशास्त्र पठतीति (हि १ १७)८४।१६नभोभूषा पूषा (प्र.म १५)१७७।९९१
न जाने समुख (अमरु ६४)२७३।१न धातोर्विज्ञानं न च४४।८नभोलताकुञ्जुमुपा२९९।१५
न जिघ्रत्याघ्रातं स्पृशति४३।५न ध्यात पदं (शा प ४१५२)३७४।२१८नभोवन नक्तमसौ३२३।६
न जीमूतच्छेद स२५७।२४न ध्वानं कुरुषे (शा प ९६७)२३५।१४८न भ्रूणा स्फुरणं न२२९।२३२
न ज्ञातुं नाप्यनु (प्र.राघव ५.२)१५८।२३४न नटा न विटा (भर्तृ स १६५)८०।३०नम खलेभ्य क (सु ३२६)५९।२२०
नटोऽपि दयाद्रणकोऽपि४४।७न नरस्य नरो दासो (हि ३ ७८)६४।७नम शिवाय नि शेष (सु १६)४।९
न तच्छत्त्रेर्न (पंच १ १३५)१४६।१४७न निर्यायान्ति (सु ४८६)७२।५१नम सर्वविदे तस्मै३६।५५
न तज्जल यन्न (भट्टि २ १९)३३१।३५न र्नातमुपनासिकं२७६।३७नम स्तवन्नचिच्छक्ति (सु २१)१।७
न तथा तप्य (भाग ११ २३)३८४।३०१ननु नीलाञ्चल२६२।१७०न मणेरितोऽधिका२४७।६४
न तथा बाध्यते (पच २ ९५)६६।२२ननु सदिशोऽति (शिशु.९ ६१)२८७।३न मध्यव्यसनी (शा प १५०७)१५४।६४
न तथेच्छन्त्य (सु ३६९)५६।१००नन्दनजन्मा मधुप२२२।५७न मया गोर (काव्या ३ १०८)१९५।४७
न तथोत्थाप्यते (हि ३ ४२)१४८।२२९नन्दनरेन्द्राधिषणे (शा प ३८१)७२।३८न मया रचित२३७।३२
न तद्युक्तं न (शा.प ४७५)१५५।१९३नन्दन्ति म (शा प ४१२४)३७२।१६७नमस्कुर्म कूर्म नमद१८।१८
नतध्रुवो लोचन२५५।८९नन्दयति कस्य न (सु.१७४१)३४०।१०नमस्तस्मै गणेशाय२।४
न तस्यादिनं१८५।१७नन्वाश्रय (सु ४४१)२४८।६९नमस्तस्मै वराहाय (सु ७)१८।२३
न तादृक्कर्पूरे (शा प १०१६)२४०।१९९न पक्षकृत्तिर्न सपक्षक१२४।३नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्र (सूक्ति १ १)३।१
न तिर्यगवलोकितं२६१।४८न पङ्करालेप (सूक्ति १ ३५)१८।२९नमस्तुभ्यं देवासुरसुकु (सूक्ति १.५)५।४९
न तृणाडु (नैषध १२ ४९)१०९।१६३न पण्डिता साह (दशरू ४ २६)३९।२२नमस्त्रिभुवनोत्पत्तिस्थिति (सु ५)१।४१
न तेजस्तेजस्वी (सूक्ति १० ९)७९।२०न पर फलति हि (सु ४१८)५८।१८९नमश्छिमूर्तये तुभ्यं१४।१
न दन्तुरमुर स्थलं२५६।३६न परस्यापराधे (हि २ १०३)१६४।४८८नमस्यामो देवाञ्जतु (भर्तृ २ ९२)९३।८८
न दातुं नोपभोक्तु च (भोज ७०)७१।११न पर्वताग्रे नलिनी (मृच्छ ४ १७)३५५।६न मातरि न (गरुड पू अ ११४)८८।१३