सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ४७ | |
|---|---|---|
| पाकश्वेभ्र शु (राजत ३ ३०३) ६२।२७४ | पाथोदजालजटिलं ३४४।६ | पारीन्द्राणा धुरीणैरवनि १२६।३१ |
| पाटलया वन (शा प १०१४) २३९।९७ | पादन्यास (सु ५६१) २१०।३३ | पार्वतीमोषधीमेकमपर्णा ११।२ |
| पाटीर तव प (भामिनी अ ११) २३७।४३ | पादपाना (स पाठो.५४) १६२।४१४ | पार्श्वस्थपृथ्वीधरराजकन्या ४।२९ |
| पाठीन कमठ (शा प १३३) १७।३ | पादसवाहने वज्री २५१।१७ | पार्श्वभिया (शा प ३५०५) २९३।१ |
| पाणि पात्रं प (शान्ति ४ ७) ३७१।११३ | पादस्याविर्भवन्ती (मुद्रा १ २) १०१।५४ | पार्श्वस्फिाला (शा प ५८७) २०७।१९ |
| पाणिग्रहे पर्वतराज ४।२८ | पादा कन्दुकवत्स्थि १४३।५७ | पाशक्षुण्णखुरस्य २३४।१२३ |
| पाणिग्रहे पुलकितं वपु ४।१६ | पादाग्रस्थितया (सूक्ति २ ३८) १२।३८ | पाश्चात्यभागमिह (शिशु ४.२२) ३६३।१८ |
| पाणिग्राहस्य सा (म ५ १५६) ३५१।१७ | पादाघातविघूर्णिता (सु ६३५) २३२।८६ | पाश्चात्याम्बुधिदृष्टपूर्व २९५।६४ |
| पाणिपल्लवविधूत(किरात ९ ५०)३१८।१० | पादाङ्गुष्ठेन (अमरु परि १३६) २८१, २१ | पाश्चात्यैर्म (शा प १८३१) ३३६।२७ |
| पाणिरोधमविरो(शिशु १० ६९)३१८।१२ | पादसक्ते (अमरु ६८) ३०७।५२ | पाषाणखण्डे (शा प ४०९९) ३६७।२३ |
| पाणिर्नीरवरूक्षण स्तन २९१।९५ | पादस्त एव ३१३।५८ | पाषाणा पयसि १८३।६२ |
| पाणौ कङ्कणमुत्पर्गं (शृं ति ३ २) ७८९ | पादाहृत यदुत्थाय (शिशु २ ४६) ७९।५ | पाषाणो भिद्यते ५५।४५ |
| पाणौ गृहीतापि पुर ३५२।२२ | पादाहतोऽपि (शा प ३६१) ६०।२३७ | पास्यन्ति कस्य कुसुमे २४१।१३४ |
| पाणौ ताम्रघटी (सूक्ति ८९ ७) ३६५।४९ | पादेन क्रम्यते १५९।२७१ | पिकस्तावत्कृष्ण ८५।१२ |
| पाणौ पद्म (सूक्ति ६५ ४०) ३३४।११९ | पादे मूर्धनि (शा प ३५६९) ३१०।७ | पिका गी वाचालीभवति २८५।२६ |
| पाणौ मा कुरु (सु १३१३) २८२।१३८ | पादौ सस्तम्भयन्ती ९६।४८ | पिण्डे पिण्डे १५९।२६५ |
| पाण्डित्यस्य विभूष (सु ३०५४) ८४।२३ | पान दुर्जनसंसर्ग (म ९ १३) १६६।५७६ | पिता (गरुड पू अ ११५) १६६।५७५ |
| पाण्डु क्षामं वदन(काव्यप्र ७ १५)२८५।२ | पानं स्त्री (भा १२.५२७२) १४८।२३८ | पिता रत्नाकरो यस्य(वृ चा १७ ५)९१।२० |
| पात पूष्णो (भट्ट. १०) २०९।१३ | पानधौतनवया (शिशु १० २६)३१५।२९ | पिता रत्नावार शुचिसह ९३।१५ |
| पातकानां समास्ता १४७।१५७ | पानमक्षा (शा प १३८९) १४६।१६४ | पिता वा (पंच १ ४५७) १४७।२२१ |
| पात जले विष्णुपदापगा ४२।५ | पानायावरतोऽमृत २७२।६२ | पितुरधिपुर लङ्का ३२९।९२ |
| पातयति हृदयदेशे २७५।८ | पानीय (भा १२ ४११४) १६३।४५६ | पित्रो पादाब्जे १०१।४७ |
| पातालत. किमु (शा प ४०८०) ३६६।२ | पानीयं (शा प ३८०७) ३३५।१३५ | पित्रोर्निंल प्रियं १६७।६१८ |
| पातालमिव ते नाभि ३१२।१० | पानीय पातु (शा प ५३०) १८।४२ | पित्रोर्नैव वच शृणोति ९०।१२ |
| पातालाङ्गुवनावलो २७४।२४ | पानीयमानीय २१२।२८ | पिदधाति (शा प ३६०१) २९७।१३ |
| पातालाच्च विमो (शा प २५७) ८०।४४ | पान्तु वो (शा प ११३) २२।१०१ | पिदधानमन्वयुपग (शिशु ९ ७६)३१०।८ |
| पाताले मज्जु मूलं १२१।१६१ | पान्थ मन्दमते २५४।६८ | पिनष्टीव तरंगाग्रै (कुव ३५) २९९।४ |
| पातितोऽपि करा (भर्तृ २ ८३) ४५।३० | पान्थाधार इति (शा प ९८३) २३६।२१ | पिनाकफणिभालेन्दुभस्म (शा.प ६३) ३।६ |
| पातुं त्रीणि जग (शा प ४०१७) १८।३१ | पान्थाना प्रमदा ३३७।५६ | पिपासाक्षामकण्ठेन २२६।१४९ |
| पातु न प्रथम व्यव (अ शा ४ ८) ३६३।३९ | पापं समाचरति (सु २७२) ५०।२१० | पिपासुरिव चञ्चलं २६०।१११ |
| पातु श्रोत्ररसायनं (सूक्ति ४ ९९) ३६४।४३ | पापं कर्तुमृण कर्तुं ९८।२ | पिपि प्रिय (शा प.३६५१) ३१६।६७ |
| पातुमाहितर (किरात ९ ५१) ३१५।४३ | पापान्निवारयति (भर्तृ २ ६४) ८८।१८ | पिपीलिकार्जितं धान्यं १५५।१०१ |
| • पातु व कपटकैरळके १८।२७ | पामारागाभि (सूक्ति ९८ १) १९४।१७ | पिबतस्ते (शा प ५३८) १९५।४२ |
| पातु व शिति १०१।४४ | पार्यं पाय पिव (शा प ११५१) २२०।३ | पिबन्ति नद्य ४९।१७० |
| पातु वो निकषग्रावा ३।४ | पायात्पयोधिदुहितु (शा प १३४) १६।२ | पिबन्ति मधु (सु ६९०) ९१।८ |
| पातु वो (मृच्छ १ २) १०१।४२ | पायात्स व (सु.४८) १६।४५ | पिब पय (शा प १२११) २३५।१५६ |
| पातु वो मेदिनी (सु ३०) १८।२४ | पायादायासखे १०१।५७ | पिब स्तन्यं (भामिनी अ ५८) २३०।३६ |
| पातु श्रीस्तनपत्र १८।३२ | पायाद्गजेन्द्रवदन (सु ८०) २।२३ | पिशुन खलु ५८।१६२ |
| पात्र न तापयति ९०।१३ | पायाद् करणोऽरुणो २०६।१८ | पिशुनत्वमेव विद्या ५७।१५२ |
| पात्रं पवित्रयति (सु ३२४) ५१।२१६ | पायाद्दो जमदग्निवश २०।७२ | पीठा कच्छपवत्तरन्ति ६८।७८ |
| पात्रमपात्री (शा प ३७०) ८८।९ | पायान्मायामृगेन्द्रो १९।५८ | पीठीप्रक्षाल (शा प.४०२८) ३६५।५५ |
| पात्रविशेषे (भा.१३ १७७) ८६।७ | पारिजाततरु यावन्न २३७।३८ | पीठे पीठनिषण्णबालक २४।१५७ |
| पात्रापात्र (सु २९७५) १५७।२०३ | पारीन्द्रशावक न २३०।३० | पीडिते पुर (शिशु १० ४६) ३१६।६ |
| पात्रे त्यागी गुणे (प्रसगा ४) १४२।१२ | पारीन्द्रस्य (धर्मवि.८) १८३।५९ | पीतं येन पुरा पुरन्दरपुरे २३२।३७ |