सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| ४८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
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| पीतं यत्र हिम (शा प ९२१) २३२।८३ | पुमासो ये हि (भाव १ ४०) ३९०।५०६ | पूरयित्वा (शान्ति. २.२१) ३६७।१२ |
| पीत पङ्कजकानने २२४।११४ | पुर पूर्वमिव (रत्ना ३ ७) २०१।२८ | पूरोत्पीडे तडा १५६।१६६ |
| पीत क्रुद्धेन (वृ चा १५ १६) ३८७।४१७ | पुर स्थित्वा (सूक्ति ४१ १२) २७३।१४ | पूर्ण पङ्कज २११।४८ |
| पीतमत्र मधु यापिता २२३।६९ | पुरत कृच्छ्र ३९०।५१० | पूर्णचन्द्रमुखी १९६।१४ |
| पीतवल्यभिमते (शिशु १०.९) ३१४।१२ | पुरत प्रेय्यलाशा ७३।१६ | पूर्णनखेन्दुद्विगु ९१।३५ |
| पीतशीधुमधु (शिशु १० ११) ३१५।१४ | पुरंदरमहस्त्राणि (सु ३३०९) ३७३।१९० | पूर्णापूर्णे (पच १ १७) ३९३।६२९ |
| पीतस्तुषार (अमरु १२०) ३१६।६६ | पुरस्तन्व्या (अमरु ५१) ३५७।५३ | पूर्णेन्दुमा (माकडेय २७.२५) ३९३।६३१ |
| पीतस्त्वं कलशोद्भवेन १८३।६५ | पुरस्ताद्रच्छन्ती २८०।७८ | पूर्णेन्दु कर १३७।५५ |
| पीतोऽगस्त्येन तातश्वरण ६४।४३ | पुरा कवीना गण (कुव १६४) ३५।७ | पूर्णे शतसहस्रे (शा प ३९८५) ३६०।८ |
| पीतो यत. (अमरु १३०) २७९।५७ | पुराण (सूक्ति ५३ १३) २६०।११४ | पूर्वं तावत्कुवलय (शाति ४ १६) ३६९।६३ |
| पीत्वा गर्जन्त्यपस्ते २१७।३९ | पुराणमित्येव (मालवि १ २) १७४।८९३ | पूर्वं द्विरेफ (सूक्ति ६५ १२) ३३४।११६ |
| पीत्वा भृश (सूक्ति ८२ २८) ३२३।१५ | पुराणरश्मि २९३।३ | पूर्वं चेटी ततो (शा प ४०५२) ३६४।४ |
| पीनोत्तङ्ग (शा प ३९३९) ३४७।१४ | पुराणान्ते १५८।२३२ | पूर्वं यत्र सर्व २९३।५ |
| पीनोत्तुङ्गस्तनकलशयो २७६।४२ | पुरातनपरीमल ३२६।२१ | पूर्वजन्मकृतं कर्म (हि प्र ३२) ८२।६ |
| पीयूष वपुषोऽ (शा प ७६१) २१०।३६ | पुराभूद (शा प ३५५८) ३१३।६५ | पूर्वजन्मजनितं ८३।१९ |
| पीयूषाश्रयणं (सूक्ति ७२ ३०) ३०२।९७ | पुरा विद्वत्ता (भर्तृ ३ १००) ३७८।४२ | पूर्वत्रासिद्ध १२१।१६४ |
| पीयूषेण कृतार्थिता २१७।३६ | पुरारितनुहारिणी १२।२४ | पूर्वदत्ता च १५८।२२४ |
| पीयूषेण सुरा श्रिया २१७।३४ | पुरा शर (शिशु १७ ५५) १२७।४ | पूर्वभागतिमिर २९४।१६ |
| पीलूना फलव (शा प.९५६) २३४।१३६ | पुरा सरसि (भामिनी अ २) २२१।२६ | पूर्वा क्षणक्रम ३९५।५२ |
| पुंस सबोधन (शा.प ५५२) १९८।४२ | पुरीषस्य च ४५।१ | पूर्वाह्ने प्रतिबोध्य २०९।१७ |
| पुंसा दर्शय सुन्दरि १६२।१७४ | पुरुष कीदृशो १९९।३१ | पूर्वे वयसि (भा १३ १७८८) ३८७।४१५ |
| पुंसा सर्वसुखैक १४५।१९२ | पुरुष पौरुष ९१।२७ | पृच्छति पुरुष २००।४६ |
| पुसामुन्नत (सूक्ति ७ ५) ७०।१३ | पुरुहूतदिगङ्गना (सु २२२०) ३२७।४ | पृच्छति शिरसिरुहो २०१।६९ |
| पुंस्कोकिलकुलसैते १९४।१४ | पुरो (भामिनी अ ७९) २४५।११ | पृथिवी दह्यते (सु ३३०८) ३७२।१५४ |
| पुच्छं चेदहमुन्नयाम्य १७।१२ | पुरोजनमा नाय(महा ना १ ४७)३६०।३३ | पृथिवी रत्न (भा १ ३१७५) ३९०।५३४ |
| पुज्यमानानरुण १८२।३३ | पुरो दिगनुरा ३०६।४० | पृथिव्या त्रीणि (वृ चा १४ १) २९।६ |
| पुञ्जीभूतं प्रेम २२१।२४ | पुरोन्नम पक्षा (सूक्तिसङ्घ) २०७।११ | पृथुकार्तरस्वर (सूक्ति. १२७ ४) ६६।३५ |
| पुण्यतीर्थे कृतं (हि १७) ९०।६ | पुरो रेवापारे (नीतिरत्न ५) ३७८।६८ | पृथु गगन (सूक्ति ६८ ६) २९५।५४ |
| पुण्यान्नौ (सूक्ति ६४ १२) ३४८।२० | पुरो वा पश्चाद्वा ८०।३३ | पृथुवर्तुलतन्नि (नै २ ३६) २६८।२७७ |
| पुण्ये ग्रामे वने (भर्तृ ३ २४) ३७९।७६ | पुष्पं पुष्पं (भा ५ ११११) ३८८।४४९ | पृथ्वी तावन्त्रि ३५४।६६ |
| पुण्यैर्मूलफलै (भर्तृ ३ २७) ३७०।८५ | पुष्प प्रवा (शा प ३३१८) २६१।१४८ | पृथ्वीपते शुभ १३५।२० |
| पुत्र (शान्ति २ १०) ३७०।९४ | पुष्पाणि प्रथमं ३३३।१५ | पृथ्वी पृथ्वीगुणा (सु ५०२) ७०।१६ |
| पुत्रदारादि (शान्ति २.२५) ३६७।१३ | पुष्पे गन्धं (वृ चा ७ २१) ३९०।५१५ | पृथ्वी श्रीमदनङ्ग(शा प १२६०)११३।५ |
| पुत्रपौत्र (चाणक्य. १०७) १४४।७७ | पुष्पेषुमाता पुरुषा १९०।७० | पृथ्वीसबोधनं १९६।६ |
| पुत्रपौत्रवधू १५६।१३२ | पुष्पेष्वोरभिषेक (सु १५४६) २६५।२९३ | पृष्टो ब्रूते न १४२।२९ |
| पुत्रप्रयोजना (चाणक्य ५३) १६१।६८५ | पुष्पैरपि न (शा प १२९८) १५०।३२६ | पृष्ठत (हि २.३४) १६३।४७२ |
| पुत्रमित्रकल (वामन. अ ७७) ३६७।२ | पुस्तकस्था (चाणक्य ८३) १६२।४१३ | पृष्ठे श्राम्यद (सु.३६) १८।२० |
| पुत्रसू पाक १५७।१९४ | पुस्तकेषु च (हि प्र ३८) ३९।१५ | पृष्ठे कञ्चुकमुत्कल्यै ३१।८७ |
| पुत्रिण्य कति २३६।५ | पुस्तकप्रत्यया (वृ चा १७ १) ३९०।५१८ | पेटीचीवरपट्टवस्त्र ४१।७३ |
| पुन प्रभातं ३७४।२१० | पुस्तकेषु च या १५९।२६९ | पेशलमपि खल ४८।१२५ |
| पुनरपि मिलनं २७८।२८ | पूजाया कि पद १९८।१ | पोतो दुस्तर (पंचरत्न. २) ६१।२६४ |
| पुनर्वित्तं पुनर्मिं(वृ चा १४ ३) ३८७।४०९ | पूज्यो बन्धुरपि(पच १ २४०) ३७८।५१ | पौर सुतीयति १०५।१४७ |
| पुनर्दांरा पुन (वृ चा १४ ४) ३८५।३३९ | पूतिपङ्कमये (सूक्ति ९८ ९) १९८।२९ | पौरस्त्यैदर्दाक्षि (शा प ११०८) २१८।७२ |
| पुन्नाम्नो नर (भा.१ ३०२६) ३८९।५०१ | पूरयति पूर्णमेषा ६२।१७ | पौराणिकाना व्यभि ४४।१ |