सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| ५० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
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| प्रयत्नै रस्तोकैः परि | ४३।६ | प्रहरति न पञ्च (शा प ५०६) | १८४।५ | प्रातर्नीलनिचोलमच्युत | २५१।७५ |
| प्रयाणे तव | १२५।१ | प्रहरविर (अमरु १२) | ३२९।११ | प्रातर्मूत्रपुरीषा (सु ३३३६) | ३६७।१९ |
| प्रयाति शमनं (पञ्च ३ ३१) | ३९१।५६३ | प्रहरिष्यन्प्रियं (शा प १४२९) | १५३।८ | प्रातर्हन्त कृतापराधोऽपि रज | ९९।२८ |
| प्रयातुमस्माक (नै १ ६९) | १२३।४ | प्राकारगोपुरा (शा प १५६५) | १४३।३८ | प्रातिभ त्रिसर (शिशु १० २२) | ३१५।१५ |
| प्रयातेऽस्तं भानौ (सु १०९०) | २७५।२८ | प्राक्पादयो (हि १ ८१) | ६०।२३५ | प्राथमिकी घनवृष्टि प्राप्ता | २१४।४ |
| प्रयाहि तत्रैव | ३०९।२ | प्राकृतो हि (भा १२ ४२१७) | ३८९।४७२ | प्रादुर्भवन्ति वपुष (प्रब ९३) | ३७१।१२९ |
| प्रयोगव्युत्पत्तौ प्रति | ३४।१ | प्रागल्भ्यं पुरुषा | ३०१।२१ | प्रादुर्भूते नवजलधरे त्वत्पथं | २८९।५६ |
| प्रयोजनेषु ये (भा ५ २४४१) | ३८०।१४२ | प्रागल्भ्य प्रयय | २४८।७६ | प्रादुष्यातपण्डिताना कवि | ४२।७७ |
| प्रलयसहायकरा (शा प ५१०) | १८१।२४ | प्रागल्भ्यहीनस्य (ज्योतिस्तत्त्व) | १७३।८५६ | प्रापितेन चटुकानुविडम्ब | ६९।१९ |
| प्रवसतः (शिशु ६ ३०) | ३४१।३६ | प्रागेतद् (नै १२ ९३) | ११०।२४६ | प्राप्तं प्राज्यमिव श्रम | ३३५।१३४ |
| प्रवातान्नीलोत्पल (कुमार १ ४६) | २५९।७७ | प्राज्ञा मेति ततो (भर्तृ १ २५) | ३१।७७ | प्राप्तमदो मधुमास प्रबला | १९४।३७ |
| प्रविश झटिति (शृं ति ६) | २६२।१९३ | प्राची वासकसज्जिकामुपगते | ३२५।६१ | प्राप्ताविद्यार्थ (पञ्च १ ४३२) | ३९०।५३२ |
| प्रविष्टं सर्वं (र २.१२२ २०) | ३९१।५५५ | प्राचीकुङ्कुमतिल (प्र राघव ७ ९०) | २७।४ | प्राप्तव्यमर्थ लभ (पञ्च २ १३३) | ९२।४९ |
| प्रवीणे पाक्पदु (शा प १३३५) | १४४।७४ | प्राची दिगम्बरमणौ दयिते | ३२३।१० | प्राप्ता श्रिय (भर्तृ ३ ६८) | १७६।९४९ |
| प्रशस्त्यायुक्त | १९४।३२ | प्राचीनाचलचुम्बिचन्द्र | ३०२।११६ | प्राप्ता जरा (शा प ४१६५) | ३७४।१९६ |
| प्रशान्त (किरात ८ २८) | ३३८।७३ | प्राचीभागे सरागे धरणि | ३०३।१२२ | प्राप्तानपि न (सूक्ति ९ १९) | ७२।३७ |
| प्रशान्ते नूपुरा (शा प ३६९६) | ३२०।१ | प्राचीमहीधरशिलाविनिवे | ३४३।११० | प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्य (हि २ १०३) | १४२।२४ |
| प्रसत्तेर्य. पात्रं | ३१।४१ | प्राचीमालम्ब (प्र राघव २.३३) | २९५।७० | प्राप्ताज्ञासात्पिपासातिशय | १३३।४४ |
| प्रसङ्गा (सु १४७) | ३९२।५९३ | प्राचीविभ्रमकर्णिकाकमलिनी | ३२५।५६ | प्राप्ते भये परि (पञ्च २ १९३) | ३९०।५२६ |
| प्रसरति (पञ्च ३ २४५) | १७७।९९४ | प्राचेतसस्यापसराशराधा | ३७।६६ | प्राप्ते वसन्तसमये (सु ७९४) | २०२।९४ |
| प्रसरदल (सूक्ति ६१ २७) | ३४३।१०५ | प्राज्ञो वा (भा १२.५७१७) | ३८९।४६७ | प्राप्यं कार्यं गरी (र ५ ८४) | ३८८।४६० |
| प्रसह्य मणिमुद्धरे (भर्तृ. २ ४) | ४०।५६ | प्राञ्जलावपि (किरात ९ १०) | २९४।२९ | प्राप्य चलानधिकारा | १७०।७४० |
| प्रसाद कुरुते (हि ३ १९) | ३७७।२८ | प्राज्ञे नियोज्य (चाणक्य ८५) | १४६।१७८ | प्राप्यते गुणव (किरात ९ ५८) | ३१५।५० |
| प्रसाद्माधुर्यगुणौ | ४९।१६७ | प्राज्ञो हि जल्पता | ३८।६ | प्राप्यते स्म (शिशु १० ७८) | ३१९।२१ |
| प्रसादग्म्य (किरात ११.३८) | ८५।३ | प्राणवद्रक्ष्ये (पञ्च ३ १२२) | ३९२।६०७ | प्राप्य नाम्नि (शिशु १० ६०) | ३१७।२१ |
| प्रसादे व (सूक्ति ५७ २३) | ३०६।४४ | प्राणब्रुवन्त्येव (भाग ११ ७) | ३८५।३०९ | प्राप्य प्रमाणपद (भोजप्र १३४) | २४७।६९ |
| प्रसादो (सु.२७८५) | १४६।१५८ | प्राणघातान्नि (भर्तृ २ ६०) | १८०।१०५६ | प्राप्य मन्मथर (शिशु १० ८०) | ३१९।२३ |
| प्रसादो नि (भोजप्र ४७) | ३७७।२९ | प्राणातिपात (भा १२.५८४) | १५४।३९ | प्राप्य वित्त जडास्तूर्ण (दृ श ४४) | ५५।७७ |
| प्रसाधिकाल (रघु ७ ७) | १२६।३३ | प्राणत्यागे (पञ्च २ १७८) | ३९१।५८३ | प्रांभ्रश्राद्विष्णु (का प्र ७ १७४) | १८८।४३ |
| प्रसारणपरै करै. | ३०१।८७ | प्राणाना च (शा प ३०८९) | २५१।६ | प्रामाण्यं स्वत एव नैव | १०९।२१५ |
| प्रसारितकरे (शा प.११३८) | ३९१।५७६ | प्राणाना बत कि (शान्ति १ १८) | ७४।४३ | प्रामाण्यं परत खतोऽपि | १०९।२१६ |
| प्रसार्य (शा प.३८७८) | ३४२।७४ | प्राणा यथात्मनो (हि.१ १२) | १६३।४३६ | प्रामाण्यं परतो न शक्ति | ११७।९९ |
| प्रसीदेति (रत्ना.२.१९) | ३०६।४५ | प्राणायामोपदेष्टा सरसिरुह | ३०२।११८ | प्राय कार्ये न मुह्यन्ति | १९९।१२ |
| प्रसूतकलिका | ३३३।९० | प्राणेश तव विरहिणी हिम | २८७।६ | प्राय काव्यैर्गमितवयस | ४३।५ |
| प्रसूनबाणाद्वय (नै ७ ४८) | २६३।२२१ | प्राणेशमभिस (शा प ३६१२) | २९८।५ | प्राय. कुकवयो लोके | ३७।४ |
| प्रसूनशृङ्गै (शा प.३७९१) | ३३१।१६ | प्राणेश विज्ञाप्ति (शृ.ति.१७) | ३३०।४ | प्राय. खलप्रकृतयो (सु ४०२) | ५८।१७७ |
| प्रस्ताव (चाणक्य.१४.१५) | १५८।२५० | प्राणेशेन प्रहितनखरैश्छिन्न | ३२८।४ | प्राय परोपतापाय (सु ३५१) | ५६।९३ |
| प्रस्तावे हेतुयुक्तानि | ३२।२ | प्राणेश्वरपरि (काव्या सू. १५) | १७३।३०३ | प्राय प्रकाशता याति (सु ३५०) | ५६।९२ |
| प्रस्थान (अमरु.३५) | ३२९।२१ | प्राणेश्वरे किमपि जल्पति | ३२९।९ | प्राय प्रकुप्यतितरा (दृ श ३०) | ५५।७६ |
| प्रस्थाने तव | १२५।१८ | प्राणैरपि हिता वृत्तिरद्रोहो | ८८।१७ | प्राय सन्त्युप (दृ श ६) | १६८।६७० |
| प्रस्फुरत्प्रचुर | ३३२।७३ | प्रात क्षालितलोचना कर | ९६।५ | प्राय स्वभावमनिलो (सु ४४२) | ६०।२४३ |
| प्रस्वेदमलदिग्धेन (सु.३३४२) | ३६६।१ | प्रात प्रात समुत्थाय द्वौ | १९३।२ | प्राय स्वभावं (दृ. श ८०) | ४६।६५ |
| प्रहरकमपनीय (शिशु ११.४) | ३२३।२२ | प्रातः प्रातरुपा (अमरु ३३) | ३५६।१९ | प्रायश्चरित्वा वसुधा (कुव ११०) | ३२५।९ |
| प्रात. सीमन्ति (शा.प.३७३१) | ३२६।३२ | प्रायश्चित्त न गृहीतस्तन्वङ्ग्या | २६४।२५२ |