सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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५६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या | पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या | पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| मम रूपकीर्तिं (शिशु.) | २८८।२७ | महतोऽपि हि विश्वासा | ४७।९९ | मा गमनमदवि (किरात.९ ७०) | ३१६।६२ |
| ममत्वं हिन (भा २ १९५६) | ३८९।४९६ | महतो हि (भाव.३१) | ३७७।१ | मा गर्वमुद्वह (सूक्ति ८६ १४) | ३५५।२ |
| मया कुमार्यापि (शा प ३७६२) | ३५२।२१ | महतो सुवृत्तयो सखि | ४७।९८ | मा गा प्रत्युप (भर्तृ स ६४६) | ११४।११ |
| मयास्योप (काम नीति ९ १०) | ३८९।४७४ | महल्पल्पेऽप्युपा (हि ३ ४९) | १८४।२३४ | मा गा विषाद (सूक्ति १९ ४) | २२३।८५ |
| मयि जीवति बीजाढ्ये | २४१।१३८ | महद्भि स्पर्धे (पच १ ४०४) | ३७७।२ | माघश्वोरो मयूरो सुररिपु | ३७७।१ |
| मयि ते पादपतिते (पंच ४ ८) | ३०५।३ | महद्भिरोधैस्तम (सु.१९०३) | २९४।४२ | माघेन विम्रितोत्सा (सूक्ति ४ ५९) | ३७।६४ |
| मयि मलयसमीरो वर्षतीव | ३०९।२ | महागजाना गुरुबृंहितै | १२८।३८ | मा चक्र चक्रि(शा प १२५७) | १२३।१९४ |
| मयि सकपटं (सा द ३ १६२) | २७९।७० | महागजाना (कुमार १६ ४२) | १२८।४३ | मा जीवन्ध (शिशु २ ४५) | ८१।१ |
| मयि स्थितिर्न (सु २५२१) | ००४।११५ | महाजनस्य संसर्ग (पच ३ ५९) | ८६।२ | माणिक्यद्रव (राघवचैतन्य) | २२७।२०० |
| मयूखनखरत्रुट (सु.१९८१) | ३०१।८६ | महातरुर्वा (सु.७८८) | २४१।१४६ | मात क हृदये (दश रू २ ३९) | २८६।३२ |
| मय्यायाते सपदि शयना | ३५७।४९ | महादेवो देव (भर्तृ स २९९) | ३८८।४५८ | मात किं यदुनाथ देहि | २४१।५२ |
| मरणं प्रकृति (रघु.८ ८६) | ३७२।१७० | महात्मानोऽनुगृ (शिशु २ १०४) | ४५।१४ | मातङ्ग कुम्भ (सूक्ति.५३.३८) | २६६।३०२ |
| मरालश्रेणीभिर्नियतमुप | २७५।३० | महानदीप्रतरणं (विक्रमच १६) | १६७।६५० | मातङ्गा किमु (सूक्ति २२ ६) | २३१।४९ |
| मरौ नास्त्येव सलि (सु ९३८) | २२०।१ | महानपि (सूक्ति ९८.२१) | १९५।७ | मातज्ञाना (शिशु.१८ ३४) | १२९।७३ |
| मर्कटस्य सुरापानं तस्य | १५९।२६८ | महानप्यल्पता (हि.३ १२) | १६४।४९८ | मातङ्गीमिव (भोजप्र २६१) | ३४।६६ |
| मर्तव्यमिति (विक्रम.१४३) | १६५।५४९ | महानुभावसंसर्ग (शा प ३२१) | ८६।१ | मातङ्गैरथ यैर्महे(शा प १५७६) | १४३।४६ |
| मर्दितरावणक्सौ सरयू | २२१।७ | महानुभावसंसर्ग कस्य नो | ८६।३ | मातरं पितरं पुत्र (भोजप्र ३) | ६९।४ |
| मर्यादानिलयो महोदधि | २४९।१०३ | महान्तमप्य (भा ५ १५३३) | ३८८।४६४ | मातर्जीव किमेत (सु ६९) | ७।९४ |
| मलयज (काव्याल सू ४ ३ १०) | २९९।२३ | महाप्रलयमारु ( वेणी ३ ४) | ३६५।५ | मातर्धर्मपरे दया (सूक्ति ९६ ३) | २०८।३१ |
| मलयभुवि विरुद्धश्चन्दनेना | ६०।२४७ | महाबलान्प (भा ५ १५४६) | ३८८।४५३ | मातर्नति परमनुचितं यत् | ९७।११ |
| मलयमग्ना (अमरू ३२) | २८३।१५३ | महामतिरपि प्राज्ञो न | १६४।५०६ | मातमयि (शान्ति ४.२३) | ३६९।६४ |
| मलयशिखरादाकैलास | ३३४।१३० | महाराज श्रीमज्जग (भोजप्र.८२) | १३५।२९ | मातर्मेदिनि (भर्तृ स ३०१) | ३६९।७५ |
| मलयस्य गिरेरपत्यमादौ | २१९।५ | महाशयमतिस्वच्छं नीर | १९५।१ | मातर्लक्ष्मि (भर्तृ स.३०२) | ३७०।१०२ |
| मलयाचलगन्धेन विन्ध्यनं | ८६।४ | महाशय्या (शान्ति.४ ८) | ३६८।५४ | मातस्तर्णकर (सु १०१) | २३१।४६ |
| मलयानिल (सु १६६७) | ३६७।२८ | महासेनो यस्य प्रमदमय | ३६०।३२ | मातस्तातजटासु कि | १२।३१ |
| मलयानिल (काव्याल ३ ३०) | ३३१।१० | महास्वन (कुमार १४ ३२) | १२८।३७ | मा तात सपदा (सु २७४९) | १४५।१३३ |
| मलिनयितुं खलवदन (कुव ९४) | १३८।२ | महिम्नामन्तर पश्य (सु २२५७) | ७८।४ | मा तात साहस (सु २७४७) | १४५।१३० |
| मलिनहुतभुग्धूम (सु १७६०) | ३४१।५४ | महिष्या दृष्टया भाव्यं | १४४।४२ | माता नताना सघट्ट | २०५।८ |
| मलिना अपि सय्यमनात्कृ | २५७।१० | महीपते सन्ति (शा प १६७) | ३३।३२ | माता निन्दति (नीतिसार २) | ६४।१६ |
| मलिनात्मना (सूक्ति १४.४) | २२४।१३० | महीमण्डलीमण्डपीभूत | ३४१।४७ | माता पिता (शा प १३४७) | १४६।१५२ |
| मलिनेऽ |