भारतकोश
सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

Subhashita Ratna Bhandagara

पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा

स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)

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संस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः (पृष्ठ ५९)

मौलौ केकिशिख २५।१८०य स्तोकेना (पञ्च २ १४८) १६५।५३२यत्प्रत्यग्रदलावलीकवल २३३।९५
मौलौ मन्दारदाम ३४।६७य स्यात्क्रवललक्ष्य (सु १९२) ३८।३०यत्प्रदेशमुपनीय (नैषध ५ ८५) ६९।२०
मौलौ सन्मणयो (उद्भट ६३) २३५।१६३य स्वभावो हि (हि १ ५८) ८४।३यत्प्रियव्यति (शिशु १० ५१) ३१६।११
प्रदीयसीपि (शिशु २ ७४) ८४।६य एवादि स एवा १८५।१८यत्र क्षिपामि दृशमन्य २७८।४५
प्रदीयस्त्वा (शा प १००७) २३९।८७यक्ष विरहिण क्वचि ३०३।१४०यत्र देशेऽथ (पञ्च १ ४४३) १६४।५१६
म्रियमाणं (शा प ४१६९) ३७३।१९२यच्च कामसु (भा १२ ६५०३) ७६।१६यत्र न फलितास्तरवो १६९।७३४
म्लानस्य जीवकुसु(मालती ६ ८) ३१३।५२यच्चिन्तितं तदिह १७६।९७१यत्र न मदनवि (शा प.३६६६) ३१७।२
यच्छक्यं प्र (भा ५ ११०७) १६६।६०२यत्र नार्यस्तु(भा १३ २८८८) ३८९।४९३
यच्छजलमपि जल (पञ्च २ ७९) ७०।२६यत्र नास्ति दधिमन्थन ८९।१
यं दृष्ट्वा मीनरूप १८।१४यच्छति प्रतिमु (किरात ९ १४) २९६।६यत्र पतत्यव (सा द १० ६३) २५१।२६
य प्राक्प्रत्यगवा ३०२।१९४यजमानेन क स्वर्गं १९९।३२यत्र यत्र चलते शनै २६०।१०६
य मातापितरौ (म २ २२७) १६७।६१७यज्जातोऽसि (शा प ७५८) २१०।३५यत्र विद्वज्जनो नास्ति (हि १ ६३) ३८।२
यं य नृपोऽनु (भोजप्र १३९) १४७।२०१यज्जीवति क्षणमपि (पञ्च १ २४) ९८।९यत्र श्यामाकवी ९५।१२९
यं शैवा समुपास (महा ना १ ३) १५।२७यत प्रभृति ते कान्तं २९१।४यत्र सूक्त (भा ५ ३२९०) ३८८।४४१
य कन्दुकैरिव ४।२७यत सत्यं त (विष्णु प्र अ ९) १४३।३५यत्र स्त्री यत्र (पञ्च ५ ६१) ३४९।३२
य करोति (किरात ११ १९) १६१।३६यत एवागतो (वृ श ६६) १६९।६९९यत्राकृतिस्तत्र गु(पञ्च.१ २०८) २७८।३२
य काकिनी (सु २९११) १५१।३७९यती व्रती चापि १७४।८८२यत्राखण्डलदन्तिद ९४।१२०
यः कुन्तपाणिरिह २४८।९१यतो गजैर्र्विना (शा प १५६०) १४३।३६यत्रात्मीयो जनो १५०।३३३
य कुर्यात्सन्धि (हि २ १३०) १४७।२११यतो यत षट्चर ३४५।५१यत्रानुल्लिखि (का प्र ७.२७३) २१८।६२
य. कुलाभिज्ञ (हि १ १३०) १४५।१९६यतो यतोऽङ्गा (शा प ३३७५) २७०।२८यत्रानेके क (भर्तृ स १७१) ३७४।१९९
य कृत्वा सुकृ (पञ्च १ ९३) १४९।२७५यत्कण्ठे गरल (शा प ५०२) १८२।५०यत्रापि कुत्रापि २२९।१४
य कृष्णं कुरु (शा प ८६४) २२६।१६५वत्करोल्यरतिं केश (गुणरत्न २) ७१।३यत्राभ्यागतदानमान ६३।४०
य कोटिहोमानल १३५।१३यत्कर्म कुर्व (मनु ४ १६१) १६७।६०३यत्रायुद्धे ध्रुवं (हि २ १७०) १४७।२१८
य कौमारहर (सा द १ २) ३५३।४२यत्कस्यामपि (नैषध १२ ८१) ११०।२४३यत्रार्जवेन लघिमा १६९।७३८
य पठति लिखति १७०।७६०यत्कीर्ति कापि गङ्गा १३८।८८यत्रास्ति लक्ष्मीर्विप १७३।८४७
य. परस्य विषमं १७१।८१२यत्कीर्तिर्वलयं भुव १३७।६७यत्रैकं श्रुतमक्षरं ३६९।८१
य पित्रा (मार्क पु २१ ९५) ३८५।३२६यत्कीर्त्या धवलीकृत १०७।१७९यत्रैता लहरीच (कुव.१७१) २५२।५६
य पीयूषसहो (शा प ११६४) २४५।१२यत्कोवनो(भा १२.११०१८) ३८९।५०५यत्रोदक (वृ चाणक्य ७ १३) ३८८।४४४
य पूतनामारणलब्ध २२।९८यत्क्षान्ति. (शान्तिश ३.१२) ३७०।९७यत्सग्रहो (राज.त ६.२२७) ३८८।४५१
य. पृष्ट्वा कुरु (पञ्च ४ ६४) १६५।५४४यत्खलु खलमूखेषु ५७।१४३यत्सकाशाच्च (पञ्च २.१००) १४९।२८०
य पृष्टुं युधि (नैषध १२ ९७) १०८।१९२यत्तादृशेषु सरलेषु न २१२।४२यत्सत्यव्रतभङ्गी (वेणी १ २४) ३६६।५
य प्रशंसति नरो ७०।३३यत्तालीदलपा (विद्ध शा.२.१५) २८६।२६यत्सद्गुणोऽपि (शा प ११९८) २४८।७४
य. प्रागासीदभि ३१३।५८यत्तीर्थाम्बु मुखाम्बुजा २७२।६९यत्सारस्वतवैभव गुरु(भोजप्र ९५) ३४।६३
य प्रीणयेत्सुच (भर्तृ स २७९) ५०।१९२यत्तु (काम नी ११ ३९) ३९०।५१४यत्स्मृत्यैव परां यान्ति (सु ३४८) ५६।९०
य. शौर्यावधिरे (शा.प ९१७) २३१।४६यत्त्वन्नेत्रसमान(सुवृत्तति २.३९) २९२।३०यथा काष्ठ (भा १२ १३३८) १६६।५८९
य श्रीख (प्र राघव ७ ६२) ३०२।१०४यत्नादन्विष्य का ग्राह्या १९९।२५यथा खननख् (मनु २ २१८) १६७।६१६
य सतापमपाक (शा प ८०९) २२१।३१यत्नादपि क (पञ्च १ ४४१) २२६।१७०यथा खरश्चन्दन (सुश्रु १.१३) ३८८।४५४
य समानं समा (पञ्च २ २२) १४९।३०४यत्नोत्थापन (शा.प ४०५६) ३६५।५०यथा गजपति श्रान्त (सु ३५४) ५६।९४
य सत्पदस्थमिह (सु १९१) ३८।२३यत्पङ्केरुहलक्ष्म ३०९।९५यथा गौर्दुह्य (का नी ५ ८४) १४९।२९४
य सर्वैका (राज त ४.५२९) ३८८।४८४यत्पद्ममादित्यु(नैषध २२ ११५) ३१२।३७यथा ग्रामान्त(र २ १०८.५.६) ३७७।३१
य. ससर्ज कमल २६२।१७७यत्पल्लव समभवत्कुसु २१२।४३यथा चतुर्भि (वृ.चा ५ २) १७५।९१४
य सिन्धौ फेनराशि ३।३४यत्पादा शिर (शा प.७४७) २०९।१६यथा चित्तं तथा (विक्रम २५२) ४६।३६
य सुन्दरस्तद्वनिता ९२।५८यत्पीयूषमयूखमालि ३०२।११३यथा छायातमौ (पञ्च २ १३६) ३७७।३३
य सृष्टिस्थितिसंहतीर्वि १।१५यत्पूर्वं पवना (शा.प.११७२) २४६।३१यथा तथापि य पूज्यो (सु.१९) १।६
य सैन्यै स्मर (शा प ३७२१) ३२४।४५
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