सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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६० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| यथा तैलस्य (भा १३ ३३८) ३८८।४५९ | यदकांशुकान्त (शा प ५९५) २०७।१४ | यदि रामा (वृ.चाणक्य १७ १६) ८९।२ |
| यथा दोषो हिमालयस्य (दृ श ४) ५५।७४ | यदर्ज्यते परिक्ले (शा प ३७८) ७१।२ | यदि वै मनसि १०४।९२ |
| यथा धेनुसहस्रेषु (पच २ १३२) ९१।१२ | यदवधि वि (भामिनी शृ वि ६०) २५५।७ | यदि सत्सङ्गनिरतो (सु ४६१) ८७।१५ |
| यथा नयति कै (शा प २०६१) १८८।३७ | यदवधि विबुद्ध ३५२।१७ | यदि सन्ति गुणा (कुव ५१) ८१।६ |
| यथा परोपकारेषु ५६।१०७ | यदशक्य न त (हि १ ९०) १६३।४५० | यदि समर (वेणी ३ ६) १५२।४०२ |
| यथा प्रभुक्रुता (हि ३ ८८) १४८।२३६ | यदसेवनीयमसता ३१।२२ | यदि स्मरामि (शा प ३४६२) २७७।५ |
| यथा बीजं विना(मा १३ २०१)३७७।३५ | यदस्माभि (शा प ४१२८) ३७३।१७८ | यदि स्याच्छीत (पंच १ २८७) ३४९।३५ |
| यथा बीजा (शा प १२९२) १४५।१२४ | यदस्य यात्रासु बलो (नैषध १८) १२५।६ | यदि स्यात्पाव (पंच ३ १९३) ३४८।२३ |
| यथामिषं ज (स्कंद नागर १८४) ६४।९ | यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं (भर्तृ स ५) ४१।५८ | यदि स्यान्म (सा.द १० ४७) २५९।७२ |
| यथा मृत्पिण्डत (पञ्च भूमि ८१) ८२।८ | यदा तु भाग्य (मृच्छ १ ५३) ६७।४७ | यदिच्छसि (शा प.१४२६) १५८।२१० |
| यथायर्थ ता. (किरात ८ २) ३३४।१२० | यदा त्वं चन्द्रो (शा प ३५६४) ३०९।३ | यदीयबलमालोक्य २८३।४ |
| यथा यथा भोज (भोजप्र ७६) ११७।८७ | यदानतोऽयदान २०६।१३ | यदुपात्तं (मार्क पु २१.९३) ३८५।३३२ |
| यथा यथाय वल २५८।३२ | यदा न योगो ३८९।४८० | यदेक कासारं रच २९२।१९ |
| यथा यथा विश (शा प ३२७०) २५४।१ | यदा पूर्वं ना (शान्तिश २ ६)३७६।३५० | यदेकस्मिन्वर्षे २४०।११७ |
| यथा यथास्या (शा प ३२८५) २५५।१७ | यदा प्रकृत्यैव (शान्तिश २ ४) ३२।३ | यदेतच्चन्द्रान्त (भोजप्र २३६) २०५।८ |
| यथा यथैव स्नेहे (शा प ३७२) ५४।२२ | यदालोके सूक्ष्मं (अ शाकु १ ९) १४०।४ | यदेतत्कामिन्या (शा प ४१७०) २४६।३५ |
| यथा यूनस्तद्व (नैषध २२ १५०) ३१।३९ | यदा वि (किरात.१४ २४) १७४।९०४ | यदेतत्क्षेत्राम्भ (शा प.१४०१) ५१।२३४ |
| यथा रन्ध्रे व्योम्न (कुव १७१) ३४२।८७ | यदा विनाश (र ३ ६२ २०) ३८३।२४३ | यदेतत्स्वच्छन्दं (भर्तृ.३.५१) ३६८।४६ |
| यथा विहंगास्तरुमा १७४।८८१ | यदा विनाशो (र ३ ६२ २०)३८८।४५६ | यदेते साधूना (शान्तिश ३ २३) ७२।५५ |
| यथा वृष्टि समुद्रेषु ५५ ७१ | यदा शरीरस्य शरी(शाकु ९४)३८९।४६८ | यदेव भर्त्ता (शा.प.४९५) १६६।६०४ |
| यथा शरीर किल (सु ५२६) ७०।३४ | यदासीदज्ञानं (भर्तृ स ६) ३७५।२४६ | यद्रन्ध्रद्विपदानवा १३७।६६ |
| यथा शरीर (कथास २२ ४०)३८२।२२८ | यदासौ दु (शान्तिश १ २२) ३६८।४८ | यद्रम्यं गुरुगौर (अमरु १५९) ३०७।६७ |
| यथा सत्प्रसव १९५।४ | यदि कुप्यसि ना (मृच्छ ५ ३४) ३०८।५ | यद्गुणैर्मथिते १३४।४ |
| यथा हि पुरुष (स.पातोप ५६)३८२।२२९ | यदि क्षुण्ण पूर्वे १११।१२४ | यद्ददाति यदश्नाति (भोजप्र ६३) ६८।२ |
| यथा हि (याज्ञ ३ १६२) ३८२।२३२ | यदि गन्तासि ३५४।७२ | यद्ददासि विशिष्ठे (हि १ १६९) ६८।३ |
| यथा हि मलिनैर्वस्त्रै (पच ४ ३०) ८४।९ | यदि गर्जति (मृच्छ ९ ३२) २९८।९ | यद्दुर्गामटवीमट ६९।११ |
| यथा हि शृङ्गं (भा १२ ९९२०) ७६।२० | यदि तव हृदयं (भोजप्र ४९) १५१।३७२ | यद्धात्रा निजभाल (भर्तृ स ५६) ९२।९९ |
| यथा ह्येकेन चक्रेण (याज्ञ १ ३५१) ८२।७ | यदि त्रिलोकी (नैषध ३ ४०) १०४।१०३ | यद्बाहू व (प्र राघव ३ २६) १०९।२२६ |
| यथेयं वाग्देवी (शा प १८२) ३५।२२ | यदिदमगणयित्वा ३०६।३२ | यद्विम्बमम्बरमणि २७।६ |
| यथोदयगिरौ द्रव्यं (हि प्र ४६) ८७।६३ | यदि दह्येतन (आनन्द देवीश.) ५०।१९० | यद्बीजानि च १२१।१५७ |
| यथोर्ध्वाक्ष पिब (कुव ९८) ३३९।११७ | यदि न स्यान्न (पच ४ ७१) १४५।१२६ | यद्धनु धनुरीश्वरस्य ९४।११३ |
| यदक्षिभ्रूलतापा (शा प ४०५९) ३६४।५ | यदि नाम कुले (सु ३१५८) ६६।१७ | यद्भर्तुं कुरुते(नैषध १२.९२)११०।२४५. |
| यदचेतनोऽपि (भर्तृःस ६५) ७९।१५ | यदि नाम दैव (भर्तृ स ३०७) २२१।९ | यन्मूलते तरलिते २०८।४० |
| यदधोऽध (हि १ १५७) ७१।१७ | यदिन्दोरन्वेति ५१।२३५ | यद्यत्परवशं कर्म (म ४ १५९)१६७।६२० |
| यदन्तस्तन्न जि (पच ४ ५३) ३४९।२७ | यदिन्दोर्लक्ष्मीस्ते २९१।१५ | यद्यदिष्टतमं तत्तद्धे ५६।१११ |
| यदपथ्यवता १६६।५७८ | यदि परगुणा (दश रू ४ १७) ६१।२५६ | यद्यदेव रुचे (शिशु १० ७१) ३१९।२२ |
| यदपि कटकयात्रा ११६।६५ | यदि प्रभुरुदारधी ३३।४८ | यद्यदेव हि वाञ्छे(हि १ १९१)१६३।४६४ |
| यदपि जन्म बभूव ९२।६९ | यदि प्रसारीकु (नैषध ७ ४३) २६३।२१० | यद्यप्यनीनं चिर २४०।११४ |
| यदपि मेघगणेन २२३।७५ | यदि प्राणा एव २९२।१८ | यद्यपि क्षितिपा(हनु ११.१९)१४७।१९४ |
| यदपि रतिमहोत्सवे ३५।५१ | यदि प्रियावियो (शा प ३४४९) २७७।१ | यद्यपि खदिरारण्ये २३८।६५ |
| यदभावि न (भर्तृ स ६६६) १६२।४२९ | यदि प्रिये वेत्सि तब ३०५।१५ | यद्यपि च दैवयो २२९।१६ |
| यदमरशैलै सिन्धो २६२।१९४ | यदि भवति दै (पच.१ १९२) ३५२।१६ | यद्यपि चन्दन (भर्तृ स ६७१) २३७।४१ |
| यदमी दश (शा प.२४४) ४८।११५ | यदि भवति (पच १ १९२) ७२।३३ | यद्यपि चातकप (चातक ८) २२६।१५३ |
| यदम्बुकणमादा (शा प ७८९) २११।६ | यदि मत्तोऽसि (शा.प ९३६) २३१।६२ | यद्यपि तरणे कि २२९।२३३ |