सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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६२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्यपद्यार्धा
| श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या | श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या | श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| यस्याङ्गिदितयं | १३।४५ | याते मध्य (भामिनी प्रा १५) | २१९।१३ | यावद्दृष्टिर्मृगाक्षीणां (धूर्तश.८४) | २५१।१२ |
| यस्याञ्जनश्याम | १३५।१२ | यातेयं रजनी | २११।४१ | यावद्यावत्कुव (शा.प ३३१६) | २६१।१५८ |
| यस्यात्मबुद्धि (भा.११.७८) | ३८४।३०३ | याते यात | २२८।२०१ | यावद्याव | २८९।५१ |
| यस्यादौ व्रज (शा प ९६८) | २३५।१४९ | यातोऽस्मि पद्म (रत्ना ३ ६) | २९५।५० | यावन्त. कुरुते (शा प ४१३९) | ३६७।८ |
| यस्यार्थास्तस्य मित्राणि (पच १ १) | ६५।६ | यात्येकतोऽस्त (अ शाकु ४ १) | ३२३।११ | यावन्चीरनिवे | ३२७।२३ |
| यस्यालीयत | ७७२ | यात्रामङ्गल (शा.प ३४३७) | २८४।३२ | याविपत्तिर्धना | ७१।२६ |
| यस्यावन्ध्यरुष (शा.प.९१६) | २३४।१४५ | दन्त्राश्रु यस्य | १२५।४ | यासा कटा (शा प ३२९९) | २६०।१०० |
| यस्याश्वोरश्चिकुर | ३७।६८ | या दक्षिणा | २८८।१५ | यासा नाम्नापि (पच ४.३५) | २५१।११ |
| यस्यासीज्जव (शा प ९५५) | २३४।१३५ | यादृग्जानासि | १६।१३ | यासा सत्यपि (सा द ३ १०) | २५२।५३ |
| यस्यास्ति वित्तं स नर (भर्तृ स ५१) | ६४।९ | यादृशि तादृशि | ६५।११ | या सा जग | ७६।३८ |
| यस्याहुरागमविद. | ४।३५ | यानि मिथ्या (शा प.१३११) | १४५।१३२ | या साधूश्च | ९३।३७ |
| यस्येषव | १०४।१०१ | यानेन तन्व्या (नैषध ७ १०२) | २६९।४१५ | या साधूनिव | ३२।५ |
| यस्योच्छिन्ना | १२२।१८८ | यान्ति न्याय | १५५।८५ | यासामबल | २५१।९ |
| यस्योदये गुरु | २१२।४९ | यान्ती गुरु (भामिनी शृ वि.५४) | २६०।९७ | या सृष्टि स्रष्टुराद्या (अ शाकु १ १) | ७।९९ |
| यस्योदये नैव | २१०।१९ | यान्त्या सर | २७९।५५ | यास्यति जलधर (भर्तृ स ६८८) | २१८।३ |
| यस्योद्यद्वाणबाहु (सु ५१) | १६।४३ | यान्त्या मुहु (मालती.१ ३२) | २७८।५१ | यास्यति सजन (पच १.२२४) | ३३।२६ |
| यस्योद्यद्भुज | ११५।३० | या पाणिग्रह | १८६।१५ | यास्यत्यद्य शकु (अ शाकु ४ ५) | ३६२।३८ |
| यस्योपवीत | १११।६३ | या प्रकृत्यैव चपला (हि २ २४) | ९७।६ | यास्यामीति (शा प.३४३५) | २८४।३१ |
| या कान्ति | २४७।६५ | या बिम्बोष्ठरुचि (शा प ३३९६) | ३३०।२ | या खसञ्जानि पद्मे (शा प ४७१) | ६२।१ |
| या दृष्ट्वा यमुना | २४।१६१ | या भार्या दुष्ट (पच ४.१५१) | ३४८।२४ | या हि शश्वद्ध | ३४९।४७ |
| या या प्रिय. (शिशु ३.१६) | २७३।२ | याभिरनङ्ग | २५०।८ | युक्तं मध्ये | २६६।३१२ |
| या पश्यन्ति प्रियं (भर्तृ ६८९) | २८३।३ | यामस्ते शिव | २१५।१५ | युक्तं यया (सु ४४०) | ६०।२४२ |
| या कटाक्षच्छटा | १९४।३८ | या महेश | २१०।१२ | युक्त प्रमा (किरात ११.२९) | १६१।३७२ |
| या कर्थचन (शिशु.१० १८) | ३१५।२१ | या माताममता | २०५।४ | युक्तमुक्तं (स्कांद काशी १) | १५९।२९२ |
| या कर्षति निज | ८४।८ | यामि न यामीति धवे (कुव ४२) | ३२९।४ | युक्तियुक्तं प्रगृह्णी (शा.प ४५२) | १५३।२५ |
| या कामिनी सा | ३४०।२ | यामिन्येषा बह (शृगारति १३) | ३५४।७९ | युक्तोऽसि | २३५।१६५ |
| या कुन्देन्दुतुषार | ३।१३ | यामि प्रेयसि | ३२९।१९ | युक्त्या परो | १५०।३५७ |
| या केलिच्युत | ३६३।४० | यामि विधाय | १८८।४५ | युगपत्खगण्ड | २।१४ |
| या गम्या (किरात.११ २२) | १६१।३६५ | यामीति प्रिय (शा प.३३८७) | ३२९।२ | युगपद्विकास (शिशु ९ ४१) | ३००।६६ |
| याचकघीरो | ७३।२१ | यामीत्यप्रिय | ३२९।२० | युगान्तकालप्रति (शिशु.१०२३) | ३६३।१५ |
| याचते कार्यकाले य (हि २.३१) | ८८।८ | यामीत्युक्ते | ३२९।१४ | युगान्ते (वृ चाणक्य १३.२१) | ३८९।४७५ |
| याचना हि पुरुषस्य (प्रसगा.१७) | ७३।२७ | या राका (गुप्तरत्न.१०) | १७८।१०१७ | युद्धं च (चाणक्य ७२) | १६२।४०३ |
| या चन्द्रस्य | २९०।८१ | या लाक्षा | १११।२६१ | युद्धकालेऽप्रगो (पच १ ५८) | १४८।२६७ |
| याचमानजन (नैषध ५ ८८) | ७२।४६ | या लोभा | ६१।२६० | युद्धा चामि (नैषध १२ ४८) | ११०।२३९ |
| याचितो यः (भोजप्र ७१) | ७०।४ | यावकरसार्द्र (का.प्र ७.१४५) | ३१७।१ | युधिष्ठिर कस्य | १९६।४ |
| याज्ञापद (वृ २७४) | ५०।२१२ | यावच्चक्रे नाज (शिशु १८ २६) | १२९।६९ | युधिष्ठिरोऽसि (शा.प.१२२८) | १०२।१६ |
| याज्ञाशून्यम (शांतिश १ १३) | ३७०।९२ | यावच्छकलितो | २०७।९ | युध्यन्ति | १६७।६४३ |
| या जयश्रीर्मनो (सा द ७ ९) | २७७।१४ | यावज्जीव | १५७।१८६ | युध्यन्ते पक्षिणश | ७०।८ |
| यातं यौवन (भर्तृ.स.६८३) | ३७४।२०७ | यावत्तिष्ठति | २१३।६२ | युष्मत्प्रौढतर | १३४।२० |
| यातस्यास्य | ३०२।९९ | यावत्त्वा न | २४४।२२६ | युष्मद्दोर्दण्ड | १३१।१२५ |
| याता. किं न मिल (अमरु.१०) | २८०।९० | यावत्पौलस्त्य (नैषध १२ ४७) | १३८।८२ | युष्मद्राजि | १२५।१३ |
| याता यान्ति च या (शा.प १५०) | ३०।३ | यावत्फलो (शा प १०२३) | २३९।११० | युष्माकमम्बर (भट्ट.१) | २७।१८ |
| यातास्ते रससार (सु १०८) | ४१।७६ | यावत्स्वस्थ (भर्तृ स ६८६) | १६१।३६१ | यूथान्त्यग्रे | २३३।९८ |
| यातीत. पान्थ (शा प १२७६) | १३३।४२ | यावत्स्वस्थमिदं (भर्तृ १९४) | १७८।१००७ | यूथि यथो | २३८।७८ |