सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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६४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या | पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या | पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| रक्ताशोक (विक्रमोर्व.४.४१) | २८३।१५५ | रत्नान्यधो (सु २१२७) | १११।२५७ | रहस्यभेदो (हि.१.९८) | ८८।२ |
| रक्तैर्नैव | १११।२६० | रत्नावलीपूर्वं | ३६।३३ | रा. पुण्यं | १६६।५८७ |
| रक्तोत्फुल्ल (सा द ३ २६५) | ३६६।११ | रत्नैरापूरितस्यापि (शा प.१०८०) | २१५।३ | राकायाम (का.प्र.१० ४५१) | २६२।१६६ |
| रक्तोऽभिजायते (पच १ १५५) | ३४८।१६ | रत्नैर्महार्हेस्तुतुषुर्न (भर्तृ स.५२) | ७७।१० | राकाविभा (का प्र ७.१५६) | ३१२।१८ |
| रक्षन्ति कृपणा (शा प ४७२) | ७०।३ | रत्नाप्तप्रिय (कुव १४०) | २६६।२९७ | राका सुधाकरकरें | २८८।४३ |
| रक्षन्ति पक्षं ((शा प १५७३) | १४३।४४ | रथ शरीरं (भा ५ ११९३) | ३८५।३४० | राकासुधाकर (का प्र.४ ४९) | २७९।५४ |
| रक्ष पात्रगतं (शा प.१११५) | २४७।६२ | रथस्थिताना (कुव ३५) | ३३१।२० | राक्षसा कलि | ९८।४ |
| रक्षाधिका | १५०।३२२ | रथस्यैक चक्र (भोजप्र.१६९) | ५२।२५१ | राक्षसेभ्य. | १९४।२० |
| रक्षामालिका (शा प ३६६९) | ३१७।१ | रथिनो रथि | १२८।२३ | रागकान्तनयने (किरात ९.६३) | ३१६।५५ |
| रक्षेत्कन्या (याज्ञ १ ८५) | ३९२।६३५ | रथेभ्यो गज (शा प ३९८४) | ३६०।७ | रागादिरोगान्सत | ४३।२ |
| रघुतिलक | ११८।१२२ | रथो रथाङ्ग | १२८।२७ | रागिणि नलिने | ७४।८ |
| रङ्गावङ्क | ३०४।१६३ | रथ्याघोषैर्बृंहणै (शिशु १८.३) | १२९।५४ | रागिण्यपि | ३६७।१० |
| रचयति | २६८।३६१ | रथ्यान्तरश्वरत (शान्तिश ४ ९) | ३७०।८८ | रागी बिम्बाध (पच.१ २२१) | ३७८।६२ |
| रचयति सहसा | ११।२२ | रथ्यारजोषु (शा प ३४०७) | ३५४।७६ | रागी भिनत्ति | १८६।७ |
| रजनिचर (विद्ध शा ४ २) | ३३६।२० | रभसादभिस | २९८।१० | रागे द्वेषे | १६६।५८० |
| रजनीमवाप्य (शिशु ९ ३३) | ३००।५८ | रभसेन हार (शिशु १३ ३२) | १२६।३९ | राघवस्य | १९४।१६ |
| रजनीषु विमल (सा द ४ ९) | १३५।९ | रमणीय | १७०।७४५ | राजंस्त्वत्कीर्ति | १३४।१ |
| रजन्यामन्वस्या (शा प ३५०९) | २९३।६ | रमणे चरण (सा द ७ ८) | ३०८।४ | राजंस्त्वद्दर्शने | १०१।१ |
| रजोजुषे जन्मनि | १४।३ | रम्भातरु | १२८।३५ | राजचन्द्रं (भोजप्र १७६) | १०२।४५ |
| रज्यन्न | २६४।२४५ | रम्भापि (नैषध ७ ९३) | २६९।३९२ | राजत सलि (भा ३ ८५) | ६४।१० |
| रजिता न | २१०।१३ | रम्यं द्वेष्टि (अ शाकु ६ ५) | २७४।६ | राजति त्रिवली | २६७।३३३ |
| रजिता नु विवि (किरात ९.१५) | २९७।९ | रम्यं हर्म्यतलं (भर्तृ स ३१५) | ३४५।४५ | राजते राजरामा (भर्तृ स ७०९) | ३२८।२ |
| रटतु जलवर (शा.प ३८७४) | ३४०।३० | रम्यं हर्म्यतलं (भर्तृ स ७०८) | २७३।१८१ | राजनि (हि २ ६४) | १७०।७४९ |
| रणत्कङ्कणाना | ३३१।२ | रम्याणि वीक्ष्य (अ शाकु ) | ३९२।६१८ | राजन्कनक (भोजप्र ३१४) | १०२।२६ |
| रणे बाणगणै (कुमार १६ २४) | १२८।१० | रम्या रामा (प्रसगाभ १३) | ३९२।६२८ | राजन्कमल | १८४।७ |
| रण्डा पीन | ३६५।५३ | रम्यार्थोक्ति | ३१।४४ | राजेन्द्रधुक्षसि (भर्तृ.स.५८) | १५२।४०५ |
| रतखिन्नतरा प्रात(शा प ३७४५) | ३२८।१ | रवि करसह | १०१।६ | राजेन्द्रौवारि (भोजप्र ३१०) | १०२।२५ |
| रतरीतिवीत | ८५।९ | रविचन्द्रौ घना | ७४।३ | राजेन्द्रिष्टस्ते भय (शा प १२७९) | १३२।८ |
| रतान्ते प्राणेशे | ३२१।२३ | रविजा शशि | १८४।७ | राजन्प्रम्यु (भोजप्र ७५) | १११।२६६ |
| रतिकृति गते (शा प ३७१२) | ३२२।५ | रवितप्तो गज (कुव ३७) | २३१।६० | राजन्नवद्य | १९३।६ |
| रतिकेलिकल (सा द ६ १९३) | २९६।१ | रवितुरङ्गतनूरुह (शिशु ६ २२) | ३३५।१० | राजनमुञ्ज (भोजप्र २१२) | ११७।९० |
| रतिक्रीडाद्यूते कथ(दशरू २.३९) | ३१६।३ | रविमणि (सु २२७३) | ३६०।१५ | राजन्नजन्यु (राज त ५ ३१७) | ३८६।३७५ |
| रतिपतिप्रहितेव (शिशु ६ ७) | ३३२।६२ | रविमावसते | २८।२ | राजनराजसुता (शा प १२६८) | १३२।२८ |
| रतिरभसनि (शा प ३६८८) | ३१९।३० | रविरपि न | ५६।१९६ | राजनिव (का प्र ७.२११) | १०५।१४६ |
| रतिरभसविला (शिशु ११ २) | ३२३।२१ | रविसुतकृत | १८९।५४ | राजनवीर | १२४।१० |
| रत्नभित्तिषु (काव्या २ ३०२) | ३६३।२ | रचे कवे• (शा प ५५४) | १९७।२१ | राजन्ससाप्य (कुव १६३) | १३३।२ |
| रत्नसानु | १०४।८४ | रवेरस्तं तेज | २९५।५९ | राजपत्नी (वृ चाणक्य ४ २०) | १६०।३२६ |
| रत्नाकर किं कुरुते (नीतिप्र.१) | ४९।१७१ | रवेरेवोदय (वेणी ?) | २०९।१ | राजश्लाट (प्र राघव ७ ८) | २७८।४४ |
| रत्नाकरतनुजनु (शा प ११४०) | ६२।१६ | रवेर्मयूखैरभि (शा प ३८३८) | ३३६।३६ | राजसेवा (कुव ५४) | १३९।१ |
| रत्नाकरस्तव | ६३।२८ | रसति तरुणीके (शा प ३८९०) | ३४२।८५ | राजा कुल (हि १ १७३) | ८६।५ |
| रत्नाकरे परि (भर्तृ स ७०५) | २४६।२२ | रसायनविद (भा १२ ८७३) | ३९२।६२२ | राजा धृणी (शा प १५४१) | १७२।८२० |
| रत्नाकरो | २१०।२७ | रसालशिखरा (शा प ८४८) | २२५।११७ | राजा तुष्टोऽपि (भोजप्र १७) | १४४।१०१ |
| रत्नाना न (शा.प.१०७२) | २१५।१८ | रसालानामन्त | १४।१६ | राजा धर्मविना (समरञ्जन.२) | ३७८।४३ |
| रत्नानि विभूष (शा.प.३०८६) | २५१।३० | रसा सार (काव्याल.५.२०) | २०६।१२ | राजानं प्रथम (हि.१.२०४) | १४३।२ |