सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| ६८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
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| वयसि गते कः काम १७४।८९६ | वर्णैः कतिपयैरेव (शिशु २ ७२) ८४।४ | वाक्यं तु यो ३८२।२२० |
| वयसी शिशुता (नैषध २ ३०) २६७।३४७ | वर्धते येन न (सूक्ति १२६ १८) ७६।२५ | वागर्थाविव (रघु १ १) १८१।२० |
| वयस्या क्रोष्टार प्रति ३६०।३० | वर्धते न चिर लोके वंश ८९।४ | वागुच्चारोत्सवं ९८।६ |
| वयो नव्यं स्वान्तं विषयतरल ३३०।१ | वर्धनं वाथ समानं (हि २ १३९) ५५।४० | वाग्वादमर्थं १६७।६४० |
| वयोभिमानादपमानता २३०।२१ | वर्धिते सेवि (शा प १०३३) २४१।१४५ | वाङ्मात्रार्यन्नान्य (शा प.१४२७) ८५।११ |
| वयोवृद्धास्तपोवृद्धा (शा प ३३४) ६५।२ | वर्धेत स्पर्धयैवोभौ (सु ३४६) ५६।८९ | वाच पल्लवयत्यु (गीत १ ४) ३७।७० |
| वरं कृतध्वस्तगुणादप्य १६६।५९० | वर्षेन्ति स्तन (शा प ३४९०) २९०।७४ | वाचयति नान्य (सु २३४४) ३६४।२६ |
| वरं गर्भस्रावो (पञ्च.भू ५) ९०।११ | वर्षानिलरजो(शा प १४१२) १४५।१०६ | वाचाशौचं च (वृ चा ७ २०) ३८६।३५२ |
| वरं तुङ्गाच्छृङ्गा (भर्तृ २ ७७) १७७।९८१ | वर्षासु का भवति निर्मधु २०२।८७ | वाचो वाग्मिनि (शृं ति २ ३५) ३११।१९ |
| वर दरिद्र श्रुतिशास्त्र(सु ३४४०)४०।३६ | वर्षासु जाता(अल कौस्तु अस १)३४०।१६ | वाच्य तस्मै २८७।६ |
| वरं दारिद्र्यम (शा प १४४१) १५३।१८ | वर्षासु भीतमवशाद्विभुजं १३२।१४ | वाजिवारण (गरुड पूर्व ११०) १६३।४७४ |
| वरं न राज्यं न (वृ चा ६ १३) | वलिभिर्मुखमाक्रान्तं (भर्तृ स १५६) ७६।४ | वाजी चारु (शा.प १५५५) १४५।११० |
| वरं पक्षच्छेद (भर्तृ स ३२१) २१५।११ | वल्गतकुच व्याकु(शा प ३६०८) ३२०।८ | वाञ्छा सज्जन (भर्तृ स ४३) ५२।२५९ |
| वरं पर्वतदुर्गेषु (भर्तृ स ३२०) ३९।५ | वल्गतकचानि वलनासट २९१।११ | वाञ्छैव सूच (पंच २ ८७) १७६।९५१ |
| वर प्राणपरि (शा प १७४३) १४७।२०९ | वल्मीकप्रभवेण (सु १८६) ३४।६५ | वाणिज्येन गत ३५५।८२ |
| वरं मौनं कार्यं (हि १ १३७) ३७८।६७ | वल्लभोसङ्गसङ्गेन (सा द १० ६८)२७५।४ | वाणि त्वत्पद (प्र राघव.१.८) ३२।५० |
| वरं वनं वरं भैक्ष्यं (शा प १३७४) ९७।५ | वल्लीना कति (शा प १०६१) २४३।१९९ | वाणी दरिद्रस्य ६५।१० |
| वरं वन व्याघ्रगजे (नीति र १५) ६६।४६ | वंशं प्राप्ते (प्र ९५) ३७८।३८ | वाणी ममैव ३१।३३ |
| वरं वरयते कन्या १६५।५४३ | वश्यभावेन सुमना ३५०।१० | वाणी रसवती ९७।३ |
| वरं विन्ध्याटव्यामन्न (सु ३०५५)८४।१८ | वसति कुत्र सरोरुहसन्तति २०१।६४ | वात स्थावर १२४।१० |
| वरं विभवहीनेन (हि १ १३५) ७१।१३ | वसन्तनीलोत्पलषट्पदाना २६०।१०४ | वातार्कीणे (शा प ३८५६) ३४०।१२८ |
| वरं शून्या (हि १.१३८) १७७।९८६ | वसन्तप्रारम्भे (सु १६८८) ३३५।१४० | वाताच्छीतिर १८९।५६ |
| वर सखे सत्पुरुषापमानि १७४।८८५ | वसन्तमासाथ २०२।७९ | वातान्दोलित (विक्रमच २६०) २२१।२७ |
| वरं हालाहल पीतं (शा प.२५९) ६४।३ | वसन्तमासाद्य २०२।८१ | वाता वान्तु (भट्ट.१०१) ३४३।१०७ |
| वरं हि नरके वासो (सु ३१६३) ६६।२० | वसन्तविश्लेषमपारयन्त्या ३४०।१७ | वाताहारतया (भट्ट.८७) ६१।२६९ |
| वरतरुविघटनपटव (शा.प ७९०) २१४।५ | वसन्त्यरण्येषु (शा प ९४५) १७४।८८३ | वाति गन्ध (र २.६१ १९) ३९२।६०२ |
| वरममी तरवो वन (सु.४८८) ७२।५० | वसुधान्तनिःसृत (शिशु.९ २५) ३००।५० | वाते वाति यद ९१।२६ |
| वरमल्पबलं सारं (हि ३ ८९) १४३।६२ | वसुमतीपतिना नु सरस्वती ३०।११ | वातैर्विधूनय (चात ३) २१२।४६ |
| वरमत्यन्तविफल (सु ३८५) ५६।११२ | वस्तुनि चिराभिलषिते १७१।७८५ | वातोद्भूतमुखी (शा.प ३६११) २९८।१९ |
| वरमश्रीकता (शा प.११३६) २४३।२०५ | वह्नं गा च (शा प ४४१७) १६६।५७९ | वातोल्लासित २१५।५ |
| वरमसिधारा तरु (पञ्च.स.९) ६५।१५ | वह्नहीनस्त्वलं (चाणक्य.५१) १६१।३८४ | वादानाशान्नु ११३।२९४ |
| वरमसौ दिवसो (अमरु १२५) २८४।१२ | वहति भुवनश्रेणीं (भोजप्र २०७) ५१।२२६ | वानीरप्रसवैर्नि (मालती ९.१५) १४०।३ |
| वरमहिमुखे क्रोधा' (शा प २५५) ८०।३८ | वहति विषधरा ५९।२०७ | वान्ति कहार (अमरु.१२२) ३४५।५६ |
| वरमुन्नतलाङ्गला (शा.प.४९३) २२९।११ | वहल्यस्या दृष्टि (प्र.राघव २ १६) २७१।४५ | वान्ति रात्रौ (शा.प.२९१५) ३४५।५५ |
| वरमेको गुणी पुत्रो (स पाठो ५३) ९०।७ | वहद्वहलमारुत ३३७।४२ | वापी कापि कदा २४७।५६ |
| वरुणेन यथा (र २.१२२.१२) ३७९।७३ | वहन्ति शोक ४५।१२ | वापी कापि स्फु (कुव.३६) २७१।५० |
| वर्जनीयो मतिमन्ता (शा प.३६७) ५४।१८ | वहन्ती सिन्दूरं (कुव.६७) २५८।३८ | वापीतोयं तटरूह (शा प.३६००) २९६।९ |
| वर्जयेदिन्द्रिय (शा प.१५१९) १५४।७३ | वहसि बलि २३९।१०७ | वापी पाताल १३८।७७ |
| वर्णं सितं समभि (भर्तृ सं ३२३) ९५।१४ | वहेदमित्रं (मा १२ ५२६४) १५५।८९ | वापी स्वल्प (पू चातका ५) २२६।१६७ |
| वर्णनदयित (शा प ४०५३) ३६४।३३ | वह्निं शीतयितु हिम (सु २२८७) ७८।१४ | वाप्या ज्ञाति ३५५।११ |
| वर्णप्रकर्षे सति (कुमार.३ २८) ३३१।२५ | वह्निज्यालेव १६०।३०५ | वाप्यो भव (सा द.१० ७८) १७१।८०३ |
| वर्णयामि विमलत्वमम्भस १२४।१ | वह्निस्तस्य (भर्तृ सं ४३) ८४।१९ | वामस्कन्धनिक्ष (कवि क ५ १) २०८।२९ |
| वर्णस्थं गुरुलाघवं न ६२।२७६ | वह्ने शक्तिर्जल (बाल रा ५ ३५) ३४७।१३ | वामासस्थल २५१।७८ |
| वर्णाकारप्रतिष्ठा (हि ३ ३२) १४७।२२५ | वाक्चक्षुःश्रोत्र ६२।१४ | वामाङ्गीकृतवामाक्षी (शा.प ६२) ३।२ |